स्वाध्याय
– प्रवीण नारायण चौधरी
कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण
लङ्काकाण्ड – चौदहम अध्याय
पुष्पक रथ सँ राम केर सदल-बल अयोध्या पहुँचब
।जयकरी छन्द।
क्रम क्रम सकल देखाबथि धाम । रथपर सौँ सीता काँ राम ॥१॥
गिरि त्रिकूट लङ्का रण-भूमि । काक गृद्ध मड़ड़ाइछ घूमि ॥२॥
राक्षस वानर काँ एत मारि । मुइला एतहि दशानन हारि ॥३॥
कुम्भकर्ण घननादक झुण्ड । बहुतक एतहि खसल छल मुण्ड ॥४॥
ई बाँधल भेल सागर-सेतु । वानर-निकर उतरबा हेतु ॥५॥
परम पवित्र पाप सभ हरथि । सेतुबन्ध दर्शन जे करथि ॥६॥
हम रामेश्वर स्थापन कयल । शरण विभीषण एहि थल धयल ॥७॥
दर्शन कयल जानकी जाय । जय शिव रटथि सैन्य-समुदाय ॥८॥
किष्किन्धा ई कपिपति-ग्राम । कहि किछु काल कयल विश्राम ॥९॥
तारादिक सुग्रीवक दार । चढ़ली पुन रथ उड़ल उदार ॥१०॥
सीता-प्रिय-कारण व्यवहार । करथि रघूत्तम विश्वाधार ॥११॥
मुइला बालि बली एहिठाम । ऋष्यमूक गिरि हिनकर नाम ॥१२॥
पञ्चवटी अयलहुँ से ठाम । राक्षस सङ्ग जतय सङ्ग्राम ॥१३॥
भेला जे जे समर समक्ष । मारल गेला से से रक्ष ॥१४॥
मुनि सुतीक्ष्ण मुनि तथा अगस्त्य । आश्रम दूनू परम प्रशस्त ॥१५॥
तापसगण पड़इत छथि दृष्टि । धन्य धन्य थिक हिनकर सृष्टि ॥१६॥
चित्रकूट गिरि होइछ प्रकाश । बारह वर्ष जतय छल वास ॥१७॥
होउ प्रसन्न शरण हम धयल । भरत बहुत हठ एतहि कयल ॥१८॥
भारद्वाजाश्रम ई थीक । यमुनातट मे लगइछ नीक ॥१९॥
ई थिकि गङ्गा करू प्रणाम । परम पवित्रा कहलनि राम ॥२०॥
सरयू निकट अयोध्या धाम । थिक कर्त्तव्य नगर-विश्राम ॥२१॥
भावार्थः
जेना-जेना रथ बढ़ैत जाइत छल, रामजी सीताजी केँ पुरान स्थान सब देखबैत छलथि – “देखू, त्रिकूट पर्वत पर लंकाक ई युद्धक्षेत्र थिक जेतय कौआ आ गिध सब जहाँ-तहाँ चक्कर काटि रहल अछि । एतहि राक्षस आ कपि सभक बीच लड़ाइ भेल छल । एतहि रावण हारिकय मरल । कुम्भकर्ण, मेघनाद आदि बहुते-रास वीर सभक सिर एतहि खसल छल । ई कपि लोकनिक उतरबाक लेल समुद्र मे बनायल गेल बाँध छी । जे एहि सेतुवन्धक दर्शन करैत अछि ओ अतिशय पवित्र भ’ जाइत अछि आ पाप सब सँ मुक्त भ’ जाइत अछि । एतय हम रामेश्वर केर स्थापना कयलहुँ । एतय विभीषण शरणागत भेल छलाह ।” जानकी एवं अन्य सैनिक लोकनि ओतय जाकय रामेश्वरक दर्शन कयलनि ा कपि सब शिवजीक जयध्वनि कयलनि । राम कहय लगलाह – “ई सुग्रीवक नगरी किष्किन्धा थिक ।” एतेक कहिकयक किछु समय ओतय विश्राम कयलनि । सुग्रीव केर तारा आदि स्त्री सब सेहो ओहि रथ पर चढ़लिह । फेर रथ स्वच्छन्द उड़य लागल । विश्वक आधार राम सीता केँ प्रसन्न करबाक लेल लीला सब करैत छथि । फेर राम कहय लगलाह – “बलवान् बालि एतहि मरल छल । एहि पर्वत केर नाम ऋष्यमूक थिक । आब हम सब पंचवटी अयलहुँ । ई वैह स्थान छी जेतय राक्षस सब सँ लड़ाइ शुरू भेल । एतय जे-जे राक्षस लड़ाइ मे सोझाँ आयल ओ सब मारल गेल । ई सुतीक्ष्ण मुनिक आ ई अगस्त्य मुनिक आश्रम थिक । ई दुनू आश्रम परम श्रेष्ठ अछि । देखू, ई तपस्वी लोक सब देखाय पड़ि रहल छथि । हिनका लोकनिक दुनिया धन्य अछि, धन्य अछि । ओ चित्रकूट पर्वत देखाय दय रहल अछि जेतय हम सब बारह वर्ष रहल छलहुँ । ई यमुना नदीक किनार पर ऋषि भरद्वाजक आश्रम थिक । ई कतेक सोहावन लगैत अछि ! ई गंगा नदी थिक । हिनका प्रणाम करू । ई परम पवित्र अछि ।” रामजी कहलनि – “ई सरयू नदी लगका अयोध्यानगरी छी । एतय हमरा लोकनिक नगर-विश्राम करब उचित अछि ।” ॥१-२१॥
