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नालंदा थीक प्राचीन पावन ज्ञान स्थली

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लेख विचार
प्रेषित: दिलीप झा ललित
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :-  ज्ञान, गरिमा आऽ मानवताक करुण पुकार “नालंदाक चीरहरण”

नालंदा नगरी कानि उठल,
लाजक आँचर फाटि गेल,
ज्ञानक गगन जे उज्ज्वल छल,
अन्हारक बादर झांपि गेल।

मिथिलाक माटि सदिखन ज्ञान, करुणा आऽ मानवीय मूल्यक संगम रहल अछि। एहि धरती पर शिक्षा केवल रोजगारक साधन नहि, बल्कि आत्मोन्नति आऽ समाज-निर्माणक आधार मानल गेल अछि। नालंदा, जे कखनो विश्व-विद्या के दीप-स्तंभ छल, ओ केवल ईंटा-पाथरक संरचना नहि, बल्कि मानवता, सहिष्णुता आऽ ज्ञानक जीवंत प्रतीक रहल अछि। मुदा जखन “नालंदाक चीरहरण” जेकाँ समसामयिक घटना सामने अबैत अछि, तखन ई केवल एक संस्थानक अपमान नहि, बल्कि सम्पूर्ण सभ्यता, संस्कृति आऽ मानवीय चेतनाक अवमूल्यनक संकेत बनि जाइत अछि।
“चीरहरण” शब्द अपन भीतर गहन पीड़ा आऽ अपमानक बोध समेटने अछि। जखन ककरो सम्मान, अस्मिता आऽ गरिमा के सार्वजनिक रूप सँ लांघल जाइत अछि, तखन ओ केवल एक व्यक्तिक नहि, बल्कि समग्र समाजक आत्मा के घायल करैत अछि। नालंदा जेकाँ पावन ज्ञानस्थली संग जुड़ल कोनो अपमानजनक घटना, आधुनिक युग में बढ़ैत असंवेदनशीलता, नैतिक पतन आऽ मूल्यहीनताक द्योतक अछि।
एहन घटना सभ बतबैत अछि जे हम प्रगतिक नाम पर तकनीकी रूप सँ आगाँ बढ़ि रहल छी, मुदा भीतर सँ मानवीयता बिसरल जा रहल छी। शिक्षा जँ केवल डिग्री तक सीमित भ’ जाए, आऽ ओहिमे संस्कार, संवेदना आऽ सह-अस्तित्वक भावना नै रहय, तखन ओ अधखिसल ज्ञान बनि जाइत अछि। नालंदा, जे कखनो वसुधैव कुटुम्बकम्” के आदर्श के संग जीबैत छल, आइ ओकर नाम संग जुड़ल एहन घटना हमरा सभ के आत्ममंथन करबाक लेल बाध्य करैत अछि।
मानवता के पक्ष में सोचब एहि समयक सबस’ पैघ आवश्यकता अछि। हमरा सभ के बुझ’ पड़त जे कोनो संस्थान, समाज वा व्यक्तिक अस्मिता के चोट पहुँचैब, आखिरकार समग्र मानवता के कमजोर करैत अछि। सहिष्णुता, आपसी सम्मान आऽ संवाद ई तीन आधार स्तंभ अछि, जकरा बिना कोनो सभ्य समाज टिकि नहि सकैत।
नालंदाक चीरहरण केवल एक घटना नहि, बल्कि एक चेतावनी अछि चेतावनी एहि बातक जे जँ हम अपन नैतिकता आऽ मानवता के रक्षा नहि करब, तखन सभ्यता के ओ उज्ज्वल परंपरा, जकरा पर हम गर्व करैत छी, धीरे-धीरे क्षीण भ’ जाएत। समय आबि गेल अछि जे हम केवल आलोचना नहि, बल्कि आत्मचिंतन करी, अपन व्यवहार में संवेदनशीलता आनब आऽ मानवता के सर्वोपरि स्थान देब।
ज्ञानक सच्चा उद्देश्य केवल बुद्धि के विकास नहि, बल्कि हृदय के विस्तार होयत अछि। जँ हम एहि मूल भावना के पुनर्जीवित क’ सकी, तखन नालंदाक संग मिथिलो फेर सँ केवल इतिहास नहि, बल्कि वर्तमान आऽ भविष्यक मार्गदर्शक बनि सकैत अछि।
तैं अन्ततः कहब जे..
उठू नवयुवक, स्वर दिय जोर,
अन्यायक जंजीर तोड़ू आब,
मिथिला फेर नालंदा बनि उठय
एहि संकल्प सँ जागू सब।

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