स्वाध्याय
– प्रवीण नारायण चौधरी
कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण
लङ्काकाण्ड – तेरहम अध्याय
सब देवता लोकनिक राम केर स्तुति करब, अग्निदेव द्वारा वास्तविक सीताक लौटायब, राम केर सदल-बल अयोध्या लेल प्रस्थान
।चौपाइ।
ऐरावत पर चढ़ि सुरराज । समीचीन श्री-शची समाज ॥१॥
सहस्राक्ष अयला तहिठाम । सुरगण सहित गबैत गुणग्राम ॥२॥
यम ओ वरुण कुबेर समेत । अयला रघुनन्दन-रण-खेत ॥३॥
वृषभ चढ़ल अयला वृषकेतु । करब रघूत्तम-स्तुति तैँ हेतु ॥४॥
रजताचल सन झलकय देह । चण्डी सङ्ग अखण्ड सिनेह ॥५॥
त्रिनयन शोभित श्रीमुख पाँच । रघुपति-चरित सतत से बाँच ॥६॥
गङ्गा पिङ्ग-जटा भल रङ्ग । भूतप्रेत-गण बहुविध सङ्ग ॥७॥
ब्रह्मा अयला हंस -सवार । सङ्ग शारदा सदगुणदार ॥८॥
वीणा पुस्तक अक्ष सुमाल । अयली जतय राम महिपाल ॥९॥
मुनि ऋषि पितर सिद्ध गन्धर्व्व । उरगादिक मिलि अयला सर्व्व ॥१०॥
बद्धाञ्जलि अभिनत सतभाष । प्रभु पूरल जन-मन-अभिलाष ॥११॥
सकल-लोक-कर्त्ता भगवान । साक्षी सकल देह विज्ञान ॥१२॥
रावण सभक हरल धन धाम । तकरा अपने मारल राम ॥१३॥
भेलहुँ अकण्टक सुख सौँ रहब । निज निज सदन सुयश-चय कहब ॥१४॥
ब्रह्मास्तुति कयलनि अगुआय । आज कयल प्रभु समुचित न्याय ॥१५॥
भावार्थः
देवता लोकनिक राजा हजार आँखिवला इन्द्र सची सहित आर देवता सभक संग रामक गुण गबैत ऐरावत पर चढ़िकय ओतय अयलाह । यम, वरुण आ कुबेर सेहो ओतय अयलाह जेतय राम-रावण युद्ध भेल छल । बसहा (बरद) पर चढ़िकय भगवान् शिव सेहो रामक स्तुति करबाक उद्देश्य सँ ओतय अयलाह । हुनकर शरीर चाँदीक पर्वत समान चमकैत रहनि । चण्डी सेहो संग छलिह जिनका संग हुनक अटूट प्रेम छन्हि । हुनक पाँचो श्रीमुख तीन-तीन आँखि सँ शोभायमान छल, आर ओ मुख सदिखन रामक चरितक कीर्तन करैत छल । उज्जर गंगा आ हल्का पियर जटा – दुनूक रंग खुबे खुलैत छल । तरह-तरह केर भूत आ प्रेत सभक दल हुनका संग छल । ब्रह्मा हंस पर सवार भ’ कय अयलाह । संगहि हुनकर गुणवती स्त्री शारदा सेहो वीणा, पुस्तक आ स्फटिक माला लेने ओतय अयलिह जेतर राजा राम रहथि । ऋषि, मुनि, पितर, सिद्ध, गन्धर्व, नाग आदि सब मिलिकय अयलाह । सब हाथ जोड़नेे माथ झुकेने बजलाह – “हे प्रभु, अपने अपन भक्तक मोनक कामना पूरा कयलहुँ । हे भगवान्! अपने तीनू लोक केर सृष्टि करयवला थिकहुँ, सब कर्मक साक्षी थिकहुँ, आर सब शरीर मे विज्ञानक रूप मे विद्यमान छी । रावण सभक धन-सम्पत्ति आर घर-बार सबटा हरण कय लेने छल । अपने ओकर संहार कयलहुँ । हम सब अकण्टक भ’ गेलहुँ । आब सुख (आराम) सँ रहब । अपन-अपन घर मे अपनेक सुयश केर बखान करैत रहब ।” फेर आगू भ’ कय ब्रह्माजी स्तुति कयलनि – “हे प्रभु, अपने रावण प्रति उचित न्याय कयलहुँ ॥१-१५॥
