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मानव धर्म अनुसार सेवाकार्य मे निरन्तरता बनेने रही – जातिक विचार मे ओझरेबाक जरूरत नहि

1407 भ्यूज

सेवाभाव सँ काज करैत रहू

एकटा छलाह लुट्टी बाबू । लूटन झा केँ सब लुट्टी बाबू कहनि । बड़का मालिकक बेटा रहथि, दुलारे लूटन नाम राखि देने रहथिन बाबूजी । तेँ लुट्टी नाम बेसी प्रचलित भ’ गेल छलन्हि ।
लुट्टी बाबू मे एकटा गुण कि दुर्गुण ई रहनि जे ओ अपन लोकप्रिय जमीन्दार पिताक ठीक विपरीत पंचायत मे नकारात्मक भूमिका निभबैत छलथि । सेहो सब पंचक सोझाँ नहि, अपितु परोक्ष रूपे । कोनो पर-पंचायती आदि मे पंच सभक सामने कम बाजथि आ जखन पंचायती खत्म भ’ जाइक त आरोपित-दोषी पक्ष केँ अपना लग बैसाकय पंचक देल निर्णय विरूद्ध अचानक स’ खुब बाजय लागथि ।
पंच सँ जे बहस करबाक चाही से ओहि आरोपी-दोषी पक्षक फेवर मे पंच सब पंचायती खत्म कय चलि गेलाक बाद बाजथि । मुदा फेर बात ई कहिकय सम्हारि देथि जे ‘जाय दहक, आब जे भेलय से भेलय । मुदा पंच सब नीक नहि कयलाह । तोरा दोषी बना देलखुन ।’
दोषी-दण्डित लोक एहि तरहें लुट्टी बाबू केँ अपन पक्ष मे देरिये सँ मुदा ठाढ़ भेल देख अपना केँ बौंसि लेल करय । दण्ड त ओकरा लागिये गेल रहैत छलैक, मुदा लुट्टी बाबूक ओकरा लेल बहायल गोहिया नोर सँ ओ स्वयं केँ निर्दोष बुझय लगैत छल ।
लुट्टी बाबू अपन एहि एहसानक बदला मे ओकरा सँ अपन बहुते रास स्वार्थ सब सिद्ध कयल करथि । जमीन्दार सब मे ई सब आदति आम बात भेल करैक । मूर्ख-जाहिल सामन्त सब ई पेंच कि जानय गेल । बेचारा सब फँसि गेल करय मालिक वर्गक जाल-झेल मे ।
लुट्टी बाबूक प्रसंग सन्दर्भवश मोन पड़ल
लुट्टी बाबू आइ एहि लेल मोन पड़लाह जे वर्तमान लोकतंत्र आ लोकतांत्रिक व्यवस्था मे जमीन्दारी प्रथा भले उन्मूलन भ’ गेल हो, मुदा जमीन्दारी रवैया आइयो यथावते बनल अछि ।
पहिने बेसी लोक अभिजात वर्गक जमीन्दार भेल करय, अपन बुद्धि-बल सँ अन्य समुदाय-वर्गक लोक पर हुकुमत चलबय । आब लोकतांत्रिक पद्धति आ ‘साम्यवाद’ कि ‘समाजवाद’ केर नाम पर ‘सामाजिक न्याय केर वकालत करयवला’ कतेको तरहक गाँधीजीक हरिजन समाज नव-नव वर्गवादी राजनीति अनुसार ‘पिछड़ा वर्ग’, ‘दलित वर्ग’, ‘महादलित वर्ग’, ‘अति पिछड़ा वर्ग’, ‘अल्पसंख्यक वर्ग’ आदिक शाब्दिक जाल मे ओझराकय अपन-अपन जमीन्दारी चला रहल अछि ।
एहि बीच अभिजात वर्गक लोक सब अपन-अपन बोरिया-विस्तर, बाल-बच्चा आ सारा सगा-सम्बन्धी सब समेटिकय पहिनेक बन्जारा समुदाय जेकाँ मूल डीह छोड़ि सौंसे संसार मे अपन टेन्ट लगा-लगा जीवन बिता रहल अछि ।
एम्हर मुखिया-मैनजन सब खुश जे फल्लाँ जमीन्दारक धियापुता आ परिवार सब परदेश मे विलीन भ’ गेल, गामक बचलाहा शेख-सम्पत्ति सब धीरे-धीरे औने-पौने दाम मे बेचि रहल अछि, कतेको त साकिमो भ’ गेल, भूमिहीन, डीहो बेचि लेलक ।
मुदा राजनीति के हवा-बिहाइड़ एहेन छैक जे अभिजात वर्गक ‘लुट्टी बाबू’ सब जेहो बचल छैक तेकरो नाश करबाक लेल आतुर अछि । अहाँ कोनो समिति गठन करू, कोनो काज करबाक विचार आनू – करू सबटा अहाँ आ मंच पर आगू बैसबाक मारि मे फँसा देत ‘लुट्टी बाबू’ जातीय आधारित संख्या देखिकय । हमरा बुझने एहि प्रवृत्ति सँ बचबाक चाही ।
एकटा टेन्डेन्सी सँ बचबाक चाही
जातिवादी विचारधारा जखन सत्ताक राजनीति मे हावी अछि, ताहि समय अभिजात वर्गक लोक अपन अभिजात्य गुण-धर्म छोड़ि नर्हरा-हेल करता आ अपन ओकादि सँ बाहर जाकय (अपन धियापुता केँ भुखले मारिकय नाम-शोहरत लेल नेतागिरी करता) समावेशिकता सूत्र लागू करता तखन काज करता – ई सब यूजलेस परिकल्पना मे एकदम नहि ओझराय ।
हम मानव छी । मानवता सर्वोपरि अछि । हमर जन्म मिथिला मे भेल । मातृभाषा मैथिली छी । हमर मातृभूमि आ मातृभाषाक संग समस्त मानवक हित लेल हमरा सँ जे पार लागत से हम करब । प्रथमतः अपनहिं आवश्यकताक पूर्ति लेल मस्तिष्क, श्रम, समय आदि खर्च करब से स्वाभाविक सत्य अछि । एहि सँ कनिकबो बचत भेल, से दुनिया लेल खर्च करब । सेवाभाव हमरा मे रहबाक चाही । बस ।

हरिः हरः!!

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