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मिथिलाभाषा रामायण – लङ्काकाण्ड – बारहम अध्याय: विजयोपरान्त राम द्वारा विभीषण आदिक प्रति कृतज्ञता-ज्ञापन

730 भ्यूज

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण
लङ्काकाण्ड – बारहम अध्याय

विजयोपरान्त राम द्वारा विभीषण आदिक प्रति कृतज्ञता-ज्ञापन

देखि विभीषण ओ हनुमान । अङ्गद लक्ष्मण कीश प्रधान ॥१॥
जाम्बवान आदिक रणधीर । सभ काँ तुष्ट कहल रघुवीर ॥२॥
अहँ सभहिक बाहुक बल पाबि । मारल रावण लङ्का आबि ॥३॥
यावत रवि शशि नभ रहताह । यशोगान मुनिजन करताह ॥४॥
ई चरितक जे कीर्त्तन करत । भव-वारिधि बिनु श्रम से तरत ॥५॥
रावण मृतक पड़ल रण-भूमि । गृद्ध काक विघसित घुमि घुमि ॥६॥
दुस्सह मन्दोदरिक विषाद । मुरछि मुरछि कर कुररी-नाद ॥७॥
पति-गुण कहि कहि करथि विलाप । पाप-प्रताप असह सन्ताप ॥८॥
भेलहुँ अभागिनि पहु बिनु आज । धिक् विधवा-जीवन की काज ॥९॥
तुम्बुरु प्रभृतिक शुन जे गान । काक नोच से प्रियतम-कान ॥१०॥
यम जे लोचन-ओतहि जाथि । हा से गृद्ध नोचि कय खाथि ॥११॥
शिव काँ माँथ चढ़ाबथि काटि । सञ्जीवन-साधन भेल माटि ॥१२॥
अहह नाथ नित नित अन्याय । एकदिन माँथा अवश विशाय ॥१३॥
परमेश्वर सौँ भारी द्वेष । दण्डक गेलहुँ दण्डी-वेष ॥१४॥
सीता हरि आनल जेहि काल । तेहिखन मानल नहि दशभाल ॥१५॥
शोक विभीषण-हृदय समाय । शीतज्वर जनु देल दलकाय ॥१६॥
कुल-प्रधान हा बड़का भाय । काल-प्रपञ्च वृथा नहि जाय ॥१७॥
अपनैक कि कहब गुण ओ दोष । के कर वारण कालक रोष ॥१८॥
विधवा-वनिता-वृन्द-विलाप । शुनि पर-मन सञ्चर सन्ताप ॥१९॥