।अनुष्टुप् छन्दः।
।देश।
स्तुवे कादम्बिनी-श्यामं धनुष्मन्तम्मुदा रामम् ॥१६॥
युगान्ते सर्व्वलोकानामशोकानां हि विश्रामम् ॥१७॥
खले मन्दोदरीकान्ते महच्चित्रं रणे शान्ते ॥१८॥
हृताशेषावनोभारं रमादारं महोदारम् ॥१९॥
मुनीनां दुःखशान्त्यर्थं मुदा सम्प्राप्तकान्तारम् ॥२०॥
सुमित्रानन्दनं वन्दे रणे शक्रारिहन्तारम् ॥२१॥
भावार्थः
हम मेघ समान साँवला धनुषधारी रामक सानन्द स्तुति करैत छी जिनका मे युगक अन्त मे सब लोक शोक-रहित भ’ लीन भ’ जाइत अछि । जे मंदोदरीक पति दुष्ट रावण केँ आश्चर्यपूर्वक युद्ध मे मारिकय धरतीक भार दूर कयलनि ताहि परम उदार लक्ष्मीपति भगवानक हम स्तुति करैत छी । जे मुनि लोकनिक कष्ट केँ दूर करबाक लेल आनन्ददाता बनि गेलाह, आर जे युद्ध मे इन्द्रजित मेघनाद केँ मारलनि ताहि सुमित्रानन्दन लक्ष्मणजीक हम स्तुति करैत छी ॥१६-२१॥
।सबैया छन्द।
वाक अगोचर चित्त अगोचर, के कह केहन कान्ति कहाँ छी ॥२२॥
सूक्ष्मसौँ सूक्ष्म विशाल विशालसौँ, ईश्वर छी विभु छी जे जहाँ छी ॥२३॥
सृष्टिक हेतु अनादि अनामय, ध्यान सौँ ध्येय-स्वरूप तहाँ छी ॥२४॥
विष्णु अहाँ छी विरञ्चि अहाँ छी, महेश अहाँ छी कहाँ नै अहाँ छी ॥२५॥
ज्ञान समाधि समग्र महातप, ध्येय सरूप जहाँ छी तहाँ छी ॥२६॥
नाम विरञ्चि कहै छथि लोक से, गोचर ब्रह्म न देव कहाँ छी ॥२७॥
व्योम समीर तथानल ओ जल, देखल जाइछ सर्व्व-सहाँ छी ॥२८॥
श्रीरघुनन्दन दुष्ट-निकन्दन, सद्गुण ब्रह्म अनन्त अहाँ छी ॥२९॥
भावार्थः
अपने वाणी सँ अगोचर (बहुत उपर) छी, चित्त सँ अगोचर छी – फेर अहाँक कान्ति (रूप) केर वर्णन के कय सकैत अछि । अपने सूक्ष्म (अणु) सँ सूक्ष्म छी तथा महानो सँ महान (विशालहु सँ विशाल) छी, अपने ईश्वर छी तथा विभु यानि सर्वव्यापी प्रभु छी, जे छी, अहीं छी । अपने सृष्टिक कारण यानि कर्त्ता छी । अपने आदिहीन छी, विकार सब सँ रहित छी । अपनेक स्वरूप केवल योग द्वारा ध्यान मात्र मे देखाय पड़ि सकैछ । अपने विष्णु छी, अपने ब्रह्मा छी आ अपने महेशो छी । अपने कतय नहि छी ! जहाँ-तहाँ अपने ज्ञान, समाधि या उग्र तपस्या द्वारा ध्यान मे अयबा योग्य छी; अपनेक ताहि स्वरूप केँ लोक ‘ब्रह्म’ कहैत छथि । मुदा सभक आँखि मे देखाय देनिहार अपने कतय नहि छी ! अपने तँ आकाश, वायु, अग्नि, जल आ पृथ्वीक रूप मे सर्वत्र देखल जाइत छी । हे दुष्ट सब केँ संहार करनिहार रघुनन्दन राम, अपने अनन्त ब्रह्म रहितो सगुण छी ।” ॥२२-२९॥
