लेख विचार
प्रेषित: भावेश चौधरी
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- मिथिला मे साओन मास केर महत्व
मिथिला मे सावन महिनाक महत्व-
सावन, हिन्दू पंचांगक अनुसार वर्षा ऋतुक सबसँ अनुपम आ रमणीय महिना होई छै। ई प्रकृति, आत्मा आ संस्कृति सँ जुड़ल एकटा गहीर अनुभूति अछि। मिथिला मेँ सावन केवल पानि झहरैक समय नहि,ई महिना प्रेम, भक्ति, सौंदर्य, लोकसंस्कृति आ नारीशक्ति के उत्सव छै।
सावन आबिते मिथिला के धरती पर हरियर चादैर पसैर जाईत अछि। गाछ-वृक्ष, खेत-खरिहान, नदी-नाला सभ जीवन्त भऽ उठैत अछि। गाछी मेँ लागल झूला,सभ मानवीय हृदय केँ स्पर्श करैत वर्षा के रिमझिम बूंद- सावन प्रकृति आ मानसक बीच आत्मीय संवादक समय भेल।
सावन महिना के शिवजी सँ विशेष नाता अछि। मिथिला मेँ लोक श्रद्धापूर्वक सोमवारी व्रत राखैत छथि,गंगाजल लऽ कऽ शिवलिंग पर चढ़बैत छथि। “कांवड़ यात्री” भक्तगण दूर-दूर सँ जल भरि कऽ पैदल यात्रा कऽ कऽ बाबा जलेश्वरनाथ,बाबा गरीबनाथ, कपिलेश्वर धाम,बाबा मुक्तिनाथ,उगना महादेव मंदिर सन प्रसिद्ध शिवालय मेँ जल चढ़बैत छथि।
ई शिवभक्ति केवल धर्मक आस्था नहि, जीवनक शुद्धि आ आत्मा सँ साक्षात्कारक अवसर अछि। सावन मेँ प्रत्येक सोमवारी मिथिलाक शिवमंदिर मेँ मेला सन दृश्य देखय लेल भेटत ।
मिथिला मेँ स्त्री सभक लेल सावन बहुत खास महिना छी। विवाहित स्त्री हरितालिका तीज, सोलह सोमवार व्रत, आ झूलन पर्व मनबैत छथि। ओ मेहंदी, चूड़ी, साड़ी, फूल, सिंदूर सँ साज-सज्जा करैत छथि। अविवाहित कन्या सभ शिवजी सँ उत्तम वरक प्रार्थना करैत छथि।
झूला झूलैत गबैत छथि:
“सावन महीना आयल हे सखी, हरियर चूनर उड़ल हे…”
ई गीत खाली मनोरंजन नै, बल्कि नारीक मनक भावनात्मक उद्गार छै। सावन मेँ स्त्री अपन सौंदर्य, श्रद्धा आ सामाजिक सहभागिता के अभिव्यक्त करैत छथि।
सावन मिथिलाक लोक-संस्कृतिक चित्ताकर्षक चित्रण करैत अछि। गाम-घर मेँ झूला, झूलन गीत, भजन कीर्तन आ कथा वाचन होइत अछि। स्त्री-पुरुष सभ सामूहिक रूप सँ एकठाम आबि सांस्कृतिक उत्सव मेँ भाग लैत छथि। बच्चा सभक लेल ई समय खेल-कूद, नाच-गान आ उमंगक अवसर होइत अछि।
मिथिला चित्रकला (मधुबनी पेंटिंग) मेँ सावनक दृश्य बहुत रचनात्मक रूप सँ देखायल जाइत अछि — झूला झूलैत स्त्री, मोर, मेघ, फूल आदि। सावन पर विद्यापति, नागार्जुन, आ उग्रनाथ झा आदि मैथिली कविक रचना अद्भुत अछि।
विद्यापति लिखैत छथि:
“सावन महीना सुंदर बरखित, राधिके मन हरषय रहल।”
“घन-घटा उड़ी-उड़ी जाय, मोर बोले बड़ सुखदायक।”
ई पद जनमानस के भावलोक मेँ डुबा दैत अछि।
आजुक डिजिटल युग मेँ सेहो सावन मिथिला मेँ अपन परंपरागत रूप मेँ जीवित अछि। फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब आदि पर सावनक गीत, नृत्य, आ मेहंदी डिजाइन वायरल होइत अछि। नवयुवती सभ झूला पर फोटो खींचि सोशल मीडिया पर शेयर करैत छथि। ई परिवर्तन आधुनिकता सँ जुड़ल अछि, मुदा मूल भावना- प्रकृति, नारी आ भक्ति ,आबो जस के तज्स अछि।
सावन महिनामेँ लोकल व्यापारी — चूड़ी विक्रेता, फूल वाला, मिठाई दुकान, मेहंदी बेचैय्या — सभक व्यवसाय चमक उठैत अछि। गाम-घर मेँ हाट-बाजार लगैत अछि। ई सांस्कृतिक उत्सव ग्रामिण अर्थव्यवस्था केँ सेहो जीवन दैत अछि।
निष्कर्ष:
मिथिला मेँ सावन केवल ऋतु नहि, बल्कि मिथिलाक आत्मा छी। सावनक माध्यम सँ मिथिला अपन लोकगीत, नारीशक्ति, भक्ति परंपरा आ सांस्कृतिक चेतना केँ अभिव्यक्त करैत अछि।
“सावन आइल, मिथिलाक अंगनाके चिरईयो नाचय लागल।”
जय मिथिला, जय मैथिली।।