भावार्थः

युद्धक बाद राम विभीषण, हनुमान, अंगद, लक्ष्मण, सुग्रीव, जाम्बवान आदि समस्त योद्धा लोकनिक खोज-खबर लेलनि आ प्रसन्न भ’ सब सँ कहलनि – “अहाँ सभक बाहुबलक चलते हम लंका आबिकय रावण केँ मारलहुँ । जाबत धरि आकास मे सूरच आ चाँद रहत, ताबत धरि मुनि लोकनि अहाँ सभक गुण गबैत रहताह । हमर एहि चरित केँ जे कीर्तन करब से बिना श्रम केँ भव-पार करत ।” रावणक लाश लड़ाइक मैदान मे पड़ल अछि । गिध आ कौआ ओकरा नोचि-नोचिकय खा रहल अछि । मन्दोदरी केँ असह्य शोक भ’ रहल छन्हि । ओ बेर-बेर बेहोश होइत छथि आ कुररी जेकाँ सिसि-सिसकिकय कनैत छथि । पतिक गुणक बखान कय-कय केँ बिलखैत छथि । पापक परिणामस्वरूप ओ असह्य सन्ताप सँ जरि रहल छथि – आइ हम पतिक बिना अभागिन भ’ गेलहुँ । धिक्कार अछि विधवाक जीवन केँ । एहि सँ आब कोन काज ? हाय, जे कान तुम्बुरु आदि महान संगीताचार्य लोकनिक गान सुनैत छल, हमर प्रियतमक वैह कान केँ आइ कौआ नोचि रहल अछि । जाहि आँखिक सोझाँ मे यम तक नहि आबथि, तेकरा गिध नोचि-नोचिकय खा रहल अछि । जाहि संजीवन-सिद्धिक सहारे ओ अपन सिर काटिकय चढ़बैत रहथि, से संजीवन-सिद्धि आइ माटि भ’ गेल । हा नाथ, यदि रोजक रोज अन्याय-अत्याचार करैत अछि त एक न एक दिन ओकर कुफल भोगहे टा पड़ैत छैक । अहाँ परमेश्वर सँ बहुत द्वेष कयलहुँ । संन्यासीक छद्मवेष बनाकय दंडकवन गेलहुँ । जहिये अहाँ सीता केँ हैर अनलहुँ, तहिये हम जानि गेलहुँ जे आब अहाँ दसो सिर टिकयवला नहि अछि ।” विभीषणक हृदय मे शोक भेलनि । हुनकहु हृदय तेना दलकय लगलनि मानू जेना जड़ैया बुखार भ’ गेल होइन्ह । ओ विलाप करय लगलाह – “हा हमर जेठ भाइ, अहाँ हमर कुल केर श्रेष्ठ पुरुष छलहुँ । काल केर चाल बेकार नहि जाइछ । अहाँ गुण या दोष हम कि कहू ? कालवश सब कियो सब किछु करैत अछि, काल केर प्रकोप केँ के रोकि सकैत अछि !” विधवा सब जे करुणक्रन्दन कय रहल छथि से सुनिकय दुश्मनहु केर मोन मे सन्ता भरि जाइत छैक ॥१-१९॥

।दोहा।

शुनु लक्ष्मण रघुनाथ कह, सत्वर अहँ तहँ जाय ॥२०॥
विकल विभीषण शोक सौँ, सद्यः करू उपाय ॥२१॥
लाउ विभीषण काँ एतय, तत्त्वज्ञान शुनाउ ॥२२॥
की राजा मन विकल अहँ, वनिता-वृन्द बुझाउ ॥२३॥

भावार्थः

रखन राम कहलनि – “हे लक्ष्मण, अहाँ तुरन्त ओतय जाउ । विभीषण शोक सँ व्याकुल छथि । हुनका सान्त्वना देबाक उपाय करू । विभीषण केँ एतय आनि लिअनु । हुनक प्रबोधन करू । (हुनका बौंसू ।) राजा भ’ कय अहाँ विह्वल कियैक होइत छी ? अहाँ महिला सब केँ समझाउ-बुझाउ ॥२०-२३॥

।चौपाइ।

लक्ष्मण कहल सुखद उपदेश । कनलैँ की भेटता लङ्केश ॥२४॥
देहादिक सौँ आत्मा आन । विश्व अनित्य मानि करु ज्ञान ॥२५॥
देखू रावण-देह समीप । भवन अँधार मिझायल दीप ॥२६॥
सगुण ब्रह्म रामहि काँ जानि । सेवा करू कतहु नहि हानि ॥२७॥
प्रभु कहइत छथि से शुनु कान । भ्राता रावण छथि नहि आन ॥२८॥
दाहादिक परलौकिक काज । करु गय सभटा अपनहि आज ॥२९॥
कनइत वनिता-गण करु चूप । लङ्का-राज्यक भेलहुँ भूप ॥३०॥
सभ जनि घुरिकेँ लङ्का जाथु । पानि पिबथु गय अन्नो खाथु ॥३१॥
लक्ष्मण कहल कथा शुनि कान । गेला जतय राम भगवान ॥३२॥
कहल विभीषण शुनु भगवान । रावण पतित छला सभ जान ॥३३॥
तनिकर दाह करब नहि जाय । विदित छला अततायि कहाय ॥३४॥

