बिहारी मंत्री विनोद नारायण झा केर बयान पर सामाजिक मीडिया मे असन्तोष

सम्पादकीय

हालहि अपन कोलकाता दौरा पर बिहार केर वर्तमान सरकार मे बाभनक कोटा सँ बनल मंत्रीजी मिथिला राज्य पर दुइ अलग-अलग जगह दुइ तरहक बात रखलैन। मिथिलावासी सब जखन पूछलखिन जे अपन राज्य – मिथिला राज्य कहिया धरि बनत, ताहि पर नेताजी बड़ा सधल जबाब देलखिन जे जहिया मिथिलाक सब वर्ण एक भऽ जायत तहिया मिथिला राज्य बनि जायत। दोसर मंच पर कहलखिन जे हुनक दल भाजपा एहि सम्बन्ध मे कोनो नीति स्पष्ट नहि कएने अछि, आर ओ बिहार केँ आरो बेसी टुकड़ा करबाक पक्ष मे नहि छथि। संगहि, समूचा देश मे मिथिलावासी लोकमानस द्वारा अपन भाषा आ संस्कृति प्रति सचेतना सँ भरल विभिन्न अन्तर्क्रिया, सांस्कृतिक गोष्ठी, कवि सम्मेलन सभ पर ओ बजलाह जे ई नितान्त आवश्यक कार्य छैक, कारण देश मे बहुतो छोट संस्कृति आ भाषा सब संकट मे पड़ि गेल अछि। आब हुनकर एहि बयानक मतलब मिथिलाक सक्रिय अभियानी जे फेसबुक आ व्हाट्सअप आदि पर मातृभाषा, मातृभूमि आ भारतक संविधान मे मैथिली जेकाँ मिथिला केँ सेहो सम्मानित ढंग सँ राज्य रूप मे मान्यता दियेबाक पक्ष मे विभिन्न अभियान आ वार्ता-चर्चा आदि चलबैत छथि ओ सब नकारात्मक ढंग सँ बुझलनि अछि आर एहि लेल बिहारी मंत्री विनोद नारायण झा केर जैमकय आलोचना कय रहला अछि।

पूर्वहु मे वरिष्ठ राजनीतिकर्मी पंडित ताराकान्त झा द्वारा एहि तरहक भूल भेल छल। पद केर प्राप्ति धरि हिनका लोकनि मे मातृभूमि प्रति चिन्ता आ चिन्तन रहलैन अछि। मैथिली-मिथिलाक विभिन्न मंच पर पाग-दोपटा सँ सुसज्जित उपरोक्त बिहारी मंत्री अपन खरखांही लूटय सँ नहि चूकलाह – सब ठाम मिथिलाक अदौकाल सँ अपन विशिष्ट अस्तित्व रहल ताहि पर खूब लंबा-चौड़ा भाषण देलनि। लेकिन जखन संविधान सँ मिथिला केँ सम्मान दियेबाक बात आयल त ओ एतुका सार्वभौम जनताक एकजुटता पर फेकैत अपन पार्टीक कोनो नीति अलग राज्य बनेबाक लेल स्पष्ट नहि रहल – एहेन मंशा प्रकट कय देलनि। संगहि एकरा बाजय मे भूल कहू आ कि बुझनिहारक भूल – विनोद नारायण झा केर पूर्व वक्तव्य सँ अत्यन्त भिन्न ‘मिथिला केँ छोट संस्कृति’ आ ‘मैथिली केँ किछु लोकक भाषा’ समान ओछ टिप्पणी साक्षात्कारक भाषा सँ स्पष्ट भेल अछि। एकर प्रतिक्रिया बौद्धिक रूप सँ पूर्ण सामर्थ्यवान् वर्ग मे बेसी भेल अछि। तथापि भारतीय जनता पार्टीक किछु कार्यकर्ता आ विभाजित मैथिल जनमानसक मानसिकता सँ मंत्रीक कथ्य केर समर्थन मे सेहो क्रिया-प्रतिक्रिया सब सरेआम आबि रहल देखल जा रहल अछि। एतेक तक कि कोलकाता मे मिथिला विकास परिषद् केर सम्मान ग्रहण करय लेल पहुँचल मंत्रीजी केर पक्ष मे अशोक झा समान वरिष्ठ मिथिला राज्य अभियानी पर्यन्त अपन पक्ष रखैत देखेलाह अछि। एहि बयान सँ उत्पन्न विवादक बीच मधुबनी जिला परिषदक पूर्व उपाध्यक्ष भरत भूषण यादव द्वारा सेहो मिथिला राज्य केर स्थिति पर मंत्रीक बयान केर पक्ष मे किछु बात-विचार राखल जा रहल अछि।

