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सिनेमा भावी पीढ़ीक लेल नीक वा बेजाय परन्तु प्रेरणाक बड्ड पैघ स्रोतक अछि

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लेख विचार
प्रेषित: दिलीप झा ललित
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- सिनेमा : मिथिलाक सांस्कृतिक चेतना, अस्मिता आऽ पुनर्जागरण

सिनेमा आधुनिक युगक सर्वाधिक प्रभावशाली कलामाध्यम थिक। ई केवल मनोरञ्जनक साधन नहि, अपितु समाजक चेतना, संस्कृतिक संरक्षण, इतिहासक पुनर्पाठ आऽ भावी पीढ़ीक मार्गदर्शनक सशक्त माध्यम सेहो अछि। शब्द, संगीत, अभिनय, चित्र आऽ तकनीकक समन्वयसँ सिनेमा जीवनक विविध पक्षकेँ सजीव रूपमे प्रस्तुत करैत अछि। कोनो समाजक सभ्यता, संस्कार, भाषा आऽ जीवन-दर्शनक लोकप्रिय दस्तावेज सेहो सिनेमा बनि जाइत अछि। मिथिलाञ्चलक परिप्रेक्ष्यमे सिनेमाक महत्त्व आओर बढ़ि जाइत अछि, कारण एहि भूमिकेँ अपन समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, लोकपरम्परा, लोकगीत, विद्यापति-काव्य, मधुबनी चित्रकला, पर्व-त्योहार आऽ मैथिली भाषाक असाधारण वैभव प्राप्त अछि। यदि सिनेमा एहि सम्पदाकेँ प्रभावकारी रूपेँ प्रस्तुत करए, तँ मिथिलाक सांस्कृतिक अस्मिता विश्वस्तर धरि अपन पहचान स्थापित कऽ सकैत अछि।
मिथिलाञ्चलक समाज प्राचीन कालसँ ज्ञान, दर्शन, साहित्य आऽ लोकसंस्कृतिक केन्द्र रहल अछि। एतयक जीवनमे सरलता, आत्मीयता, धार्मिकता आऽ लोकाचारक गहन प्रभाव देखल जाइत अछि। सिनेमामे एहि जीवन-दर्शनक यथार्थ चित्रण समाजकेँ अपन जड़िसँ जोड़ि राखए मे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकैत अछि।
मैथिली सिनेमा अपन आरम्भिक यात्रामे सीमित संसाधनक कारण बहुत विस्तार नहि पाबि सकल, मुदा जतेक फिल्म निर्माण भेल, तकरा माध्यमसँ मैथिली भाषा आऽ मिथिलाक सांस्कृतिक पहचानकेँ नव आयाम भेटल। विवाह-संस्कार, सोहर, समदाउन, झिझिया, जट-जटिन, सामा-चकेवा, मधुश्रावणी, कोजागरा, छठि आदिक लोकपरम्पराक चित्रण दर्शककेँ अपन सांस्कृतिक मूलसँ जोड़ैत अछि।
सिनेमा मैथिली भाषाक संरक्षणमे सेहो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकैत अछि। जखन पर्दापर शुद्ध, मधुर आऽ साहित्यिक मैथिली सुनाइ पड़ैत अछि, तँ नवपीढ़ीमे भाषाक प्रति अपनत्व आऽ गौरवक भाव विकसित होइत अछि। विशेषतः प्रवासी मैथिल परिवारक बालक-बालिकाकेँ अपन मातृभाषासँ परिचित कराबएमे सिनेमा प्रभावकारी माध्यम सिद्ध भऽ सकैत अछि।

मिथिलाञ्चलक साहित्य अत्यन्त समृद्ध अछि। महाकवि विद्यापति, हरिमोहन झा, चन्दा झा, यात्री, राजकमल चौधरी, ललित, मायानन्द मिश्र आदिक साहित्यिक कृतिमे असीम सिनेमाई सम्भावना निहित अछि। यदि एहि साहित्यक सफल चलचित्र-रूपान्तरण होइ, तँ साहित्य आऽ सिनेमा दुनूक विकास सम्भव अछि आऽ वैश्विक दर्शक मिथिलाक बौद्धिक परम्परासँ परिचित भऽ सकत।
सिनेमा सामाजिक परिवर्तनक सेहो सशक्त साधन अछि। दहेज-प्रथा, बाल-विवाह, जातीय भेदभाव, अशिक्षा, महिला-सशक्तीकरण, पर्यावरण-संरक्षण, प्रवासन, बेरोजगारी तथा ग्रामीण विकास सन विषय पर आधारित मैथिली फिल्म समाजमे सकारात्मक चेतनाक संचार कऽ सकैत अछि। मनोरञ्जनक संग-संग सामाजिक उत्तरदायित्व निभेनाइ सिनेमाक सर्वोच्च उपलब्धि मानल जाइत अछि।
मिथिलाक लोककला, विशेषतः मधुबनी चित्रकला, सिक्की शिल्प, सुजनी कला, मखान, पान, माछ, आमक बगान, कोसी-कमला-बलानक अंचल, ग्राम्य जीवन आऽ प्राकृतिक सौन्दर्यकेँ सिनेमा वैश्विक मंच धरि पहुँचा सकैत अछि। एकर परिणामस्वरूप पर्यटन, हस्तशिल्प आऽ स्थानीय अर्थव्यवस्थाकेँ सेहो नव गति भेटि सकैत अछि।
तथापि, वर्तमान समयमे मैथिली सिनेमाक समक्ष अनेक चुनौती उपस्थित अछि। सीमित पूँजी, गुणवत्तापूर्ण पटकथाक अभाव, प्रशिक्षित कलाकारक कमी, आधुनिक तकनीकक न्यून उपयोग, वितरण-व्यवस्थाक कमजोरी तथा व्यावसायिक दृष्टिकोणक अभाव एकर विकासमे बाधक बनल अछि। किछु फिल्ममे भाषिक शुद्धता आऽ सांस्कृतिक मर्यादाक उपेक्षा सेहो चिन्ताक विषय अछि। एहि परिस्थितिमे आवश्यक अछि जे निर्माता, निर्देशक, साहित्यकार, कलाकार, शिक्षाविद आऽ समाज संयुक्त प्रयाससँ मैथिली सिनेमाकेँ उच्च कोटिक सांस्कृतिक आन्दोलनक रूप प्रदान करथि।
सिनेमा केवल चलैत-फिरैत चित्र नहि, बल्कि समाजक सामूहिक स्मृति, सांस्कृतिक चेतना आऽ भावी पीढ़ीक प्रेरणास्रोत थिक। मिथिलाञ्चलक सन्दर्भमे एकर उत्तरदायित्व आओर बढ़ि जाइत अछि, कारण एकरा माध्यमसँ भाषा, साहित्य, लोकसंस्कृति, इतिहास आऽ सामाजिक मूल्यमानकेँ नव जीवन देल जा सकैत अछि। आवश्यक अछि जे मैथिली सिनेमा केवल मनोरञ्जनक उद्योग नहि, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरणक अभियान बनए। जखन सिनेमा मिथिलाक आत्माकेँ अपन कथानक, संगीत, भाषा आऽ संवेदनामे सजीव रूपेँ अभिव्यक्त करत, तखन निश्चित रूपेँ मिथिलाक सांस्कृतिक ज्योति सम्पूर्ण विश्वमे नव आलोक बिखेरत।

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