भावार्थः

लक्ष्मण विभीषण केँ सान्त्वनाप्रद उपदेस देलनि – “कनला सँ कि रावण भेटि जेताह ? देह आदि सँ आत्मा भिन्न अछि आर ई विश्व अनित्य अछि, ई बुझिकय ढाँढस राखू । देखू, रावणक शरीर लगे मे पड़ल अछि । दीप मिझा गेल आ घर मे अन्हार पसैर गेल । राम केँ सगुण ब्रह्म जानिकय हुनकर सेवा कयल जाउ, कतहु कोनो अहित नहि होयत । राम जे कहलनि अछि से ध्यान सँ सुनू । रावण अहाँक भाइ रहथि, कियो आन नहि । आइ हुनकर दाह-संस्कार आदि सबटा काज अहाँ स्वयं करू । महिला सब जे कानि रहल छथि, हुनका सब केँ समझाउ-बुझाउ । अहाँ लंकाक राजा भेलहुँ । सब महिला लोकनि घुरिकय लंका जाइथ आ खाइथ-पिबथि ।” एहि तरहें लक्ष्मण जे कहलनि से सुनिकय विभीषण ओतय गेलाह जेतय राम रहथि । विभीषण कहलनि – “हे भगवान राम, सुनू । सब जनैत अछि जे रावण पतित रहथि । हुनकर दाह-संस्कार हम केना करब ? ओ त आततायीक रूप मे प्रसिद्ध रहथि ।” ॥२४-३४॥

।सोरठा।

वैर मरण-पर्य्यन्त, कहल राम उत्तर तकर ॥३५॥
भेल प्रयोजन अन्त, करु रावण-संस्कार विधि ॥३६॥
तखन विभीषण कयल, लङ्कापति-संस्कार तहँ ॥३७॥
काष्ठ घृतादिक धयल, चिता धधक प्रलयाग्नि सन ॥३८॥
कयलनि तखना स्नान, देल तिलाञ्जलि हाथ कुश ॥३९॥
वनिता-गण काँ ज्ञान, कहल विभीषण हित वचन ॥४०॥
क्रन्दन की रहु चूप, सगर नगर घर बनल अछि ॥४१॥
हमहि भेल छी भूप, सुख सौँ रहबे पूर्व्ववत् ॥४२॥
दशमुख-घरणी जाय, बद्धाञ्जलि प्रभु सौँ कहल ॥४३॥
हो की हमर उपाय, दुर्म्मति पति-सुत-रहित छी ॥४४॥

भावार्थः

राम एकर उत्तर देलनि – “शत्रुता मरहे तक रहैत छैक । जे काज छल से पूरा भ’ गेल । आब रावणक संस्कार कयल जाउ ।” तखन विभीषण लंकापति रावणक संस्कार ओहिठाम कयलनि । चिता मे लकड़ी, घी, आदि ईंधन भरलनि आ चिता प्रलयकाल केर आगि जेकाँ धहधह करय लागल । फेर स्नान कयलनि आ हाथ मे कुश लय केँ तिलांजलि देलनि । महिला सब केँ प्रबोध देलनि आ कहलनि जे कि करबाक चाही – “कनैत कियैक छी ? समस्त लंकापुरी मे घर बनि गेल अछि । हमहीं राजा भेलहुँ अछि । अहाँ सब जेना रहैत रही तहिना आराम सँ रहब ।” रावणक स्त्री मन्दोदरी राम लग गेलिह आ हाथ जोड़िकय हुनका सँ कहलनि – “आब हमर कि गति होयत ? हमरा नहि त बुद्धि अचि, न पति आ न बेटा ॥३५-४४॥

