लेख विचार
प्रेषित: आभा झा अद्विका
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :– गृहणीक मौन तपस्या: त्याग आ समर्पणक अनमोल गाथा
मिथिलाक समाजमे गृहणीकेँ ‘गृहलक्ष्मी’ कहल गेल अछि, मुदा एहि पदवीक पाछाँ हुनक जे असीमित श्रम आ त्याग छुपल अछि, ओकर चर्चा अक्सर गौण भ’ जाइत अछि। एकटा घरकेँ सुचारु रूपेँ चलेबाक लेल गृहणी जे अदृश्य युद्ध लड़ैत छथि, ओ कोनो तपस्यासँ कम नहि अछि।
एकटा अंतहीन डियूटी –
जखन संसार सुतल रहैत अछि, तखन गृहणीक दिन शुरू भ’ जाइत अछि। भोरक चहकबा सँ पहिने ओ घरक साफ-सफाई आ भनसाक काजमे जुटल रहैत छथि। एकटा गृहणीक लेल ‘छुट्टी’ (रैब) शब्दक कोनो अर्थ नहि होइत। बरु, छुट्टीक दिन तँ हुनक काज आओर बढ़ि जाइत छनि, कियैक तँ ओहि दिन परिवारक अन्य सदस्य घर पर रहैत छथि आ हुनक फरमाइश सेहो दूना भ’ जाइत अछि।
पाबनि-तिहार होय या कोनो विशेष आयोजन, गृहणीक श्रम ओहि समय शिखर पर होइत अछि। जखन सभ लोक उत्सव मनबैत छथि, तखन ओ भनसा घरक धुआँ आ गर्मीमे सभक लेल पकवान बनाबयमे व्यस्त रहैत छथि। हुनक ई श्रम निस्वार्थ अछि, जाहिमे कोनो वेतनक लालसा नहि, मात्र अपन परिवारक प्रसन्नताक इच्छा रहैत अछि।
बहुआयामी भूमिका –
गृहणी मात्र भोजन बनेबाक काज नहि करैत छथि, ओ एकहि संग कतेको भूमिका निर्वाह करैत छथि:
प्रबंधक : घरक राशन, बजट, आ भविष्यक लेल बचत करब।
शिक्षिका: बच्चाक पहिल गुरु बनि क’ हुनका संस्कार आ शिक्षा देब।
नर्स: वृद्ध आ बीमार सदस्यक सेवा-सुश्रुषा करब।
सृजनकार: घरक कोना-कोनाकेँ अपन सुरुचि सँ सजेनाइ।
एतेक रास भूमिकाक बीच ओ अपन व्यक्तिगत इच्छा आ अरमानकेँ कतेको बेर दबा दैत छथि।
आर्थिक मूल्य बनाम सामाजिक प्रतिष्ठा –
अर्थशास्त्री सभक अनुसार, यदि एकटा गृहणीक काजकेँ बाजारू दर पर वेतनमे बदलल जाय, तँ ओ एकटा कॉर्पोरेट ऑफिसरक वेतन सँ बेसी भ’ सकैत अछि। मुदा विडम्बना ई अछि जे एहि श्रमकेँ ‘अनुत्पादक’ मानि लेल जाइत अछि। समाजक धारणा अछि जे घरक भीतर कयल गेल काज तँ ‘कर्तव्य’ थिक, ‘श्रम’ नहि।
ई सोच बदलबाक समय आबि गेल अछि। जखन धरि घरक भीतरक व्यवस्था ठीक नहि रहत, तखन धरि घरक कोनो सदस्य बाहर जा क’ नीक काज नहि क’ सकत। एकटा पुरुष वा कामकाजी महिला बाहर निफिकिर भ’ काज तखनहि क’ पबैत छथि, जखन घरक गृहणी ओहि घरक मोर्चा सम्हारने रहैत छथि।
मानसिक स्वास्थ्य आ एकाकीपन –
गृहणीक श्रम केवल शारीरिक नहि, बल्कि मानसिक सेहो थिक। दिन भरि चारि दिवारीक भीतर काज करब आ अपन समस्या साझा करबाक लेल कोनो मंच नहि भेटब, हुनका मानसिक रूपेँ थका दैत अछि। अक्सर हुनक थकानकेँ ई कहि क’ नजरअंदाज क’ देल जाइत छनि जे “अहाँ तँ घरेमे तँ रहैत छी, कतेक नीक अछि।” मुदा घरमे रहि क’ मोन मारि क’ खटब कतेक कठिन अछि, ई मात्र ओहि गृहणीकेँ पता होइत अछि।
सम्मानक अधिकार –
मिथिलाक माटिमे नारीकेँ शक्ति मानल गेल अछि। एहि शक्तिक आदर तखनहि संभव अछि जखन हम गृहणीक श्रमकेँ सम्मानक दृष्टि सँ देखब। ई मात्र शब्दक सम्मान नहि, बल्कि व्यवहारक सम्मान होय। घरक बच्चा सँ लय क’ बुजुर्ग धरि, सभक ई दायित्व अछि जे ओ गृहणीक काजमे अपन भागीदारी सुनिश्चित करथि।
गृहणी कोनो ‘मशीन’ नहि, बल्कि एकटा संवेदना सँ भरल मनुष्य छथि। हुनक श्रमकेँ बोझ नहि, बरु प्रेम मानू। जखन समाज गृहणीक अदृश्य पसीनाकेँ देखय लागत, तखनहि एकटा स्वस्थ आ सुखी समाजक निर्माण संभव अछि। गृहणीक श्रम ओ आधारशिला अछि, जाहि पर मानवताक महल ठाढ़ अछि। जय मिथिला, जय मैथिली।
