स्वाध्याय
कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण
अध्याय सातम्
मंत्री सुमन्तजीक अयोध्या वापसी
।मिथिला संगीतानुसारेण पार्व्वतीयबराड़ी नाम छन्दः।
ओतय अयोध्या मन्त्रि सुमन्त्र । पहुचि सरथ भेल दिवसक अन्त ॥१॥
वसनहि सौँ मुह कय लेल ओट। राम-वियोग दुःख बड़ गोट ॥२॥
नोरक लेल गेल तन तीति । पुर-प्रवेश मे हो बड़ भीति ॥३॥
रथ छोड़ल बाहर नृप-द्वार । भूप देखि जय शब्द उचार ॥४॥
स्तुति कय कयलनि चरण-प्रणाम । के अहाँ पुछल कहल से नाम ॥५॥
अहह कहू कत सानुज राम । जनक-नन्दिनी छथि कोन ठाम ॥६॥
हम निर्द्दय त्यागल मर्य्याद । पापिहुँ काँ किछु कहल समाद ॥७॥
हाहा राम कहाँ अहँ आज । गुणनिधि त्यागल हमर समाज ॥८॥
प्रियवादिनि जानकि कत गेलि । दुखमे हमर केओ नहि भेलि ॥९॥
उबडुब होइछि दुःख-पयोधि । निकट निधन सभटा सुख शोधि ॥१०॥
भावार्थः
ओम्हर मंत्री सुमन्त दिनक अन्त मे रथ-सहित अयोध्या घुरलाह । ओ वस्त्र सँ मुँह पर परदा कय लेलनि (मुँह झाँपि लेलनि) । रामक बिछोह सँ हुनका भारी दुःख रहनि । नोर सँ पूरा देह भिजल छलन्हि । नगर मे प्रवेश करय मे बहुत डर लगैत रहनि । रथ केँ बाहरे छोड़िकय सुमन्त राजद्वार अयलाह । राजा दशरथ केँ देखिकय जय-जयकार कयलनि । विरुदपाठ कय केँ राजा केँ प्रणाम कयलनि । राजा पुछलनि – “अहाँ के छी ?” ओ अपन नाम बतौलनि । दशरथ बजलाह – “ओह, बताउ, लक्ष्मण सहित राम कतय छथि ? जनकनन्दिनी कतय छथि ? हम निर्दय भ’ कय मर्यादाक त्याग कयलहुँ । कि एहि पापी पिता केँ सेहो राम किछु सन्देश कहलनि अछि ? हा राम! आइ अहाँ कतय छी ? गुणवान् पुत्र हमर संग छोड़ि देलनि । मधुरभाषिणी सीता कतय गेलिह ? दुःखक घड़ी मे हमर कियो नहि भेलिह । हम दुःखक समुद्र मे बेर-बेर डूबि रहल छी । सबटा सुख भोगिकय आब मृत्यु लग पहुँचि गेल छी ॥१-१०॥
।हरिपद छन्दो मिथिलासंगीतानुसारेण तु वसन्तनाम छन्दः।
कहल सुमन्त चढ़ाय लेल रथ, शृङ्गवेरपुर गेला ॥११॥
गङ्गातीर उतरला जखना भय गेल बड़का मेला ॥१२॥
गुह नामक निषादपति सभ जन दौड़ि दण्डवत कयलनि ॥१३॥
कन्द मूल फल मधुर मधुर से रामक आगाँ धयलनि ॥१४॥
कन्द मूल फल एक लेल नहि परशि देल प्रभु हाथै ॥१५॥
गुह कहलनि हम किङ्कर अपनेक आज्ञा कर हम माँथै ॥१६॥
तनिका कहि कहि श्रीरघुनन्दन बड़क दूध मंगबाओल ॥१७॥
सानुज राम ताहिसाँ माथा जटा मुकुट निर्म्माओल ॥१८॥
अविकल कहल राम जे हमरा से समाद सभ आजे ॥१९॥
कहितहु बहुत कलेश होइछ मन तदपि कहब महराजे ॥२०॥
हमर निमित्त पिता नहि करिहथि ओ चिन्ता किछु मनमे ॥२१॥
निज घर सौँ शत गुण सुख सन्तत हमरा होयत वनमे ॥२२॥
राम कहल माता काँ कहि देब पिता शोक सभ हरिहथि ॥२३॥
कहब प्रणाम धैर्य्य कय नृप लग चर्च्चा हमर न करिहथि ॥२४॥
भावार्थः
सुमन्त्रजी कहलनि – “ओ सब रथ पर सवार भेलाह आ शृंगवेरपुर गेलाह । ओतय गंगाक किनार जेनाही रथ सँ उतरलाह कि बड़ा भारी मेला लागि गेल । निषाद सभक राजा गुह सब परिजन लोकनिक संग दौड़ि अयलाह आ हुनका दण्डवत् प्रणाम कयलनि । ओ लोकनि मीठ-मीठ कन्द, मूल ओ फल राम केँ अर्पित कयलनि । प्रभु राम एकहु टा कन्द, मूल या फल नहि लेलनि, मात्र हाथ सँ छुबिकय लौटा देलनि । फेर गुह कहलखिन – ‘हम अहाँक दास छी । जे आज्ञा देबाक हो से दिय’, ओ हमरा शिरोधार्य होयत ।’ तखन राम हुनका आज्ञा दयकय बरगदक दूध मँगबौलनि । लक्ष्मण-सहित राम अपन माथा मे जटाक मुकुट बनौलनि । राम जे सब समाद कहलनि से सुनबैत यद्यपि हमर मोन मे बहुत कष्ट होइत अछि, तैयो हे महाराज, हम अविकल सुनायब । रामक सन्देश अछि – ‘हमरा लेल पिताजी मोन मे कोनो चिन्ता नहि करिहथि । हमरा एहि वन मे सदैव अपन राजमहल सँ सौ गुना बेसी सुख भेटत ।’ राम माता सँ ई समाद कहय कहलनि जे ‘ओ लोकनि पिताजी केँ सम्पूर्ण शोक सँ दूर करथि । माता सब केँ हमर प्रणाम कहबनि आ अनुरोध करबनि जे पिता लग हमर कोनो चर्चा नहि करिहथि ।” ॥११-२४॥
।सोरठा।
सभकाँ कहब प्रणाम, गुरुजन जे छथि नगर मे ॥२५॥
चलयित कहलनि राम, गेल जाय पुर शून्य अछि ॥२६॥
भावार्थः
राम चलैत घड़ी ई कहला – ‘नगर मे जे-जे गुरुजन छथि सब केँ हमर प्रणाम कहबनि । आब जाउ । अयोध्या नगर सून्न अछि ।” ॥२५-२६॥
।नरेन्द्र छन्दः।
सीता कहलनि प्रभु मुख देखइत गुरुजन जे छथि ग्राम ॥२७॥
कहिहथि मन दय शाशु-शशुर-पद शत साष्टाङ्ग प्रणाम ॥२८॥
