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शगुन कहि द्रव्य देब’ आशीषक एक टा प्रकार छल

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लेख विचार

प्रेषित : आभा झा

दहेज मुक्त मिथिला

लेखनीक धार , वृहस्पति वार सप्ताहिक गतिविधि

विषय – शगुन: व्यवहार वा बाहरी दिखावा

मैथिल संस्कृति अपन संस्कार, परंपरा आ व्यवहारक लेल पूरे विश्वमे जानल जाइत अछि। एहि परंपरा सभमे ‘शगुन’ वा ‘नेग-जोग’ क स्थान बहुत महत्वपूर्ण अछि। मुदा समयक चक्रक संग, जाहि शगुन कए कखनो आपसी प्रेम आ आशीर्वादक प्रतीक मानल जाइत छल, ओ एखुनका समयमे किछु हद धरि ‘बाहरी दिखावा’ आ ‘प्रदर्शन’ क वस्तु बनि गेल अछि। ई विचारणीय अछि जे शगुन वास्तवमे हृदयक व्यवहार थिक वा मात्र लोक-लाजक लेल कएल गेल आडंबर?

शगुन: एकटा पवित्र परंपरा –
मूल रूप सँ देखल जाए तँ शगुनक अर्थ अछि ‘शुभ लक्षण’। कोनो मांगलिक काज, जेना विवाह, मुड़न, वा उपनयनक समय जे उपहार वा द्रव्यक आदान-प्रदान होइत अछि, ओकर पाछाँ दूटा मुख्य भाव रहैत अछि—स्नेह आ सामूहिकता।

मैथिल समाजमे जखन कोनो बेटीक विआह होइत अछि, तँ गाम-घरक लोक अपन सामर्थ्य अनुसार किछु ने किछु शगुन दैत छथि। एकर अर्थ ई नै जे बेटीक पिता असमर्थ छथि, बल्कि एकर अर्थ ई अछि जे पूरा समाज ओहि खुशीमे सहभागी अछि। ई शगुन आपसी संबंधकें प्रगाढ़ करबाक एकटा माध्यम थिक। एतय टका-कौड़ी सँ बेसी भावनाक महत्व होइत अछि।

दिखावाक प्रवेश आ विकृति –
बीतल किछु दशकमे शगुनक स्वरूप बदलि गेल अछि। जतय पहिने ‘नेग’ क राशि श्रद्धा सँ देल जाइत छल, एखन ओ ‘प्रतिष्ठा’ क विषय बनि गेल अछि। एखुनका समयमे शगुन केर किछु नकारात्मक पक्ष एहि प्रकार अछि:

आर्थिक दबाव: एखन शगुन दै सँ पहिने लोक ई सोचैत छथि जे ‘फलाँ आदमी एतेक देने छल, तँ हमरा ओहि सँ बेसी देबय पड़त।’ ई भावना श्रद्धाकें खत्म कऽ दैत अछि आ व्यक्ति पर मानसिक दबाव बनाबय लागैत अछि।

प्रतियोगिता: भोज-भात आ विआहमे शगुनक लिस्ट बनैत अछि। के कतेक देलक, एकर चर्चा सामाजिक जमघटमे होइत अछि। ई व्यवहार नै, बल्कि व्यापारक रूप लऽ रहल अछि।

दहेजक छद्म रूप: कतेको बेर ‘शगुन’ क नाम पर भारी भरकम उपहारक मांग कएल जाइत अछि। एतय ई ‘शुभ’ सँ बेसी ‘बोझ’ बनि जाइत अछि।

व्यवहार आ प्रदर्शनक बीचक रेखा –
व्यवहार ओ थिक जे स्वेच्छा सँ, बिना कोनो शोर-शराबाक आ हृदयक गहराइ सँ कएल जाए। मुदा जखन शगुन केर वितरण सोशल मीडिया पर फोटो खिचेबाक लेल वा समाजमे अपन रूतबा देखयबाक लेल होइय, तँ ओ ‘बाहरी दिखावा’ भऽ जाइत अछि।

मैथिलीमे एकटा कहावत अछि—”मन चंगा तँ कठौतीमे गंगा”। अर्थात, जँ मन शुद्ध अछि तँ छोट सँ छोट उपहार सेहो अनमोल अछि। मुदा जँ मनमे अहंकार अछि, तँ लाखक शगुन सेहो मात्र एकटा बेजान वस्तु अछि।

सुधारक आवश्यकता –
हमरा सभकें एहि बात पर आत्ममंथन करबाक आवश्यकता अछि जे हम परंपरा कए जीवित राखय चाहैत छी वा कुरीति कए बढ़ावा दऽ रहल छी। शगुन कए पुनः ‘व्यवहार’ बनेबाक लेल किछु कदम उठाबय पड़त:

सामर्थ्यक सम्मान: के कतेक शगुन देलक, ओकर चर्चा बंद होबय चाही। शगुन कए गोपन राखब तँ ओकर पवित्रता बनल रहत।

दिखावा सँ परहेज: बड़का-बड़का होर्डिंग वा माइक सँ शगुनक घोषणा करब बंद होबय चाही।

भाव कए प्रधानता: उपहारक दाम सँ बेसी उपहार देनिहारक भाव कए देखल जाए।

मानसिकता: ‘अहाँक उपस्थिति ही उपहार अछि’— एहि सोच केँ बढ़ावा देब आवश्यक अछि।

शगुन हमर मिथिलाक गौरवशाली परंपराक अभिन्न अंग अछि। ई समाज कए जोड़बाक सूत्र अछि, तो़ड़बाक नै। जखन धरि एहिमे प्रेम आ आशीर्वाद रहत, ई ‘व्यवहार’ कहल जायत। मुदा जखन एहिमे अहंकार आ प्रतियोगिताक प्रवेश भऽ जायत, तँ ई मात्र ‘बाहरी दिखावा’ बनि कऽ रहि जायत।

अतः, हमर कर्तव्य अछि जे हम शगुन कए आडंबर सँ मुक्त करी आ एकरा पुनः ओहि स्वरूपमे आनी जतय सँ ई शुरू भेल छल—स्नेह, आदर आ आपसी सद्भावक प्रतीक स्वरूप। जय मिथिला, जय मैथिली।

 

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