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बिहार मे फेर त नहि आओत जंगलराज ?

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राजनीति आ प्रवीण विचार

– प्रवीण नारायण चौधरी

जंगल केर राजा आ राजनीति

भारत १९४७ मे स्वतंत्र भेल । स्वतंत्रता पछाति ‘संविधान सभा’ द्वारा भारतक गणतंत्रात्मक स्वरूप केँ ‘संघीय गणराज्य’ केर आधार राष्ट्र-राज्य सिद्धान्त अनुसार लगभग ५५० रियासती राज (princely states) केँ एकीकृत रूप मे संघ एवं राज्य द्वारा राष्ट्रिय राजश्वक वितरण व भोग-चलन मुताबिक ‘राज’ चलेबाक सिद्धान्त पर देश आगू बढ़ल ।

लोकतंत्रक साधारण व सर्वाधिक प्रचलित परिभाषा ‘Of the people, by the people, for the people’ अर्थात् लोकतंत्र मे जनता केर सरकार, जनता द्वारा, जनते लेल चलैछ । ई परिभाषा विश्वक सर्वाधिक चर्चित राजनेता ‘अब्राहम लिंकन’ द्वारा १८६३ ई. मे गेट्टिसबर्ग (अमेरिका) मे अपन सम्बोधनक क्रम मे कहल गेल आ एतबा प्रसिद्ध भ’ गेल जे पूछू जुनि । हमहुँ सब नागरिकशास्त्रक अध्ययन शुरू करिते ई फ्रेज पढ़लहुँ-बुझलहुँ आ यादे भ’ गेल । भारत एकटा लोकतांत्रिक गणराज्यक रूप मे १९५० मे २६ जनवरी केँ घोषित भ’ गेल ।

भारतक इतिहास मे गौर कय केँ देखला सँ पता चलत जे वैदिक निर्देशनानुसार मुख्य राजनीतिक पद्धति, मान्यता आ संरचना पर हमेशा सँ ‘राज्य आ सम्राज्य’ केर समानान्तर शासन पद्धति रहल एहिठाम । ईशा पूर्वक कालखंड हो, ईशा पछातिक कालखंड हो – दुनू समय एहिठाम ‘रियासती राजा’ एवं ‘सम्राज्यरूप मे भारतवर्षक सम्राट’ यैह पद्धति रहल छल । मध्यकालीन समय धरि भारतवर्षक पवित्र भूमि मे हिन्दू-बौद्ध मत बीच द्वन्द्वक लाभ उठबैत बाहर सँ व्यापार करबाक लेल आयल अरबिक, योरोपीय डच-पुर्तगाल-फ्रान्सिसी सब मे सँ कतेको लोक सम्राज्यवादी सिद्धान्त पर चलिकय ‘बाहरी आक्रान्ता’ बनिकय ‘सिन्धु’ केँ ‘हिन्दु’ कहैत अपन सम्राज्यक प्रसार ‘हिन्दुस्थान’ अर्थात् ‘हिन्दुस्तान’ केर शासक बनि गेल ।

शासन पद्धति मे ‘जेकर लाठी तेकर महींस’ नीति सब दिन रहल । लेकिन होइत-होइत भारतीयता जेहेन ‘राष्ट्रीयता’ केर जीत होइछ, कतेको सुपर सन्स अफ स्वाइल (महान धरतीपुत्र) लोकनिक योगदान, दृष्टि आ विचार-सोच संग सक्रिय भूमिका (योगदान) सँ भारत १९४७ मे सभक चांगुर सँ मुक्त भ’ एकटा स्वतंत्र लोकतांत्रिक गणराज्य – संघीय राष्ट्र बनल आ तहिया सँ जनता द्वारा, जनता लेल, जनता पर शासन चलेबाक वास्ते ‘चुनाव’ होइत आबि रहल अछि ।

