मिथिलाक्षर केर सही रूप कोन – सुझाव व विचार संकलन

मिथिलाक्षर केर औचित्य आ रूप पर चर्चा

मिथिलाक्षर केर प्रयोग-प्रचलन आब लगभग १३५ वर्ष सँ ऊपर सँ व्यवहार बन्द होयबाक आ जनसामान्य केर सहजता आ संस्कृत एवं हिन्दी पर्यन्त केर सुगम पाठ्य-लेखन आदिक वास्ते देवनागरी केर स्वीकृति आ प्रचलन बढि गेलाक बाद धीरे-धीरे ‘मिथिलालिपि’ (तिरहुताक्षर) उठाव जेकाँ भऽ गेल। लेकिन लिपि कोनो पहिचान आ सभ्यताक एकटा मजबूत स्तम्भ होयबाक कारण बचल रहबाक चाही, ताहि लेल व्यक्तिगत, समूहगत आ संघीय गणराज्यक विभिन्न राजकीय निकाय द्वारा पर्यन्त मिथिलालिपिक संरक्षण-संवर्धन-प्रवर्धनक लेल समय-समय पर उपाय कयल जाइत रहल अछि, हालहि एहि क्रम केँ आगू बढेबाक लेल मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा पर्यन्त महत्वपूर्ण समिति गठन कयल गेल अछि। मिथिलाक्षर शिक्षा अभियान आ कतेको नाम सँ कतेको वर्ष सँ अनेकों गणमान्य व्यक्ति लोकनि अपना तरहें प्रयास करैत आबि रहला अछि, युनिकोड भाषा मे सेहो मिथिलाक्षर कंप्युटर लैंग्वेज मे बनायल जेबाक समाचार एम्हर-ओम्हर पढबाक लेल भेटैत रहल अछि। तथापि, एकर समुचित प्रयोगक अभाव, मैथिली लेखन लेल मिथिलालिपिक प्रयोग बाध्यात्मक नहि होयबाक कारण बेर-बेर एक्के टा सवाल ठाढ होएत अछि जे आइ भूलल-बिसरल मिथिला समाज केँ अपनहि लिपि सँ कोना जोड़ल जा सकैछ? अभियानी लोकनि तऽ लिपिक महत्व एतेक तक कहैत छथि जे बिना मिथिलालिपि केर ज्ञान भेने कियो पूर्ण मैथिल पर्यन्त नहि भऽ सकैत छथि – लेकिन एकर औचित्य कम सँ कम आजुक पेटभरा शिक्षाक चलन-चल्तीक युग मे कतेक आ कोना ई सवाल अनुत्तरित अछि।

मिथिलाक्षरक स्वरूप पर आन्तरिक विवाद

भारतीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा गठित एक उच्चस्तरीय कार्यसमितिक सदस्य पर्यन्त रहला व्यक्तित्व आ मिथिला सँ जुड़ल अनेकानेक महत्वपूर्ण शोधकार्य मे लागल रहनिहार पं. भवनाथ झा द्वारा सोशल मीडिया पर सेहो एहि सम्बन्ध मे कतेको बेर बुलेटिन – अपडेट्स लगायल गेल अछि जे मिथिलाक्षरक प्रयोग प्राचीन कालखंड सँ वर्तमान समय धरि कोना-कोना प्रभावित होएत रहल अछि आर एकर यथार्थ स्वरूप कि हेबाक चाही। तहिना मिथिलाक्षर केर फोन्ट्स तैयार करय मे अपन जीवनक महत्वपूर्ण समय लगानी कयनिहार विद्वान् विनय झा सेहो अथक परिश्रम सँ एकर एक स्वरूप तैयार कय केँ मिथिलाक नव पीढी आ कंप्युटर द्वारा सेहो प्रयोग कयल जायवला मिथिलालिपि प्रदान कय देलनि अछि, ई समाचार हमरा लोकनिक भाषा-संस्कृति अभियानी आ लेखक-कवि रामबाबू सिंह समय-समय पर जानकारी दैत आयल छथि। एवम् प्रकारेन् आइ कतेको वर्ष सँ सोशल मीडिया मार्फत आ जमीनी अभियान मार्फत मिथिलाक्षर साक्षरता अभियान चलौनिहार अभियन्ता अजय झा शास्त्री सेहो मिथिलाक्षर पर विद्वान् विश्वनाथ झा केर शोध मुताबिक मिथिलालिपिक सर्वस्वीकार्य प्रारूप उपलब्ध रहबाक बात सेहो कतहु पढल-सुनल।
 