।सोरठा।
भरद्वाज-मुनि-धाम, अटकाओल कौबेर रथ ॥२२॥
अभिनत कयल प्रणाम, मुनि हर्षित पुछलनि कुशल ॥२३॥
पूर्ण चतुर्दश वर्ष, तिथि भल आइलि पञ्चमी ॥२४॥
मन मे बाढ़ल हर्ष, वार्त्ता पुर पहिलहि उचित ॥२५॥
जिबइत छथि सभ माय, भरद्वाज मुनि शुनल अछि ॥२६॥
कुशल क्षेम दुहु भाय, पुरी सुभिक्षा अछि कहू ॥२७॥
अति प्रसन्न सभ लोक, भरद्वाज हसयित कहल ॥२८॥
अपनैँक केवल शोक, आबि गेलहुँ देखबे करब ॥२९॥
कन्द मूल फल खाथि, माथ जटा बल्कल वसन ॥३०॥
अनतय कतहु न जाथि, भरत खरौँ सेवा करथि ॥३१॥
भावार्थः
एतेक कहिकय राम भरद्वाज मुनिक आश्रम मे कुबेर केर पुष्पक रथ केँ रोकलनि । झुकिकय मुनि केँ प्रणाम कयलनि । हर्षक संग मुनि भरद्वाज कुशल-समाचार पुछलनि आ कहलनि – “चौदह वर्षक अवधि पूरा भ’ गेल । पंचमी शुभ तिथि आबि गेल । हर्षक लहर छा गेल । नगर मे पहिनहिं खबर कय देनाय उचित होयत ।” राम पुछलनि – “हे भरद्वाज मुनि, कृपया ई कहल जाउ जे हमर सब माता लोकनि जिबैत छथि ? कि भरत आ शत्रुघ्न दुनू भाइ कुशल सँ छथि ?” भरद्वाज मुस्कुराइत कहलनि – “सब गोटे परम प्रसन्न छथि । मात्र अहाँ बारे मे चिन्ता छल । आब त अहाँ आबि गेल छी, स्वयं देखबे करब । भरत मात्र कन्द, मूल आ फल खाइत छथि, माथा मे जटा आ तन मे वल्कल धारण कएने छथि । अन्यत्र कतहु नहि निकलैत छथि । निरन्तर अहींक खड़ाउँ केर सेवा करैत रहैत छथि ॥२२-३१॥
।चौपाइ।
तप-प्रताप अपनैक पद ध्यान । रामचन्द्र हमरा सभ ज्ञान ॥३२॥
जे जे चरित कयल प्रभु जाय । आज्ञा पायब देब शुनाय ॥३३॥
नहि अछि आदि मध्य नहि अन्त । परब्रह्म छी देव अनन्त ॥३४॥
अपनैँक नाभिकमल-उत्पन्न । ब्रह्मा करथि सृष्टि सम्पन्न ॥३५॥
निर्गुण ब्रह्म सगुण अवतार । हरण करैछी पृथिवी-भार ॥३६॥
करु पवित्र प्रभु हमरो गेह । सेवक-विषय विशेष सिनेह ॥३७॥
अङ्गीकार कयल भगवान । अति आतिथ्य सुभोज्य विधान ॥३८॥
भेटय तीर्थ तहाँ तहाँ जाथि । तीर्थ-कृत्य-विधि तहाँ नहाथि ॥३९॥
भावार्थः
हे रामचंद्र, अपनेक चरण मे ध्यान लगाकय कयल गेल तपस्याक प्रभाव सँ हमरा सब बात पता अछि । अहाँ जे-जे चरित कयलहुँ अछि, जँ आज्ञा हो त हम सब किछु सुना दी । अहाँक न आदि अछि आ न अन्त अछि । अहाँ अनन्त परब्रह्म छी । अहींक नाभिकमल सँ उत्पन्न ब्रह्मा समस्त दुनियाक सृष्टि करैत छथि । अहाँ निर्गुण ब्रह्म रहितो सद्गुण रूप सँ अवतार लैत छी आ पृथ्वीक भार केँ दूर करैत छी । हे प्रभु, अहाँ हमर घरहु मे पधारिकय पवित्र करू । अहाँ केँ अपन सेवक सब पर विशेष अनुग्रह रहैत अछि ।” रामजी भरद्वाजक अनुरोध केँ स्वीकार कयलनि । मुनि सुन्दर भोजनक तैयारी कय केँ खूब आतिथ्य कयलनि । आश्रम लग जे-जे तीर्थ छल, ततय-ततय जाकय राम तीर्थ मे अनुपालनीय विधि सँ स्नान कयलनि ॥३२-३९॥
।बरबा छन्द।
कहलनि श्रीरघुनन्दन, शुनु हनुमान ॥४०॥
अयलहुँ से वार्त्ता पड़, भरतक कान ॥४१॥
भावार्थः
तखन राम कहलनि – “हे हनुमान, सुनू । हम सब आबि गेलहुँ, एहि बातक सूचना भरत केँ भेटबाक चाहियनि ॥४०-४१॥
।प्रज्झटिति छन्द।
पुर झटिति पवन-सुत अहाँ जाउ । सभ कुशलक्षेम जनकाँ शुनाउ ॥४२॥
गुह शृङ्गवेरपुर हमर मित्र । तनिकहु कहि देबक सभ चरित्र ॥४३॥
छथि नन्दिग्राम मे भरत भाय । आगमन कुशल तनिकाँ शुनाय ॥४४॥
पुन हमर निकट अहँ शीघ्र आउ । कहु किछु विलम्ब नहि अहँ लगाउ ॥४५॥
मानुष-तन धयलय हनूमान । चलला उड़ि नभ जनु गरुत्मान ॥४६॥