।चौपाइ।
पावक प्रकट भेल तहिकाल । दिव्यरूप अति-दीप्ति विशाल ॥३०॥
वैदेही आरोपित अङ्क । क्षीरोदधि जनु रमा निशङ्क ॥३१॥
अरुण बसन विमलारुण कान्ति । दिव्य विभूषण सुन्दरि शान्ति ॥३२॥
सकलदेव जय-जय धुनि करथि । गगन अवनि स्वेच्छा सञ्चरथि ॥३३॥
पावक कहल राम भगवान । करयति यशोराशि-गुणगान ॥३४॥
सीता काँ सोपल वन राम । लेल जाय प्रभु से एहि ठाम ॥३५॥
प्रमुदित राम कमल-कर धयल । वाम अङ्ग मे स्थापित कयल ॥३६॥
से शोभा देखथि अमरेश । कह जय-जय सीता-प्राणेश ॥३७॥
सहस्राक्ष फल पाओल आज । सीतासहित देखल रघुराज ॥३८॥
हम अमरेश्वर छल ई गर्व्व । से अभिमान रहित भेल सर्व्व ॥३९॥
श्रीप्रभु-चरणक हम लघु दास । रावणादि-कृत छूटल त्रास ॥४०॥
रामचन्द्र नूतन-घन-रङ्ग । जनक-सुता-सौदामिनि सङ्ग ॥४१॥
जहिलय योग ज्ञान तप करथि । गुहावास घन वन सञ्चरथि ॥४२॥
जहिलय शङ्कर करथि समाधि । तनिकाँ देखल छूटल आधि ॥४३॥
केओ कह कर्म्म काल केओ प्रकृति । केओ कह पुरुष सिद्धमुनि प्रभृति ॥४४॥
कहयित शुनयित अन्त न पाव । केओ कह सृष्टिक सहज स्वभाव ॥४५॥
कर्त्ता कर्म्मादिक जत भाष । देखि प्रभु-चरण पुरल अभिलाष ॥४६॥
रहल न एको मन वैषम्य । सभहिक अपने केवल गम्य ॥४७॥
भावार्थः
ताहि समय अग्निदेव दिव्य रूप मे प्रकट भेलाह । हुनक शरीर मे अद्भुत चमक छलन्हि । हुनकर कोरा मे सीताजी निःशंक विराजमान छलिह जेना समुद्रक कोरा मे लक्ष्मीजी । सीता लाल वस्त्र पहिरने छलिह । हुनकर शरीरक रंग निर्मल लाल छलन्हि । ओ अलौकिक आभूषण पहिरने छलिह, सुन्दर आ शान्ति लागि रहल छलिह । सब देवता लोकनि जय-जयकार कय रहल छलथि आर रावणक मृत्यु सँ निर्भय भ’ स्वच्छन्दतापूर्वक धरती आ आकाश मे विचरण कय रहल छलथि । अग्निदेव रामजीक यश आ गुण सभक गान करैत कहलनि – “हे राम, वन मे अपने जे सीता केँ हमरा जिम्मा सौंपने रही से हुनका आइ एतहि वापस लेल जाउ ।” राम प्रसन्न भ’ सीताक हाथ धय लेलनि आ अपन बायाँ अंग मे हुनका राखि लेलनि । इन्द्र ई शोभा देखलनि आ कहलनि – “जय हो, सीतापति रामचन्द्रजी की जय हो ! हजार आँखि भेटबाक फल आइ पेलहुँ । सीता-सहित रामक दर्शन पेलहुँ । हमरा घमंड रहय जे हम देवता सभक राजा छी मुदा ओ सबटा घमंड आइ समाप्त भ’ गेल । हम अहाँक चरणक तुच्छ दास छी । रावण आदि राक्षस सब सँ होयबला आतंक आइ दूर भेल । रामक शरीरक रंग नव मेघ-समान छन्हि आ बिजली जेकाँ चमकैत कान्तिवाली सीता संग मे छथिन । जिनका लेल ऋषि-मुनि सब योग, ज्ञान आ तप करैत छथि, निर्जन खोह आ घना जंगल सब मे रहैत छथि, जिनका लेल भगवान् शिव समाधि लगबैत छथि, हुनका हम आइ अपन आँखि सँ देखलहुँ । सबटा चिन्ता दूर भ’ गेल । कियो अहाँ केँ कर्म कहैत अछि, कियो काल कहैत अछि, कियो प्रकृति कहैत अछि आ कियो पुरुष कहैत अछि । ऋद्धि, सिद्धि, ऋषि-मुनि सब अपनेक बखान करैत आ सुनैत अन्त नहि पबैत छथि । कियो कहैत अछि जे अपने विश्वक स्वाभाविक गुण थिकहुँ । कर्ता, कर्म आदि अनेकों रूप सब मे जे परिभाषित छथि, से प्रभुक चरण केर दर्शनक अभिलाषा आइ पूर्ण भेल । मोन मे कोनो दुविधा नहि रहि गेल । अपने समस्त साधक लोकनिक एकमात्र लक्ष्य थिकहुँ ॥३०-४७॥
।दण्डक छन्दः।
जय सदोद्यत-धराधारे, हृत-धरित्री-विपुल-भारे ॥४८॥
जगन्मातर्गुणागारे, महोदारे हे ॥४९॥
जनक-महि-महनीय-कन्ये, शिव-विरञ्चि-प्रभृति-मान्ये ॥५०॥
रमा-गौरी-जन-वदान्ये, यशोहारे हे ॥५१॥
सदानाहत-जलज-वासे, पाप-तूल-महा हुताशे ॥५२॥
पूरिताखिल-सुर-जनाशे, निराकारे हे ॥५३॥
राम-घन-चपले सुकामिनि, जय चराचर-वर-स्वामिनि ॥५४॥
रूप जित-कन्दर्प्प-मानिनि, शक्तिसारे हे ॥५५॥
भावार्थः
हे सीता, अपनेक जय हो । अपने पृथ्वी केँ धारण करय मे सदा उद्यत रहैत छी । अपने पृथ्वीक विशाल भार केँ हरैत छी । अपने संसारक माता अर्थात् मूल प्रकृति छी । अपने गुण सभक खजाना छी आ परम उदार छी । जनकक भूमि मिथिलाक पूज्य कन्या छी । शिव, ब्रह्मा आदि अहाँक पूजा करैत छथि । लक्ष्मी, गौरी आदि देवी सब अपनेक स्तुति करैत छथि । अपने यशोमालिका सँ विभूषित छी । अपने सदैव अनाहत कमल मे निवास करैत छी । अपने पापरूपी रुइयाक लेल दारुण आगि छी । अपने सब देवता लोकनिक आशा पूरा कयलहुँ । अपने निराकार शक्तिस्वरूपा छी । अपने रामरूपी मेघ मे बिजली जेकाँ शोभैत छी । अपने आदर्श नारी छी । अपने संसारक चल आ अचल सब वस्तुक स्वामिनी छी । अपने अपन रूप सँ कामदेवक स्त्री रति केँ जितने छी । अपने शक्तियहु केर शक्ति छी ॥४८-५५॥
।चौपाइ।
राम कहल शुनु शुनु सुरराज । एकगोट अपनैँ सौँ काज ॥५६॥
वानर रण मे मुइल बहूत । से सजीव करु प्रिय पुरहूत ॥५७॥
से शुनि तेहन कयल अमरेश । अमृत-वृष्टि सौँ राम-निदेश ॥५८॥
