लेख विचार
प्रेषित: दिलीप झा ललित
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :-शिक्षाक आत्मा पर सत्ताक आघात
(चिन्तनप्रधान सामाजिक-शैक्षिक निबन्ध)
शिक्षा समाजक आत्मा होइत अछि। ई मात्र अक्षर-ज्ञान नहि, बल्कि मनुष्यक विवेक, संस्कार, नैतिकता आऽ मानवीय मूल्यक निर्माणक आधारशिला अछि। जँ शिक्षा निष्पक्ष, गुणवत्तापूर्ण आऽ मूल्यनिष्ठ हो, तँ राष्ट्रक भविष्य उज्ज्वल बनैत अछि। मुदा जखन शिक्षा पर राजनीतिक हस्तक्षेप हावी भऽ जाइत अछि, तखन विद्यालय ज्ञानक मंदिर नहि, बल्कि विचारधाराक अखाड़ा बनय लगैत अछि। शिक्षाक मूल उद्देश्य ज्ञानक प्रकाश फैलाबऽ सँ हटि सत्ताक स्वार्थ पूरा करब दिस मुड़ि जाइत अछि, जे समाज आऽ राष्ट्र दुनूक लेल चिन्ताक विषय अछि।
वर्तमान समयमे शिक्षाक लगभग प्रत्येक क्षेत्र पर राजनीतिक प्रभाव स्पष्ट देखल जा सकैत अछि। विद्यालय आऽ विश्वविद्यालयक प्रशासनसँ लऽ कऽ शिक्षक नियुक्ति, पाठ्यक्रम निर्माण, कुलपतियक चयन आऽ छात्रसंघक गतिविधि धरि राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ैत जा रहल अछि। योग्यताक स्थान पर दलगत निष्ठा आऽ योग्यता सँ बेसी राजनीतिक समीकरणक महत्त्व देल जाइत अछि। परिणामस्वरूप शिक्षण संस्थानक स्वायत्तता कमजोर पड़ैत अछि।
पाठ्यक्रममे सेहो समय-समय पर सत्ता परिवर्तनक संग परिवर्तन होइत रहैत अछि। इतिहास, साहित्य, समाजशास्त्र आदिक विषयमे वस्तुनिष्ठ अध्ययनक स्थान पर विचारधारात्मक आग्रह प्रवेश कऽ जाइत अछि। विद्यार्थी स्वतंत्र चिन्तन करबाक स्थान पर पूर्वाग्रहक बोझ उघऽ लगैत छथि। ज्ञानक सार्वभौमिक स्वरूप एहन प्रवृत्तिसँ प्रभावित होइत अछि।
राजनीतिक हस्तक्षेपक सर्वाधिक दुष्प्रभाव विद्यार्थी पर पड़ैत अछि। अध्ययन, अनुसन्धान आऽ चरित्र-निर्माणक स्थान पर आन्दोलन, गुटबाजी आऽ शक्ति-प्रदर्शन प्राथमिकता बनि जाइत अछि। शैक्षणिक वातावरण अशान्त होइत अछि, सत्र नियमित नहि चलैत अछि, परीक्षा प्रभावित होइत अछि आऽ प्रतिभाशाली छात्र-छात्रा निराश होइत छथि।
शिक्षक सेहो स्वतंत्र वातावरणमे शिक्षण कार्य नहि कऽ पबैत छथि। जखन नियुक्ति, स्थानान्तरण वा पदोन्नति राजनीतिक प्रभावसँ संचालित हो, तखन शैक्षणिक उत्कृष्टता स्वतः प्रभावित होइत अछि। समाजमे योग्यताक स्थान पर पहुँच आऽ प्रभावक संस्कृति विकसित होइत अछि, जे लोकतन्त्रक स्वस्थ भविष्य लेल शुभ संकेत नहि।
शिक्षाक गरिमा बनौने रखबाक लेल आवश्यक अछि जे शैक्षणिक संस्थानकेँ पर्याप्त स्वायत्तता प्रदान कयल जाए। शिक्षक नियुक्ति पूर्णतः पारदर्शी आऽ योग्यता-आधारित हो। पाठ्यक्रम निर्माणमे शिक्षाविद्, अनुसन्धानकर्ता आऽ विषय-विशेषज्ञक भूमिका प्रमुख हो, राजनीतिक स्वार्थक नहि। विद्यार्थीकेँ दलगत राजनीति सँ दूर राखि लोकतान्त्रिक मूल्य, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, नैतिक शिक्षा आऽ सामाजिक उत्तरदायित्वक संस्कार देल जाए।
राजनीति स्वयं समाजक आवश्यक अंग अछि, मुदा ओकर भूमिका शिक्षाक मार्गदर्शक धरि सीमित रहए, शिक्षाक नियन्ता नहि। ज्ञानक क्षेत्रमे स्वतन्त्रता, निष्पक्षता आऽ अनुसन्धानक वातावरण बनल रहब अत्यन्त आवश्यक अछि।
शिक्षा आऽ राजनीति दुनूक अपन-अपन महत्त्व अछि, किन्तु जखन राजनीति शिक्षाक मूल उद्देश्य पर हावी भऽ जाइत अछि, तँ राष्ट्रक भविष्य संकटमे पड़ि जाइत अछि। ज्ञानक दीपक तखनहि प्रज्वलित रहि सकैत अछि जखन ओकरा स्वार्थ, पक्षपात आऽ सत्ता-संघर्षक आँधिसँ बचाओल जाए। आवश्यकता एहि बातक अछि जे शिक्षा केँ पुनः ज्ञान, संस्कार, अनुसन्धान आऽ मानवताक केन्द्र बनाओल जाए। कारण, शिक्षित समाजे सशक्त राष्ट्रक निर्माण करैत अछि, आऽ निष्पक्ष शिक्षा राष्ट्रक सभसँ पैघ पूँजी होइत अछि।