रथकाँ ओ हमरा दिश देखल भेलि अधोमुखि फेरि ॥२९॥
हमर प्रणाम कयल संज्ञहि सौँ कनइत चलती बेरि ॥३०॥
रोषैँ लक्ष्मण किछु अनुचित सन कहक यत्नपर जखना ॥३१॥
सीताराम शपथ दय तनिकाँ स्वस्थ कयल कहि तखना ॥३२॥
चढ़ि से नाव उतरि गङ्गा सौँ टक टक तकितहि रहलहुँ ॥३३॥
कहुना कहुना अयलहुँ कनइत देखल से नृप कहलहुँ ॥३४॥
भावार्थः
तखन प्रभु रामचन्द्रजी दिश ताकिकय सीता कहलिहः “नगर मे जे कियो गुरुजन, सासु आ ससुर लोकनि छथि हुनका लोकनिक चरण मे हमर सौ-सौ साष्टांग प्रणाम कहबनि ।” फेर सीता रथ दिश आ हमरा दिश ताकिकय गरदनि झुका लेलनि । आर विदाह होइत समय इशारे सँ हमरा प्रणाम कयलनि । क्रोधवश लक्ष्मण जहिना किछु अनुचित (अनटोटल) बात बाजय लगलाह तहिना सीता आ राम हुनका शपथ दय केँ शान्त कय देलनि । ओहि नाव पर चढ़िकय ओ लोकनि गंगा केँ पार कयलनि; बिना पलक झपकौने (अपलक) हुनका दिश ताकैत रहलहुँ । कोहुना-कोहुना कानैत-खिझैत घुरि अयलहुँ अछि । हे राजा, जे देखलहुँ से अपने केँ सुना देलहुँ ।” ॥२७-३४॥
।मत्तगजेन्द्र छन्दः।
से शुनि कानि कहै लगली तहाँ भूपति सौँ बड़की महरानी ॥३५॥
केकयि काँ वर देलहुँ जे वर लेलनि राज्य कि होइत हानी ॥३६॥
हा ! हमरे प्रिय पुत्र पुतोहु वृथा वन देल कहाओल ज्ञानी ॥३७॥
शोच वृथा करणी अपने सभ आरि न बान्हल गेलहु पानी ॥३८॥
भावार्थः
ई सुनिकय बड़की महारानी कौशल्या कानि-कानिकय राजा दशरथ सँ कहय लगलिहः “अपने कैकेयि केँ वर देलियनि आर ओ भरत वास्ते राज्य माँगि लेलिह, एहि मे त कोनो हानि नहि छैक । मुदा हाय ! हमरहि प्रिय पुत्र आ पुतोहु केँ अकारण वनवास दय अपने ज्ञानी कहेलहुँ । अपने व्यर्थ शोक करैत छी । सबटा त अहाँक अपनहिं करनी छी । अपने आरि नहि बन्हलहुँ, तेँ पानि बहि गेल ॥३५-३८॥
।माधवीबराड़ी छन्दः।
बड़ निरदय विधि जानल रे ककरो नहि दोष ॥३९॥
राज न करत भरत एत रे केकयि सन्तोष ॥४०॥
बुझि पड़ राज-भवन वन रे के रह एहिठाम ॥४१॥
नृपतिक की गति होयत रे विन लक्ष्मण राम ॥४२॥
तिनु जन वन वन सञ्चर रे सहि भूष पिआस ॥४३॥
की होइत की कै देल रे विधि आश विनाश ॥४४॥
हा धिक हा धिक जीवन रे जग भरि उपहास ॥४५॥
नाति-तन्त्र लिख ककरो रे नहि करि बिसवास ॥४६॥
भावार्थः
हम बुझि गेलहुँ, विधाता (भाग्य) बड़ा निर्दय होइत छथि । एहि मे आर केकरहु दोष नहि अछि । भरत तँ राज करता नहि, मात्र कैकेयि केर मोन मे सन्तोष हेतनि । राजभवन त वन जेहेन लगैत अछि । एतय के रहत । राम आ लक्ष्मणक बिना राजा दशरथक कि हाल हेतनि । सीता, लक्ष्मण आ राम भूख-प्यास सहैत बिना परिजनक वने-वन भटकि रहल छथि । विधाता कि सँ कि कय देलनि । आशा पर पानि फेरि देलनि । जेकर सारा संसार मे उपहास होइ ओकर जीवन केँ धिक्कार अछि । नीतिशास्त्र मे ठीके कहल गेल अछि जे केकरहु विश्वास नहि करबाक चाही ।”
।वितत-सूहब छन्दः।
शुनि रानी वचन तहन राजा विकल कहल एहन ॥४७॥
अपन हानी कैलहु रानी विधिक शासन जेहन ॥४८॥
केकयि कारण मानल मरण हरण अपन ज्ञान ॥४९॥
अन्तष्करण आधि हि दरण होइछ आन कि जान ॥५०॥
मरण दिवस दैवक विवश क्षमा करिअ दोषे ॥५१॥
पतिक हीना केकयि दीना भोगथु विभव रोषे ॥५२॥
भावार्थः
राजा बिलखिकय कहैत छथि – “विधिक जेहेन विधान छल, हे रानी, हम अपन हानि अपनहिं कयलहुँ । हम कैकेयि केर कारण मृत्यु पाबि रहल छी । हम विवेक हेरा देलहुँ । अन्तर्व्यथा सँ कलेजा फाटि रहल अछि । दोसर ई व्यथा कि जानय गेल ! विधिवश आइ मृत्युक दिन आबि गेल अछि । हमरा सँ जे किछु अपराध भेल से क्षमा कय दिअ । आब पतिहीन दीन कैकेयि रोषक संग एहि धन-सम्पत्तिक भोग करय ॥४७-५२॥
।मुदिरा छन्दः।
पुत्र-पुतोहु-वियोग-व्यथा-ज्वरसौं हम आइ मरै परछी ॥५३॥
की दुख मे दुख दैछि अहाँ दुख-सागर आइ तरै परछी ॥५४॥
अन्तरमे अनुभूत महानल बाहर मध्य जरै परछी ॥५५॥
हा रघुनन्दन प्रीति-प्रतीति धरातल मध्य करै परछी ॥५६॥
भावार्थः
आइ हम पुत्र आ पुत्रवधूक बिछोह केर सन्ताप सँ मरय पर छी । अहाँ दुःख मे हमरा कियैक आरो दुःख दैत छी । आइ त हम दुःख-सागर केँ पार करय पर छी । भीतर मे जे तेज आगि जरि रहल अछि ओकर ज्वाला मे बाहर शरीर सँ सेहो जरय पर छी । हा रघुनाथ ! आइ हम धरती पर प्रेमक कड़बा अनुभूति पाबय वला छी ॥५३-५६॥
।सोरठा।
कयल बहुत हम पाप, शुनु कौशल्या कुशल-मति ॥५७॥
तकरे फल सन्ताप, शाप देल मुनि प्राप्ति-दिन ॥५८॥
