स्वार्थक खेल सँ सफलता दूर-दूर धरि संभव नहि
स्वार्थी मनुष्यक बदलैत रूप-रंगः आजीवन असफल रहबाक कठोर सत्य ‘हम’ सफल होइ, ‘हम’ हर क्षेत्र मे नीक करी, ‘हम’ केकरो सँ आगू रही…. ई तीनू अवस्था जनसामान्य केर मनक भीतर होइते टा छैक। हँ, तेहने भुश्कोल छात्र रहत जे पहिने सँ हाथ-पैर चियारि देत, मुंह बाबि देत आ बकार हरण भ’ जेतैक तखन ओ ई … स्वार्थक खेल सँ सफलता दूर-दूर धरि संभव नहि




