विभूति आनन्द केर कथा “प्रोफेसर”

#कथा_सीरीज
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प्रोफेसर:आठ

आइ भोरे-भोर श्रद्धाक रिंग आयल. ओना तकर उम्मीद तॅं छले– ‘प्रणाम सर !’
– ‘खुश रहू. काल्हि अछि ने!’
– ‘जी…’
– ‘कखन धरि अबै छी ? विभाग एगारह बजे सऽ पहिने पहुॅंचि जायब !’
– ‘जी…’
– ‘और किछु !’
– ‘हेड साहेब फोन करैत रहै छलथिन, कैक दिन सऽ !’
– ‘की ?’
– ‘एक्सपर्ट सऽ बात भेल ?, हुनका लेल कोन होटल बुक कैलियनि ?, हुनकर टीए-डीए अपने दिस दऽ देबनि, बाद मे चेक अपन भजबैत रहता, आदि-आदि…’
– ‘आरो किछु ?’
– ‘वएह, हैभी पैकेटक बनबायब ! ओपेन भाइभा होइ छै ने, पचास सऽ कम लोक की रहत…’
– ‘आर ?’
– ‘बहुत ठंढ छै, दू बेर कम-सऽ-कम काॅफीक इंतजाम जरूर राखब !…’
– ‘आर ?’
– ‘डिपार्टमेंटल प्रोफेसर्स आ एक्सपर्ट कें नीक होटल मे लऽ जा कऽ भोजन करयबाक परंपरा छै, से तऽ गाइड कहनहि हैता !…’

आ सुनैत-सुनैत लागल जेना हमरहि माथ फाटि जायत ! केहन मजाक कऽ देने छै पीएचडी भाइभा कें ई सभ ! मोन भेल जे श्रद्धाकें कहि दियनि जे किछु करबाक जरूरत नहि छै ! बस दू बेर चाहक इंतजाम टा कऽ लेब. मुदा सेहो कथी लेल ! अहाॅं बहरिया स्काॅलर, कोना-कतऽ सॅं करब ! अच्छा, प्यून सॅं पुछबै. इंतजाम कऽ देत तॅं बड़ बढ़ियाॅं, उचित टका थमा देबै !
मुदा से सभ किछु कहल नहि भेल. ओना दुख तॅं जरूर भेल. आ विवशता सेहो. किएक हमरा चलते अनेरे कोनो फेर मे पड़तीह. आखिर हेड तॅं वएह छथिन. हम तॅं अवकाश प्राप्त छी. माने निहत्थ !…

ओना, जाहि समय नोकरी मे रही आ अपन कोनो-कोनो स्काॅलरक भाइभा मे काॅलेज सॅं आबी तॅं देखिऐ पैकेट बॅंटाइत ! हमरो भेटय. मुदा हम एहि मादे अधिक खोध-बेध नहि करिऐ. ओना स्काॅलर सेहो किछु नहि कहय. तें विश्वास रहय जे ई सभ चाय-नाश्ता, आकि होटलबाजी विभागे दिस सॅं होइत हएतै !
बाद मे जखन किछु वर्षक लेल यूनिवर्सिटी विभाग मे ट्रान्सफर भेल, तखन जा कऽ अंतर्कथा बुझलिऐ ! शोषणक ई परंपरा पुरान रहै. जें कि सभ सॅं जूनियर रही, कथी लेल किछु बजितहुॅं ! चुप्पी सधने रहलहुॅं.
ओना मोन मे आबय जे एकर विरोध करी, मुदा एसगर वृहस्पतियो झूठ ! तथापि एकदिन अपन एक सहकर्मीक निकट फुसफुसायल रही. मुदा ओ तर्क देने रहथि– ‘एहि सभ कथी ले’ दिमाग दौड़बै छी । एखन जतेक-जे भायभा भऽ रहल छै, सभ जेआरएफ छथि !’
– ‘तकर माने ?’
– ‘हिनका सभ के प्रतिमाह यूजीसी द्वारा एक खास एमाउंट भेटै छनि ! संगहि कंटीजेंसी लेल सेहो…’
– ‘अच्छा !’
– ‘आ काज तऽ देखिते हैबनि ! जेना कि वेतन उठबैत जाइत होथि !’