तरुण अवस्था भूप, गेलहुँ खेलाय सिकार हम ॥५९॥
की कहु चूपहि चूप, एक समय शर-धनुष-कर ॥६०॥
दूइ पहर छल राति, नदी-तीर वन घोर मे ॥६१॥
दुस्सह क्षत्रिय जाति, काण चलाओल जानि गज ॥६२॥
गज पिबइत अछि पानि, शब्द-बेध सौं बिद्ध से ॥६३॥
व्याकुल उठला कानि, के मारल अपराध बिनु ॥६४॥
की गति पओतहि माय, विकल बाप करताह की ॥६५॥
के देत पानि पिआय, हाहा पुत्र कतय रहल ॥६६॥
शब्द शुनल हम कान, मुनि-मानुष-सूचक वचन ॥६७॥
भेल आन सौँ आन, गमहि गेलहुँ भय त्रस्त हम ॥६८॥
मुनि हम दशरथ भूप, जल भरइत मारल वृथा ॥६९॥
जानल नहि ई रूप, गज-भ्रम सौँ अपराध बड़ ॥७०॥
धयल पयर पर माथ, त्राहि त्राहि कय बेरि कहि ॥७१॥
सब गति अपनेक हाथ, चोर न्याय सौँ नष्ट हो ॥७२॥
मुनि कहलनि तहि राति, ब्रह्म-वधक संशय तजिय ॥७३॥
वैश्य हमर अछि जाति, भ्रमसौँ मारल कर्म्म-वश ॥७४॥
करू एकटा काज, जतय पिता जननी हमर ॥७५॥
लय जल तनिक समाज, जाय देब कृति अपन कहि ॥७६॥
भावार्थः
हे हमर बुझयवाली कौशल्या, सुनू । हम भारी पाप कयलहुँ अछि । ई सन्ताप तेकरे फल छी । हमरा मुनि शाप देने रहथि । आइ ओहि पापक भोग केर दिन आयल अछि । एक समय, जखन हम किशोर अवस्थाक राजा छलहुँ, चुपके सँ हाथ मे तीर-धनुष लय केँ शिकार करय चलि गेलहुँ । दू पहर राति भ’ गेल छल । नदीक किनार पर घोर जंगल मे दुःसाहसी क्षत्रियक रूप मे शिकार करैत हमरा बुझि पड़ल जे हाथी पानि पीबि रहल अछि । हम शब्दवेधी वाण चला देलहुँ । शर सँ विद्ध एक पुरुष व्याकुल भ’ कय कानय लागल – ‘के हमरा बिनु अपराधक एना मारलक अछि ? आब हमर माय केर कि गति होयत ? हमर विकल पिताजी कोन उपाय करता ? हुनका पानि के पिऔतनि ? ओ सब कनता, हाय-हाय करता, हमर बेटा कतय रहि गेल से बजता ।’ हम ई शब्द सुनलहुँ । अरे, ई त कोनो मनुष्यक या कोनो मुनिक आवाज छल । कि सऽ कि भऽ गेल । डर सँ संत्रस्त हम धीरे सँ ओकरा नजदीक पहुँचलहुँ आर ओकरा सँ कहलहुँ – ‘हे मुनि, हम राजा दशरथ छी । हम जल भरैत अहाँ केँ अकारण मारि देलहुँ । अहाँक ई मुनि-रूप हमरा नहि बुझायल । हाथी बुझिकय हम वाण चला देलहुँ । हमरा सँ भारी अपराध भ’ गेल । एतेक कहिकय हम हुनकर पैर पर अपन माथ राखि देलहुँ आर बेर-बेर ‘त्राहि-त्राहि’ केर पुकार करिते हुनका सँ कहलहुँ – ‘आब अहाँ जे करी, सब अहाँक हाथ मे अछि । चोरक नाश न्याय सँ होइत अछि।’ ओहि राति मुनि कहलनि – ब्रह्म-वध केर शंका जुनि करू । हम वैश्य जातिक छी । भाग्यवश अहाँ भ्रम सँ हमरा मारलहुँ अछि । कृपया एकटा काज कयल जाउ । ई पानि लयकय ओतय जाउ जेतय हमर पिता आ माता छथि । हुनका पनि देबनि आ अपन करनी सुना देबनि ॥५७-७६॥
।मत्तगजेन्द्र छन्द।
आंधर वृद्ध पिता जननी छथि जाय तहाँ नृप पानि पिआऊ ॥७७॥
बाणक वेदन देहमे होइछ खैँचि धरू मरिकैँ सुख पाऊ ॥७८॥
जौँ नहि जायब भूप तहाँ कय भस्म देता जनु कोप बढ़ाऊ ॥७९॥
जे किछु कैल अहाँ करणी हमरो सब दुर्ग्गति मृत्यु शुनाऊ ॥८०॥
भावार्थः
हे राजा, हमर वृद्ध माता-पिता आन्हर छथि । ओतय जाकय अहाँ हुनका लोकनि केँ पानि पियाउ । हमर शरीर मे वाणक वेदना भ’ रहल अछि । एकरा खींचि लियह आ हमरा मरिकय सुख पाबए दियह । हे राजा, यदि अहाँ हुनका पास नहि जायब त ओ अहाँ केँ भस्म कय देताह । हुनकर क्रोध केँ जुनि बढ़ाउ । अहाँ हमर जे किछु दुर्गति कयलहुँ अछि, से बात आ हमर मृत्युक बात हुनका सुना देबनि ॥७७-८०॥
।चौपाइ।
जेहन कहल मुनि मरती बेरि । सभटा तेहन कयल हम फेरि ॥८१॥
जल भरि कलस लेल से कन्ध । गेलहुँ हम जत आन्धरि अन्ध ॥८२॥
पद आहट शुनि से बजलाह । पुत्र रातिमे कतय छलाह ॥८३॥
भूख पिआसेँ कण्ठ सुखाय । दिअ दिअ सत्वर पानि पिआय ॥८४॥
शयन करू अपनहुँ जल पीबि । मन चिन्ता छल अयलहुँ जीबि ॥८५॥
पयर धयल हम कहि निज नाम । अहँक पुत्र नहि छथि एहि ठाम ॥८६॥
सकल विवर्त्त कहल निज काज । तैँ आयलछी अहँक समाज ॥८७॥
दया करथि मुनि बड़ अपराध । कनइत कहलनि हा विधि व्याध ॥८८॥
हमरा कहल दैह पहुँचाय । शुनि दम्पति लेल कांध चढाय ॥८९॥
धिक धिक जीवन हमरो आब । कहि शव सुतकाँ अङ्ग लगाब ॥९०॥
हे नृप चिता करिय निर्म्माण । हमरो निश्चय चलला प्राण ॥९१॥
बूढ बूढि कय विविध विलाप । मरण समय हमरहु देल शाप ॥९२॥
हमर पुत्र-सुख कयलह हरण । पुत्र-वियोगहिँ तोहरो मरण ॥९३॥
एकहि चिता तिनू जरि अमर । सुरपुर गेल पार दिन हमर ॥९४॥