‘चुनाव’ ५ वर्ष पर होइछ

राज्य एवं संघ लेल जनप्रतिनिधि चयन करबाक काज होइछ । जेकरा संख्यात्मक रूप सँ अधिक मत भेटैछ, वैह ग्रामाधिपति, क्षेत्राधिपति, प्रदेशाधिपति जेहेन विभिन्न आकारक ‘अधिपति’ बनबाक हिसाब सँ ‘सरकार’ केर हिस्सा ‘सदनक सदस्य’ बनैछ । सत्ता पर पहुँचैछ । सत्ता संचालन मे चयनित जनप्रतिनिधि लोकनिक विधायिकाक संग सचिवालयक सहयोग यानि ‘कार्यपालिकाक अनेकों कार्यालय व कर्मचारी’ संग-संग ‘विधि-विधान संग न्याय’ केर ‘न्यायपालिका’ सहित संचालित होइछ ।

एहि मे चारिम स्तम्भ ‘संचारकर्म’ केँ मानि सूचना प्रवाह संग सरकार नीतिक समीक्षा, आलोचना एवं जनता केँ सुसूचित रखबाक प्रचलित आधार पर देश बढ़ि रहल अछि ।

आजादीक लगभग ८ दशक सँ ‘भारत’ प्रगतिपथ पर निरन्तर बढ़ि रहल अछि । आइ विश्वशक्तिक रूप मे भारतक नाम समस्त विश्व मे गणनीय अछि । लोक गर्व सँ कहैछ जे ‘हम भारतक छी, भारतीय छी, भारतीयता सर्वोपरि अछि’ ।

फेर ई ‘जंगलराज’ लोकतंत्र मे केना ?

चूँकि जनप्रतिनिधिक चुनाव मे संख्या गानल जाइछ, गुणवत्ताक कोनो स्थान नहि – केवल संख्याबल जुटाउ, राज चलाउ – त, एहेन स्थिति मे हमेशा उपद्रवी तत्त्व अपन उपद्रव सँ जनताक मत मे विभाजन आनि अपना तरहें ‘शासन संचालक शासक’ बनबाक नीति अख्तियार करैत ‘जंगलराज’ यानि जंगल मे जेना एकटा जंगलराजा ‘बाघ’ केर मनमानी चलैत छैक, ठीक तहिना एहेन-एहेन उपद्रवी तत्त्व सब अपन राज चलबैत अछि ।

याद करू हिरण्याक्षक नाम – सनातन वैदिक धर्मक पुराण (स्मृति) मे, इतिहास (रामायण ओ महाभारत) मे, सर्वत्र चर्चित नाम थिक ई । तहिना याद करू हिरण्यकशिपु केँ, कंस केँ, रावण केँ, दुर्योधन या कौरव केँ, अपना पास अर्जित शक्तिक दुरुपयोग कयनिहार हरेक ‘शासक’ केँ याद करू । गौर करू – शक्ति अर्जित कयला उपरान्त दुरुपयोग आ नीति-नैतिकता विरूद्ध कतेको तरहक उपद्रव सँ शासन चलेनिहार जेकरा संहार करबाक लेल ‘सर्वोच्च शक्ति’ यानि ईश्वरक विभिन्न अवतार केँ पृथ्वी पर आबय पड़लन्हि, तखन ओहि दुरूह शासक केँ दण्डित कय पुनः पुनः धर्मक राज्य स्थापित होइत रहल ।

ठीक तहिना, भारतक एकटा राज्य मे लोकमत सँ प्राप्त शासन शक्ति केर दुरुपयोग करबाक परम्परा १९९० ई. सँ २००५ ई. धरि ‘रावणक कहकहा लगाकय एकटा शासक’ अपना केँ ‘दबल-कुचलल-पिछड़ल लोकक मुंह मे आवाज’ दयवला ‘क्रान्तिकारी शासक’ बनिकय भारतक एक प्रदेश ‘बिहार’ मे आगमन होइछ आ ओ राजनीतिक शक्ति सच मे समाजक गरीब, दबल, कुचलल, पिछड़ल, गामक सिमान पर उपेक्षित रहबासी कय रहल लोक सभक ‘मतदान’ अपना पक्ष मे कय केँ स्वतंत्र भारतक स्वतंत्रताक लगभग ४ दशक उपरान्त ‘भारतीय कांग्रेस’ केर शासन मे ‘बड़िया लोकक ठीकेदारी आ वोट लूटबाक संयंत्र केँ ढाहिकय’ पटनाक गद्दी पर पहुँचि जाइछ ।