आ से मानसिकता बुझा गेल. तें आगू सॅं बहस/ विरोध करब ठीक नहि लागल. ओना प्रतिप्रश्न उठल छल जे पुछियनि कि ई सभ तॅं आनो-आनक भायभा मे होइत छनि ? मुदा मुखर नहि भऽ सकल रही.
ओना तॅं किछु वर्ष बाद पुनः कालेज मे ट्रांसफर भऽ गेल छल. तखन तॅं फेर जतबा अपन सक मे रहय, कोनो स्काॅलरक सुपरवाइजर बनब नहि गछलियनि. इएह श्रद्धा कोना-ने-कोना बाॅंचल रहि गेल छलीह !
मोन पड़ल, एकटा भाइभा मे तॅं अचंभित रहि गेल रही ! वएह सहकर्मी कहलनि– ‘अहाॅं तऽ महादेव जी, सूगरक पेंसेंट छी ?’
– ‘जी !’
– ‘हमहूॅं !’
– ‘अच्छा…’
आगू कहलनि– ‘काल्हि एक टा जेआरएफ के भायभा छनि !’
– ‘अच्छा, सुपरवाइजर के छथिन ?’
– ‘हमरे अंडर मे छै…’
– ‘वाह !’
– ‘हॅं, तें कहि देलियनि अछि जे नाश्ताक जॅं बन्दोबस्त करी, तऽ बूझल अछि ने, हम आ महादेव जी सूगर पेंसेंट छी !’
– ‘जी. मुदा तकर अर्थ नै बुझलिऐ !’
– ‘अपना दूनू गोटेक लेल ‘सूगर फ्री मिठाइ’ फराक सऽ रहत !’
मुदा सत्य कही तॅं फेर ताहि पर कोनो तरहक प्रतिक्रिया देब हमरा लेल सहज नहि भऽ सकल. मुदा तकर फलाफल ई भेल जे जाधरि विभाग मे रहलहुॅं, ओहि प्रथाक संग, संग पुरैत रहब बाध्यता भऽ गेल रहय…

आ से ई सभ तॅं अछि ओकर एक पक्ष ! अहम पक्ष अछि ‘ओपेन भाइभा प्रकरण !’ से आबहु जहिया-जहिया किनकहुॅं भाइभा होइत छनि, आ जाय पड़ि जाइत अछि तॅं राजा बाबू स्मरण आबिये जाइत छथि ! एकटा विभागीय प्रोफेसर रहथि. ओ प्रश्न पूछऽ मे, आम शब्दावली मे कही तॅं, ‘कुख्यात’ रहथि ! आ तें कैंडिडेट सतत हुनका सॅं डरल-सहमल रहैत छथि. ओना उल्लेख करैत चली जे पीएचडीक रिजल्ट निकलले रहैत छै ! हमरा जनतब मे क्यो फेल नहि होइत अछि. हॅं उन्टे, पीएचडीक लेल प्रस्तुत थीसिसकें डीलिट् भेटि जयबाक एकाध जनतब जरूर अछि !
हॅं तॅं राजा बाबू ! ओ एक युक्ति निकाललनि, आ भाइभा सॅं एकदिन पूर्व उल्लेखित प्रोफेसरक डेरा पर पहुॅंचि गेलाह ! से एकदम सॅं धखाइत ! प्रोफेसर साहेब तॅं अति विनम्र– ‘अरे राज नारायण जी ! आउ-आउ, एना अचानक भोरे-भोर ! की सभ टा कुशल ने ?’
– ‘जी, काल्हि छै ने… तें आशीर्वाद लेल…’
– ‘अरे नै नै, सभ टा फस्ट क्लास रहतै ! एहि लेल एतय अयबाक…’
– ‘तैयो सर…, बात ई छै जे…’
भरिसक प्रोफेसर साहेब कें लगलनि जे ओ किछु बाजऽ चाहैत छथि, मुदा बाजि नहि पाबि रहल छथि, स्वयं पूछि देलथिन– ‘किछु कहऽ चाहै छी की ?’
– ‘जी, जी सर…’
– ‘बाजू, निधोख बाजू ! डर कथीक, अपने घर अछि !’
– ‘ज्जी…ज्जी… काल्हि लेल किछु गेस कऽ दितिऐ…’

