टेढ़ प्रवीणक सोझ मीमांसा
(केवल फिलौसोफिकल चिन्तक लेल)
एक दिन हम अत्यन्त गहन चिन्तन करैत अपना केँ चिन्हबाक चेष्टा कय रहल छलहुँ । हम मनुष्य छी । हम फल्लाँ जातिक छी । हमरा माता-पिता, हमर सर-समाज, कर-कुटुम्ब आदि-आदि; एहि सब विन्दु पर सोचि रहल छलहुँ । अन्त मे ई सेहो अबैत छल जे हम मिथिलाक लोक छी, भूगोलक एक विशेष भाग मिथिला मे जन्म भेल अछि । हमर भाषा मैथिली अछि । एहि भूमि मे जानकी जी भेल छथि, जनक जेहेन विदेहराजक सुपुत्री रूप मे स्वयं लक्ष्मी अवतार लेलनि, सौभाग्यवश हमरो जन्म ताहि भूमि ‘मिथिला’ मे भेल । हमहुँ आत्मविद्याश्रयी राजा जनक जिनका ‘मैथिल’ कहल जाइत छन्हि, तिनकर प्रजा रूप मे हमहूँ मैथिल छी । फेर हमर पहचान फल्लाँ, चिल्लाँ, कुल्लाँ आदि विभिन्न दृष्टि सँ विभिन्न प्रकारक अछि । आदि-आदि ।
सोचैत-सोचैत अपन शरीर, चेहरा, स्वास्थ्य, आदि पर सेहो नजरि गेल । मुदा ताबत दिमाग मे एकटा अलगे बात ई आयल जे हम मिथिलाक लोक बड टेढ़ कियैक कहाइत छी ? ई टेढ़ी कि थिकैक ? गुण-स्वभावक आधार पर लोक नीक-बेजाक विवेकपूर्ण निष्कर्ष निकालैत अछि । हम मैथिल टेढ़ कियैक होइत छी आखिर ?
टेढ़ीक मूल तत्त्व ‘अहंकार’ होइत छैक । हम मैथिल भले घटले मे छी, मुदा जतबी अछि ततबी मे सन्तुष्ट छी । आ जँ आत्मसन्तोष अछि त फेर हम दोसर लग कियैक झुकब, अपना आप मे मगन रहब । अपना आप मे येन-केन-प्रकारेन पूर्णताक अनुभव करैत रहब । आ एना मे जरुरतो रहल समय अपना-आपे मे डूबल रहि आजु-बाजु कि भेल, नहि भेल, समाज कतय गेल, से सारा बात सँ हम स्वयं केँ कटल राखैत छी । एकरा लोक टेढ़ बुझय या जे बुझय ।
पुरखाजन सब विदेहराजक भूमि मे हमेशा वेद-वेदान्त पर निर्भर रहथि । एक सँ एक नैय्यायिक आ मीमांसब सब एहि भूमि पर भेल छथि । आइ भौतिक युग मे भौतिक उपलब्धि लेल बेहाल संसार अछि, ताहू मे हम सब वीरे कहाइत छी । हँसोथि-हँसोथि राखय मे जगजियार भ’ गेल छी । जेना छी, अपना मे छी । आर यैह रवैयाक कारण लोक टेढ़ बुझैत अछि । हमर टेढ़ी यैह थिक ।
मुदा ई टेढ़ी बनल केना ?
