संस्कृति आ कर्मकाण्ड
वक्ता – पंडित भवनाथ झा, डा. तारानन्द वियोगी, रोशन जनकपुरी, प्रवीण नारायण चौधरी
संचालक – विकास वत्सनाभ
वैशाख १ गते २०८३, समयः १० सँ ११ बजे, स्थानः मिथिला सांस्कृतिक केन्द्र, औरही गाउंपालिका, वार्ड नम्बर २, परवाहा, धनुषा, नेपाल ।
विमर्शक अपेक्षाः
“संस्कृति स्थूल नहि होइछ । ओ त अविरल बहैत रहैत अछि । मिथिला मे संस्कृति केँ स्थूल बनेबाक प्रयत्न होइत रहलैए । परिणामतः संस्कृति आ कर्मकाण्ड बीचक भेद समाप्ति दिस जा रहल छै । आमलोक भ्रमित अछि । ओ निष्कर्ष धरि पहुँचय मे असमर्थ भ’ रहल अछि ।
एहि भ्रम आ अनिर्णय कारण समाजक सोच मे संकीर्णता त नइ अएलय ? आमलोकक जीवन आओर जटिल त नइ बनाओल जा रहल छै ? कर्मकाण्डीय चेतना वर्चस्ववादी समूह केँ आओर प्रभावशाली आ तृण समूह केँ कमजोर त नइ बनौलकैए ? एहि के संग आओर बहुत रास प्रश्न छै जे आजुक समाज केँ उत्तर भेटबाक चाही । एहि सत्र मे उत्तरक खोजबाक प्रयत्न होइक ।”
प्रवीणक विचार
मिथिला संस्कृति केँ स्थूल बनेबाक प्रयत्न होइत रहलैए – केना ?
“परिणामतः संस्कृति आ कर्मकाण्ड बीचक भेद समाप्ति दिस जा रहल छै । आमलोक भ्रमित अछि । ओ निष्कर्ष धरि पहुँचय मे असमर्थ भ’ रहल अछि ।” – अर्थात् परम्परागत संस्कृति – बाप-पुरखा द्वारा कय आयल विभिन्न कर्मकाण्डीय पद्धति केँ कियो-कियो छोड़ि रहल अछि, कियो-कियो धेने अछि, लोक भ्रम केर अवस्था मे अछि । कि करू, कि नहि करू – हम यैह करब त जीवन कटि जायत – एहेन स्थिति अछि ।
कारण समकालीन शिक्षा आ संस्कार नव मिश्रित पद्धति पर चलि रहल अछि । भारत मे एकटा पैघ कालखंड मे बाहरी लोकक सल्तनत (शासन) आ नियम-कानून लागू कयल गेल । नेपाल मे हिन्दू राष्ट्रक नाम आ धार्मिकता मे हिन्दू सनातन – वैदिक रीति-रिवाजक महत्ता रहितो शिक्षा पद्धति भारतहि मे लागू ब्रिटिश पद्धतिक अनुकरण करैत अपन मौलिक स्वरूप – गुरुकुल आ वैदिक शिक्षा पद्धति नहि रहबाक यथास्थिति अछि ।
एहि तरहें मिश्रित शिक्षा पद्धति मे कि उचित, कि अनुचित – एकर निर्देशनक कोनो ठोस आधार नहि रहि गेल अछि । ई बेहाली सनातन धर्म किंवा वैदिक धर्म कहायवला हिन्दू मे सर्वाधिक अछि कहि सकैत छी । कारण आन-आन धर्मक एकटा निश्चित प्रवर्तक भेल छथि, हुनका द्वारा निर्दिष्ट मार्ग केँ अन्तिम सत्य मानि ओ धर्मावलम्बी या त अनुसरण करैत छथि, या फेर नास्तिक रूप मे केवल मानवीय विवेकक प्रयोग करैत स्वच्छन्द आचरण अपनबैत छथि ।
अपन-अपन रुचि आ स्वीकार्यताक आधार पर लोक बढ़ैत रहबाक उदाहरण सर्वाधिक सनातन हिन्दू धर्म मे भेटैत अछि । आइ स्वच्छन्दता कतेक बढ़ि गेल से छुपल नहि अछि ।
