Search

प्राथमिक शिक्षाक माध्यम भाषा मैथिली होयब अत्यावश्यक अछि

54 भ्यूज

विचार

– प्रवीण नारायण चौधरी

हम मैथिलीभाषी अन्दाज आ कल्पना सँ न्याय करबाक लेल नव-नव तर्क गढ़ैत रहैत छी । परञ्च नियम कहैछ जे कोनो गम्भीर विषय पर समुचित अध्ययन करबाक चाही, फेर कोनो तरहक आधिकारिक निर्णय किंवा निष्कर्ष पर पहुँचबाक चाही । मैथिलीभाषीक हित लेल प्राथमिक शिक्षाक माध्यम मैथिली होयब अत्यावश्यक अछि ।

कनि पढ़ू तखन बाजू
अँधेर बेसी गप नै मारू

डा. हेतुकर झा सम्पादित – बिहारी लाल फितरत केर लिखल ‘तावालिख-ए-तिरहुत’ जेकरा ‘आईना‍-ए-तिरहुत’ नाम सँ प्रसिद्धि भेटल छैक, जेकर प्रकाशन १८८३ ई. मे भेल छैक, ताहि सन्दर्भित लगभग ३० पृष्ठक आलेख “The Importance of Aina-i-Tirhut in Urdu Historiography” मे अत्यन्त गम्भीर तथ्य व आधार आदिक विवेचना करैत ताहि समयक लेखन शैली मे फारसी आ तत्पश्चात् उर्दू मे इतिहास लेखनक खाका सेहो रखने छथि । हमरा-अहाँ केँ बुझाकय कहने छथि जे उर्दू मे लेखनक महत्व कि छलैक, कियैक लोक लिखैत छल आ एकर मूल उद्देश्य कि होइत छलैक ।

याद करू, राज्य द्वारा पोषित भाषा मे बहुत रास काज होइत छैक । आर कतबो समृद्ध भाषा कियैक न हो, राज्य द्वारा उपेक्षित होयत त ओ नाश भ’ जायत । आइ मैथिली भाषाक बेहाली राज्यक उपेक्षाक कारण मात्र भेल छैक । एहनो नहि छैक जे राज्य पूर्णतया दरकिनार कय देने छैक, आंशिक पोषण मैथिली लेल सेहो भेटले छैक, मुदा तेहेन पोषण पर गिधदृष्टि सँ ‘राज्यप्रदत्त माल’ हाई-वे पर लुटा जाइत छैक । एम्हर समाज मे भाषा आ बोलीक नाम पर राजनीतिक मल्लयुद्ध करबाकय राज्यक सत्तारोहण मात्रक काज होइत छैक ।

संस्कृत मे चारि गोट वेद आ तत्पश्चातक विभिन्न शाखा-उपशाखा, महत्वपूर्ण छः गोट वेद-अंग यथा शिक्षा, व्याकरण, छन्द, निरुक्त, ज्योतिष आ कल्प संगहि चारि गोट उपांग यथा मीमांसा, न्याय, पुराण आ धर्मशास्त्र – यानि १४ गोट विद्याक आधार पर ठाढ़ छल मानव जीवन । मुदा वैदिक परम्परा मे मानवीय स्वतंत्रता आ स्वच्छन्दताक संगहि कतेको रास द्वन्द्वक कारण आइ एहि विद्याक अनुसार कतेक लोक जिबैत अछि, से स्वतः बुझि सकैत छी ।

विद्यापतिक कालखंड मे स्वयं विद्यापति सँ तत्कालीन राजवंश (यानि राज्य) कतेको महत्वपूर्ण लेखन कार्य करौने अछि । विद्यापति जाहि वंश सँ छलथि, ताहि वंश मे पिता, पितामह आदि सेहो राजकाज संचालनक मुख्य जिम्मेदार लोक सब रहथि । स्वयं विद्यापति कतेको मानवोपयोगी शास्त्र-उपशास्त्र आधारित टीका-विश्लेषण आदि लिखलनि । आर ज्ञान परम्परा सँ प्राप्त कतेको जरूरी सूत्र केँ ओ जनसुलभ साहित्य ‘देसिल बयना’ – अवहट्ट (मैथिली) मे लिखलनि । पुरुष परीक्षा, लिखनावली, वर्षकृत्य, आदि विभिन्न महत्वपूर्ण लोकोपयोगी साहित्यक रचयिता विद्यापति भेलथि ।

मातृभाषाक महत्व यथार्थतः जनसामान्य अर्थात् एलिट्स सँ बेसी कौमनर्स लेल होइत छैक । भारतक संविधानक अनुच्छेद ३५० (क) मे प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा मे देल जेबाक प्रावधान कयल गेल छैक । ई मौलिक अधिकार थिकैक लोकक । जन्मोपरान्त क्रमिक रूप सँ विकसित होइत बाल-मस्तिष्क अपन परिवेश सँ जे भाषा सिखैत अछि, वैह ओकर मातृभाषा थिकैक । आर शुरुआती शिक्षा सब अपनहिं भाषा मे पाओत तखनहिं ओकर आगू पढ़ाइ-लिखाइ मजगुत रहतैक । लेकिन मिथिलाक्षेत्र केँ संस्कृत सँ छुटकारा भेटलैक आ देसिल बयना मैथिलीक बदला मे विभिन्न शासकीय व्यवस्थाक भाषा सब जेना फारसी, उर्दू, अंग्रेजी आ हिन्दी (भारत मे), नेपाली (नेपाल मे) अपनेबाक बाध्यता भेलैक ।

परिणाम कि भेलैक ?

परिणाम यैह जे आभिजात्य वर्गक आ शिक्षा-संस्कार प्रति पूर्वहि सँ विकसित वर्ग त ओहि बहरियो भाषा सब मे स्वयं केँ प्रशिक्षित कय केँ आगू बढ़ि गेल । सामान्यवर्ग पछुआ गेल । साक्षरता दर विपन्न भ’ गेलैक । मजदूरी मात्र लोक लेल सहारा रहि गेलैक । जमीन्दारी प्रथा, मजदूरक शोषण, पिछड़ापन, विपन्न जीवन – ई सब विभिन्न कालखंड मे कोन तरहें मिथिला समाज मे रहल से केकरो सँ नुकायल नहि अछि । पछातिकाल बड़का-बड़का जमीन्दारो सभक सन्तति सब पलायन लेल बाध्य भेल अछि । विकासदर कतेक धीमी गति सँ चलि रहल अछि सेहो सब बुझिते छी ।

समाधान की ?

महत्वपूर्ण सवाल छी ई । एकर जवाब ताकय जाउ । सभक बुद्धि आ विवेक केँ जोड़िकय समाधान निकालबाक कोशिश करय जाउ ।

मात्र बौद्धिक आधिक्यताक प्रदर्शन आ व्यवहारिक तौर पर एक-दोसर सँ उलझैत अनावश्यक विवाद मात्र केँ जन्म दैत रहब उचित नहि । अस्तु !

हरिः हरः!!

Related Articles