से शृङ्वेरपुर प्रथम जाय । अयला रघुनन्दन से शुनाय ॥४७॥
चौदह वर्षोत्तर अहँक मित्र । सभटा कहि देलनि तनि चरित्र ॥४८॥
अतिशय मन हर्षित गुह निषाद । छुटि गेल सकल संशय-विषाद ॥४९॥
भावार्थः
हे हनुमान, अहाँ जल्द अयोध्यापुरी जाउ आ ओतय लोक सब केँ सारा कुशल-समाचार सुनाउ । नन्दिग्राम मे हमर भाइ भरत रहैत छथि, हुनका हमर अयबाक समाचार सुनाकय जल्दी हमरा लग घुरि आउ, आ कतहु कनिकबो देरी जुनि लगायब ।” ई सुनिकय हनुमान मनुष्यक रूप धारण कय केँ आकाश मे गरुड़ समान उड़ि चललाह । पहिने ओ शृंगवेरपुर गेलाह । ओतय रामक मित्र गुह केँ बतौलनि – “चौदर वर्षक बाद अहाँक मित्र राम आबि गेलाह ।” फेर रामक सारा इतिवृत्त कहि सुनौलनि । निषादराज गुह केर मन ई सुनि अतिशय आनन्दित भ’ उठल । हुनक सबटा अन्देशा दूर भ’ गेल ॥४२-४९॥
।चौपाइ।
कहि हनुमान चलल उड़ि गगन । रामतीर्थ सरयू देखि मगन ॥५०॥
सरयू लाँघि गेला तहिठाम । भरत छला जहाँ नन्दिग्राम ॥५१॥
रामचरण-पङ्कज अनुराग । डेढ़ कोश निजपुर सौँ लाग ॥५२॥
अति कृश देखल भरत-शरीर । नहि सुखाय पल नयनक नीर ॥५३॥
जटामुकुट बलकल भल चीर । दीन मीन संक्षीण सुनीर ॥५४॥
कन्द मूल फल भक्ष्य-विधान । रामचन्द्र-पद केवल ध्यान ॥५५॥
पुर-प्रधान काँ शोक अभङ्ग । वसन पहिर से गेरुक रङ्ग ॥५६॥
चौदहवर्ष जानि अवसान । पलपल हर्ष विषाद समान ॥५७॥
धर्म्ममूर्त्ति जनु देखल ठाढ़ । हर्ष हनूमानक मन बाढ़ ॥५८॥
कहलनि विनत हाथ दुनु जोड़ि । चिन्ता भरत अहाँ दिय छोड़ि ॥५९॥
त्यागु त्यागु निज हृदय-महाधि । राम-वियोगज-शोक-समाधि ॥६०॥
गाछ सुखायल लता समूल । भेल सपल्लव नव फल फूल ॥६१॥
नाच मयूर पूरस्वर गाब । षड्ज सु-मूर्तिमान बनि आब ॥६२॥
कोकिल-कुल कल करइछ गान । स्वर पञ्चम शुनि पड़इछ कान ॥६३॥
केकयि-नन्दन करु अनुमान । अयला रामचन्द्र भगवान ॥६४॥
राजराज-रथपर रघुराज । राजा बनल अबै छथि आज ॥६५॥
रावण काँ मारल सङ्ग्राम । कर्म्म अमानुष कयलनि राम ॥६६॥
क्रम क्रम चरित कहल सभ गोट । नहि कर्त्तव्य भरत मन छोट ॥६७॥
सीता लक्ष्मण चित्त प्रसन्न । प्रभु सङ्ग मित्र सुगुण-सम्पन्न ॥६८॥
हर्षक कथा शुनाओल कान । करु उद्योग मिलन सन्मान ॥६९॥
भावार्थः
निषादराज गुह केँ सब हाल कहिकय हनुमानजी फेर आकास मे उड़ि गेलाह । आगाँ सरयू नदी मे रामतीर्थ देखि हुनकर मन आनन्दमग्न भ’ गेलनि । सरयू केँ पार कय केँ ओहि नन्दिग्राम पहुँच गेलाह जेतय भरत छलथि । हुनका रामजीक चरण मे असीम प्रेम छलन्हि । नन्दिग्राम अयोध्यापुरी सँ डेढ़ कोस दूर छल । हनुमानजी देखलनि जे भरक शरीर एकदम दुब्बर-पातर भ’ गेल छन्हि । हुनकर आँखि मे नोर पलहु भरि लेल सुखाइत नहि छन्हि । जटा समेटिकय मुकुट बनायल गेल अछि । सुन्दर वल्कल वस्त्र पहिरने छथि । हुनकर हालत ओहने छन्हि जेहेन पानि घटि गेला पर माछक होइत छैक । ओ मात्र कन्द, मूल आ फल खाकय रहैत छलथि आ मात्र रामचन्द्रजीक चरण मे ध्यान लागर रहैत छलन्हि । नगरक प्रधान केँ बड़ा भारी शोक छलन्हि । ओ गेरुआ वस्त्र पहिरने रहथि । चौदर बरस केर अवधि केँ अन्त देखिकय भरतक चित्त मे पल-पल मे कखनहुँ हर्ष त कखनहुँ विषाद होइत छलन्हि । हनुमानजी भरत केँ ठाढ़ देखलनि जेना मूर्तिमान धर्म स्वयं ठाढ़ होइथ । हनुमानक हर्षक ठेकान नहि रहलनि । ओ दुनू हाथ जोड़िकय कहलनि – “हे भरतजी, आब अपने चिन्ताक त्याग करू । अपन हृदयक भारी व्यथा केँ हंटाउ आ रामक बिछोह सँ होयबला दुःख मे लीन रहनाय छोड़ू । जे