अनादि वैदिक पद्धति मे कालान्तर मे कतेको तरहक व्याख्या-कुव्याख्या होइत आबि रहल अछि । विभिन्न कालखंड मे कतेको प्रकारक आडम्बरी सोच आ पन्थक विविधता सब अपनेबाक काज सेहो होइत आबि रहल अछि ।
मानव स्वभाव अधिकतर स्वतंत्रता आ स्वच्छन्दता केँ अपनाबैत अछि ।
मानवीय गुणक तीन टा आधार – सत्त्व, रजस ओ तामस केर सम्मिश्रण आ मन, बुद्धि एवं अहंकार सहितक अष्टगुण प्रकृति सँ चलयवला दार्शनिक सिद्धान्त सर्वविदित अछि । एहि मे वैदिक निर्देशन अनुसार जीवन चलेबाक जे पद्धति बनायल गेल अछि तेकरे कहल जाइछ कर्मकाण्ड । भोरे उठू त कर-दर्शन करू, हाथक अग्रभाग, मध्यभाग व पार्श्वभाग धरि त्रिदेव-त्रिशक्तिक दर्शन कय स्वयं केर करबल मजगूत बनाउ आ कर्मठ सन्तान बनिकय पृथ्वीलोक मे अपन कर्तव्य पूरा करू । भोरे बिछौन सँ उतरिते पृथ्वी उपर पैर राखू त हुनका सर्वप्रथम प्रणाम करू जे दिन भरि पुण्यक काज करैत बितय । फेर नित्यकर्मक शौच-स्नान-मार्जनक संगहि सन्ध्या, तर्पण, अग्निहोत्र एवं विभिन्न देवी-देवताक लक्षित पूजा-पाठ, पंचदेव उपासना, कुलदेवताक पूजा, बर-पिपरक पूजा, प्रकृतिक पूजा, तुलसी पूजा, मन्दिर मे पूजा – ई सब अनेकों उपक्रम सँ स्वयं केँ साधल-समधानल मानव जीवन मे राखू । कर्मकाण्डक यथार्थ अर्थ यैह छैक ।
कर्मकाण्ड सँ इतर ज्ञानकाण्ड सेहो एहि वेद एवं वेदक विभिन्न प्रकल्प – उपनिषद्, वेदान्त आदि द्वारा वर्णित अछि । वेदक ऋचा, सुक्त सूत्र रूप मे अछि । वेदक विभिन्न मंत्र बीज रूप मे अछि । फेर वैह सुक्त-सूत्र-ऋचा व बीजादिक विशद् व्याख्या – संहिता, ब्राह्मण एवं ताहू सँ उपर आरण्यक रूप मे देल गेल अछि । मुदा एहि विभिन्न चरणक प्रारम्भ कर्मकाण्ड थिक । पहिने अभ्यास करैत-करैत स्वयं केँ इहि योग्य लोक बनबैछ जे अन्तिम पौदान धरि ओकर पहुँच भ’ सकैक । ओ ज्ञान प्राप्त करत तखनहिं बुद्ध बनत, जनक बनत – यानि मुक्तजीव बनि सकत ।
आरम्भ मे जेना औपचारिक शिक्षा प्राप्त करैत लोक शिक्षित होइत अछि, सुसंस्कृत बनैत अछि, ठीक तहिना कर्मकाण्ड सँ लोक अपन जीवन केँ अनुशासित आ सुव्यवस्थित करैत अछि । मिथिलाक पांडित्य मे एहि कर्मकाण्डक अपन विलक्षण स्थान अछि । यैह पांडित्य तिब्बत-चीन धरि प्रसारित भेल । आइना-ए-तिरहुत मे बिहारीलाल फितरत १८७९ ई. मे लिखने छथि जे चीन केना मिथिला केँ अपन गुरु मानैत अछि । कतेको रास आदिवासी-जनजातीय समुदाय केँ मिथिलाक कर्मकाण्डीय पद्धति सँ वन-जंगल केर आदिम लोक सँ सभ्य मानव जीवनक मूलधारा मे आनल गेल अछि । मिथिलाक्षेत्र थारू केर जीवन आ अबध क्षेत्र आ कि गढ़वाली क्षेत्रक थारूक जीवन पद्धति मे फर्क एकर जिबन्त उदाहरण थिक ।
