रामचरितमानस मोतीः समुद्र पर श्री रामजीक क्रोध तथा समुद्रक विनती, श्री राम गुणगान केर महिमा
स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती समुद्र पर श्री रामजीक क्रोध तथा समुद्रक विनती, श्री राम गुणगान केर महिमा १. एम्हर तीन दिन बित गेल, लेकिन जड़ समुद्र विनय नहि मानलक। तखन श्री रामजी क्रोध सँ बजलाह – बिना भय के प्रीति नहि होइछ! हे लक्ष्मण! धनुष-बाण लाउ, हम अग्निबाण सँ समुद्र केँ सोखिये … रामचरितमानस मोतीः समुद्र पर श्री रामजीक क्रोध तथा समुद्रक विनती, श्री राम गुणगान केर महिमा