अहीर छन्द।
।तिरहुति।

छल छथि पति दशमाथ, हे माधव, तनि बिनु विकलि अनाथ ॥४५॥
ओ अरि-भाव बढ़ाय, हे माधव, प्रभु तन गेलाह समाय ॥४६॥
हम पापिनि सहि ताप, हे माधव, परिणत भेल फल पाप ॥४७॥
हम घननादक माय, हे माधव, जलनिधि-शोक समाय ॥४८॥
प्रभुक चरण भरि नयन, हे माधव, देखल मुक्तिक अयन ॥४९॥
जय रघुनन्दन वीर, हे माधव, नूतन जलद शरीर ॥५०॥
भ्राता युगल उदार, हे माधव, करब हमर उद्धार ॥५१॥

भावार्थः

रावण हमर प्राणेश्वर रहथि । हुनका बिना हम अनाथ भ’ गेलहुँ । हे भगवान! ओ अहाँ संग शत्रुक भाव जगाकय अन्त मे अहींक शरीर मे लीन भ’ गेलथि । हम पापिनी सन्ताप सहि रहल छी, पापक फल भुगैत रहल छी । हम मेघनादक माता छी, तैयो शोकसागर मे डूबल छी । हम अहाँक चरण भैर आँखि देखलहुँ जे मुक्तिक साधन छी । हे रघुनन्दन ! घनश्याम-तनु वीरवर राम, अपनेक जय हो । अपने उदार हृदय दुनू भाइ हमर उद्धार करब ।” ॥४५-५१॥

।मिथिला सङ्गीतानुसारेण कलहंस छन्दः।
।श्रीमालव छन्दश्च।

देवर अहाँ एत छथि महाराजे । सुखसभ अनुभव तनिक समाजे ॥५२॥
दशमुख-घरणि करणि अछि नीके । पुर परिजन सभ अहँइक थीके ॥५३॥
देवर वदान्य सह करु सहवासे । मन नहि राखब किछु विपतिक त्रासे ॥५४॥
शुनि प्रभु-वचन सकल दुख-हीना । लङ्का मानल से अपन अधीना ॥५५॥

भावार्थः

रामजी कहलनि – “हे रावणक प्रिया मन्दोदरी, अहाँक करनी नीक अछि । सब नौकर-चाकर आ नगरनिवासी अहींक छथि । अहाँ उदार दिअर केर संग रहू । अहाँ विपत्ति मे छी, एहेन आशंका जुनि करू ।” रामक बात सुनिकय मन्दोदरीक दुःख दूर भेलनि आर ओ लंका केँ अपन अधिकार मे बुझलनि ॥५२-५५॥

।सोरठा।

सभ काँ नगर पठाय, प्राप्त विभीषण प्रभु-निकट ॥५६॥
पङ्कज-नयन उठाय, देखल भक्त-प्रधान काँ ॥५७॥
रामक दण्ड-प्रणाम, बहुत विनय मातलि कयल ॥५८॥
चलला सुरपति-धाम, प्रभु-आज्ञा सौँ हर्षयुत् ॥५९॥

भावार्थः

विभीषण सब गोटे केँ लंकापुरी पठाकय स्वयं राम लग गेलथि । राम आँखि उठाकय अपन प्रमुख भक्त विभीषण केँ देखलनि । इन्द्रक सारथि मातलि राम केँ दण्डवत् प्रणाम कयलनि आ बहुत विनती कयलनि । फेर रामक आज्ञा पाबिकय सहर्ष इन्द्रपुरी लेल विदाह भेलाह ॥५६-५९॥