नहि विलम्ब दिन से सम्प्राप्त । मर्म्म मर्म्म दुख हमरा व्याप्त ॥९५॥
हा रघुनन्दन हा सुत राम । हा जानकि लक्ष्मण गुण-धाम ॥९६॥
केकयि कारण अहँक वियोग । मरण होइ अछि आन कि रोग ॥९७॥
ई कहइत त्यागल नृप प्रान । विकलि सकलि रानी-जनि कान ॥९८॥
गेला वसिष्ठ मन्त्रि लै सङ्ग । की भय गेल रङ्ग मे भङ्ग ॥९९॥
दशरथ-देह तेलमे रहय । सत्वर दूत भरत केँ कहय ॥१००॥
अश्ववार घोड़ा दौड़ाउ । भरतक मातृक सत्वर जाउ ॥१०१॥
छथि शत्रुघ्न भरत तहि ठाम । गुरु-आज्ञा चलु एखनहि गाम ॥१०२॥
कहबनि पहुँचल ताकी आज । जननि जनक काँ देखय काज ॥१०३॥
नाम युधाजित भरतक माम । तनिकाँ कयल सबार प्रणाम ॥१०४॥
निज घर भरत चलथु दुहु भाइ । अयलहु गुरु पठाओल आइ ॥१०५॥
भावार्थः
मरैत समय मुनि जेना-जेना कहने रहथि तेना-तेना हम कयलहुँ । घैल मे जल भरिकय कन्धा पर उठेलहुँ आ ओतय गेलहुँ जेतय आन्हर माता-पिता छलथि । हमर चलबाक धाप सुनिकय ओ बजलाह – “बेटा, राति मे तूँ कतय छलह ? भूख आ प्यास सँ हमरा लोकनिक गला सुखा रहल अछि । लाबह, जल्दी हमरा पानि पियाबह । तूँ सेहो पानि पीबिकय सुति रहह । मोन मे चिन्ता छल । तूँ सकुशल चलि अयलह ।” हम अपन नाम कहिकय हुनकर पैर पकड़लहुँ आ कहलियनि – “अहाँक पुत्र आब नहि रहलाह । ओ चलि बसलाह । ओ अपन काज हमरा बतौलनि । ताहि लेल हम अपने लग आयल छी । हे मुनि, हमरा उपर दया करू । हम बड़ पैघ अपराध कयलहुँ ।’ सुनिकय ओ सब बिलखय लगलाह – ‘हाय विधाता, अहाँ केना प्रहार कयलहुँ ?” फेर हमरा सँ कहलनि – “हमरा ओतय पहुँचा दिय’ जेतय हमर बेटा अछि ।” सुनिकय हम आन्हर माता-पिता केँ कन्धा पर उठा लेलहुँ । ओ दुनू ‘आब हमर जियब बेकार अछि’ एना कहिकय बेटाक लाश केँ गला सँ लगा लेलनि । फेर कहलनि – “हे राजा, आब चिता बनाउ । निश्चय आब हमरो प्राण चलि जायत ।” बूढ़ा आ बूढ़ी मरैत समय बहुते विलाप कयलनि आ हमरा शाप देलनि । ‘अहाँ हमरा पुत्र-सुख सँ वंचित कयलहुँ अछि, ताहि सँ अहाँक मरण सेहो पुत्रहि केर वियोग सँ होयत ।’ तखन एक्के टा चिता पर जरिकय तीनू अमर भ’ गेलथि आ स्वर्ग चलि गेलथि । आब हमर बेर आयल अछि । विलम्ब नहि अछि । ओ दिन आबि गेल । हमर रग-रग मे वेदना पसरि गेल अछि । हा रघुनन्दन ! हा बेटा राम ! हा जानकी ! हा गुणधाम लक्ष्मण ! कैकेयि केर कारण तोरा सब सँ बिछोह भ’ गेल । आर कोनो बीमारी नहि अछि । हम शापक मुताबिक एहि बिछोह सँ मरि रहल छी । ई कहिकय राजा प्राण त्यागि देलनि आ सब रानी लोकनि जोर-जोर सँ चिकरैत कानय लगलिह । गुरु वसिष्ठ मंत्री सब केँ संग लय केँ ओहिठाम गेलथि । देखलनि, कि रंग मे भंग भ’ गेल अछि । ओ कहलनि – “दशरथक लाश तेल मे राखल जाय आ तुरत भरत लग दूत पठायल जया । एकटा घोड़सवार केँ हुक्म देल जाय जे ओ तुरत भरतक नानी गाम जाय जेतय भरत आ शत्रुघ्न गेल छथि । हुनका कहब जे ‘गुरुक आज्ञा अछि, तुरत चलू । आइये पहुँचब जरूरी अछि । आबिकय माता आ पिता सँ भेटू ।” ॥८१-१०३॥
नानी गाम सँ भरतक लौटब आ पिताक श्राद्ध करब
घोड़सवार भरतक नानी गाम पहुँचल आ ओतय भरतक मामा युधाजित केँ प्रणाम कयलक । हुनका सँ अनुरोध कयलक जे भरत आ शत्रुघ्न दुनू भाइ अपन घर चलथि; गुरुक आज्ञा सँ हम ई समाद लय केँ आयल छी ॥१०४-१०५॥
।सोरठा।
त्वरित भरत दुहु भाय, चलला तुरग सबार सह ॥१०६॥
की थिक बुझल न जाय, भय-चिन्तातुर मन अधिक ॥१०७॥
भावार्थः
भरत आ शत्रुघ्न दुनू भाइ तुरत ओहि घोड़सवारक संग चलि पड़लाह । बात कि अछि से हुनका सब केँ बुझय मे नहि अबैत छन्हि । डर आ चिन्ता सँ हुनकर मोन बहुते घबरायल छन्हि ॥१०६-१०७॥
।चौपाइ।
सगर नगरमे पसरल शोक । उत्सव-रहित सकल पुरलोक ॥१०८॥
प्राणि मात्रकाँ नहि उतसाह । कनइत कनइत जेहन बताह ॥१०९॥
त्यागल कमला जेहन निवास । देखि भरत-मन अतिशय त्रास ॥११०॥
की अनर्थ थिक मन मन गून । राज-भवन निज जन सौँ शून ॥१११॥
केवल केकयि बैसलि देखि । मुदित मन्थरा दशा विशेषि ॥११२॥
कयल प्रणाम मातृ-पद छूबि । ओ आशिष देल मुख लेल चूमि ॥११३॥
हरषित लेलनि हृदय लगाय । कुशल पिता छथि भ्राता माय ॥११४॥
अहँ छी निकय देखल भरि नयन । देखला बिनु मन छल नहि चयन ॥११५॥
व्याकुल पुछल पिता छथि कतय । भरत कहल हम जायब ततय ॥११६॥
एकसरि अहँ कहँ छथि महिपाल । अति व्याकुल मन हो एहि काल ॥११७॥
अपने बिनु नहि रहथि एकान्त । हाय माय थिक की वृत्तान्त ॥११८॥
