मैथिली पढौनीक विशुद्ध लाभ कम-साक्षरता दर व पिछड़ा जनसमुदाय केँ, तखन गलत राजनीति कियैक?

खास बात-विचार

सन्दर्भ: मैथिली साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समिति, मधुबनीक संस्थापक मैथिली कवि-साहित्यकार एवं शिक्षक दिलीप कुमार झा द्वारा ‘प्राथमिक शिक्षाक माध्यम मैथिली’ केर मांग पर फेसबुक सँ धरातलीय विमर्शक सम्बन्ध मे आजुक टटका-टटकी बहस

भूमिका: भारतक संविधान द्वारा देल गेल मौलिक अधिकार मे पड़ैत अछि ‘प्राथमिक शिक्षा मातृभाषाक माध्यम सँ’ हो, परञ्च ‘मैथिली’ भाषा केँ पूर्ण भाषा होयबाक विन्दु पर जानि-बुझिकय विवाद ठाढ कय एकरा हिन्दी वा बंगालीक बोली आदि कहिकय नकारबाक प्रवृत्तिक कारण हाल धरि अपनहि राज्य बिहार मे ‘राजभाषा’ केर दर्जा नहि पायब, ओम्हर मैथिली संघर्ष करैत-करैत जखन राष्ट्रक संविधानक आठम् अनुसूची मे जगह लय लैत अछि तखनहुँ वोटबैंक केर राजनीति कय केँ मैथिली भाषा सिर्फ उच्च जातिक भाषा थिक कहिकय एकरा पाछुए राखब… एहि सब प्रवृत्तिक कारण हाल धरि मैथिलीभाषी जनमानस केँ संविधानप्रदत्त मौलिक अधिकार तक नहि भेटल अछि। पटना उच्च न्यायालय सँ दिल्लीक सर्वोच्च न्यायालय धरिक लड़ाई मैथिली भाषाक पक्ष मे आबि गेल, लेकिन अराजक आ अबुझ राजनीति केर कारण पिछड़ापन दूर करबाक बदला, असाक्षरता केँ कम करबाक बदला एखन धरि मैथिली मे प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षाक स्थिति सेहो अराजक अछि। एहि सब विषय मे सामाजिक संजाल पर विमर्श त होइत अछि, लेकिन डा. जयकान्त मिश्र समान उच्च जानकार, भाषाविद्, भाषाक महत्व सँ आमजन केँ जोड़निहार अधिकारकर्मी द्वारा प्रारम्भ कयल गेल न्यायिक संघर्ष केँ परिणामोन्मुखी बनेनिहार, कोनो संघर्ष केँ ओकर मंजिल धरि पहुँचेनिहार ‘अभियानी’ आइ मिथिला मे घोर अकाल पड़ि गेल अछि। मात्र फेसबुक पर खरखाँही लूटय लेल, अपना केँ चिन्तकवर्गक लोक सिद्ध कय अपन पीठ अपनहि थपथपाबय लेल काज करबाक ढकोसला कहि सकैत छी एकरा। एहि सन्दर्भ मे आइ जे विमर्श प्रारम्भ कयल गेल अछि ताहि पर राखल गेल प्रतिक्रिया आम पाठकजन केँ सेहो ज्ञानवर्धन करत जे आखिर हमरा सभक भाषाक स्थिति एना दयनीय कियैक अछि भारत मे, खासकय बिहार मे।

पहिने देखल जाउ आदरणीय दिलीप भाइ केर प्रस्ताव: 

मैथिलीक फुनगी बहुत चतरि पसरि रहल छैक मुदा जड़ि उकन्नन भ’ रहल छै। से जनितो गबदी मारने पड़ल रहब एकटा अपराध अछि, मातृभाषाक प्रति मातृभूमिक प्रति। ई प्राय: सभ मिथिलावासी जनैत छथि मुदा किछु लोक एहन छथि मोन रहितो किछु करैमे अनेक कारण सँ असमर्थ छथि। हम भाषाक प्रश्नपर मैथिली अभियानमे आयल छी, साहित्य सँ पछाति लागि भेल।

एखन हम गप क’ रहल छी नेना लोकनिकेँ पाठशालामे मातृभाषा पढ़बाक अधिकार कोना भेटतै। हमरा जनैत मिथिला क्षेत्रमे प्राथमिक पाठशालामे शिक्षाक माध्यम मैथिली हुए मुदा राजनीतिक कुचक्र एखन एकर संभावना क्षीण क’ रहल अछि तें बहुतो मैथिली अभियानी, विचारक सँ विमर्शक पछाति एहि निष्कर्षपर पहुँचलहुँ अछि जे राज्य सरकार अपना विद्यालयमे आ केन्द्रीय मा. शि. बोर्ड सँ सम्बद्ध विद्यालयमे केन्द्र सरकार मैथिलीक पढ़ौनी प्रारंभ करय।