।जयकरी छन्द।

करु अभिषेक विभीषण माथ । लक्ष्मण काँ कहलनि रघुनाथ ॥६०॥
पूर्व्व कयल हम लङ्कानाथ । सुखशासन न विभीषण-हाथ ॥६१॥
विधिपूर्व्वक ब्राह्मण सभ आब । हाटक-घटसौँ जलधि-जल लाब ॥६२॥
पुरजन वानर सैन्य अनेक । कयल विभीषण नृप-अभिषेक ॥६३॥
प्रभुक प्रणाम विभीषण करथि । रत्न अमूल्य चरण पर धरथि ॥६४॥
देखि विभीषण प्रभु कृतकृत्य । बड़ गोट राज्य पाबि गेल भृत्य ॥६५॥
मिलि सुग्रीव संग रघुनाथ । भेल विजय-यश अहँइक हाथ ॥६६॥
मारल रावण लङ्काराज । देल विभीषण काँ भल काज ॥६७॥
विजय-लाभ भेल अहँक प्रसाद । राखल उचित मित्र-मर्याद ॥६८॥

भावार्थः

तखन राम लक्ष्मणजी सँ कहलनि – “अहाँ विभीषणक माथ पर अभिषेक करू । पहिने हम हिनका लंकाक स्वामी बनेलहुँ । मुदा सुखपूर्वक शासन करबाक अधिकार विधिवत् हिनकर हाथ मे नहि सौंपने रही । आब शास्त्रोक्त विधान अनुसार ब्राह्मण बजायल जाइथ । सोनाक घड़ा मे समुद्रक जल मंगायल जाय ।” नगर केर निवासी कपिगण आर अनेकों सैनिक लोकनि मिलिकय विभीषणक राज्याभिषेक कयलनि । विभीषण रामजी केँ प्रणाम कयलनि आ अमूल्य रत्न हुनकर चरण पर समर्पित कयलनि । विभीषण केँ राजाक रूप मे देखिकय राम कृतकृत्य भ’ गेलाह । सेवक केँ महान राज्य भेटि गेलनि । फेर राम सुग्रीव सँ (गला) मिललाह आ हुनका सँ कहलाह – “एहि विजय केर कीर्ति हमरा अहींक मदति सँ भेटल अछि । रावण केँ मारलहुँ । लंकाक राज्य विभीषण केँ देलहुँ, ई सब नीक भेल । हम अहींक चलते जीत (विजय) पेलहुँ । अहाँ मित्रक मर्यादा खुब नीक सँ निभेलहुँ ।” ॥६८॥

सीता केँ समाद देनाय, हुनकर लौटब तथा अग्नि-परीक्षा

लङ्का मारुतसुत अहँ जाउ । सीता काँ वृत्तान्त शुनाउ ॥६९॥
रावण-मरण प्रथम कहि देब । समाचार तनिकर बुझि लेब ॥७०॥
शुनि प्रभु-वचन गेला हनुमान । दनुजी-जन मन कर अनुमान ॥७१॥
प्रथमहि लङ्का अयला जैह । मन अबइछ लगइछ रङ्ग सैह ॥७२॥
जनकनन्दिनी देखल जाय । दिन दिन गेलि बहुत दुबराय ॥७३॥
रामचन्द्र-पद मे दृढ़ ध्यान । चिन्हल न आयल छथि हनुमान ॥७४॥
हाथ जोड़ि तहँ कयल प्रणाम । दूर ठाढ़ भय कहलनि नाम ॥७५॥
स्वामिनि रावण काँ रघुवीर । मारल समर अमर-मन थीर ॥७६॥
भेल विभीषण नव लङ्केश । जय-जय करथि अमर अमरेश ॥७७॥
प्रभु-आज्ञा सौँ हर्ष समाद । अयलहुँ कहय न रहय विषाद ॥७८॥
रावण दशा कि अछि कहबाक । घर पर सञ्चर गृद्ध ओ काक ॥७९॥
गेला विभीषण आज्ञा पाय । अन्त-क्रिया कयलनि बुझि भाय ॥८०॥
जत छल लङ्का रावण-वंश । सभहिक भेल समर विध्वंस ॥८१॥
श्री रघुवर प्रभुवर जे दास । से सभ कुशल समर निस्त्रास ॥८२॥
वैदेही मन शुनि बड़ हर्ष । तन पुलकित लोचन जल वर्ष ॥८३॥
रघुवर-प्रिय-सेवक हनुमान । वचन अहाँक सुधाक समान ॥८४॥
प्रिय वचनक तुल की वसु देब । सकल लोक उत्तम यश लेब ॥८५॥
शुनु वैदेहि कहल हनुमान । देवि-अनुग्रह सम की आन ॥८६॥
रावण काँ मारल रघुवीर । मन छल कलुषित से सुख थीर ॥८७॥
हनुमानक शुनि वचन उदार । सीता उत्तर कहल विचार ॥८८॥
करुणा-सदन समीर-कुमार । कहल समाद प्रभुक दरबार ॥८९॥
आज्ञा देथि दुखी-दुख-हरण । देखी श्री रघुनन्दन-चरण ॥९०॥
चलल अनिल सुत कयल प्रणाम । पहुँचलाह रघुवर जहि ठाम ॥९१॥
सीता-दशा कहल सभ कहल । गदगद कण्ठ नयन जल बहल ॥९२॥
जेहि कारण सागर मे सेतु । दशकन्धर मारल जे हेतु ॥९३॥
तनि सीता-मन छूटय शोक । देखल जाय मङ्गाय सुलोक ॥९४॥
रघुनन्दन-माया के जान । मन मे कयल तखन प्रभु ध्यान ॥९५॥
सीता अनल-गता बहराथु । माया-सीता छाया जाथु ॥९६॥