शून्य भवन कत प्रबल प्रताप । बिनु देखलेँ जिव थरथर काँप ॥११९॥
भावार्थः
सारा अयोध्यानगरी मे शोक पसरि गेल । नगरक सब लोक उदास भ’ गेल । केकरो कोनो उत्साह नहि रहलैक । लोक सब कनैत-कनैत मानू बताह भ’ गेल । लगैत छल जेना लक्ष्मी ओतय सँ चलि गेल होइथ । ई रंग देखिकय भरतक मोन आतंकित भ’ उठलनि । ओ मोन मे सोचैत छथि, कि अनहोनी बात भेल अछि ? राजभवन मे अपन लोक नहि देखाय दैत अछि । देखलनि जे मा्त्र कैकेयि बैसल छथि आर एहि हालत केँ देखि मन्थरा विशेष प्रसन्न अछि । भरत माताक पैर छुबिकय प्रणाम कयलनि । माता आशीर्वाद देलिह आ मुँह चुमलिह । हर्षित भ’ कय छाती सँ लगा लेलिह । भरत पुछलनि – “हे माता, हमर पिता आ भाइ सब कुशल त छथि ?” बात टारिकय कैकेयि पुछलिह – “तूँ कुशल सँ छह ने ? आब तोरा नजरि भरि देखलहुँ । तोरा नहि देखला सँ हमर मोन बड़ा बेचैन छल ।” फेर भरत व्याकुल भ’ पुछलनि – “पिताजी कतय छथि ? बताउ, हम ओतय जायब । एतय अहाँ असगरे छी ? राजा कतय छथि ? एखन हमर मोन बहुते घबरा रहल अछि । राजा तँ अहाँ बिना एकान्त मे नहि रहैत छलाह ? हाय ! बताउ त हमर माँ, बात कि अछि ? सून्न भवन कतेक सन्ताप दय रहल अछि । पिता केँ देखने बिना जी काँपि रहल अछि ।” ॥१०८-११९॥
।रूपमाला।
।मिथिला-संगीतरीत्या केदार-छन्दः।
जेहन छल छथि नृपति सुकृती अश्वमेध जे कयल ॥१२०॥
भरत चिन्ता चित्त नहि करु दिव्य गति से धयल ॥१२१॥
कुलिश-कठिन कठोर केकयि-वचन से शुनि कान ॥१२२॥
शोक-आकुल भरत खसला छिन्न वृक्ष समान ॥१२३॥
हा पिता कत गेलहुँ अपने त्यागि दुखमे देल ॥१२४॥
राम काँ नहि सोपि गेलहुँ दुःख कीदहु देल ॥१२५॥
भरत व्याकुल देखि केकयि कहल की हो कानि ॥१२६॥
माय बाप न सदा जीबथि धैर्य्य करु मन मानि ॥१२७॥
भावार्थः
कैकेयि कहलीः – “राजा दशरथ बहुते पुण्यवान् रहथि । ओ अश्वमेध यज्ञ कएने छलाह । ओ दिव्य गति (स्वर्गलोक) पेलनि । ताहि सँ हे भरत, अहाँ हुनका वास्ते चिन्ता जुनि करू ।” कैकेयि केर मुँह सँ ई वज्र-सन कठोर वचन सुनिकय भरत शोक सँ व्याकुल भ’ कटल गाछ जेकाँ (धड़ाम सँ जमीन पर) खसि पड़लाह आ विलाप करयल लगलाह । “हे पिता! अहाँ हमरा रामक हाथ मे सौंपने बिना दुःख मे छोड़िकय कतय चलि गेलहुँ ? अहाँ केँ कोन दुःख भेल जे एहि तरहें छोड़ि गेलहुँ ।” भरत केँ व्याकुल देखिकय कैकेयि कहलनि – “कानिकय कि होयत ? माँ-बाप सब दिन जिबैत त नहि रहि सकैत छथि ? एना बुझिकय मोन मे धैर्य राखू ॥१२०-१२७॥
।सोरठा।
हा रघुनन्दन राम, हा वैदेही हा कहाँ ॥१२८॥
हा लक्ष्मण गुणधाम, ई कहि त्यागल प्राण नृप ॥१२९॥
लक्ष्मण सीता राम, ई सभ छल छथि जननि कत ॥१३०॥
शून्य देखि पड़ धाम, अति व्याकुल मन भरत कह ॥१३१॥
भावार्थः
राजा ‘हा रघुनन्दन राम, हा वैदेही ! हा गुणधाम लक्ष्मण! कतय छी ?’ एहि तरहें विलाप करिते प्राण छोड़लनि ।” भरत अति व्याकुल मन सँ कहलनि – “माँ, लक्ष्मण कतय छथि ? सीता आ राम कतय छथि ? आर माता लोकनि कतय छथि ? महल सून्न-सून्न कियैक लागि रहल अछि ?” ॥१२८-१३१॥
।चौपाइ।
शुनु सुत सम्प्रति अछि एकान्त । कहइतछी बड़ बड़ वृत्तान्त ॥१३२॥
मरण निकट नृप मन भेल व्याज । मन छल रामचन्द्र युवराज ॥१३३॥
बड़ि बुधिआरि देखैत अधलाहि । देल मन्थरा काज निबाहि ॥१३४॥
देलक विपत्ति समय मन पाड़ि । हम वर लेल देल नहि छाड़ि ॥१३५॥
वर धयले छल से लेल माँगि । नृपति-हृदय जनु लागल साँगि ॥१३६॥
चौदह वर्ष राम वन जाथु । कन्द मूल फल वन बसि खाथु ॥१३७॥
भरत एतय होअथु युवराज । हमरा एहि दुइटा सौँ काज ॥१३८॥
सगर नगर भेल हाहाकार । त्यागल हम कि कठिन व्यवहार ॥१३९॥
बड़ बड़ जन कहि गेला हारि । सुपुरुष मुरुख हमहि बुधिआरि ॥१४०॥
महति मन्थरा समय सहाय । बुद्धि विलक्षण कूबड काय ॥१४१॥
सीता सती रहलि नहि गेह । लक्ष्मण रामक सत्य सनेह ॥१४२॥
तिनु जन वन वश गत सामाज । पटल आन छल समटल काज ॥१४३॥
आर्त्त भरत की होयत कानि । काज सम्हारल हम हठ ठानि ॥१४४॥
गेल राज्य आयल अछि हाथ । कनलेँ पुत्र दुखाएत माँथ ॥१४५॥
भावार्थः
