मैथिल मे मातृभाषा प्रति अनुराग मे कमी
डा. देवशंकर नवीन केर एक महत्वपूर्ण उक्ति पर ध्यान दीः
मैथिलों में मातृभाषा के प्रति अनुराग में कमी । ये कमी किस कारण है – इसका पहला कारण है कि मैथिली रोजगार और बाजार की भाषा अभी तक नहीं बन पाई है । एक प्रोफेसरी की नौकरी मिलती है, वो नौकरी जैसे मिलती है, वह पकड़के उसी तरह से वे जीवन निर्वाह कर देते हैं, उसमें पढ़ना-लिखना अब प्रोफेसर महेन्द्र, भीमनाथ झा, रामदेव झा, शिवशंकर झा, …. वो पीढ़ी अतीत की बात हो गई, और अब पढ़ना-लिखने की जरूरत नहीं है ।
जिन लोगों की यह समझ है कि भाषा रोजगार के लिये पढ़ी जाती है, ये तो गलत समझ है, जिनलोगों की यह समझ है उनपर तो दया ही की जा सकती है । और यह समझ बनने की वजह है कि मैथिली माध्यम से बाल शिक्षा नहीं हो रही है । पहली बार मुद्रित रूप में मैथिली शब्द मैंने दसवीं क्लास में देखा, उससे पहले मैं जानता ही नहीं था कि मैथिली में कोई किताब भी होती है । अब सोचिये कि दसवीं कक्षा में जो बच्चा आ गया है वह तब तक अपनी तीनों भाषाएं, त्रिभाषा – बाजार की भाषा, अकादमी की भाषा और जीवन की भाषा – तीनों भाषाएं तय कर लेते हैं । अब उसे मैथिली सिखाई जाएगी तो कहाँ से मैथिली के प्रति अनुराग उसको जगेगा ।
उस समय तक तो यही था कि मैथिलों का प्रवास बंगाल (ढाका), मोरंग और कामरूप कामाख्या – इन तीन-चार जगहों में जाकर मैथिल लोग कमाया करते थे । और इन तीनों जगहों पर देखेंगे कि मैथिलों को भाषा बड़ी समस्या नहीं होती थी । इसलिये भाषा की पहचान मैथिलों को न तब हो पाई, और आज, आज जो मैथिल निकलते हैं तो सबसे पहले अपनी भाषा-संस्कृति को ही भूलते हैं । इस वजह से मैथिलों का जो भाषाप्रेम है उसमें थोड़ी गड़बड़ी है ।
संविधान स्वीकृति के बाद लोगों ने ये देखा कि सरकारी संसाधन से कुछ फन्ड लिये जा सकते हैं, तो दनादन-दनादन संस्थाएं बनने लगी और प्रोजेक्ट लिये जाने लगे, और मातृभाषा को कमाने का जरिया बना लिया गया, यही जो है ये भाषा-संवर्द्धन का नाटक, इन्हीं नाटकों की वजह से मैथिली की ये सब दुर्दशा है । आशा कि जा सकती है कि आगे के दिनों में मैथिली के प्रति प्रेम जगेगा ।
– डा. देवशंकर नवीन (प्रोफेसर, जेएनयू, दिल्ली) – लाइफ एक्सप्रेस केँ देल गेल अपन इन्टरव्यू मे
आदरणीय डा. नवीन सर द्वारा किछु पचय योग्य आ किछु अपच बात कहल गेल अछि । मैथिल केर वर्णण करैत खाली एकल (आभिजात्य) समुदायक चरित्र चित्रण कयलनि अछि, जखन कि मैथिली आमलोक (मास) केर भाषा थिकैक ।
राज्यक उपेक्षाक कारण संविधानप्रदत्त मौलिक अधिकार अर्थात् मैथिलीभाषी लेल प्राथमिक शिक्षा मैथिली भाषा मे नहि हेबाक कारण, संगहि अपनहि राज्य मे अपनहि भाषा केँ राजकाजक भाषा, संचारकर्मक भाषा, सरकारी सूचना आदान-प्रदान करबाक भाषा, रेडियो-टेलिविजन केर भाषा रूप मे मान्यता नहि देबाक कारण – मैथिलीभाषी केँ हिन्दीपट्टीक मतदाता बनाकय पटना-दिल्ली धरि सत्तारोहण करबाक शासकवर्गक सोचक कारण ई सारा दुर्दशा भेल अछि ।
आकाशवाणी दरभंगा खुजैत अछि स्थानीय भाषा मे रेडियो संचार लेल आ ९०% कार्यक्रम चलाओल जाइछ हिन्दी मे – ई सब गलत रणनीति केर कियो विरोध तक नहि करैछ, राजनीतिक षड्यन्त्रक शिकार भ’ जाइछ – मिथिलाक मौलिकता प्रति कोनो शासकवर्ग तैयार-तत्पर नहि होइत अछि, खाली बैकवार्ड-फोरवार्ड आ छद्म समाजवाद व सामाजिक न्याय मे ओझराकय राज्य संचालित कयल जाइछ – उर्दू केँ दोसर राजभाषा जगन्नाथ मिसिर जेहेन मैथिल सपूतक कार्यकाल मे राजनीतिक डेग उठायल जाइछ, धरि मैथिली लेल गोलगपट शून्ना । तखन ?
डा. नवीन आ एहने आरो विश्लेषक सब केँ मनगढ़न्त ढकोसला जे स्वतंत्रता बाद संस्था आ सरकारी कोषक दुरुपयोग आदिक मनगढ़न्त बात बजनाय निन्दनीय अछि । आइ जे किछु मैथिली बचल अछि ताहि मे वैह संस्था सभक प्रयास आ आवाज उठेबाक कारण बचल अछि ।
डा. नवीन कहथि जे कतेक सरकारी कोष आ कोन-कोन संस्था कमेबाक धन्धा कयलक ?