भावार्थः

फेर रामजी हनुमानजी सँ कहलनि – “हे पवनसुत, अहाँ लंका जाउ आर सीता केँ सब समाचार सुनाउ । पहिने ई सुनायब जे रावण मारल गेल । फेर हुनकर कुशल-मंगल पुछब ।” रामजीक बात सुनिकय हनुमानजी सीता लग गेलथि । ओतय हुनका देखिकय राक्षसी सब अनुमान करय लागल – जे बन्दर पहिने आयल रहय, रंग-ढंग सँ लगैत अछि जे ओ फेर लंका आयल अछि । हनुमानजी जाकय जनकनन्दिनी सीता केँ देखलनि । ओ दिनानुदिन दुब्बर होइत गेल छलिह । हुनकर ध्यान रामजीक चरण मे एहि तरहें लागल छल जे चिन्ह नहि सकलिह कि ओ हनुमान थिकाह । ओतय हनुमानजी हाथ जोड़िकय प्रणाम कयलनि आर दूरे ठाढ़ रहिकय अपन नाम कहलनि । फेर कहलनि – “हे स्वामिनी, रामजी युद्ध मे रावण केँ मारि देलनि । देवता सभक मन निश्चिन्त भ’ गेलनि । विभीषण लंकाक राजा भेलाह । देवता आर हुनक राजा इन्द्र रामजीक जय-जयकार कय रहल छथि । रामजीक आज्ञा सँ ई हर्षक समाचार हम अहाँ केँ सुनाबय लेल आयल छी जाहि सँ अहाँक विषाद दूर हुअय । रावणक जे हाल अछि से कि कहू ! ओकर घर पर गिध आ कौआ मँडरा रहल अछि । रामजीक आज्ञा सँ विभीषण गेलनि आ भाइ बुझिकय अन्तिम संस्कार कयलति । लंका मे रावणक कुल केर जे-जे राक्षस छल, युद्ध मे सभक अन्त भ’ गेल । प्रभुवर रामजीक जे सेवक सब छल, युद्ध मे ओ सब बचल अछि आर हुनका सब केँ आब कोनो त्रास नहि छन्हि ।” सीताजी केँ ई (समाद) सुनिकय मन मे बहुते हर्ष भेटलनि । हर्ष सँ शरीरक रोइयाँ ठाढ़ भ’ गेलनि आर आँखि सँ आनन्दक नोर बहय लगलनि । ओ कहलनि – “हे रामक प्रिय सेवक हनुमान, अहाँक ई वचन अमृत समान अछि । अहाँ केँ हम एहि प्रिय वचन अनुरूप कि इनाम दी ? सम्पूर्ण दुनिया मे अहाँ केँ सर्वश्रेष्ठ कीर्ति भेटत ।” हनुमानजी कहलनि – “हे जानकीजी, अपनेक कृपा सँ बढ़िकय आर कोन चीज अछि ? रावण केँ रामजी मारलनि ई सुनिकय व्यथित चित्त सुख सँ शान्त भ’ गेल ।” हनुमानजीक एहेन उदार वचन सुनिकय सीताजी सुविचारित उत्तर देलनि – “हे कृपालु पवनसुत हनुमान, अहाँ रामजीक दरबारक समाचार कहलहुँ । आब हम दुखियाक दुःख दूर करयवला रामजीक चरणक दर्शन करय चाहैत छी ।” तखन हनुमान प्रणाम कय केँ विचाह भेलाह आ ओतय पहुँचलाह जेतय राम छलथि । सीताक हाल पूरा-पूरा कहि सुनौलनि । सुनिकय राम गदगद भ’ गेलथि आ हुनकर आँखि सँ नोर बहय लगलनि । ओ कहलनि – “जिनका खातिर समुद्र बँधायल गेल आ रावण मारल गेल ताहि सीता मोन सँ शोक दूर हेबाक चाही । हुनका सकुशल मंगायल जाय ।” रघुनन्दनक माया के जानि सकैछ ! प्रभु राम अपन मन मे ध्यान कयलनि – जे असली सीता आगि मे समायल छलिह ओ निकलिकय बाहर आबथि आर मायारूपी सीता छाया मे समा जाइथ ॥६९-९६॥

