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मिथिला, ज्ञान आ संस्कारक भूमि थिकै

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­लेख विचार
प्रेषित: दिलीप झा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- “त्रैवर्णिक सूत्र: धर्म आ संस्कृति केर बंधन”

धोइ देल स्नान सँ, जतनक फूल चढ़ल,
गुरुक चरण धरि बालक नव प्रण लेल।
गायत्री मन्त्रक मधुर ध्वनि गूँजि उठल,
ज्ञानक बाट हमर मोनक दीप बनल।
त्रैवर्णिक जनेऊ सनेह सँ सजल,
देव-पितरक आशीषे अंग मे पगल।
साधनाक संकल्प, सेवाक प्रण सहित,
बालक बढ़ल धर्मक अमर गीत लिखित।
आई मिथिलाक धरणि गाबय मंगल गान,
उपनयन सँ उदित भेल आजु नव बिहान।

मिथिला, ज्ञान आ संस्कारक भूमि, सदैव अपन गहन वैदिक परम्पराक रक्षा आ संवर्धन करैत आयल अछि। एतय यज्ञोपावित संस्कार जेकरा हम “उपनयन” वा “जनेऊ संस्कार” कहैत छी मात्र एक सामाजिक कर्तव्य नहि, अपितु आध्यात्मिक जीवनक शुभारम्भ मानल जाइत अछि।
‘यज्ञोपवीत’ शब्द दू शब्द सँ बनल अछि “यज्ञ” आ “उपवीत”। अर्थ भेल यज्ञक योग्य बनय लेल उपवीत धारण। एतबे नहि, यज्ञोपावित जीवनक दू मुख्य धारा ज्ञान आ कर्म मे प्रवेशक प्रतीक अछि। एहि संस्कारक माध्यम सँ बालक शिष्यत्व धारण करैत अछि, गुरु-आश्रम मे अध्ययन प्रारंभ करबाक अर्हता प्राप्त करैत अछि।
मिथिला मे ई संस्कार मुख्य रूप सँ ब्राह्मण, क्षत्रिय आ वैश्यक लेल अनिवार्य मानल गेल अछि। बाल्यावस्था सँ यज्ञोपावित धारण करा बालककेँ धार्मिक, नैतिक आ सांस्कृतिक शिक्षाक पथ पर आरूढ़ करबाक परम्परा अछि।
यज्ञोपावित यज्ञ एक विस्तृत समारोह होइत अछि। बरुआ (बालक) केँ स्नान कराओल जाइत अछि, शुद्ध वस्त्र धारण कराओल जाइत अछि। यज्ञ मंडप सजाओल जाइत अछि, जत’ विधिपूर्वक अग्नि प्रज्वलित केलाक बाद पितर-देवता, ऋषि-मुनि आ लोकाचारक साक्षी मानि संस्कार सम्पन्न कएल जाइत अछि।
सब सँ महत्वपूर्ण क्षण होइत अछि गुरु द्वारा गायत्री मन्त्रक दीक्षा देनाइ। बालक केँ कान मे धीरे-धीरे मन्त्रक उच्चारण क’ क सुनाओल जाइत अछि, आ उपदेश देल जाइत अछि जे अहाँके जीवन भरि एहि मन्त्र केर साधना करबाक अछि।
यज्ञोपवीत कातक वाम भुजा पर त्रैवर्णिक सूत्रक रूप मे पहिराओल जाइत अछि। एकर तीन तार जीवनक तीन ऋण देवऋण, पितृऋण आ ऋषिऋण केँ स्मरण करबैत अछि।
मिथिला मे यज्ञोपावित संस्कार अत्यन्त उल्लास आ भक्तिपूर्वक आयोजित होइत अछि। पारम्परिक गीत, पचांग पाठ, सामूहिक भोजन आ वरुआक उपहार-भेंटक आयोजन होइत अछि। विशेष रूप सँ “गुरु दक्षिणा” केँ एक महत्वपूर्ण अवसर मानल जाइत अछि जतय बालक अपन गुरु केँ आदरपूर्वक भेट दैत अछि।
कतेको ठाम “उपनयन” केँ विवाहक तुल्य महत्व देल जाइत अछि। कहलगेल अछि जे जखन धरि बालक यज्ञोपवित नहि पहिरैत अछि, तखन धरि ओ पूर्ण सामाजिक दायित्वक अधिकारी नहि बनैत अछि।
आजुक बदलैत समाज मे यद्यपि अनेक परिवार एहि संस्कारक प्रति उदासीनता देखेबा मे लागल अछि, तथापि मिथिलांचल मे एखनहुं यज्ञोपावित केँ गम्भीरता सँ लेबाक परम्परा जीवित अछि। नव पीढ़ी लेल ई संस्कार केवल एक रिवाज नहि, बल्कि अपन सांस्कृतिक जड़िकेँ पकड़य आ आध्यात्मिक चेतनाक नव यात्रा शुरू करबाक अवसर बनि सकैत अछि।
यज्ञोपावित संस्कार मिथिला मे आत्मा केँ शुद्ध करबाक, कर्तव्यपथ पर अग्रसर होयबाक आ परमात्मा दिस ध्यानाकर्षण बढ़बाक प्रथम पायदान अछि। ई संस्कार जीवन भरिक साधना आ सेवा भावक बीज रोपइत अछि, जाहि सँ व्यक्ति मात्र अपन परिवार नहि, अपितु सम्पूर्ण समाज लेल कल्याणकारी सिद्ध भऽ सकैत अछि।
संस्कारक दीप जरय हृदय भीतर,
उपनयन सँ खुलय ज्ञानक नव द्वार।
मिथिलाक गौरव सँ जुड़य नव प्राण,
धर्मक बाट चलय सगरो संज्ञान।

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