पूर्वक विभिन्न समान घटना आ परिणाम केँ स्मरण करैत ई कहल जा सकैत छैक जे मिथिलाक अपन राज्यरूप मे पुनर्स्थापित होयबाक कार्य गोटेक एलिट्स (बुद्धिजीवी वर्ग) केर लोक छोड़ि आन मे कम होयबाक कारण जनप्रतिनिधि हेतु ई मुद्दा बेकार आ ब्यर्थ बुझेलैक – लेकिन एकर दुष्परिणाम सेहो बहुत खतरनाक रूप सँ प्रभावित करैत रहलैक अछि।

एक गलती केँ नुकेबाक लेल भाइ मनुष्य केँ हजारों टा गलती करय पड़ैत छैक….. मातृद्रोह भयानक भूल थिक, एकरा कियो कोनो जन्म मे मेटा नहि पबैत अछि। उदाहरणः पंडित ताराकान्त झा। पंडित जगन्नाथ मिश्र। हुकुमदेव नारायण यादव। आदि।

महाभारत मे कर्ण आ अर्जुन बीच जखन बाणक वर्षा भऽ रहल छलैक त अर्जुनक तीर सँ कर्णक रथ २-२ हाथ पाछू घूसैक जाएक, तहिना कर्णक बाण सँ अर्जुनक रथ सेहो २-२ आंगूर पाछू घूसैक जाएक। मुदा कर्णक बाण सँ अर्जुनक रथ घुसकला पर कृष्ण कहथिन – शाबाश! शाबाश कर्ण!!

ताहि पर अर्जुन कृष्ण सँ पूछलखिन, “सरकार! ई कि? हमर बाण सँ २-२ हाथ घूसैक जाएत छैक त अहाँ एको बेर वाहवाही नहि करैत छी, मुदा कर्णक बाण मात्र २-२ आंगूर घूसकाबैत अछि त अहाँ शाबाश-शाबाश केर बौछाड़ करैत छियैक?”

कृष्ण कहलखिन, “एकर किछु कारण छैक। रुकू बतबैत छी।” एतेक कहैत कृष्ण अर्जुनक रथ पर फहराइत झंडा मे साक्षात् विराजमान हनुमानजी सँ कनेक हँटि जेबाक इशारा कय देलखिन, तहिना अर्जुनक रथक पहिया केँ धरती अपन दाँत स किटकिटाकय धेने छलखिन तिनको कनेक छोड़ि देबाक इशारा कय देलखिन।

आब जे कर्णक बाण चलय लागल त अर्जुनक रथ हावा मे उड़ियाय लागल। अर्जुन कतबो सम्हारबाक चेष्टा कयलनि, हुनका सँ अपन रथ वापस पृथ्वी तक पर आनल पार नहि लगलैन। ओ विकल भऽ कृष्ण तरफ तकलैन। कृष्ण हुनकर मौन प्रार्थना केँ बुझि गेलखिन। ओ पुनः हनुमानजी आ पृथ्वी दुनू केँ अपन कार्य करबाक लेल इशारा केलखिन आर फेर अर्जुनक रथ माटि धय सकल।

कृष्ण अर्जुनक विकल अनुहार दिश तकलाह आ बात बुझि जेबाक बात कहलखिन इशारे-इशारा हनुमानजीक स्वयं रथक झंडा पर विराजमान भेला सँ बनल भार आ पृथ्वीक दाँत सँ रथ केँ धेने रहबाक बात बुझा देलखिन। मुदा कर्णक रथ मे ई सब किछुओ नहि रहैत ओ अपन बहादुरी सँ लड़ि रहबाक बात कहलखिन। ताहि लेल कृष्णक शाबाशी हुनका भेटलनि कृष्णजी स्पष्ट केलखिन।

ई दृष्टान्त हम ओहेन मनुक्ख सब केँ देबय लेल चाहब जिनका रण मे डटल रहबाक मौका छन्हि। जे समाजक बीच मे छथि। राजनीति करैत छथि। सब दिन होत न एक समाना – ई बुझि जाउ। सम्हरू। समाज केँ सही दिशा मे लय चलू। नहि त अहाँ सेहो मटियामेट भऽ जायब, जेना पहिनहुँ बहुत भऽ चुकल छथि। जाबत सामर्थ्य अछि, किछु नीक काज अपन रणक्षेत्र मे कय दियौक – यैह मोन राखत लोक।

हरिः हरः!!