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मन्दिर मे भगवानक दर्शन – एक सहज दर्शन

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मन्दिर

(सहज दर्शन – Simple Philosophy)

एकटा बन्द चहरदेवाल भीतर जीर्ण-शीर्ण अवस्थाक ओ मन्दिर, जेकर त्रिशूल मात्र केर दर्शन होइत अछि – से आइ सँ नहि कइएक दशक सँ…. आ कि मोन पड़ि गेल करैछ –

त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं

अर्थात् तीनू तरहक ताप (आध्यात्मिक, आधिदैविक ओ आधिभौतिक) केर हरण कयनिहार त्रिशूलधर्त्ता देवाधिदेव महादेव छथि जे सर्वव्यापी रहितो एहि उपयुक्त निशानी सहितक जीर्ण-शीर्ण मन्दिर मे विशेष रूप सँ विराजति छथि ।

फेर की ? हमर आत्मा हुनका मे लीन होइत कहि बैसैछ – त्रितापहरण देव महादेव की जय !

आस्था आ विश्वास मनुष्य मानसिक ग्रन्थि सँ सौंसे देह मे झुरझुरी (विद्युतीय तरंग) मार्फत शक्तिशाली ऊर्जाक संचरण कयल करैत अछि । भौतिकवादी लोक केवल दृश्य भौतिक संसार मे ओझरायल भले एहि ऊर्जाक संचरण बारे नगण्य जानकारी किंवा अनुभव रखैत हो, परञ्च भक्तिमान व्यक्ति लेल यैह विश्वास प्रबल बनैत चलि जाइछ । अन्त मे मुक्त भ’ जाइछ ।

मुक्तिक परिभाषा सेहो भौतिक दृष्टि आ आध्यात्मिक दृष्टि दुनू सँ दुइ प्रकारक भेल करैछ । भौतिक दृष्टि मुक्तिक अर्थ स्वतंत्रता सँ धराधाम मे जिबय केँ बुझैछ, आध्यात्मिक तौर पर मुक्ति कहल जाइछ जे कोनो तरहक मायावी अथवा सांसारिक बन्धन सँ मुक्त रहब । मायावी भेल जे सांसारिक सम्बन्ध, सांसारिक मोह, लोभ-लालच जे हमरा ई भेटय, ओ भेटय, आदि तथा सांसारिक बन्धन भेल पत्नी, पुत्र, परिजन, आदिक संग लेपटायल रहब ।

मन्दिरक आगाँ स्वतः मन-माथ झुकि जाइछ । कियैक ? कियैक तँ स्वयं केर आत्मीय अस्तित्व केँ बुझनिहार परमात्माक सर्वशक्तिमान आ कण-कण मे विराजित हेबाक बात, साँस-साँस मे हुनकहि प्रवेश आदिक बात, हर पक्ष, हरेक चिन्तन मे केवल आ केवल परमपिता परमेश्वर प्रति कृतज्ञताक भाव भरल रहैछ । जाहिठाम कियो गोटे विशेष परिकल्पनाक संग मूर्ति रूप मे परमात्माक कोनो विग्रह स्थापित कएने छथि, ताहिठाम स्वतः आत्मीयता भरल प्रेम आ श्रद्धा-सम्मान सँ मन-माथ झुकैत अछि ।

अहाँ जीवन मे विनम्र बनब, सब किछु हासिल कय सकब । ‘मुद्रा आ बैंकिंग’ (Money & Banking) विषय मे आई. कौम. मे पढ़ने रही कहियो – “Courtesy costs nothing but buys everything.” विनम्रताक कोनो दाम नहि छैक परञ्च ई दुनियाक हरेक चीज कीनि सकैत अछि । अर्थात् मुद्रा जाहि मे हम-अहाँ भौतिक रूप सँ मान्यता प्रदान करैत माइन-मोजर स्थापित कय देने छियैक तेकरा मे क्रय क्षमता (किनबाक सामर्थ्य) छैक । लेकिन एहि पंक्ति केँ ‘कर्ट्सी’ (विनम्रता – पोलाइटनेस) मे परिवर्तित कय देला पर मुद्राक काज अदृश्य रूप मे भ’ जाइत छैक ।

मन्दिर मे कि छैक ? पाथरक मूर्ति दृश्यमान् छैक । परञ्च शक्ति आ पाथर ? मिललैक संयोग ? जी, संयोग तखन मिलि जाइत छैक जखन अहाँक अपन आत्मा आ तेकरा संग-संग ई शरीर व सम्पूर्ण दृश्य-अदृश्य भाव-अनुभूति मे ओहि पाथर मे किनकर परिकल्पना कयल गेल छैक से टा दृश्य हो, बुझल हो आ बुझबाक निरन्तर कोशिश (अभ्यास, साधना) सेहो हो ।

एहि मन्दिर लग सँ आरो कतेको लोक गुजरैत हेतैक । हम नित्य टहलबाक क्रम मे अपन गुजरबाक समय आन कतेको केँ देखैत छी । जरूरी नहि छैक जे सभक मन-माथ ओतय झुकतैक । मन-माथ मे जँ पहिनहिं सँ गिनती चलैत रहतैक जे फल्लाँ ठाम फल्लाँ मन्दिर मे हमर इष्टदेव विराजित छथि, ओ पूजित छथि कि अपूजित छथि, ओतय धूप-दीप, आरती, भोग आदि पड़ल कि नहि पड़ल – परञ्च हम इष्टदेव ओतहि छथि । ओ त्रिताप हरण कयनिहार छथि । बस ।

एतेक विश्वास सँ मनक ग्रन्थि केँ शुचितापूर्वक बन्हने रहू । ईश्वर प्रत्यक्ष देखा जेता । ऊर्जा आ शक्ति प्राप्त भ’ जायत । ॐ तत्सत् !!

हरिः हरः!!

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