प्रारूप मे विवाद केर सम्बन्ध मे विद्वान् पं. भवनाथ झा केर तर्क जे ऐतिहासिक तथ्य (शिलालेख, पान्डुलिपि, आदि) ओ दस्तावेज मे प्रयुक्त मिथिलाक्षरक प्राचीन प्रारूप मे परिवर्तन केँ मान्यता देनाय गलत होयत – ई तर्क किछु बेसी प्रभावित करैत अछि। जाहि मूल कारण सँ मिथिलाक्षरक औचित्य आइयो ओतबे आवश्यक वा अनिवार्य कहैत छी, यानि कि ऐतिहासिक तथ्य सँ आबयवला पीढी केँ जोड़िकय राखबाक आवश्यकता वा अनिवार्यता केँ मद्देनजरि, तँ कालान्तर मे आयल फर्क आ मिथिलाक्षर सँ विकसित बंगलाक्षर केर समीप जा कय मिथिलाक्षर केँ रोकि देनाय – ई कतेक विवाद सही मे उत्पन्न करैत अछि। बहुत दिन सँ एहि विवाद केँ बुझबाक प्रयास कय रहलहुँ अछि, लेकिन अन्य-अन्य कार्य मे व्यस्तताक कारण एहि सम्बन्ध मे कोनो बेस महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल नहि भेल अछि। बस, विवाद अन्त करबाक लेल एकटा सेमिनार – गोष्ठीक आयोजन लेल सरोकारवाला व्यक्तित्व आ सम्बन्धित दावी कयनिहार पक्ष सब सँ सार्वजनिक अपील करैत सोशल मीडिया पर साम्य वातावरण बनाकय आगू बढबाक अपील कएने रही। ताहि पर शोधकर्ता आ विद्वान् पंडित भवनाथ बाबू अलग-अलग प्रारूप आ दावेदारी केँ एकठाम राखिकय आमजन सँ रायशुमारी करैत एकटा निर्णयादेश लेल प्रस्ताव पठौलनि अछि।

निष्कर्षः

कामेश्वर सिंह संस्कृत दरभंगा विश्वविद्यालय, मिथिला विश्वविद्यालय, चन्द्रधारी संग्रहालय (दरभंगा), प्राचीन प्रकाशक, चेतना समिति (पटना), पटना म्युजियम, अन्य अभिलेखागार, नेपाल सँ प्राप्त अभिलेख आ सरोकारवाला पक्ष (पुरातात्विक विभाग, राष्ट्रीय अभिलेखागार, संग्रहालय आदि) सहित उपलब्ध विद्वान् लोकनि (जानकार) सभ केँ एकटा बैसार कय मिथिलाक्षरक मान्य स्वरूप निर्धारित कयल जाय – ई एकटा सुझाव अछि। कोनो विवादक बात मे विद्वान् लोकनि जे मत रखता ओहि मे ऐक्यबद्धता संभव होयत। ओना, हाल धरि पाठ्यक्रम मे जे चलि रहल अछि, ईहो स्वीकार्य कहल जा सकैछ। नव विवाद जतय सँ आर जाहि कारण सँ उठल तेकर साम्य करबाक लेल नव रास्ता अख्तियार करब आवश्यक अछि।

रायशुमारी लेल प्रश्नः

देल गेल तस्वीर मे सब तरहक मिथिलाक्षर राखल गेल अछि। अहाँ अपन राय जरूर दी, तर्कक संग।
 
हरिः हरः!!