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विद्यापति स्मृति समारोह लेल न्युनतम मापदंड कि?

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vidyapatiनिस्सन्देह भूगोलहीन मिथिलावासी केँ आइ विद्वान् केँ स्मरण करबाक एक सुन्दर परंपरा विद्यापति स्मृति पर्व समारोह केर रूप मे अपन समृद्ध इतिहास संग पहिचानक विशिष्टता मोन पारि रहल अछि। समाजक हरेक वर्गक लोक केँ शिक्षा आ संस्कार संग समाजक विकास लेल कर्मवीर जनकवि विद्यापतिक जीवन चरित्र गंभीर सन्देश दैत अपन-अपन बाल-बच्चा संग स्वयं केँ सुशिक्षित-सुसंस्कृत रहबाक संवाद सेहो संचरण करैत अछि। संगहि, विद्यापति स्मृति समारोह केर नाम पर मात्र गीतनाद करब आर ओहि ठामपर अपन पूज्य नेताजी केँ बजाकय स्वार्थसिद्धि टा मे लागब, करोड़ों रुपया बस समारोह टा पर खर्च करब नहि कि यथार्थ धरातल पर विकासक छोटो टा डेग बढायब, आदि स्वस्थ आलोचना सेहो होएत अछि जे हमर मिथिला समाजक जागृतिक उच्च स्तर केँ झलकबैत अछि। हम सब समारोहो करैत छी, समारोह केर बदला सार्थक कार्य सँ पलायनक चिन्ता सेहो करैत छी, आर एना मे सब तरहक लोक केर विकास भऽ रहल अछि। अफसोस जे बयानवीर बनि छूछ आलोचना टा करैत कएनिहार केँ दूसैत टा छी, धरि अपनो किछु सार्थक काज कय केँ देखाबी से वृत्ति नहि विकास कय पबैत छी – एहेन लोक केँ मिथिला साहित्य मे बेलगोबना कहल जाएत अछि जेकर मात्रा बेसी देखाएत अछि। जाहि बात लेल अहाँ आनक आलोचना करी, अथवा केकरो दूसबाक काज करी आ ताहि काज केँ स्वयं कर्मठता सँ पूरा नहि करी ई कतहु सँ मान्य नहि होयत। यानि काज करहे टा पड़त। तखन ई चिन्तन सेहो करबाक अछि जे आखिर विद्यापति स्मृति पर्व समारोह मे कि सब कैल जाय?

जहिया कहियो ‘विद्यापति स्मृति पर्व समारोह’ केर आयोजन होएछ, ओहि मे विद्वान् – विद्यावान् केर सहभागिता हमरा लोकनि केँ आह्लादित करैत अछि। सामान्यतया विद्वानक बात सुनबा मे भीड़ इकट्ठा करबाक सहस्रो उपाय लोक लगबैत अछि, लेकिन ई बहुत पैघ भूल होएत छैक। अहाँ विद्वानक सोझाँ कखनहु भीड़ इकट्ठा करबाक भूल नहि करू आ मात्र प्रबुद्ध, जिज्ञासू, भक्त, समर्पित, ज्ञानीजन आदि केँ बजाउ। अन्य लेल विद्वानक आवाज दूर तक पहुँचय से इन्तजाम करू। सदिखन एक सुनिश्चित विषय पर चर्चा करबाक लेल दिशा प्रदान करू। दिशाविहीन आ व्यक्तिवादी बात-विवाद सँ बचैत समारोहक उद्घाटन करू। विद्वानक संबोधन उपरान्त साहित्यकार, कवि, हास्य-प्रहसन आदिक कार्यक्रम होयत तऽ समारोह स्वत: गति पकैड लेत। आ अन्त भला तऽ सब भला – यानि बिना गीत-संगीत मैथिलीक मिठास मे परमानन्द नहि भेटत, तहू मे ‘विद्यापति गीत’ आ ‘प्रचलित मैथिली लोकगीत’ – एहि दुइ बातक ध्यान हमेशा राखहे टा पडत। छौंडा-छौंडीक गीत आइ काल्हि खूब चलल अछि, मुदा मैथिलीक गहिंर महासागर मे एखनहु मात्र आ मात्र प्रचलित लोकगीत केर मुख्य स्थान छैक।

फूहरपन केर उपयोगिता किछु निम्न तवका यानि पिछड़ल संस्कारक वर्ग मे छैक। जातिक ब्राह्मण हो अथवा आन कियो, जँ भाषिक शुद्धता आ सुसंस्कार लेल मंथन नहि कय मात्र नाच-गाना आ उत्तेजक प्रस्तुति करायब त ओ समाज केँ सार्थक दिशा प्रदान नहि करत। एहि तरहक असभ्य आ कूसंस्कारक माहौल मे सुन्दर भोजन समान सुसभ्य गीत सँ आनन्दक प्राप्तिक संग व्यवहारिक उर्जा सेहो भेटैत छैक। विद्यापति स्मृति पर्व समारोह मे एहि प्रारूप केँ सब ठाम अपनाबी, मैथिलीक असल परिचय भेटत। मंच-संचालक केँ सब बात पता हेबाक चाही जे एहि समारोह मे उपस्थित जनमानस केँ कि सब परोसल जाय। कलाकार आ प्रस्तोता सँ ताहि अनुसार संबोधन करबाक अनुरोध – फरमाइश होइत रहत, स्वत: मिथिलाक परमानन्द भेटैत रहत।

जँ संभव हो त मिथिलाक गृह उद्योग सँ निर्मित मिथिलाक खाद्य परिकार, परिधान, ओढना, बिछौना, साड़ी आ मिथिला चित्रकला केर प्रदर्शनी जरुर लगाओल जाय। आइ मैथिली भाषाक साहित्य केर बिक्रय-वितरण नगण्य भऽ गेल अछि तेकरा लेल सेहो प्रयास करी। साहित्य किनू आ पढू – पुस्तक प्रदर्शनी लगबाउ। मिथिलाक सिक्की कला – कुम्हारक बर्तन जेकर प्रयोग विधान सम्मत अछि जेना सरबा, दीप, छाँछी, मटकूरी, घैला, कोहा, आदि सहित मिथिलाक डोम द्वारा विध-विधान लेल अति आवश्यक समान सभक खास प्रदर्शनी लगबाबी। एकर अलावे अपन समाजक निर्धन छात्र – मेधावी छात्र सब लेल छात्रवृत्ति हेतु अक्षय कोष ठाढ करी। सामूहिकताक पोषण जाहि विध हो से सब करी।

हरि: हर:!!

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