जखन एहि सवाल पर फेर सोचलहुँ, आर गहींर मीमांसा करय लगलहुँ, त मोन पड़ल अपन शारीरिक संरचनाक बात ।
पाँच तत्त्व सँ शरीर बनबाक बात बुझय मे आयल । क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा – यैह पाँच तत्त्व सँ बनय शरीरा । किछु एहने कहावत सब सुनैत होयब अपनो लोकनि । तेकर बाद मनुष्यक प्रकृति निर्माण मे तीन टा मूल गुण होइत छैक । सात्त्विकता, राजसिकता आ तामसिकता । यैह तीनू गुणक मिश्रण भेल करैछ हमरा सभक स्वभाव ।
उदाहरण लेल, यदि सात्त्विकताक मात्रा ६०%, राजसिकताक मात्रा ३०% आ तामसिकताक मात्रा १०% हेतैक त ओहि मनुखक स्वभाव आ फेर दोसर मनुख जेकरा मे एहि अनुपात सँ भिन्न १०ः२०ः७०, अथवा २०ः३०ः५०, या फेर आने-आने आनुपातिक परिमाण मे रहल लोक सँ भिन्न हेब्बे टा करतैक । एहि सूत्र पर बनैत अछि हमर-अहाँक स्वभाव, गुण-अवगुण, पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म आदि ।
जँ हम टेढ़ लोक छी – जे कि लोक सब कहल करैत अछि, अपना-आपो केँ टेढ़ हेबाक बात मने-मन बुझिये गेल करैत छी; त एकर अर्थ यैह भेल जे हमरा मे राजसिकता बढ़ि गेल अछि । टेढ़ स्वभावक निर्माण मे सर्वाधिक मात्रा राजसिकताक होइछ । तदोपरान्त तामसिकताक मात्र सर्वाधिक होइछ । आर सात्त्विकताक मात्रा अत्यल्प होइछ ।
टेढ़ीक मात्रा सेहो भिन्न-भिन्न लोक मे भिन्न-भिन्न होयब स्वाभाविके छैक । टेढ़ो स्वभाव मे भिन्न-भिन्न अनुपातक टेढ़ी देखायत । कारण एतहु गणितीय स्वरूपक विविध अनुपातक टेढ़ी होयबाक सत्यता-यथार्थता अछि । टेढ़ केर गोटेक लोक मे राजसिकता-तामसिकता-सात्त्विकताक अनुपात ८०ः१५ः५, ८१ः१४ः५, ८२ः१३ः५ या बदलैत संख्याक तीनू गुणक विविध अनुपातक परिमाण सहजहि बुझल जा सकैछ ।
स्पष्टे अछि जे राजसिकताक मात्रा मैथिल मे सर्वाधिक – कुटि-कुटिकय भरल रहबाक कारण टेढ़ लोकक संख्या सब सँ बेसी छैक ।
एकर गहींर मीमांसा मे प्रवेश करब त पंचतत्त्वक पाँच गोट तत्त्वक मात्राक भिन्नता सेहो कारक रूप मे नजरि पड़त ।
– आकाशतत्त्व – आवाज ।
– वायुतत्त्व – आवाज व स्पृश्यता ।
– अग्नितत्त्व – आवाज, स्पृश्यता आ दृश्यता ।
– जलतत्त्व – आवाज, स्पृश्यता, दृश्यता आ रसास्वादन ।
– पृथ्वीतत्त्व – आवाज, स्पृश्यता, दृश्यता, रसास्वादन आ गन्ध ।
प्रत्येक जीव मे यैह पाँचतत्त्व सँ शारीरिक संरचनाक निर्माण भेल अछि ।
आध्यात्मिक विवेचना (पौराणिक कथा सब) मे त स्थूल नदी, पहाड़, झील, तालाब आदिक संरचना मे सेहो एहि पाँचतत्त्वक संयोगक बात बेर-बेर कयल गेल अछि । आर एहि सम्पूर्ण स्थूल निर्जीव शरीरहु सब मे आत्माक निवास मानल गेल अछि । आत्मा तत्त्व सीधा परमात्माक अंश रूप मे मानल जाइछ । परञ्च राजसिकता जेहेन गुण हावी भेला पर, टेढ़ मनुष्य जेकाँ एहि निर्जीव शरीरहु सब मे टेढ़ी होइत छैक कि नहि हमर मन-मस्तिष्क ओतय धरि नहि पहुँचि सकल हँ एखन धरि । चिन्तन जारी अछि ।
मस्तिष्क एवं ज्ञानेन्द्रिय केर सम्पूर्ण कार्य – सुनबाक, देखबाक, सुंघबाक, चखबाक, स्पर्श सँ बुझबाक आर तदनुसार सोचबाक, स्मरण करबाक, शारीरिक तंत्र सब केँ वातावरण अनुसार उचित निर्देशन सब दैत रहबाक काज – ई सब किछु आत्मा-परमात्माक अवधारणा पर आधारित अछि ।
एक बेर इहो अभरल जे मनुष्य प्रजातिक लोक केँ भगवान् अपने जेकाँ बनेने छथिन। जेना आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं क्षितिज बनल, तहिना पाँचो तत्त्व सँ परिपूर्ण पृथ्वीलोक सँ कोटि-कोटि प्रकारक जीव-जन्तु बनल । स्थूल संरचना मे महासमुद्र सँ लैत धरातलीय पिंड सब बनल । त, गीता मे भगवान् कृष्ण जे कहने छथि ‘अष्टधा प्रकृति’, ताहि अनुसारे त मनुष्य मे मन, बुद्धि आ अहंकारक सीधा प्रत्यारोपण भेला सँ ‘टेढ़ी’ वला अवगुण तँ नहि आबि गेल ?
गीताक सातम अध्यायक चारिम श्लोक मे वर्णन भेटैछः
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥
ई सवाल पर हमर चिन्तन जारी अछि । उम्मीद अछि जे जवाब एक दिन भेटि जायत । ताबत धरि लेल चिन्तन-मनन जारी रखने छी । गुरुवर्गक ज्ञानी लोक लग जँ एकर थेसिस हो त साझा कय अनुगृहीत करी ।
हरिः हरः!!