मात्र दूटा माँग अछि

पहिल: मिथिला क्षेत्रक सभ प्राथमिक पाठशालामे एकटा अनिवार्य मातृभाषा बिषयक रुपमे मैथिली क पढौनी प्रारंभ कयल जाय।

दोसर: माध्यमिक कक्षामे पूर्बे जकाँ अनिवार्य बिषय के रुपमे मैथिली पढ़ाओल जाय जकरा सम्प्रति एच्छिक क’ देल गेल अछि।

एहि बिषयपर विचार विमर्श करबा हेतु एकटा संगोष्ठीक आयोजन अगिला २२ दिशम्बर२०१८ क’ १ बजे प्राथमिक शिक्षक संघ भवन, मधुबनीमे कयल गेल अछि। उपरोक्त विचार सँ सहमति रखनिहार समस्त मातृभाषानुरागी, मिथिला राज्य अभियानी एहि संगोष्ठीमे आमंत्रित छी।

“निज भाखा केर ज्ञान लेल
मातृभूमि केर मान लेल
डेग सँ डेग मिलाबी
चलू! मैथिली के पाठशाला धरि पहुँचाबी”

पुन: देखू प्रतिक्रिया मे निहित ओ सब बात जेकरा नव विचार करयकाल कतहु चर्चा तक नहि कयल गेल अछि:

आदरणीय दिलीप भैया,
 
विनम्रतापूर्वक मांग केर प्रकृति पर किछु तकनीकी दृष्टिकोण सँ पुनर्विचार करब आवश्यक अछि।
 
*मिथिलाक्षेत्र परिभाषित नहि रहबाक कारण राज्य एकरा पर कहियो कान-बात नहि देत, जखन हम-अहाँ सेहो नहि जनैत-बुझैत छी जे फल्लाँ-फल्लाँ जिला ‘मिथिलाक्षेत्र’ थिक, तेहेन परिस्थिति मे राज्य ‘जनभावना’ केँ आधार बनाकय ‘जनताक मांग अनुसार’ जाहि-जाहि जिला मे मैथिली मातृभाषा-भाषी जनगणनाक तथ्यांक अनुरूप उपलब्ध छथि ताहि ठामक सरकारी शिक्षा मे मैथिली पढौनी जे आइयो वैकल्पिक विषयक रूप मे उपलब्ध अछि तेकरा अनिवार्य विषयक रूप मे हिन्दीक स्थान पर किंवा अहिन्दीभाषीक लेल स्थापित प्रारूप ५०-५० अनुपातहु मे कम सँ कम प्राथमिक शिक्षा मे लागू करथि।
 
*कोनो भाषाक पठन-पाठनक अनिवार्यता समाप्त करबाक सब सँ पैघ आधार होइत छैक ‘भाषा मे रुचि राखयवला’ छात्रक संख्या। उच्च विद्यालय केर ९-१० कक्षा सँ एकरा कहिया आ कियैक हंटायल गेल, ताहि पर पहिने एकटा सूचनाक अधिकार प्रयोग कय शिक्षा सचिवालय सँ प्रतिवेदन मांगल जाय। तदनुरूप अनिवार्यता वा ऐच्छिक विषयक निरंतरता पर अपने लोकनि ‘विमर्श’ करी। आर, ताहि अनुसारे मांगपत्र – हस्ताक्षर अभियान सँ संकलित हस्ताक्षर आदिक संग राज्य संचालन पद्धतिक सोझाँ अपन बात राखी।
 
एकटा बात अनुभवक आधार पर आरो कहय चाहब:
 
२०१४ मे १० फरबरी सँ २१ फरबरी धरि निरन्तर १२ दिन तक मिथिला राज्य निर्माण सेनाक कतेको अभियानी आरबी ब्लौक पटना मे आमरण अनशन कयलनि। शिक्षा मंत्री एल पी शाही सँ प्रतिनिधि मंडल केर वार्ता भेल। मंत्रीजी सचिवालय केँ निर्देश दैत एहि दिशा मे काज आगू बढेबाक बात कयलनि। डा. ओंकार प्रसाद सिंह – उप-निदेशक एहि लेल प्रभारी बनलाह। वार्ता समिति मे हमहुँ रही ओहि दिन आ सचिवालय मे सब विन्दु पर चर्चा भेलैक जे ‘माध्यम’ केर रूप मे शिक्षा व्यवस्था लेल पाठ्यक्रम विकास एकटा पैघ चुनौती थिकैक। ताहि लेल तकनीकी समिति ठाढ करय पड़त आर फेर विषय-वस्तु केर माध्यम बदलय सँ लैत शिक्षक आदिक ट्रेनिंग आ मातृभाषा मे पढौनीक सारा वैज्ञानिक आधार निर्माण करय पड़त। हम सब एहि सँ सहमत भेलहुँ जे हँ, ई सिर्फ मुंह सँ बाजि देला सँ होइवला नहि थिकैक। लेकिन प्रक्रिया पारम्भ कयल जाउ, आगामी किछु वर्ष मे संभव कय देल जाउ। एहि पर शिक्षा सचिव आ निदेशक लोकनि सब कियो सहमति देलनि। हम सब लिखित मे आश्वासन मांगल, परञ्च ताहि लेल ओ सब नाकर-नुकर करैत मौखिक आश्वासन आ फलो-अप मे फायल नंबर उपलब्ध करेबाक वादा करैत सहमति मे अनशन तोड़बाक समझौता भेल। तदोपरान्त दरभंगा विधायकद्वय गोपालजी ठाकुर (Gopal Jee Thakur) तथा संजय सरावगी (Sanjay Saraogi) सहित कांग्रेसक प्रेमचन्द्र मिश्र आदिक संग दर्जनों गणमान्य व्यक्तित्वक सोझाँ मे डा. ओंकार प्रसाद सिंह द्वारा जूस पियाकय अनशन टूटल।
 
