लेख विचार
- प्रेषित: सुधा ठाकुर
दहेज मुक्त मिथिला
लेखनी के धार, वृहस्पतिवार
विषय : आजुक समय मे शगुन मात्र दिखावा बनि गेल
शगुन के अर्थ अछि आशीष!जे कोनो शुभ घड़ी मे
लोग टका के रुप मे दैत छथिन, कोनो शुभ काज मुंडन, उपनायन,विवाह मे लोग शगुन दैत छै जे बच्चा के उज्जवल भविष्य के लेल आशीर्वाद होयत छै!पहिने सभा गाछी स वर के आईन विवाह होयत छल जाहि मे वर पक्ष के तरफ स विवाह के पश्चात शगुन के भार आबैत छल जाहि मे नव कनियाँ लेल
साड़ी, लहठी गहना कनियाँ के आशीर्वाद स्वरूप देल जायत छल!
शगुन देनाई हमर सभक परम्परा अछि, आदिकाल स चलल आइब रहल अछि!
शगुन के स्वरूप मे आब किछ परिवर्तन आइब गेल अछि, इ परिवर्तन देवय वाला और लेवय वाला दुनू के मानसिकता मे आयल अछि!शगुन के पाई के लिफाफा के सबके समक्ष खोइल क लिखल जायत छै जाहि स जग जाहिर भ जायत छै कि अमुक व्यक्ति कतेक शगुन देलथीन जे बेसी शगुन दैत छथिन ओ गर्व महशुस करैत छैथ!
ओहिना लेवय वाला से हो मन मे दू भावना भ जायत छै!पहिने मुंडन, उपनायन मे सब सबासीन के विदाई के लेल एक रंग सब किछ आबैत रहै कपड़ा, वस्तु परन्तु आब जेहन शगुन ओहन विदाई!जाहि स शगुन मात्र आशीर्वाद नय भ एकटा व्यापार से हो भ गेल अछि एक हाथ दी दोसर हाथ लीं!
शगुन मात्र आशीर्वाद नहीं रहल आहि मे दिखावा के पूर्णरूपेण समावेश भ गेल अछि!