लत्ती जैड़-सहित सुखा गेल छल ताहि मे नव-नव पत्ता, फूल आ फल लागि गेल । मोर नाचि रहल अछि आ पूरा स्वर मे गाबि रहल अछि, लगैत छल जेना षड्ज स्वर मूर्तिमान बनिकय सोझाँ आबि गेल हो । कोयल कलरव कय रहल अछि । ओकर पंचम स्वर सुनाय दय रहल अछि । हे भरत, एहि लक्षण सब सँ अहाँ अनुमान लगाउ । भगवान रामचन्द्र आबि गेल छथि । राम आइ कुबेर केर पुष्पक रथ पर राजा बनिकय आबि रहल छथि । ओ लड़ाइ मे रावण केँ मारि देलनि । ओ एहेन करतब देखौलनि जे मनुष्य नहि कय सकैछ ।” एहि तरहें क्रमशः रामक सारा चरित्रक वर्णन कय देलनि । फेर कहलनि – “हे भरत, आब अहाँ अपन चित्त छोट जुनि करू । सीता आर लक्ष्मण दुनू हृदय सँ प्रसन्न छथि । रामक संग हुनक भला मित्र सेहो छथि । आब आदरक संग मिलन केर तैयारी कयल जाउ ।” एहि तरहें हनुमानजी भरतजी केँ खुशखबरी सुनौलनि ॥५०-६९॥
।आर्य्या दोहा।
।जाज तिरहुति।
पवन-तनय-मुखवाणी, शुनल भरत हित कान ॥७०॥
सकल-कला-कल्याणी, ब्रह्मानन्द-समान ॥७१॥
फरकै छल अछि दहिना, भुज ओ दहिना आँखि ॥७२॥
सत्य-वचन प्रभु तहिना, मरइत लेलनि राखि ॥७३॥
भावार्थः
भरतजी हनुमानजीक मुँह सँ ई हर्षक वार्ता सुनलनि । हुनका सुनिकय तेहेन आनन्द भेलनि जेहेन ब्रह्म केर साक्षात्कार सँ होइछ । ओ कहलखिन – “हमर दाहिना बाँहि आ आ दाहिना आँखि फड़ैक रहल छल । हमर प्रभु राम बड पैघ सत्यव्रती छथि । ओ मरय सँ हमरा बचा लेलनि ॥७०-७३॥
।मिथिला-सङ्गीतानुसारेण कोडार-छन्दः।
अयला भ्राता नरेश ॥७४॥
केकयी-कुमंत्रणा सौँ बनी मुनिवेश ॥७५॥
विष्णु की विरञ्चि अहाँ की स्वयं महेश ॥७६॥
मानव कि कारुणिक लयलहुँ सन्देश ॥७७॥
हर्षकथा बराबरि वित्त नै विशेष ॥७८॥
रघुनाथ-सभ्य अहाँ लोभक न लेश ॥७९॥
आउ मिलि पाउ सुख कहू कि निदेश ॥८०॥
धन्य धन्य आज हम छूटल कलेश ॥८१॥
भावार्थः
हमर भाइ राजा राम आबि गेलाह । ओ कैकेयी केर कुविचार सँ मुनिक वेष बनाकय वनवासी भ’ गेल छलाह । अपने के थिकहुँ ? अपने साक्षात् ब्रह्मा या विष्णु छी या महेश छी या अपने कोनो परम कारुणिक मानव छी जे ई सन्देश लय केँ अयलहुँ ? अपने जतेक पैघ हर्षक बात सुनेलहुँ अछि तेकर अनुरूप इनाम देबाक लेल हमरा लग धन-सम्पत्ति नहि अछि । अहाँ रामक मंडलीक छी, तेँ अहाँक नामो मात्रक लोभ नहि होयत । आउ, हमरा लग एहि खुशी मे शामिल भ’ जाउ । कहू, अहाँक लेल कि कयल जाय ? आइ हम धन्य-धन्य भेल छी । हमर सारा दुःख-दर्द दूर भ’ गेल ॥७४-८१॥
।दोहा।
ग्राम देब शय गोट हम, शय हजार देब गाय ॥८२॥
मुग्धा षोड़श कन्यका, मरयित लेल जिआय ॥८३॥
भावार्थः
हम अहाँ केँ एक सय गाम देब । एक सय हजार गाय देब; सोलह गोट नवयौवना कन्या देब । अपने हमरा मरय सँ बचा कय नव जीवन प्रदान कयलहुँ अछि ।” ॥८२-८३॥
।चौपाइ।
भरत एक मन करु जनु शोक । कुशलक्षेम अबइत छथि लोक ॥८४॥
जनिक हेतु चिन्ता विस्तारि । अयला से रण रावण मारि ॥८५॥
अपनैँक कुशल बुझक छल काज । आगु पठाओल श्रीरघुराज ॥८६॥
दारुण शोक करू परित्याग । जागल भरत इष्टजन-भाग ॥८७॥
देखब भाय मनोरथ पूत । किछु विलम्ब नहि एक मुहूर्त ॥८८॥
लक्ष्मण सङ्ग राम कृत-कार्य्य । आबि गेला अछि कुशल सभार्य्य ॥८९॥
हरपनार-सौँ गेला नहाय । रघुनन्दन सन अयला भाय ॥९०॥
खसि पड़ला महि हर्ष अपार । अति आनन्द कि तन सम्भार ॥९१॥
मारुत-सुत काँ हृदय लगाब । उजड़ल नगर बसाओल आब ॥९२॥
बहुत वर्ष शोचहिँ गेल बीति । वार्त्ता आइ प्राप्त भल रीति ॥९३॥