फेर कैकेयि बजलिहः “हे पुत्र, सुनू, एखन कियो दोसर नहि अछि । हम सुनबैत छी, बड़का-बड़का बात भेल हँ । मरबाक समय राजाक मन मे छल-कपट समा गेलनि । हुनका इच्छा भेलनि जे रामचन्द्र केँ युवराज बनाबी । मन्थरा देखय मे भले अधलाहि हो, मुदा अछि बड बुधियाइर । वैह हमर काज सम्हारि देलक । संकट केर घड़ी ओ याद करा देलक । हम वर पेने रही । से छोड़ने नहि रही । हमर वर थाती राखल छल । से हम माँगि लेलहुँ । एतबहि सँ राजाक हृदय मे मानू बरछी भोंका गेलनि । हमरा सिर्फ एहि दुइ टा वर केर जरूरत छल – पहिले ई जे राम वन चलि जाइथ आ ओतय चौदह वर्ष कन्द-मूल-फल खाइत निवास करथि । दोसर ई जे भरत एतय युवराज बनाओल जाइथ । सारा नगर मे हाहाकार मचि गेल । तैयो हम अपन ओ कठिन आग्रह छोड़लहुँ नहि, बड़का-बड़का लोक सब बुझाकय हारि गेलाह, भले लोक बेवकूफ बनल, हम चतुर सिद्ध भेलहुँ । दासी मन्थरा समय पर सहयोगी भेल । शरीर सँ त ओ कुबड़ी अछि, मुदा ओकर बुद्धि विलक्षण छैक । रामक वन-गमन निश्चित भेला पर सीता सेहो घर मे नहि रहलिह । लक्ष्मण केँ त रामक संग सत्य स्नेह छन्हि । ताहि सँ तीनू वनवास मे चलि गेलाह । आब सम्राज्य अहाँक मुठ्ठी मे आबि गेल अछि । रंग-ढंग त किछु आरे छल, लेकिन आब काज सम्हरि गेल । हे भरत ! आब अधीर भ’ कय कनला सँ कि होयत ? हठ ठानिकय हम अपन काज सम्हारलहुँ । गेल राज्य घुरिकय हाथ आयल । हे पुत्र ! कनला सँ केवल माथा मे दर्द होयत ।” ॥१३२-१४५॥
।सोरठा।
जननी-वचन कठोर, शुनलनि भरत अनर्थ कहि ॥१४६॥
धिक धिक जीवन तोर, कहइत कण्ठ न कटि खसल ॥१४७॥
खसला भरत तड़ाक, अशनि-पतन तरु-वर जेहन ॥१४८॥
रहित श्वास ओ वाक, केकयि लेल उठाय पुन ॥१४९॥
एहन करिय नहि ज्ञान, सुख सम्पति मे दुःख की ॥१५०॥
राज्य देल भगवान, भाग्यवान बनि भोग्य करु ॥१५१॥
मुह नहि देखब तोर, असंभाष्य पतिघातिनी ॥१५२॥
विषम हलाहल घोर, बरु मरि जाइत पिआय दे ॥१५३॥
तोहर पुत्र कहाय, बड़ पापी हम विश्वमे ॥१५४॥
मरबे अग्नि समाय, की करबाल कराल सौँ ॥१५५॥
देल स्वामि-शिर डाक, दुष्ट मूर्त्ति के तोर सनि ॥१५६॥
पड़बह कुम्भीपाक, सकल-लोक-सुख-नाशिनी ॥१५७॥
भरत भेला उठि ठाढ़, मन बिराम बिसराम कत ॥१५८॥
पर सङ्कट की गाढ़, तनय सङ्कटा सर्प्पिणी ॥१५९॥
भावार्थः
माताक ई कठोर वचन सुनिकय भरत बजलाह – “अनर्थ भेल ! अहाँक जीवन केँ धिक्कार अछि । कि ई सब बाजैत अहाँक गला कटिकय नहि खसल ?” एतेक कहिकय भरत धड़ाम सँ धरती पर खसि पड़लाह जेना गाछ सँ पत्ता खसैत अछि । हुनकर साँस आ वाणी बन्द भ’ गेलनि । ई देखि कैकेयि हुनका उठा लेलनि आ कहलनि – “बेटा, एना जुनि सोचू । सुख-सम्पत्तिक समय अहाँ दुःखी कियैक होइत छी ? ईश्वर अहाँ केँ राज्य देलनि अछि । अहाँ भाग्यवान् छी, एकर भोग करू ।” फेर क्रोध मे आबिकय भरत बजलाह – “अरी! हम तोहर मुँह नहि देखब । तूँ बात करय लायक नहि रहलें । तूँ पतिघातिनी छँ । एहि सँ नीक हेतौक जे तूँ हलाहल नामक तेज जहर घोरिकय हमरा पिया दे आर हम मरि जाय । हम संसार मे बड़ा भारी पापी ठहरलहुँ, कियैक तँ हम तोहर बेटा कहेलहुँ । हम आगि मे कुदिकय जरि मरब, या तीख तलवार सँ अपन अन्त कय लेब । तूँ अपनहि पतिक सिर पर डाका देलें । तोरा जेहेन दुष्ट स्वरूपा आर के होयत ? तूँ सम्पूर्ण दुनियाक सुख पर पानि फेर देलें । तूँ कुम्भीपाक नरक मे पड़में ।” एतेक कहिकय भरत उठिकय ठाढ़ भ’ गेलाह । हुनकर मोन मे शान्ति आ विश्राम नहि रहि गेलनि । भारी संकट आबि गेलनि । साँपिन अपन पुत्रहि लेल संकट होइत अछि ॥१४६-१५९॥
।चौपाइ।
कयलेँ पापिनि व्याधिनि काज । मुह न देखब नहि रहब समाज ॥१६०॥
उठि गेला कौसल्या गेह । तनिकाँ रामचन्द्र सम नेह ॥१६१॥
भरत देखि कनली कय शोर । अविरल युगल नयन बह नोर ॥१६२॥
कौसल्याक चरण लपटाय । भरतहु काँ नहि नोर शुखाय ॥१६३॥
कौसल्या लेल हृदय लगाय । राम-वियोग-शोक नहि जाय ॥१६४॥
अँह बिनु भरत एहन भेल हाल । करु सुत सकल प्रजा प्रतिपाल ॥१६५॥
कहलहि होइतिह केकयि माय । तनिकर रङ्ग देखल अँह जाय ॥१६६॥
हा रघुनन्दन हा रघुवीर । हा सीता लक्ष्मण रणधीर ॥१६७॥
दुख-सागर मे पड़लहुँ हाय । अहँ बिनु के लेत जीव बचाय ॥१६८॥
चीराम्बर-धर जटा-कलाप । वन चल गेलहुँ दय सन्ताप ॥१६९॥
परमात्मा विभु से अछि ज्ञान । शोक अरोक दैव बलवान ॥१७०॥
भावार्थः