व्रत, उपासना, साधना, जप, तप, पूजा-पाठ, स्वाध्याय, सत्संग, आदि अनेकों उपक्रम एकरे विभिन्न प्रभाग छी । जीवनक बाल्यकाल, युवाकाल, प्रौढ़काल आ बुढ़ापा – प्रत्येक समय लेल यथोचित कर्मकाण्डक व्याख्या वेदांग कल्प मे आंशिक रूप सँ आ उपांग धर्मशास्त्र मे समग्र रूप सँ वेदहि केर विभिन्न शाखा-उपशाखा आ ऋषि-महर्षि संग-संग अनेकों मीमांसक, नैय्यायिक आदिक व्याख्या सब सँ दैहिक-आत्मिक सुख आ कल्याणक मार्गदर्शन भेल अछि ।
लेकिन भ्रमक अवस्था लोकक शिक्षा, संस्कार, राजनीतिक बात-व्यवस्था आ विचार सब सँ बनल अछि । आइ वैदिक धर्म केँ छुआछुत आ जातीय भेदभावक जैड़ कहिकय, अन्धविश्वास आ आडम्बरी प्रथा-परम्परा कहिकय, ब्राह्मणक वर्चस्ववादी सोच आ व्यवस्था कहिकय – अनेकों बाहरी आक्रान्ता सभक पसारल कुव्याख्या केँ सच मानिकय एहेन भ्रम मे लोक फँसि गेल अछि । लगभग १२०० वेद शाखा मे सँ केवल २०-२२ गोट शाखा बामोस्किल सँ आइ भेटैछ, लिखैत छथि चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती ।
लोक आ समाजक भ्रम – व्यवहारिकता सँ कर्मकाण्ड समाप्तिक संकेत
एखन कथित ब्राह्मण जातिक लोक जनेउ संस्कार खाली नाममात्र लेल कय रहल अछि, जखन कि ई संस्कार वेद पढ़बाक आ कर्मकाण्ड सँ ज्ञानकाण्ड धरि स्वयं व समाज केँ आगू बढ़ेबाक लेल लय जेबाक वास्ते होइछ ।
आइ ‘डीजे’ लोकक हृदय आ कान केँ फोड़य लेल आतुर अछि । कैमरामैनक इशारा दुल्हा-दुल्हिन केँ विवाहक गठबन्धन मे बान्हबाक लेल पुरहिताय कय रहल अछि ।
देवता-पितर केर गीत, बाबी-काकीक गीत, विध-व्यवहारक गीत, ठाउं-पीढ़ी, चौका-पुरहर कि अहिपन, कोबर, मोखा लिखाइ आदिक पारम्परिक व्यवहार सब केँ क्रमिक रूप सँ लोक छोड़ैत चलि गेल अछि ।
धारावाहिक आ फिल्म मे देखायल जा रहल बाहरी संस्कृति व रिवाज अनुसार हरैद आ मेंहदी संग फिल्मी संगीत आ नाच केर रिवाज अपनबैत जा रहल अछि । भने कहैत छथि मैथिलीक उद्घोषक किसलय कृष्ण – हल्दी-मेंहदी संग बुकनी सेहो करत लोक । गोटेक रील्स जँ बुकनी रस्म पर लोकप्रिय भ’ जाय त वर कनियाँक आँखि मे आ कनियाँ वरक आँखि मे मेरचाय के बुकनी छींटय आ बाकी लोक सब खूब नाच करय, विधक उपयोगिता मे एक-दोसर मे सहन करबाक सामर्थ्य कतेक छैक से पता चलि जेतैक ।
देवता-पितर आ पुरखा-परम्पराक घटैत मानि-मोजर एहि सभक जैड़ थिक । परिणाम सुखद कि दुखद सभक सोझाँ मे अछि । बाकी विवेक लोकक अपन छैक । अस्तु ! बाकी विमर्शक मंच पर बात करब ।
हरिः हरः!!