जौँ जिब रह तौँ सहज स्वभाब । शय वर्षहु पर आनन्द आब ॥९४॥
कहु वानर रघुवर सतसङ्ग । कोन गत बाढ़ल प्रीति अभङ्ग ॥९५॥
क्रम क्रम सकल चरित हनुमान । कहल मगन-मन शेष समान ॥९६॥
भरत कहल शत्रुघ्न बजाय । अयला अरि जिति बड़का भाय ॥९७॥
देवी देव जते छथि गाम । तनिक समर्च्चन हो तहिठाम ॥९८॥
वन्दी मागध प्रभृति जे लोक । आबथि शीघ्र रोक नहि टोक ॥९९॥
गणिकागण काँ शीघ्र बजाब । मङ्गलदायिनि गाइनि आब ॥१००॥
भावार्थः
हनुमानजी कहलखिन – “हे भरत, अहाँ मन मे कोनो शोक जुनि करू । अपनेक ओ लोक सब सकुशल आबि रहल छथि । जिनका लेल अपने एतेक भारी चिन्ता कय रहल छी से लड़ाइ मे रावण केँ मारिकय आबि गेल छथि । अहींक कुशल जनबाक लेल रामजी हमरा आगू पठौलनि अछि । आब एहि दारुण शोक केर त्याग करू । हे भरत, आब अहाँक अपन लोक सभक भाग्य जागि उठल अछि । अहाँक कामना पूरा होयत । अहाँ अपन भाइ राम केँ देखब । एहिमे आब कोनो देरी नहि अछि, एकहु घड़ीक देरी नहि अछि । अपन भाइ लक्ष्मण आ पत्नी सीताक संग राम सबटा कर्तव्य सब केँ पूरा कय सकुशल वापस आबि गेल छथि ।” राम जेहेन भाइ आबि गेलाह, ई जानिकय भरत आनन्दक नोर सँ नहा गेलाह । एतेक हर्ष भेलनि जे कूदिकय धरती पर खसि पड़लाह । आनन्द-विह्वल भ’ गेला सँ अपन शरीरहु केर होश नहि रहलनि । हनुमानजी केँ छाती सँ लगबैत कहलनि – “आइ अपने हमर उजड़ल नगर केँ फेर सँ बसा देलहुँ । शोकहि मे बहुतो वर्ष बीति गेल । आइ शुभ वार्ता प्राप्त भेल । यदि जियब त स्वाभाविक अछि जे सय सालक बादहु आनन्दक दिन अवश्य आओत । हे हनुमान, कहू रामजी केँ वानर सब सँ संगत कोन तरहें भेलनि आ अटूट प्रेम केना बढ़लनि ?” हनुमानजी क्रमशः सब वृत्तान्त अनुरागक संग सुनौलनि, जेना शेषनाग सुना रहल होइथ । भरत शत्रुघ्न केँ बजाकय कहलनि – “बड़का भैया राम शत्रु केँ जीतिकय आबि गेल छथि । गाम भरि मे जतेक देवी-देवता छथि, सभक पूजा अपन-अपन स्थान पर करायल जाय । बन्दी, मागध, चारण आदि जतेको लोक सब छथि, सब गोटे केँ आइ बेरोक-टोक आबय देल जाय । नाचयवाली गणिका लोकनि केँ तुरत बजायल जाय । मंगलगीत गाबयवाली ललना लोकनि सेहो आबथि ।” ॥८४-१००॥
।गीत तिरहुति।
भरत निकट मे एक जन, बड़ परसन ॥१०१॥
कहलनि शुभ सन्देश, आब प्रभु यहिखन ॥१०२॥
जनिक वियोग सकल जन, अति अनमन ॥१०३॥
देखब जनक-दुलारि, राम ओ लछमन ॥१०४॥
हर्ष-नोर दृग बहयित, ई कहयित ॥१०५॥
बीतल चौदह वर्ष, विषम दुख सहयित ॥१०६॥
गीत सुन्दरी गाबथि, हरि आबथि ॥१०७॥
रामचन्द्र घनश्याम, चातकी पाबथि ॥१०८॥
भावार्थः
एक आदमी बहुत प्रसन्नता सँ भरत लग आबिकय शुभ संवाद सुनौलनि जे राम एखन आबि रहल छथि । जिनकर बिछोह सँ सब लोक व्याकुल छल से राम, लक्ष्मण आ जानकी केँ आब देखत । घोर वेदना सहैत चौदह बरस बीति गेल – एतेक कहैत ओकर आँखि सँ नोर बहय लगलैक । ललना सब गीत गबैत छथि – भगवान राम आबि रहल छथि । आइ चातकी सब राम रूपी श्याम घन केर दर्शन पओती ॥१०१-१०८॥
।जयकरी छन्द।
हाथी घोड़ा रथ पथ लागु । रानिक चलय सबारी आगु ॥१०९॥
चलल सकल पुरजन अगुआय । देखब राम इ नयन जुड़ाय ॥११०॥
ब्राह्मण वृद्ध कहथि सभ लोक । आज छुटत मानस जत शोक ॥१११॥
मुक्तारत्नमयोज्वल गाम । तोरण विविध पताका धाम ॥११२॥
घर-बाहर छवि तेहन बनाब । वासव-मानस विस्मय आब ॥११३॥
वृन्द वृन्द चलली पुर-नारि । रम्भा रतिक गर्व्व देल टारि ॥११४॥
शय हजार घोड़ा रथ सङ्ग । एक अयुत तत मद मातङ्ग ॥११५॥