प्राप्त-जीव से लाखहि लाख । जय रघुनन्दन आनन्द भाष ॥५९॥
भावार्थः
राम कहलनि – “हे इन्द्र, सुनल जाउ । अहाँ सँ हमरा एक गोट काज अचि । लड़ाइ मे बहुते-रास कपि मरि गेल अछि । हे हमर प्रिय इन्द्र, अहाँ कृपा कय केँ ओकरा सब केँ जिया देल जाउ ।” ई सुनिकय देवराज इन्द्र ओहिना कयलनि । रामक अनुरोध सँ ओ अमृतक वर्ष कयलनि । लाखक-लाख बन्दर जी उठल आर आनन्दक संग रामक जय-जयकार करय लागल ॥५६-५९॥
।सोरठा।
शुनु करुणानिधि राम, हाथ जोड़ि शङ्कर कहल ॥६०॥
हम आयब ओहिठाम, अति उत्सव अभिषेक मे ॥६१॥
भावार्थः
शिवजी हाथ जोड़िकय कहलनि – “हे करुणानिधि राम! हम अपनेक राज्याभिषेक केर महान उत्सवक समय ओहिठाम आयब ॥६०-६१॥
।जयकरी छन्द।
दशरथ नृप देखयित छथि ठाढ़ । अहँ मे प्रेम जनिक अछि गाढ़ ॥६२॥
दशरथ काँ लगला प्रभु गोड़ । लक्ष्मण सीता हर्ष न थोड़ ॥६३॥
दशरथ कहलनि पूरल आश । संशय आधि सर्व्व भेल नाश ॥६४॥
दशरथ गेला पाबि सन्मान । राग द्वेष गत पाओल ज्ञान ॥६५॥
तखन विभीषण जोड़ल हाथ । एक विज्ञप्ति हमर रघुनाथ ॥६६॥
घर थिक अपन चलल प्रभु जाय । दिनेक रहब शक के अटकाय ॥६७॥
स्नान अलङ्कृत मङ्गल वेष । सभ काँ मन प्रभु-छवि काँ देख ॥६८॥
घर भेल अपन अहँक सन भक्त । रघुवर कहलनि समय सशक्त ॥६९॥
अति सुकुमार भरत की हयत । अवधि एको दिन जौँ बिति जायत ॥७०॥
वल्कल वसन जटा धर माथ । हमरा बिनु शत्रुघ्न अनाथ ॥७१॥
तकइत हयता हमरे बाट । अनतय न बनब छन सम्राट ॥७२॥
करब स्नान की तनि बिनु आज । जायब सत्वर तनिक समाज ॥७३॥
सुग्रीवादिक हो सत्कार । हम मानब अपने उपकार ॥७४॥
शुनल विभीषण रघुवर-उक्ति । अति प्रसन्न मन मानल युक्ति ॥७५॥
कनकाम्बर वररत्न बजार । निज निज रुचि पाहुन व्यवहार ॥७६॥
यूथप-गणक कयल सत्कार । मुदित विभीषण परमोदार ॥७७॥
मणि लय वानर सादर चाट । स्वाद न पाव पटक झट बाट ॥७८॥
कनकाम्बर नख दसनैँ चीर । हसथि विनोद देखि रघुवीर ॥७९॥
पुष्पकरथ रवि-तेज विराज । लयल विभीषण रामक काज ॥८०॥
तेहि रथ चढ़ला राम नरेश । अछि गन्तव्य शीघ्र निज देश ॥८१॥
सीता लक्ष्मण रथ चढ़लाह । मन उदास कपिगण पड़लाह ॥८२॥
सभ काँ राम वचन कहि बेश । भालु कीश काँ देल निदेश ॥८३॥
वानर भालु यथारुचि जाथु । स्वेच्छा वन उत्तम फल खाथु ॥८४॥
कपि-पति अङ्गद नवलङ्केश । सभ काँ कहलनि चलइत देश ॥८५॥
मित्र-काज अपने सभ कयल । ऋण उपकार सर्व्वदा धयल ॥८६॥
आज्ञा दी तौँ चली सबेर । भेट घाट होयत कय बेर ॥८७॥
किष्किन्धा लय सैन्य अपार । कपिपति जाउ सिद्ध उपकार ॥८८॥