ओ बजलाह – “अरे पापिन! तूँ व्याधिन केर काज कएलें । हम तोहर मुँह नहि देखब आ न तोहर संगे रहब ।” एतेक कहिकय भरत उठिकय कौशल्याक भवन चलि गेलाह, जिनका भरत पर रामचन्द्रहि समान प्रेम रहन्हि । कौशल्या भरत केँ देखिते चिकरि-चिकरिकय कानय लगलिह । दुनू आँखि सँ धाराप्रवाह नोर बहय लगलनि । भरत कौशल्याक पैर सँ लिपटि गेलाह । हुनकहु आँखि मे नोरक धार रुकैत नहि छन्हि । फेर कौशल्या गला सँ लगा लेलिह । फेर रामक बिछोहक व्यथा दूर नहि भेलनि । ओ बजली – “हे भरत ! अहाँ नहि रही, ताहि सँ एना हाल भेल । हे पुत्र ! आब अहाँ समस्त प्रजाक प्रतिपालन करू । माता कैकेयि त कहनहि हेतिह । हुनकर रंग-ढंग अहाँ जा कय देखबे कयलहुँ । हाय रघुनन्दन, हाय रघुवीर, हाय सीता, हाय रणधीर लक्ष्मण ! आइ हम दुःख सिन्धु मे पड़ल छी । अहाँ बिना हमरा के उबारि सकैत अछि ? अहाँ चीवर आ जटा धारण कय वन चलि गेलहुँ आर हमरा सन्ताप दय गेलहुँ । ई त जनैत छी जे परमात्मा व्यापक छथि, (वैह सब किछु करैत छथि), तैयो हमर शोक केँ दूर करयवला कियो नहि अछि । भाग्य बलवान होइत अछि ॥१६०-१७०॥
।सवैयाछन्दः।
रामचन्द्र राज्याभिषेकमे केकयि कयलनि जे अविचार ॥१७१॥
सम्मत हमर मनस्पथहूँ जौँ जननिक कठिन कपट व्यवहार ॥१७२॥
ब्राह्मण-शतहत्याक जनित पड़ पातक सभटा हमरहि माँथ ॥१७३॥
गुरु वसिष्ठ ओ अरुन्धतीकाँ खड्गहिँ मारी करि जौँ लाथ ॥१७४॥
भावार्थः
(भरत कहैत छथि) – रामचन्द्र केर तिलक मे कैकेयि जे अनुचित विघ्न देलिह आर माता कैकेयि जे कपटपूर्ण क्रूर आचरण कयलिह, ओहि मे यदि हमर सहमति सपनहुँ मे रहल हो तँ सौ ब्राह्मणक वध करय सँ जे पाप होइत छैक से हमर माथ पर पड़य । जँ एहि मे हम कोनो छल करैत छी तँ गुरुपत्नी अरुन्धती-सहित गुरु वसिष्ठ केँ तलवार सँ वध करबाक पाप हमरा लागय ॥१७१-१७४॥
।चौपाइ।
खड्गहि कटितहुँ केकयि माँथ । उचित न कहता श्रीरघुनाथ ॥१७५॥
कहि हा रघुनन्दन रघुनाथ । जननी-चरण भरत धर माँथ ॥१७६॥
भरत शपथ कर बारंबार । राम नृपति हम किङ्कर चार ॥१७७॥
कौशल्या कह शुनु सुत भरत । केओ ने अनुचित अहँकाँ कहत ॥१७८॥
अति सुशील भरतक सन भरत । अहाँक बराबरि के जन करत ॥१७९॥
हम जनइत छी अहँक स्वभाव । अहँक सुयश भलमानुष गाव ॥१८०॥
अयला भरत शुनल जन कान । गुरु प्रधान तत कयल प्रयाण ॥१८१॥
कहलनि गुरु जनु करु मनखेद । थिक कर्त्तव्य लिखल जे वेद ॥१८२॥
ज्ञानी सत्य-पराक्रम वृद्ध । दशरथ छल छथि विश्व-प्रसिद्ध ॥१८३॥
बहुत दक्षिणा दय कय बेर । अश्वमेध मख कयलनि ढेर ॥१८४॥
इत सुख भोग अमरपति सङ्ग । एकासन-संस्थित सुर रङ्ग ॥१८५॥
आत्मा नित्य एक छथि शुद्ध । जनम मरण व्यवहार विरुद्ध ॥१८६॥
जड़ अपवित्र विनश्वर देह । मृतक कहाबथि निस्सन्देह ॥१८७॥
पिता तनय मरणोत्तर लोक । मूढ मृषा कर मनमे शोक ॥१८८॥
जनिकर जनम मरण हो तनिक । मिलन सर्व्वदा मानक क्षणिक ॥१८९॥
नष्ट होइछ ब्रह्माण्डो कोटि । स्थितिक भावना थिकि अति छोटि ॥१९०॥
मेरु भसम हो सिन्धु शुखाय । से की वस्तु काल नहि खाय ॥१९१॥
कालहिँ उतपति कालहिँ नाश । कालहिँ होइछ भोग विलास ॥१९२॥
चल दलपर जलकण चल जेहन । आयुक गति मानक थिक तेहन ॥१९३॥
दुख सुख हो कर्म्मक अनुसार । निश्चय ज्ञानी करथि विचार ॥१९४॥
नव पट पहिरथि त्यागि पुरान । देही देहक एहन विधान ॥१९५॥
आत्मा मरथि न जनमथि जाय । षट विकार नहि ततय समाय ॥१९६॥
भरत त्यागु मन बाढ़ल शोक । करु जैँ तृप्त पितर परलोक ॥१९७॥
तेल-द्रोणि सौँ शव बहराय । यथा-कृत्य चिति अनल लगाय ॥१९८॥
समुचित जेहन कहल गुरु-लोक । कयल भरत तखना नहि शोक ॥१९९॥
ब्राह्मण वैदिक बहुत मँगाय । रुद्र-प्रमित दिन भोज्य कराय ॥२००॥
नृपति निमित्त विप्र मे दान । गो-रत्नादि ग्राम सविधान ॥२०१॥
वस्त्र बहुत देल बापक नाम । चिन्तित आठ पहर निज धाम ॥२०२॥
राम राम हा गुणनिधि भाय । देलक बड़ दुख केकयि माय ॥२०३॥
भावार्थः
हम तँ तलवार सँ कैकेयि केर सिर उड़ा दितहुँ; मुदा राम एकरा उचित नहि कहताह ।” फेर भरत ‘हा रघुनन्दन’, ‘हा रघुनाथ’ कहिकय माता कौशल्याक चरण पर अपन सिर राखि देलनि । भरत बेर-बेर शपथपूर्वक कहैत छथि – “राम हमर राजा छथि आ हम हुनकर सेवक दास छी ।” कौशल्या कहली – “बेटा भरत, सुनू । अहाँ केँ कियो अपराधी नहि कहत । अहाँ परम सच्चरित्र छी । भरत समान भरते टा अछि । भरतक बराबरी के कय सकैत अछि ? हम अहाँ स्वभाव जनैत छी । सब लोक अहाँक यश गबैत छथि ।” ॥१७५-१८०॥