कनक-अलङ्कृत रथ पथ राज । स्वागत रामचन्द्र महराज ॥११६॥
शिविका चढ़लि चललि सभ माय । बाल तरुण कि रहय पछुआय ॥११७॥
रामक खरौँ भरत धय माँथ । हाथ जोड़ि कह भेटता नाथ ॥११८॥
पयरहि चलल सङ्ग लघु भाय । गगन निहारथि दृष्टि उठाय ॥११९॥
भावार्थः
हाथी, घोड़ा, रथ सड़क पर चलि पड़ल । रानी सभक सवारी सब आगू-आगू चलल । नगरक लोक सब बढ़ि-चढ़िकय चलि पड़ल जाहि सँ जल्दी सँ जल्दी राम केँ देखि नयन तृप्त हो । वृद्ध ब्राह्मण सब कहैत छथि – आइ हमरा लोकनिक मोनक सारा दुःख दूर भ’ जायत । पूरा गाम लटकायल गेल मोती आ रत्न सब सँ जगमगा उठल ।तरह-तरह के ध्वजा सब सँ वन्दनवार आ घर सब सजायल गेल । घर आ बाहर हरेक जगह एहेन सजावट कयल गेल जे देखिकय इन्द्र केर मन मे सेहो अचम्भा लगैत छन्हि । झुण्डक झुण्ड नगरक ललना सब चलि पड़लिह । ई सब अपन सुन्दरता सँ रम्भा आ रतिक गुमान पर्यन्त तोड़ि रहल छलिह । संग मे एक लाख घोड़ा आ रथ चलल । दश लाख मतवाला हाथी चलल । राजा रामचन्द्रक अगवानी कय केँ अनबाक लेल सोना सँ मढ़ल रथ सड़क पर चलल । डोली पर चढ़िकय सब माता लोकनि चललिह । बच्चा आ जवान कियैक पाछू रहितय ! रामक खड़ाउं माथा पर राखिकय भरतजी हाथ जोड़िकय कहैत छथि – “आइ प्रभु भेटताह ।” छोट भाइ शत्रुघ्न पैदले चलि पड़लाह । ओ बेर-बेर आनन्द सँ भरिकय आकाश दिश नजरि उठा-उठाकय निहारैत छथि ॥१०९-११९॥
।सोरठा।
आब कि अछि कहबाक, भुज उठाय हनुमान कह ॥१२०॥
सभ जन ऊपर ताक, रथ अबइछ जनु चन्द्ररवि ॥१२१॥
सीता लक्ष्मण राम, ओ सुग्रीव कपीश छथि ॥१२२॥
भक्त विभीषण नाम, मन्त्री मान्य अनेक जन ॥१२३॥
भावार्थः
बाँहि उठाकय हनुमानजी कहलनि – आब कि कहबाक अछि ! सब गोटे आकाश दिश देखय लगलाह – जेना चाँद या सूरज हो तेना आकाश-मार्ग सँ रथ आबि रहल छल । ओहि रथ पर राम, लक्ष्मण, सीता, कपिराज सुग्रीव आर भक्त विभीषण छथि; आरो अनेकों मान्य मंत्री छथि ॥१२०-१२३॥
।मिथिला सङ्गीतानुसारेण कामोद छन्दः।
मन बड़ हरष बरष दृग-वारि
सीता राम लक्ष्मण बदन निहारि ॥१२४॥
गेला वनवास ओ बरष दश चारि
अयला अबधि-दिन रावण केँ मारि ॥१२५॥
आनन्द-सुधावगाह सब नरनारि
मनोरथ-द्रुम कुसुमित सभ डारि ॥१२६॥
त्रिदश आनन्दमग्न नररूप धारि
मर्त्य देवलोकक टुटल जनु आरि ॥१२७॥
भावार्थः
सभक मोन मे बहुते हर्ष भरल छन्हि । सीता, राम आ लक्ष्मण केर मुँह देखिकय सभक आँखि सँ आनन्दक नोर बहि रहल छन्हि । ओ चौदह बरस वनवास चलि गेल छलाह । अवधि बितलाक बाद आइ रावण केँ मारिकय घुरलाह । पुरुष आ स्त्री सब गोटे आनन्दक अमृत-सिन्धु मे गुरकुनियाँ लगा रहल छथि । सभक मनोरथरूपी गाछक सब ठाढ़ि कुसुमित (फूल-फल सँ भरल) अछि । देवता लोकनि सेहो नररूप धय-धय केँ आनन्दमग्र भ’ हुनका सभक संग शामिल भेल छथि, मानू जेना मर्त्यलोक आ देवलोक केर बीचक आरि टूटि गेल हो ॥१२४-१२७॥
।जयकरी छन्द।
देखि कयल जन हर्षक सोर । अयला राम सुदिन भेल मोर ॥१२८॥
लक्ष्मण सीता रथपर राज । भल भल हित जन तनिक समाज ॥१२९॥
वृद्ध बाल वनितागण भाष । देखल राम पुरल अभिलाष ॥१३०॥
उतरि बाजि गज रथ असबार । रामचन्द्र दिश गगन निहार ॥१३१॥
भरत ऊर्द्ध्वमुख जोड़ल हाथ । सानुज सजन देखल रघुनाथ ॥१३२॥
स्यन्दनस्थ रघुनन्दन केहन । गिरि सुमेरु पर दिनकर जेहन ॥१३३॥
वन्दन करथि भरत अनुराग । बद्धाञ्जलि दृगपल नहि लाग ॥१३४॥
रथ लय चलु एहि महि निज ठाम । अयलहुँ गाम कहल प्रभु राम ॥१३५॥
भरत कयल वन्दन कय बेरि । पुष्पक महिपर रघुवर हेरि ॥१३६॥
