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अनावश्यक भाउ खोजब उचित नहि

414 भ्यूज

भाउ कतहु मांगल गेलय औ सरकार!

हमरा बुझने कोनो वस्तुक भाउ ओकर उपयोगिता पर निर्भर करैत छैक । नूनोक दाम ओकर विशेष स्वाद आ शारीरिक जरूरत देखियेकय बनलैक । कतेक मनुक्ख सेहो अपन भाउ तकैत भेटा जाइछ ।

परिवार मे कतेको तरहक जेठ-श्रेष्ठ, मित्रवत् वा अनुज सब होइत छथि । सब गोटेक अपन जीवन छन्हि । सब विद्या सेहो अर्जन कयलनि । सभक जीवनक एकटा निश्चित रूप छन्हि । तेँ समाज मे एकटा निश्चित मूल्यांकन होइत छन्हि सभक । तदनुसार एकटा निश्चित भाउ सब गोटेक स्वतः बनि गेल करैछ । मुदा कियो गोटे एहनो होइत छथि जे बेसी भाउ चाहैत छथि ।

एकटा कक्षा मे कतेको छात्र होइछ । सब अपना-अपना ढंग सँ एक्के तरहक परीक्षा आ प्रश्नपत्रक सामना करैत उत्तर-पुस्तिका मे उत्तर प्रस्तुत करैत अछि । परीक्षक सभक उत्तर केर स्तर अनुसार पूर्णांक मे सँ प्राप्तांक प्रदान करैत छथि । एहि तरहें विभिन्न छात्रक विभिन्न प्राप्तांक केर आधार पर रिजल्ट प्रकाशित कयल जाइछ । कियो फर्स्ट डिविजन, कियो सेकेन्ड डिविजन, कियो थर्ड डिविजन – कियो फेल ! कोनो विद्यार्थी कोन पोस्ट पर, कियो कतय, कियो कतय ! यैह छैक यथार्थ । सभक भाउ मे भिन्नता ओकर अपन मेहनति आ परीक्षा मे प्रस्तुति अनुसार तय होइछ ।

यदि कियो प्राप्तांक-लब्धांक सँ असन्तुष्ट अछि, ओ भाउ ताकि सकैत अछि – परीक्षक तथा संचालक सँ पुनर्जाँचक लेल चैलेन्ज (चुनौती) फाइल कय सकैत अछि । एहि लेल ओकरा अपन देल उत्तर पर पूरा आत्मविश्वास भेनाय आवश्यक होइत छैक । ई कोन मे लागू भेल ? जे अपन भाउ कम भेटबाक बात सँ असन्तुष्ट अछि, ओकरा अपन कयल काज पर पूरा भरोसा छैक, ओकरा ई लागि गेलैक जे जरूर कतहु न कतहु हमरा संग बेइमानी कयल जा रहल अछि, त ओ भरपूर विश्वास सँ अपन भाउ केँ सुधार करबाक लेल याचिका दायर करैत अछि ।

आब आउ समाज मे । हम-अहाँ सामाजिक प्राणी छी । समाजक पटल पर सभक अपन माइन-मोजर अछि । चूँकि बेसी लोक अपन-अपन काज आ घरहि केर चौखटि धरि सीमित रहि जाइछ, ओकर भाउ समाज मे तेना भ’ कय नहि खुलैछ, तथापि एकटा निश्चित भाउ ओकरो रहिते टा छैक लोकदृष्टि मे ।

समाज मे जे सब थोड़-बहुत एक्सपोजर (अनावृत्ति) पबैत अछि, अर्थात् अपन सार्वजनिक व सामाजिक योगदान सँ लोकपहिचान बनबैत अछि – यैह भाउ महत्वपूर्ण होइत छैक । मुदा ई भाउ प्रति बहुते लोक हाँव-डाँव सेहो करैत अछि । योगदान देत सिफर (शून्य) आ भाउ ताकत हाइयर । ई पूर्णतया गलत छैक ।

एकटा नोबल (कुलीन, संस्कारी) व्यक्ति कथमपि अपन भाउ केकरो सँ मांगिकय नहि लैछ, ओ एकनिष्ठ भाव सँ अपन योगदान मात्र पर ध्यान दैछ । समाज मे स्वतः ओकर योगदानक महत्व केँ लोक गनैत छैक, ओकर योगदान प्रति हृदय सँ सम्मानक भाव ओकर यथार्थ भाउ होइत छैक ।

पापक बाप होइछ लोभ । सावधान प्रवीण ! दिखाबा आ नाटक कय केँ समाजसेवी बनब, दुइ-चारि-दस ‘वाह-वाह’ कय देत । मन बढ़ि जायत । भाउ ताकय लागब । अपन सब धर्म चौपट कय लेब । ई काज जीवन मे नहि करू । बाकी, भाउ केर नपनाय-जोखनाय सेहो बन्द करू, बस कर्म करू आ बढ़ैत रहू । फल्लाँ बाबू तकला, नहि तकला – से सब तकनाय छोड़ू । बस अपन कर्तव्य पूरा भेल, ओहि पर साकांक्ष रहू ।

हरिः हरः!!

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