जितेन्द्र जीतूक कविता “लाज”
कविता – जितेन्द्र जीतू लाज चंदा मामा क, आरे पारे नदिया किनारे बजेवाक जिद्द कहाँ करैत छै ओ ? सोनाक कटोरिया मे दूधो भातक लालसा, नहि छै ओकरा । ओ त भैया-बाबू क आइँठे स’ चुपचाप पेट भरि लैत छै अपन । ओ जिद्द कहां करैत छै खेलौनाक लेल आ खेलेबाको जिद्द कहाँ ? … जितेन्द्र जीतूक कविता “लाज”