भरत उठाय अङ्क आरोप । चिर-वियोग दुःखक भेल लोप ॥१३७॥
लक्ष्मण सौँ मिलि मिलि केँ भरत । कहथि धन्य प्रभु-सेवा-निरत ॥१३८॥
वैदेहीक उचारल नाम । चरण-सरोरुह करथि प्रणाम ॥१३९॥
भरतक भक्ति-दशा सभ देख । धर्म्म देहधारी मन लेख ॥१४०॥
हनूमान जन देथि चिन्हाय । सानुज भरत मिलथि तत जाय ॥१४१॥
कपिपति जाम्बवान युवराज । मैन्द द्विविद ओ ऋषभ समाज ॥१४२॥
मुदित विभीषण सौँ मिललाह । क्रम क्रम जे जन मुख्य छलाह ॥१४३॥
भावार्थः
देखिते देरी लोक सब हर्षित भ’ शोर मचबय लागल – “राम आबि गेलाह ! हमर भाग्योदय भ’ गेल ! लक्ष्मण आ सीता रथ पर विराजित छथि । हुनका संग मे हुनक भल-भल हितैषीजनक समाज सेहो अछि ।” बूढ़, बच्चा आ स्त्री सब गोटे कहय लागल – “रामजी केँ देखलहुँ । हमर मनोरथ पूर्ण भेल ।” सब गोटे घोड़ा, हाथी आ रथ सँ उतरि-उतरिकय आकाश मे अबैत रामजी दिश निहारय लगलाह । भरतजी हाथ जोड़ने मुँह उठाकय भाइ आ परिजन-सहित रामजी केँ देखलनि । रथ पर केना लगैत छथि जेना सुमेरु पर्वत पर सूर्य । भरत प्रेम सँ भरल वन्दना कय रहल छथि; दुनू हाथ जोड़ने छथि आर पलक नहि खसबैत छथि । तखन राम अपन रथ सँ कहलनि – “हे रथ, आब हमरा अपन स्थानक एहि धरती पर उतारू । हम अपन नगर आबि गेलहुँ ।” भरतजी पुष्पक रथ केँ धरती पर उतरल आ ताहि पर रामजी केँ आसीन देखिकय बेर-बेर रामजीक वन्दना कयलनि । रामजी भरतजी केँ कोरा मे उठा लेलनि । बहुते दिनक बिछोहक दुःख हेराइत रहल । भरतजी लक्ष्मणजी सँ बेर-बेर मिलन कयलनि आ हुनका कहलनि – “निरन्तर रामक सेवा मे लागल अहाँ धन्य छी !” फेर जानकीक नाम लय केँ हुनकर चरणकमल मे प्रणाम कयलनि । भक्तिवश भरतक जे दशा छल से देखिकय सब केँ एना लगलैक जेना शरीर धारण कय साक्षात् धर्म विराजमान होइथ । हनुमानजी रामक सेवक लोकनिक परिचय दैत छथि आ छोट भाइ शत्रुघ्न-सहित भरत केँ हुनका सब लग जा-जाकय हुनका सब सँ भेटैत छथि । मुख्यताक क्रम सँ भरत सुग्रीव, जाम्बवान, अंगद, मैन्द, द्विविद, ऋषभ आर विभीषण – हिनका सब गोटे बड़ा खुशी सँ भेटलाह ॥१२८-१४३॥
।रूपमाला छन्द।
नल गवाक्ष सुषेण आदिक गन्धमादन नाम ॥१४४॥
शरभ पनश मनुष्य-तन सभ बनल छल तहि ठाम ॥१४५॥
सकल जन सौँ भरत मिलला कुशल पुछलनि सर्व ॥१४६॥
सकल जन मिलि कर प्रशंसा भ्रातृ-भक्ति अखर्व्व ॥१४७॥
कहल मिलि सुग्रीव केँ पुन अहाँ मुख्य सहाय ॥१४८॥
राम रण दशवदन जीतल अहाँ पाँचम भाय ॥१४९॥
तखन पुन शत्रुघ्न रामक चरण कयल प्रणाम ॥१५०॥
लक्ष्मणक सीताक वन्दन कयल से तहिठाम ॥१५१॥
भावार्थः
नल, गवाक्ष, सुषेण, गन्धमादन, शरभ, पनश आदि सब ओतय मनुष्यक रूप धारण कय केँ पधारल छलथि । भरत रामजीक हरेक सेवक सँ भेटलाह आर सब सँ कुशल पुछलनि । सब मिलिकय एक स्वर सँ भरतक अपार भ्रातृभक्तिक सराहना करय लगलाह । फेर भरत सुग्रीव संग भेंट करैत कहलनि – “अपनहिं रामजीक मुख्य सहायक छलहुँ । अपनहिंक सहयोग सँ राम रावण केँ जितलनि । अपने हमरा सभक पाँचम भाइ भेलहुँ ।” फेर शत्रुघ्न रामजीक चरण मे प्रणाम कयलनि । फेर सीता केँ आर लक्ष्मणक चरण-वन्दन कयलनि ॥१४४-१५१॥
।चौपाइ।
शोक-विकल जननी काँ जानि । राम प्रणाम कयल सन्मानि ॥१५२॥
केकयि तथा सुमित्रा माय । लगला गोड़ सभहि काँ न्याय ॥१५३॥
तखनुक कहल कि जाइछ रीति । हरषेँ कनयित गबयित गीत ॥१५४॥
भरत खरौँ से रघुवर-चरण । पहिरायल सभ सङ्कट-हरण ॥१५५॥
आइ सुफल भेल जीवन मोर । अयश मेटायल सञ्चित घोर ॥१५६॥