आब तकर बाद प्रोफेसर साहेबक केहन-की प्रतिक्रिया भेलनि, से ओतेक महत्वपूर्ण नहि, महत्वपूर्ण ई जे दोसर दिन विभाग मे पूछपाछ आरंभ होइतै, कि ताहि सॅं सेकेंडे पूर्व दृश्यमे नाटकीय मोड़ आबि गेलै, आ राजा बाबू कें हठात् दम्मा उखरि गेलनि ! आ से ताधरि खोंखी होइते रहलनि, जाधरि स्वास्थ्य कें देखैत एक्सपर्ट अपन रिपोर्टपर सिग्नेचर नहि कऽ देलथिन, आ राजा बाबूकें अध्यक्ष द्वारा कहि नहि देल गेलनि जे– ‘तऽ होउ राजनारायण जी, आब सभक चरणस्पर्श करियनु ! आब सऽ अहाॅं डाक्टर भेलहुॅं…’
मुदा सर्वाधिक स्मरणीय अछि एकटा ग्रामीण आ विधवा रिसर्च स्काॅलर, आ हुनकर भाइभा ! ओ इंटरव्यूक पश्चात सभ अतिथि कें ऑंचर हाथ मे लऽ कऽ आ बैसि कऽ गोर लगलथिन. सेहो पारंपरिक ढंग सॅं तीन बेर कऽ ! ई दृश्य हमरे लेल टा नहि, ओतऽ उपस्थित सभक लेल विरल छलनि !
तकर बाद एक आर घटना घटलै ! एक बालक, जे प्रायः हुनकर पुत्र रहथिन, बाहर मे अखबारक प्लेट बना नाश्ता सजा रहल छलनि, तकरा माय-बेटा संगे मिलि परसऽ लगलीह. ओहि प्लेट मे छलै दू-दू टा कऽ खजुरी आ पिरुकिया, आ फराक सॅं एक-एक जोड़ जनौ, ई कहैत जे– ‘सर अपने बनबै छिऐ ! एही सऽ कहुना…’
से किनको लग तखन कोनो शब्द नहि छल. मुदा अंततः एक्सपर्ट कें बजा गेल रहनि – ‘ई पीएचडी कऽ कऽ आब की करबै ?’
– ‘सर एकर बाप के बड़ इच्छा रहै जे हम डाक्टर होइऐ, आ प्रोफेसर बनिऐ !…’
से नहि जानि, ओ महिला कतऽ छथि, आ एखन ओ की करैत छथि, मुदा हुनक सपना आ पारंपरिकता यदाकदा स्मरण आबिये गेल करैत अछि ! आब ओहन सांस्कृतिक स्पर्श कतऽ पाबी !

