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कतय जा रहल छी मिथिला मानव ?

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जँ बुझि सकितहुँ हम सब…..

– लेख-विचारः प्रवीण नारायण चौधरी

मानव रूप मे मानवता केँ पूर्ण रूप मे यदि बुझि सकितियैक त ‘दहेज प्रथा’ कुप्रथा नहि बनैत ।

राजा जनक सँ सीता संग रामक विवाह होइन्ह, ताहि लेल राजा दशरथ कोनो शर्त नहि लगेलखिन । विवाह पूर्व कोनो तरहक मांग केँ वैधानिक तौर पर ‘दहेज’ मानल जाइछ । हिसाब सँ देखल जाय त शर्त सीताक पिता रूप मे राजा जनक लगौने छलथिन । राजा जनक अपन सुपुत्री सीताक सबलता व शक्ति-सामर्थ्य सँ तहिये परिचित भ’ गेल रहथि जहिया कुमारि सीता भगवतीक घर निपैत घड़ी शिवधनुष अपन बाम हाथ सँ उठाकय घर निपि रहल छलिह । सीता हर मामिला मे निपुण छलिह, गुणी छलिह, बुद्धिमती छलिह आ रूप मे अवर्णनीय सुन्दरता सहित धराधाम मे अवतरित भेल छलिह । हमर शक्तिशाली सुपुत्री सीता लेल वैह पति भ’ सकैछ जे शिवधनुष उठाकय डोरी चढ़ा सकैत छथि । खुल्ला प्रतिस्पर्धा केँ स्वयंवर प्रथा कहल जाइक । सीता स्वयंवर सँ श्री राम निर्णीत सीतापति भेलाह । राजा जनक जे लेब-देब कयलनि से अपन सख, मनोरथ, सामर्थ्य आ शक्ति सँ । कोनो बेटीक पिता यैह इच्छा रखैत अछि । लेकिन……

लेकिन आइ हम मानव एतबे अधिक होशियार आ बुधियार भ’ गेलहुँ जे अपन सीता लेल सरकारी वर केँ पहिल पसिन मानि टका बल सँ किनय लगलहुँ, होइत होइत समाज मे एहने प्रथा पसरि गेल जे हर बेटीक पिता लेल सरकारिये नौकरी वला वर मानू शक्तिशाली श्री राम होइथ, प्राइवेट नौकरी करयवला सब हरही-सुरही आ बबितिया-पुनितियाक वर कोहुना बनि पाबथि । अनमोल दाय, विद्योतमा दाय आ ललिता-सुनीता सब लेल सरकारिये नौकरी वला लड़काक खोज हो – विवाह हो । टका गानल जाय । जाहि लड़का केँ जतेक पाय, से लड़काक ओतबे बड़ाय । ई प्रथा कुप्रथा भ’ गेल । लोक डराय लागल । बेटीक भ्रूण जाँच होबय लागल । मायक पेट मे नाभि सँ नाभि जोड़ि पोषण-पालन त दूर गर्भहि मे डाक्टरक चक्कू चलय लागल । मानव द्वारा मानवीयता हत्या आरम्भ भ’ गेल ।

गौर सँ देखब त मानवीय मूल्यक हत्या यैह भ्रूण हत्या सँ आरम्भ भेल, आइ त एहेन दुरावस्था अछि जे विवाहोपरान्तक शारीरिक सुखक मर्यादा ताड़-ताड़ भ’ गेल, विवाह सँ पहिनहिं सँ सीमा नाँघिकय पापाचार मे लिप्त भ’ गेल अनेकों लोक आ दहेजक डर सँ नहि, अपितु कुमारि माँ बनि समाज मे कलंक लागत ताहि डर सँ सैकड़ों भ्रूण केर हत्या नित्यहु भ’ रहल अछि । जतेक बड़का शहर, ततेक पैघ पाप आ ततबे बढ़ि रहल व्यभिचार-अत्याचार-अनाचार-कदाचार-भ्रष्टाचार । मानव अपन मानवताक धर्म केँ कय देलक स्वयं लहूलुहान !

विवाह आ आदर्श केर परिभाषा कोन तरहें बदलि गेल से देखिये रहल छी । धर्मशास्त्र आ शिष्टाचार गेल निखत्तर मे । सरेआम फटक्का फोड़िकय अपन टकाबल (दम्भ) केर प्रदर्शन करैत फुलिया-अनमोलिया-बतही-घतही सभक विवाह ‘पप्पा-डैड्डी’ सब कय रहल छथि । सजाबट देखिकय इन्द्र सेहो घबरा जाइत छथि, “रौ बहिं! हमर इन्द्रलोको मे ई झिलमिल-झिलमिल बत्ती नहि देखने रही, फटक्काक फटक्क हमर वज्रो सँ बेसी बुदबुदा रहल अछि…” ।

अरे मानव! अहाँ कतबो पैजामा सँ बाहर भ’ जायब, घुरिकय वैह काज आओत जेकरा ‘मानवीय’ कहल गेल छैक । अमानवीय व्यवहारक आडम्बर सँ अहाँ या अहाँक सन्ततिक कोनो लाभ कहियो नहि भेल । अलाय-बकच आ फुकुच-मगज सब सन जोड़ी बनैछ, कनिये दिन मे डिवोर्स होइछ, फेर ओ ओम्हर लिव-इन, ई एम्हर लिव-इन । मरि जाइछ गली-कुची चलिते-फिरिते या फेर ३९वीं मंजिल केर ओहि फ्लैट मे जेतय बाल-बच्चा छोड़िकय स्वयं कैलिफोर्निया आ बोस्टन मे बोस्टिंग कय दिन बिता रहल अछि । बम-बम-बु !!

कल्याणक मार्ग सभक लेल प्रशस्त बनय, शुभकामना !!

हरिः हरः!!

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