सञ्चित द्रव्य सैन्य बल कोश । दश-गुण अछि प्रभु-चरण-भरोश ॥१५७॥
लेल जाय निज राज्यक भार । किङ्कर हम कि करब उपकार ॥१५८॥
शुनि कपिवर-लोचन बह वारि । अकपट भरतक विनय विचारि ॥१५९॥
उतरलाह रथपर सौँ राम । कहलनि अयलहुँ अपना गाम ॥१६०॥
पुष्पक-रथ अहँ धनपति-धाम । जाउ कुसल सौँ रहु तहिठाम ॥१६१॥
भावार्थः
रामजी माता कौशल्या केँ शोक सँ व्याकुल बुझि सम्मानपूर्वक हुनका प्रणाम कयलनि । फेर माता कैकेयी आ सुमित्रा केँ सेहो यथोचित रीति सँ प्रणाम कयलनि । ताहि समय जे दशा छल तेकर वर्ण कि कयल जाय । सब माता लोकनिक हर्ष सँ भरिकय कनैत छथि आ गीत गबैत छथि । भरतजी समस्त संकट केँ दूर करयवला रामजीक पैर मे खड़ाउं पहिरौलनि । फेर भरतजी कहलनि – “आइ हमर जीवन सफल भेल । हमर जे भारी बदनामी जमा भ’ गेल छल ओ आइ मेटायल । धन-धान्य, सेना आ खजाना सब अपनेक चरणक कृपा सँ आइ दश गुना बेसी भ’ गेल अछि । हे प्रभु, आब अपने अपन राज्यक भार सम्हारू । हम सेवक अपनेक कि उपकार कय सकब !” भरतजीक निश्छल विनय देखिकय सुग्रीवक आँखि सँ हर्षक नोर बहय लगलनि । तखन रामजी पुष्पक रथ सँ उतरलाह आ कहलाह – “हम घर पहुँचि गेलहुँ । हे पुष्पक रथ ! आब अहाँ कुशलपूर्वक कुबेर लग चलि जाउ आ ओतहि रहू ।” ॥१५२-१६१॥
।दोहा।
गुरु वसिष्ठ पद-कमल मे, रघुवर कयल प्रणाम ॥१६२॥
गुरु-आज्ञा आसन निकट, कयल राम विश्राम ॥१६३॥
भावार्थः
तदोपरान्त रामजी गुरु वसिष्ठजीक चरण मे प्रणाम कयलनि । गुरुक आज्ञा सँ हुनकर आसनक समीप बैसिकय किछु समय विश्राम कयलनि ॥१६२-१६३॥
।कवित्त।
रामचन्द्र-जननि पसारि आँखि देखु अहाँ, ॥१६४॥
जानकीसहित राम लछन किशोर केँ ॥१६५॥
भूमि नाचै सुन्दरी गगन किन्नरी ई नाचै, ॥१६६॥
बाट बाट भाट सुकवित्त पढ़ैँ शोर केँ ॥१६७॥
राग नाचै रागिनी भवानीपति नाचि कहै, ॥१६८॥
भल कैल मारल जे दशकण्ठ चोर केँ ॥१६९॥
जननी प्रणाम राम करथि जानकीयुत, ॥१७०॥
कौसल्या हरषि लेल मुख चुमि कोर केँ ॥१७१॥
भावार्थः
हे रामचन्द्रजीक माता, अपने आँखि पसारिकय देखू, ई छथि अपनेक जानकी सहित राम-लखन किशोर । धरती पर सुन्दरी सब नाचि रहल छथि, आकाश मे किन्नरि सब नाचि रहल छथि; बाट-बाट पर भाट सब खुब जोर-जोर सँ सुकवित पढ़ि रहल छथि । रागिनी सब राग भर गीत गाबि-गाबिकय नाचि रहल छथि । भवानीपति सेहो नाचि-नाचिकय कहि रहल छथि जे हे राम अहाँ खुब नीक कयलहुँ जे दशकण्ठ चोर (रावण) केँ मारि देलहुँ । जननी सब केँ रामजी जानकीजीक संगहि प्रणाम करैत छथि, कौशल्या हर्षित भ’ हुनक मुख केँ चुमिकय अपन कोरा (अंक) मे समेटि रहल छथि ॥१६४-१७१॥
।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे लङ्काकाण्डे चतुर्दशोऽध्यायः।
॥मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिलाभाषा रामायण मे लंकाकाण्डक चौदहम अध्याय समाप्त भेल॥
हरिः हरः!!

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Prabhu sabke Lanka san udhh m jeet hasil ko pumah MataSita k sange Laxma. Jee k sange wapas hoit apan ehi kram m kena ki bhel aa kato ki bhel o sabdekhabait ehi kram k sange Hanumanjee dwara Sambad aayodhya pahunchela san loko Prabhu sabke darshan pabi sab harsh san jhuim uthlah. Eh prasang paidh bhav bihbal bho gelao. कहलनि श्रीरघुनन्दन, शुनु हनुमान ॥४०॥
अयलहुँ से वार्त्ता पड़, भरतक कान ॥४१॥
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