भरत अयलाह, ई खबरि तुरन्ते सब लोक तक पसैर गेल । प्रधान गुरु ओतय पहुँचि गेलाह । गुरु भरत सँ कहलनि – “शोक जुनि करू । वेदक विधान मुताबिक आब आगूक कर्तव्य निभेबाक अछि । राजा दशरथ ज्ञानी रहथि, सत्यवीर रहथि, विश्वविख्यात रहथि आ बूढ़ सेहो भ’ गेल रहथि । ओ प्रचुर दक्षिणा दय-दय कय अनेक अश्वमेध यज्ञ कयलनि । ओ एहि संसार मे सुख-भोग कयलनि । स्वर्ग मे इन्द्रक संग एक आसन पर बैसिकय देवता लोकनिक संग विलास कयलनि । आत्मा अविनाशी अछि, एक अछि आ शुद्ध अछि, अतः जन्म भेनाय, मरण भेनाय – ई जे कहल-सुनल जाइत अछि से वास्तविकता सँ दूर अछि । शरीर जड़ (चैतन्य-रहित) अछि, गन्दा अछि तथा नाशवान् अछि । वैह मृतक कहबैत अछि । पिता केर या पुत्र केर मरला पर ज्ञान-हीन लोके टा मोन मे निरर्थक शोक करैत अछि । जिनकर जन्म आर मरण होइत अछि हुनकर भेटनाय सदिखन क्षण मात्र भ’ सकैत अछि । कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड सेहो प्रलय मे नाश भ’ जाइछ । कोनो वस्तुक टिकल रहबाक (स्थिति) भावना बहुत छोट होइत अछि । मेरु जेहेन विशाल पर्वत सेहो जरिकय राख भ’ जाइत अछि आ समुद्र सेहो सुखा जाइछ । एहेन कोन वस्तु अछि जेकरा काल नहि खाइत अछि । कालहि मे सब वस्तुक उत्पत्ति होइत छैक, कालहि मे नाश होइत छैक आ कालहि मे ओहि वस्तु सब सँ भोग-विलास कयल जाइत छैक । हिलैत पत्ता पर जेना पानिक बूँद, तहिना मानवक आयु चंचल बुझबाक चाही । केकरो सुख या दुःख अपन कर्मक अनुसारे भोगय पड़ैत छैक, ज्ञानी लोक एहिना सोचैत छथि । जेना पुरान कपड़ा केँ त्यागिकय लोक नया कपड़ा पहिरैत अछि, ताहि प्रकारे देही (आत्मा) पुरान शरीर छोड़िकय नव शरीर धारण करैत अछि । आत्मा केर न कहियो जन्म होइत छै आ न मरण । आत्मा मे छः प्रकारक विकार सब मे कोनो विकार नहि होइत छैक । हे भरत, मोन मे छायल शोक केँ छोड़ू आर ओ कर्म करू जाहि सँ परलोक मे पितर सब केँ तृप्ति होइन्ह ।” ओकर बाद तेलक हौज मे सँ दशरथक शव केँ निकालल गेलनि । तखन विधान अनुसार चिता बनायल गेल । गुरुजन लोकनि जेना-जेना कहलनि, भरत शोकक त्याग कयकेँ तेना-तेना कयलनि । बहुते-रास वैदिक ब्राह्मण निमंत्रित कयल गेलाह आ एगारहम दिन हुनका भोजन करायल गेलनि । राजाक निमित्त विधान-पूर्वक गाय, रत्न, ग्राम आदिक दान ब्राह्मण सब केँ देल गेलनि । पिताक निमित्त भरत बहुते रास वस्त्र सभक दान कयलनि । भरत अपन भवन मे दिन-राति चिन्तित रहय लगलाह । ओ सोचैत रहैत छलाह । “हे गुणनिधि भ्राता राम, माता कैकेयि अहाँ केँ बड दुःख देलनि ॥१७५-२०३॥
।मिथिला-संगीतरीत्या भैरव-छन्दः।
विधि हम सकल अनर्थक मूले ॥२०४॥
हमरहि कारण केकयि जननी कयल कर्म्म प्रतिकूले ॥२०५॥
रामचन्द्र लक्ष्मण शुभ-लक्षण वैदेही वन हयती ॥२०६॥
नहि घर द्वार निवास नियत नहि कन्द मूल कोना खयती ॥२०७॥
सदा प्रशंस वंश हंसक थिक केहनि केकयि अइली ॥२०८॥
चट पट प्राण लेल प्राणेशक रामक शीर विशइली ॥२०९॥
सानुज हमहु रामवत् बनिकैँ ताहि विपिन मे जयबे ॥२१०॥
परमोदार जानकी-जानिक चरणक भृत्य कहयबे ॥२११॥
भावार्थः
हाय विधाता ! सबटा अनर्थक जैड़ हमहीं छी । हमरे खातिर टा माता कैकेयि ई कुकर्म कयलिह । राम, लक्ष्मण आर शुभ लक्षणवाली सीता – सब वन मे हेताह । न घरबारक ठेकाना हेतनि, नहिये वासक । ओ कन्द-मूल-फल केना खाइत हेताह ? सूर्यवंश सब दिन प्रशंसित रहल अछि । ताहि मे कैकेयि जेहेन रानी केना आबि गेलिह ? ओ एहिना-ओहिना मे पतिक प्राण सेहो लय लेलिह आर रामक माथ पर दुःखक पहाड़ राखि देलिह । हम दुनू भाइ सेहो रामक वेश बनाकय ओहि वन मे चलि जाइत छी, आर परम उदार जानकीपति रामक चरणक दास कहायब ।” ॥२०४-२११॥
॥इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे अयोध्याकाण्डे सप्तमोऽध्यायः॥
॥मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिलाभाषा रामायण मे अयोध्याकाण्डक सातम अध्याय समाप्त॥
हरिः हरः!!

1 Comment
Ki kahi ehi prasang k bare man, Jahi Bharat lel kekai ete natak kelih weh Bharat k ete Biyog apan, Bharata sab aa Bhabhi (Maa Janki) k lel hetain. Sange hunka t bujhelain je Raja Dasrath k Mritwa k karano Mata Kaikei bhelih.
Jate ber padhait chhi Ramayan bala prasang Bhav bibhor bho jait chhai.
कहलहि होइतिह केकयि माय । तनिकर रङ्ग देखल अँह जाय ॥१६६॥
हा रघुनन्दन हा रघुवीर । हा सीता लक्ष्मण रणधीर ॥१६७॥
दुख-सागर मे पड़लहुँ हाय । अहँ बिनु के लेत जीव बचाय ॥१६८॥
चीराम्बर-धर जटा-कलाप । वन चल गेलहुँ दय सन्ताप ॥१६९॥
परमात्मा विभु से अछि ज्ञान । शोक अरोक दैव बलवान ॥१७०॥I
1 Trackback or Pingback