समकालीन कविता आ डा. चन्द्रमणि झा केर रचना – मुक्त-उन्मुक्त सँ
आदिकवि – डा. चन्द्रमणि निर्दोषकेँ उत्पीड़ित केनिहार छीना-झपटी, लूटि-मारिकेँ आजीविकाक साधन बनौनिहार रत्नाकर! अहाँ कोना बनि गेलौं आदिकवि वाल्मीकि कोना बहल अहाँक हृदयसँ काव्य-रसाल कोना भेल ई कमाल? एतय तऽ लोकक कसाइ प्रवृत्ति बढले जा रहल अछि अहाँसँ एक डेग बढिकऽ निज कुटम्बहु पर करैछ अत्याचार राजनीतिक आड़िमे दुराचार-अनाचार समाजमे घृणाक पसाही लगा … समकालीन कविता आ डा. चन्द्रमणि झा केर रचना – मुक्त-उन्मुक्त सँ