लेकिन फलो-अप? फलो-अप करबाक सामर्थ्य हमर मिथिलाक कोनो संस्था मे नहि।
 
तखन आब सोचू….! ई विमर्श आ फेसबुकिया क्रान्ति सँ कि होयत?
 
पटना सँ आदरणीय कुणाल सर, उषाकिरण खान मैडम, आ आरो कतेको संस्था केँ ई बात पता हेबाक चाही। ओना, एखनहुँ एकर दस्तावेज उपलब्ध अछि, अपने लोकनि प्राथमिक शिक्षा निदेशालय, पटना केर सचिव सँ केवल एक प्रतिनिधिमंडल जरूर भेंट करी एहि सम्बन्ध मे कि सब कार्य (फाइल प्रोग्रेस) भेल ताहि पर विमर्श करी।
 
हँ, बकौल शिक्षा निदेशालय – शिक्षक लोकनि लेल बनल शिक्षक संदर्शिका मे ‘भाषा-सेतु’ केर शिक्षण सिद्धान्तक सिफारिश ‘मातृभाषा संरक्षण’ लेल कयल गेल छैक। संदर्शिका मे हरेक शिक्षक लेल निर्देशन देल गेल छैक जे पढयवला बच्चा सभक मातृभाषा (ओकर अपन बोली) मे हिन्दीक शब्द केँ जे कहल जाएक वैह शब्दकोश तैयार करैत बेसी सँ बेसी ओहेन शब्दक प्रयोग कय बच्चा सभकेँ शिक्षा दी, ओकर विकास करी। बिहार शिक्षा निदेशालय द्वारा जारी संदर्शिका जरूर देखी।
 
मूल बात एक्के गोट छैक। पब्लिक मे भाषा प्रति जे संवेदना आ जागरुकता हेबाक चाही से एखन धरि नहि छैक। ताहि दिशा मे सामाजिक-भाषिक संस्था वा संगठन-समूह केँ कार्य करब पहिल जरूरत अछि। ई ध्यान राखब। अस्तु।
 
कि अछि समाधानक डेग:
१. एकटा वृहत् संघर्ष समिति बनय।
२. डा. जयकान्त मिश्र द्वारा कयल गेल कार्यक सब न्यायिक सामग्री संकलन करैत सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी आदेश पर समीक्षा करैत ओकर जँ अवमानना बिहार सरकार द्वारा कयल गेल हो तँ ओहि दिशा मे पुन: सुप्रीम कोर्ट मे बिहार सरकार पर प्रश्न ठाढ करैत न्यायिक प्रक्रिया केँ आगू बढायल जाय।
३. शिक्षा निदेशालय सँ उचित पत्राचार-भेंटघांट आ पाठ्यक्रम सामग्री विकास लेल वृहत् तकनीकी समिति लेल विद्वानक नाम सब सिफारिश करैत उचित बैठक व मंथन कयल जाय।
४. मातृभाषा मे पढौनीक महत्व पर आम जनभावनाक विकास करैत जमीन पर संघर्ष केँ जनोन्मुखी बनायल जाय, एकर सब सँ पैघ लाभ पिछड़ा, दलित, मुसलमान आ अत्यल्प साक्षरता दर केर जनसमुदाय केँ हेतैक ई सन्देश ढंग सँ जमीन पर उतारल जेबाक चाही। तहिना, विद्यालयस्तरीय अभियान सँ मैथिली आ बीपीएससी-युपीएससी परीक्षा मे एकर विकल्प सँ भेटयवला लाभ केर उचित जानकारी बच्चा-बच्चा केँ भेटक चाही। बच्चा मे ई रुचि रहय जे जँ मैथिली मे पढब त एकर बहुत लाभ भेटत।
५. विद्यालयस्तरीय छात्र-छात्रा केँ मैथिली लेखन, मिथिलाक्षर लेखन आ वक्तृत्व कलाक विकास पर केन्द्रित अधिक सँ अधिक अभियान कोना चलि सकत ताहि विन्दु पर काज करबाक लेल संघ-संस्था केँ आगू एबाक चाही।