भक्त विभीषण करु गय राज । लङ्कापुर मे सहित समाज ॥८९॥
बड़ अगुताइ कथा अछि ढेर । चलब अयोध्या होइछ अबेर ॥९०॥
शुनि शुनि सभजन जोड़ल हाथ । मानल जाय देव रघुनाथ ॥९१॥
देखितहुँ रामचन्द्र-अभिषेक । रहल लालसा मन मे एक ॥९२॥
कौशल्या काँ करब प्रणाम । घुरि घुरि सभ जन अयबे गाम ॥९३॥
प्रभु कह कथा देब नहि काटि । केओ न हमर भरत सौँ घाटि ॥९४॥
चलु चलु पुष्पक होउ सबार । अतिशय कठिन प्रेम व्यवहार ॥९५॥
लङ्केश्वर कपिवर हनुमान । वानर रथ पर चढ़ल प्रधान ॥९६॥
राजराज-रत अतिशय राज । चढ़ल सकल दल हलचल काज ॥९७॥
आज्ञा देलनि विश्व-निवास । हंसयुक्त रथ उड़ल अकास ॥९८॥
रघुनन्दन वर छवि काँ पाब । शोभा जेहन विरञ्चिक आब ॥९९॥
दिनकर-बिम्ब सुधवि काँ धयल । धनपति-रथ नभ-पथ गति कयल ॥१००॥
भावार्थः
राजा दशरथ अपने केँ देखैत एहिठाम ठाढ़ छथि, जिनका अहाँ सँ बहुत गाढ़ सिनेह छन्हि ।” रामजी दशरथजी केँ प्रणाम कयलनि । लक्ष्मण आ सीता केँ हुनकर दर्शन पाबि अपार हर्ष भेलनि । दशरथ कहलनि – “हमर मनोरथ पूरा भेल । मन मे जे संशय आ चिन्ता छल से सबटा दूर भ’ गेल ।” राजा दशरथ सत्कार ग्रहण कय ओतय सँ प्रस्थान कय गेलाह । तखन विभीषण हाथ जोड़िकय कहलनि – “हे राम! एकटा विनती हमर सुनल जाउ । हे प्रभु, चलू, अहाँक अपन घर छी । एक-दुइ दिन रहब । अपने केँ के अटका सकैत अछि । हमरा ओतय सब गोटेक इच्छा छैक जे स्नान कय केँ वस्त्राभूषण लगौने अहाँ मंगलमय छविक दर्शन पाबय ।” रामजी कहलनि – अहाँक घर हमर अपन घर भेल । अहाँ जेहेन भक्तक आग्रह अछि । मुदा, एहेन समय मे ई सम्भव नहि होयत । भरत बड सुकुमार हृदयक छथि; एकहु दिन जँ अवधि सँ अधिक भ’ जायत त भरतक कि हाल भ’ जेतनि ? वल्कल पहिरने आ जटा धारण कएने शत्रुघ्न हमरा बिना अशरण भ’ गेल अछि । ओ हमर बाट तकैत होयत । हम आर कतहु सम्राट नहि बनब । हुनका सब बिना हम आइ स्नान नहि करब । जल्द सँ जल्द हुनका सब लग पहुँचब । अहाँ सुग्रीव आदिक आतिथ्य करी । हम बुझब जे अहाँ हमरहि सम्मान कयलहुँ अछि ।” ॥६२-७४॥
विभीषण रामजीक ई बात सुनिकय बहुत खुशी भेलाह । रामजीक तर्क केँ ओ हृदय सँ मानि गेलाह । परम उदार विभीषण अतिथिक उपयोगक लेल हुनका लोकनि केँ अपन-अपन पसिन अनुसार बाजार सँ जरीदार वस्त्र आ नीक-नीक रत्न लय अनलनि आ आनन्दपूर्वक दलपति लोकनिक स्वागत-सत्कार कयलनि । रत्न सब लयकय बन्दर आदरक संग चाटैत अछि, कोनो स्वाद नहि भेटैत छैक त फेर माटि पर फेंकि दैत अछि । जरीदार वस्त्र केँ दाँत