मुदा भने स्मरण आबि गेल ! हॅं, हमर अपने भाइभा ! से पटना यूनिवर्सिटी ओहिना नहि कहल जाइत रहै ! हमर जहिया भायभा रहय, नहि स्मरण अछि जे एहन सन किछु भोज-भात, कि पैकेज आदिक ओरिआन भेल रहै. डिपार्टमेंट तॅं हम एसगरे गेल रही, साइकिल टुनटुनबैत. नहि, भरिसक बादमे हमर ससुर आयल रहथि. हमरा सँ बेसी हुनके बेचैनी रहनि जे हम कहिया डाक्टर बनबै !
ओना सर्वाधिक चिंतित तँ रहल करथिन हमर गाइड ! ओना ओ बड़ तमसाह, मुदा हम जल्दी सॅं लीखि कऽ थीसिस जमा करी, ताहि लेल अनेक बेर जतऽ-ततऽ टोकि कऽ लज्जित कऽ देल करथि !
से आब जेना दृश्य मोन पड़ैत अछि, ओतऽ एक चाहक दोकान रहै, रामायण सिंहक ! जतऽ सँ इंटरव्यूक बाद दस-पंद्रह कप चाय आयल रहै ! आ से अध्यक्ष जखन ओकरा पाइ देबऽ लगलथिन, आकि रामायण सिंहक मुँह सँ सहमल सन आवाज निकलल रहनि– ‘सर इसका पेमेंट हो गया है…’
– ‘कैसे हो गया, कौन दे दिया ?’ ओ तमसा गेलथिन.
आ तखन जा कऽ रामायण सिंह हमर ससुर दिस तकने रहै ! अध्यक्ष गुम…
से हमहूँ तखनहि जा कऽ बुझने रहिऐ. ओना हमर ससुर बहुत विनम्र स्वभावक, आ प्रायः सभ गोटेक पूर्वपरिचित सेहो, अस्फुट शब्दें बाजल रहथिन जेना– ‘तऽ की भेलै श्रीमान, हम देलिऐ तऽ अपनहि देलिऐ !…’
… अरे एकर उपसंहार तॅं छुटले जाइत रहय ! हमरा सॅं बेसी हमर भविष्यक लेल चिंतित एक आर अहम व्यक्ति रहथि, देवेंद्र बाबू ! ओ प्रेस चलाबथि. से बाद मे सुनल भेल छल जे ओ हमरा चलि गेलाक बाद आयल रहथिन ‘न्यू पिंटू होटल’क स्पंजी रसगुल्ला लऽ कऽ ! कहाॅंदन तकरा अधलाह नहि मानल गेलै. किएक तॅं सभ कें सुनल रहै अध्यक्ष महोदयक रसगुल्ला-प्रेम !

