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तिला संक्रान्ति सँ शुभ काजक शुभारंभ होइत अछि

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लेख विचार
प्रेषित: ममता झा मेधा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :–तिल संक्रांति पहिने आऽ आबक रूप।
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मिथिला मे तिला संक्रान्ति पहिने आऽ आबक रूप मे बहुत अंतर अछि।
पहिने त हम ई जानि ली जे मकर संक्रांति पाबैन किएक मनबैत छी।
जखन सूर्य उत्तरायण सं मकर राशि मे प्रवेश करैत छैथ तखन पाबैन तिहार के संयोग बनैत अछि। शुभ काजक शुभारंभ होइत अछि।लोग नब अनाजक लेवान करैत छैथ।
पौराणिक कथा अनुसार मां गंगा भागीरथ के पाछु पाछु गंगासागर मे आइए (संक्रांति) के दिन मिलल छली।सूर्य देव अपन पुत्र शनि देव सं भेंट करै लेल आइए के दिन गेल छलैथ।

मिथिलाक सामूहिक स्नेह के प्रतीक अछि तिला संक्रान्ति पाबैन। मिथिलांचल मे सब पाबैन समाज सं सँ जुड़ल घनिष्ठताक प्रतीक अछि। जाड़क रौद जखन अंगना मे आबैत छल, तखन घर-घर सं धानक उसन के गंध आबैत छल, कतऊ उखैर मे चूरा कुटाइत छल।तिलक सुगंध वातावरण के सम्मोहित करैत छल। तिल, गुड़, चूड़ा, दही ई सब केवल खाद्य सामग्री नहि, बल्कि लोक संस्कारक प्रतीक छल। अंगना मे चूल्हा सुलगैत छल, हाथे-हाथे तिलबा बनैत छल, आऽ संगहि सम्बन्धक गुड़क पाक पकैत छल।

पाबैन मे कोनो तरहक दिखावा नहि, सब अपनापन संग भेंट करै छल। पड़ोसी, सर सम्बन्धी, कुल-परिवार सभ एक-दोसराक आँगन सँ जुड़ल छल। पाबैन व्यक्तिगत नहि, सामूहिक छल, उत्सव घरक भीतर नहि, समाजक सामुहिक रूप छल।
कहल गेल अछि संस्कृत मे कि –
“माघ मासे महादेव: यो दास्यति घृतकंम्बलम्।
स भुक्तवा सकलान भोगान अंते मोक्षं प्राप्ति।।”
अर्थात संक्रांति के दिन जप तप दान ध्यान श्राद्ध तर्पण आदि के विशेष महत्व अछि।एहन मानल जाइत अछि कि आजुक दिन कैल गेल दानक फल सौ गुणा फल दैत अछि। कम्बल आ घी तील दान केला सँ मोक्ष प्राप्त होइत अछि।।
नदी, पोखर, इनार पर स्नान-दान, देवस्थान मे पूजा-पाठ ई सब बाहरी आडंबर नहि, बल्कि आत्मशुद्धिक साधना छल। तिला संक्रान्ति मनुष्य के प्रकृति संग संवाद करबाक अवसर दैत छल। जाड़क मौसम मे तील डाहिक आइग तापब ऊर्जा के संरक्षक छल।पहिने रूम हिटर नई छल त लोग सामुहिक रूप सँ आइगक व्यवस्था करैत छलाह।

आब तिला संक्रान्ति सुविधा, बाजार आऽ औपचारिकता भरि रहि गेल अछि। समय बदैल गेल अछि, आऽ समय संग तिला संक्रान्तिक स्वरूप सेहो। आब पाबैन तारीख पर सिमटैत देखाइत अछि। तिलक मिठास आब घरक चूल्हा सँ निकलि कऽ बाजारक पैकेट मे बंद भऽ गेल अछि। स्नेहक आदान-प्रदान अंगना सँ हटि कऽ मोबाइल स्क्रीन पर उतरि आएल अछि “शुभ संक्रान्ति” क संदेश मे।
शहरिया जीवनशैली, नौकरीक व्यस्तता आऽ एकल परिवारक जीवन पाबैनक सामूहिकता के संकुचित कऽ देने अछि।

आब तिला संक्रान्ति मे शोर अछि, प्रचार अछि, मुदा ओ मौन अपनापन कम देखल जाइत अछि। सम्बन्धक ताप सुविधा के ठंडा वातावरण मे कतहु ने कतहु सीमटल जा रहल अछि।
आब तिला संक्रान्ति उत्तरायणक आशा लैत अछि, आबो ई पाबैन जाड़क कठोरता के बीच मिठासक संदेश दैत अछि। अन्तर केवल एतबा अछि जे भाव भीतर अछि, पर अभिव्यक्ति बदलि गेल अछि।
पहिले आऽ आब के पाबैन मनब के तरीका मे बहुत परिवर्तन आबि गेल अछि।
पहिने कोनो पाबैन संबंध प्रधान छल। आब कोनो पाबैन सुविधा प्रधान अछि। पहिने के समय मे लोकक महत्व छल, आब समयक संग चलैत छैथ।
मिथिला मे बूढ़ पुरान आइयो पारम्परिक तिला संक्रान्तिक आनंद उठाब चाहैत छैथ।
तिला संक्रान्ति मिथिला के शुभ मुहूर्त के शुरुआत अछि।अई पाबैन मे अतीत के उजास आऽ वर्तमानक प्रतिबिंब समाहित अछि। आबक तिला संक्रान्ति समय संग चलबाक विवशता सिखबैत अछि। आवश्यकता ई नहि जे हम अतीत मे जाई, बल्कि ई जे वर्तमान मे ओहि संबंधक मिठास के बचा बचा कऽ राखी।

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