लेकिन राजाक नजरि राजगद्दी प्राप्ति उपरान्तहु ‘भूराबाल साफ करो’ केर नीति पर चलय, विश्वविद्यालयक वाइस चांसलर सँ चपरासी धरि केँ ‘यादवमय’ कय देल जाय, अपन वोटबैंक ‘मुसलमान’ सब केँ राज्यक संरक्षण प्रदान कय राज्य ‘अपहरण उद्योग’, ‘बेटी-बहुक इज्जत नीलाम करबाक धन्धा’, ‘जुआ आ गुन्डागर्दी’ सब केँ पुलिस बल द्वारा कवर-प्रोटेक्शन दय केँ आमजन मे ‘हाहाकार’ मचेबाक काज हो, त ओकरा कहल गेल ‘जंगलराज’ ।

अहाँ मतदान करू, जे करू, मतपेटी सँ ‘जिन्न’ निकलत आ ‘माई समीकरण’ आदि शब्दावलीक ‘जामा’ पहिरा पटनाक गद्दी पर एकमात्र जंगलराजा ‘लालू यादव या हुनक अनपढ़ घरवाली राबड़ी देवी, आ आब हुनकर नौवीं फेल राजकुमार तेजस्वी यादव’ – बस गद्दी हुनकहि भेटत से तय कयल गेल ।

मुदा भारतीय लोकतंत्र मे सेहो ४ प्रमुख निकाय ‘विधायिका, कार्यापालिका, न्यायपालिका, सूचना संचारक विभिन्न स्रोत’ मे सँ कियो न कियो वीर पुत्र निकलैछ आ ‘संविधान एवं नियमावली’ अनुरूप लोकक मन सँ त्रास बाहर करैछ, लालू यादवक ‘मतपेटिका सँ जिन्न’ केँ बाहर पठबैछ – चुनावक तिथि घोषणा भेला उपरान्त बिहार मे ‘कानून आ विधि केर राज्य’ लागू कयल जाइछ, से गांधी मैदान पटनाक पास स्थित होटल मौर्याक रूम नम्बर ३२८ सँ कार्यालय संचालन करैत भारतीय चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त कयल गेल एक विशेषाधिकार (EC Observer) श्री के जे राव द्वारा ।

तखन बनैछ ‘सुशासन बाबूक सरकार’, यानि नीतीश कुमारक सरकार । जे सात्विक सिद्धान्त पर बिहार मे सुशासन आ विकासक नया क्रान्तिक अनैत छथि नव वयार । आर तहिया सँ आइ धरि बिहार गद्दी पर छथि वैह सवार । बदलैत छन्हि कतबो विचार, घुमिफिरि अबैत छथि एनडीए केर घरबार । एतहि अछि सिद्धान्तवादी लोक आ विचार । तेँ न होइत अछि ‘नमो-नमो’ भैर संसार !

एहि बेर सेहो २०२५ मे किछु धुरफन्दी लोक सब कय रहल अछि जंगलराजक नियार – सावधान हे जनता होशियार । खाली गरीब-निमुखाक मुंहक बनता आवाज, मुदा शासन चलत कुविचार-व्यभिचार-भ्रष्टाचार – जंगलराज सँ रहय जायब होशियार । ई थिक एकटा जंगलराजक भोगल बच्चा प्रवीण केर पुकार । सुनय जायब नीक सँ, बनल रहब समझदार ।

हरिः हरः!!

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