ओहुना हमरा पीएचडी-थीसिसक प्रसंग आइडिया शुरुये सँ अधलाह रहल ! आ जकर कारणो हमर अध्यक्षे रहथि. ओ एहिना कहियो बाजि गेल रहथिन– ‘हओ, पीएचडी थिकै पवित्र चोरि ! संदर्भ सभकें विभिन्न ग्रंथ सभ सँ उतारि लएह आ नीचा फुटनोट मे तकर उल्लेख कऽ दहक !’
आ से सभहक लेल कहथिन. मुदा ई तँ बाद मे जखन यूनिवर्सिटी सेवामे अयलहुँ, तखन जा कऽ बुझल भेल जे एकर अनेक फैक्ट्री छै, जे पाइ लऽकऽ थीसिस लिखि दैत छै ! सेहो नामी-गिरामी प्रोफेसर सभ सेहो !
से एकटा हमर गैर-प्राध्यापक मित्र छथि. ओहो रिटायर छथि. एक दिन थीसिस-लेखन पर गप चललै, तँ शुरू भऽ गेल रहथि– ‘हम आ कका लगभग तुरिया रही. गाम-बाबाक बंगला मे एकटा रूम रही आ ट्यूशन कऽकऽ पढ़ी. ओतऽ समय-समय पर थीसिस सेहो लिखल करी ! आ थीसिस कोना लिखाइ, तऽ जेना कोनो स्टूडेंट आयल. बाबा विषय चूनि देथिन. सिनॉप्सिस सेहो बना देथिन. पहिने ओइ समय मे एतेक लफड़ा नै रहै ! हेड ऑफ द डिपार्टमेंट ओहि सिनॉप्सिस के एप्रूव कऽ देथिन…’
– ‘अच्छा …’
– ‘हँ तकर बाद, जे इंडियन, दि हिंदू, आकि टेलिग्राफ, सर्चलाइट अखबार सभ अबै, बाबा तकरा सभ के ओरिया कऽ रखने रहैत रहथिन. सभ मे देखिऐ कोनो-कोनो रिपोर्ट के कारी कलम स’ घेरि-घेरि कऽ रखथिन…’
– ‘ओ…’
– ‘… फेर जेना कहियो बैसला दिन मे, हमरा सभ के 1. 2. 3. 4. 5. 6. 7. 10… टा कऽ क्लिप्स द’ देलनि ! हम सभ ओकरा उतारि दिऐ पेज सभ मे…
– ‘तखन ?’
– ‘तखन की, ओकरा बाद मे ओ कतौ-कतौ सऽ काटि देथिन, तऽ आगू जोड़ि देल करथिन. अर्थात जेना ‘गो टू पेज नंबर 6.’ , तऽ शेष दू टा पाराग्राफ डीलिट ! आ एना कऽ कऽ चैप्टर तैयार ! फेर तकर बाद ओ टाइप मे चलि जाइ ! अजय बाबू, जे एखन हमरे महल्ला मे रहै छथि, ओइ समय मे बोटेनी डिपार्टमेंट मे क्लर्क रहथि, टाइप कऽ देल करथिन ! ओ बाबा के पेटेंट रहथिन…’
– ‘फेर ?’
– ‘फेर की ! तकर बाद आगू की सभ होइ, से हमरा सभ के की मालूम ! हमरा सभ तऽ तहिया विद्यार्थी रही. एक तरहें कृपापात्र ! ओइ समय मे दू सय भेटि जाय !
– ‘दुइये सर !’
– ‘हॅंयो, ओ जमाना रहै, 76-77 मे, जखन ट्यूशन घरे-घरे जा कऽ 40 टका मे पढ़ाबी ! तेहना मे दू सय टाका भेटि जाय, तऽ अलभ्य लाभ बुझाबय ! आ से सोचल करी जे महिना मे जॅं दुइयो टा थीसिस भेटि जायत, तऽ कथी लेल डेरे-डेरे बौआबी ! मुदा…’
– ‘विषय सभ, जेना कि ?…’
– ‘वएह, जेना कि ‘वाल्स ऑफ पोलिटिक्स’, ‘वाल्स ऑफ दरभंगा’, ‘इण्डो नेपाल रिलेशनशिप’, ‘प्री एण्ड पोस्ट चोग्याल सिक्किम’… सएह सभ तऽ टॉपिक्स भेल करै ! अरे, विभिन्न आर्टिकल सभ नै पेपर सभ मे अबै छै ! बस-बस, ओही सभ मे सऽ छाँटल करथिन ! आ से एखनो कहाँ कोनो अंतर…, बस, पहिने अंग्रेजी मे लिखल जाइ, आब मुदा…’
मोन मे आयल जे कहियनि– ‘मतलब हुनके सभक दूरि कएल ई सिस्टम…’
मुदा कहल किछु नहि भेल. आ से आब कहिये कऽ की ! तें मूड मे कनेक चेंज अनलहुॅं– ‘तऽ बाबाक थीसिस के प्रैक्टिस बढ़ियाँ रहनि !’
– ‘हँ हँ, ओइ समय मे ट्यूशन/ थीसिस हुनकर…, यो कॉपी सेहो जँचाइ ! साइंसक विद्यार्थी रहितो हमहूँ सभ जँचने छी पॉलिटिकल साइंस औनर्सक कॉपी…’
– ‘पहिने डेरे पर देखाइ…’
– ‘हँ हँ, डेरा पर सऽ जाइ, आ कॉपी सभ स्टेशन सऽ बिल्टी छोड़ा कऽ आनी ! तकरा बाद बाबा, हमरा सभ मे कॉपी बाँटि देथि, आ बुझा देथि– इंगलिश मे जे लिखने अछि, तकरा सिक्सटी-सेवेंटी के बीच मे भेटबाक चाही. आ हिंदी वला सभ के फिफ्टी फाइव-सिक्सटीक बीच. तकर बाद मेरिट…’
– ‘ओ…’
– ‘हँ, शुरू मे गंभीरता सऽ पढ़िऐ, फेर दू-चारि टा ऊपर सऽ, दू-चारि टा नीचा सऽ, बाद मे एवरेज बैसा देल करिऐ…’
– ‘तऽ ओ अपने…’
– ‘बाबा के डिपार्टमेंट, ट्यूशन सभ सऽ फुरसति कहाँ ! आ फेर यूनिवर्सिटी-पॉलिटिक्स… वएह सभ तऽ रहथिन…’

आ फेर तँ हमर धैर्य सही मे जवाब दऽ देलक. अपन एहन परम्पराक प्रति मोन आर घोर भऽ गेल. आकि अनायासे मुजफ्फर रज्मीक एकटा शेर ठोर पर टहलि आयल– ‘लम्हों ने ख़ता की थी, सदियों ने सज़ा पाई…’
– 13. 01. 2023

✍️लेखक:-श्री विभूति आनंद