एलिट्स लेल मैथिली प्रति रुचि २०वीं शताब्दी आ सेहो भाषा आधार पर राज्य निर्माणक अवधारणा आ स्वतंत्र भारतीय गणराज्य मे प्रान्तीय अवधारणा मे मैथिलीक आधार होयत तदोपरान्त मात्र लेखन-वृत्ति बढ़ल अछि । ताहि सँ पूर्व मैथिली मे लिखनिहार सब काव्यकर्म धरि सीमित रहलाह, इतिहास किछु एहने देखाइछ । गद्य लेखनक भाषा मैथिली नहि भ’ सकल छल ।
१९०५ सँ पत्रकारिता आरम्भ हेबाक तथ्य भेटैछ, सेहो जयपुर सँ । जिनका मे निज भाषा प्रति अनुराग छलन्हि वैह कएने हेताह । १९२० उपरान्त अंग्रेजी माध्यम सँ शिक्षा प्राप्त कयनिहार उच्चवर्गक किछु छात्र लोकनिक मन-माथ मे मैथिली भाषा-साहित्य प्रति अनुराग अयलनि – लिखैत छथि डा. अमरनाथ झा ‘एलिट्स एन्ड मास’ केर जर्नल मे ।
१९२९-३० सँ भोला लाल दास समान मैथिली भाषाक दधीचि कहेनिहार, काञ्चीनाथ झा किरण, डा. लक्ष्मण झा, डा. सुभद्र झा, बाबूसाहेब चौधरी, प्रबोध नारायण चौधरी, केर आसपास मैथिली मे गद्य-लेखन आरम्भ भेल । महाकवि विद्यापति केँ आइडोल बनाकय गामे-गाम निजभाषा मैथिली लेल जनजागरणक अभ्यास आरम्भ भेल । मिथिला मिहिर जेहेन स्तरीय प्रिन्ट संचार आरम्भ भेल ।
डा. सुभद्र झा समान भाषा वैज्ञानिक द्वारा मैथिली पूर्ण आ प्राचीन भाषा थिक तेकर डकुमेन्टेशन, डा. जयकान्त मिश्र केर निरन्तर पेपर प्रेजेन्टेशन आ विभिन्न भाषिक फोरम पर मैथिली पक्षक विवेचना-व्याख्यान, चेतना समिति पटना सहित कोलकाता, दरभंगा आदि मे स्थापित गोटेक संस्था सभक पत्राचार आदिक कारण १९६३ मे साहित्य अकादमी द्वारा मैथिली केँ मान्यता प्रदान, १९७०-८० केर दशक मे मैथिली भाषा लेल विभिन्न आन्दोलन आ बिहार राज्य मे मैथिली अकादमीक स्थापना व भाषिक सामग्री सभक प्रकाशन आ सुरक्षण आदिक महत्वपूर्ण काज, मैथिली पढ़ाइ लेल बिहार माध्यमिक शिक्षा बोर्ड आ इन्टरमीडिएट काउन्सिल आदि द्वारा सिलेबस लागू करब, विभिन्न विश्वविद्यालय मे मैथिली पढ़ाइ केँ मान्यता आ पीएचडी आदि करबाक व्यवस्थापन, बिहार लोक सेवा आयोग मे मैथिली केँ मान्यता, २००३-०४ मे भारतीय संविधानक अष्टम् अनुसूची मे भारतीय भाषा रूप मे मान्यता आ तदोपरान्त प्रशासकीय परीक्षा मे मैथिलीक प्रवेश, आदि विभिन्न स्तरोन्नति सँ मैथिली यथासम्भव बचल अछि ।
मात्र आभिजात्य वर्गक भाषा कहिकय अराजक आ कुत्सित मनसाय सँ मैथिली केँ बदनाम करबाक काज, मैथिली लेल जेहो किछु प्रोत्साहन राशि उपलब्ध अछि ताहि पर कुंडली मारिकय बैसल गोटेक नागराज-प्रवृत्ति आ भाषा-प्रसार मे ईमानदारिता साथ सम्पूर्ण मिथिला क्षेत्र केर प्रतिनिधित्वक अभाव, मैथिलीक विभिन्न भाषिका प्रति उदार स्वीकार्यताक अभाव, मैथिलीक केन्द्रिय मानक मात्र केँ बढ़ावा देबाक परिस्थिति – इत्यादि आत्मालोचनाक सन्दर्भ अछि ।
सामाजिक संजाल द्वारा निजभाषा संगहि सम्पूर्ण मैथिल संस्कृतिक संरक्षण आ संवर्धनक सहज प्रचार-प्रसार सँ स्थिति मे उल्लेख्य सुधार आयल अछि । हालांकि समाजक आभिजात्य वर्ग कहेनिहार उच्चजातिक लोक मे निजत्व प्रति उदासीनता चिन्ताजनक अछि, लेकिन एकर दुष्परिणाम जे धियापुता (सन्तति) सभक संस्कार मे स्खलन आ वैश्विक भीड़ व भौतिकवादी आर्जनक होड़ मे हेरा जेबाक कारण बहुत लोक सचेत भ’ रहल छथि । मैथिली बेहतरीक दिशा मे चलि देने अछि ।
मैथिली आइयो बहुजनक धर्मभाषा हेबाक कारण चिरकाल धरि सुरक्षित रहत से तय मानू ।