आ नह (नख) सँ चीर-फाड़ि दैछ । राम ई सब देखि-देखिकय आनन्द प्राप्त करैत मुस्कुराइत छथि । विभीषण रामक वास्ते एकटा पुष्पक रथ लय अनलनि जे सूरज समान चमकि रहल छल । राजा राम ताहि रथ पर सवार भेलाह । ओ जल्द अपन देश अयोध्यापुरी जाय चाहैत छथि । सीता आ लक्ष्मण सेहो रथ पर चढ़ि गेल । कपि सभक मन उदास भ’ गेलैक । सब केँ राम उचित विदाइ-सन्देश कहलनि आ भालू तथा बन्दर सब केँ निर्देश देलनि – “कपि आ भालू सब आब इच्छानुसार जा सकैत छथि आर स्वच्छन्दतापुर्वक वनक उत्तम-उत्तम फल तोड़िकय खा सकैत छथि ।” राम अयोध्या जाइत समय सुग्रीव, अंगद आ विभीषण सँ कहलनि – “अहाँ लोकनि अपन मित्रक काज केँ सम्हारलहुँ । एहि उपकारक ऋण हम सदैव वहन करब । आब अहाँ लोकनिक आज्ञा हो त हम शीघ्र विदा होइ । फेर कतेको बेर भेंट होयत । हे सुग्रीव, अहाँ विशाल सेना लय केँ किष्किन्धा जाउ । अहाँ जे उपकार कयलहुँ से सफल भेल । हे भक्त विभीषण, अहाँ सपरिजन जाकय लंका-नगरी मे राज करू । हमरा बहुते हड़बड़ी अछि, बात त बहुत रास अछि । अयोध्या जेबाक अछि । देरी भ’ रहल अछि ।” सुनिकय सब गोटे हाथ जोड़िकय कहलनि – “हे देव राम, हमरा सभक एक गोट बात मानि लेल जाउ । हमरा सभक मोन मे एक गोट लालसा रहि गेल अछि जे अहाँक राज्याभिषेक देखितहुँ । माता कौशल्या केँ प्रणाम करितहुँ आर फेर अपन-अपन घर अबितहुँ ।” ॥७५-९३॥
राम कहलनि – “अहाँ सभक ई अनुरोध केँ हम टारि नहि सकैत छी । सब गोटे पुष्पक रथ पर सवार भ’ जाउ । प्रेमक बरताव बड कठिन होइत अछि ।” कुबेरक पुष्पक रथ अतिशय शोभा पाबि रहल छल । हलचलक संग सारा दल ओहि रथ पर चढ़ि गेल । राम आज्ञा देलनि आर ओ हंसवाही रथ आकाश-मार्ग सँ उड़ि चलल । ओहिपर रामजीक शोभा ओहने छल जेना ऐरावत पर इन्द्र केर । जखन कुबेरक रथ आकाश-मार्ग मे चलल तखन ओकर शोभा सूरज-जेकाँ भ’ गेलैक ॥९४-१००॥
।सोरठा।
जय जय श्याम-शरीर, जय जय पङ्कज-नयन प्रभु ॥१०१॥
जय सानुज रघुवीर, जय सीतापति अमर कह ॥१०२॥
भावार्थः
देवता लोकनि कहय लगलाह – “जय हो, श्यामल शरीर केर जय हो, कमलनयन राम केर जय हो, लक्ष्मण-सहित राम केर जय हो, सीतापति राम केर जय हो ।” ॥१०१-१०२॥
।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे लङ्काकाण्डे त्रयोदशोऽध्यायः।
॥मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे लंकाकाण्डक तेरहम अध्याय समाप्त भेल॥
हरिः हरः!!

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