।सोरठा।

मित्र नवल लङ्केश, कहल रघुत्तम हर्षयुत् ॥९७॥
लय आनू एहि देश, सीता भीता छथि वृथा ॥९८॥

भावार्थः

ताहि लेल राम अपन नव मित्र लंकापति विभीषण सँ हर्षपूर्वक कहलनि – “आब सीता ओतय बेकार डरायल छथि ॥९७-९८॥

।चौपाइ।

स्नान वस्त्र सुन्दर नवरङ्ग । सकलाभरण-विभूषित अङ्ग ॥९९॥
शिविका पर लय आनू आज । प्राणेश्वरि काँ हमर समाज ॥१००॥
गेला विभीषण सङ्ग हनुमान । करबाओल तनिकाँ अस्नान ॥१०१॥
बड़ि बड़ि वृद्धा काँ मङ्गबाय । तेल सुगन्धि देल लगबाय ॥१०२॥
सभ सौँ उत्तम छल नव कोष । वस्त्र पहिरलनि से निर्दोष ॥१०३॥
जनि पहिराओल गहना सर्व्व । वस्तु अमूल्य कि खर्व्व निखर्व्व ॥१०४॥
शिविका चढ़लि कहार उठाय । चललि राजपथ सङ्ग सहाय ॥१०५॥
सङ्ग पदाति न किछु पछुआथि । हट हट करयित आगाँ जाथि ॥१०६॥
देखय दौड़ल वानर-ठठ्ठ । धक्का खड़गिक सह निरहठ्ठ ॥१०७॥
नहि हट पथ सौँ कपि जे झट्ट । बेँतक मारि सहथि पट पट्ट ॥१०८॥
वानर-वृन्द कयल चित्कार । राक्षसगण वानर काँ मार ॥१०९॥
राम समीप गेला सभ गोट । मन विषाद किछु लगलैँ चोट ॥११०॥
देखि सबारी अबइत एक । अनुव्रजन कर लोक अनेक ॥१११॥
कहल विभीषण काँ तहँ राम । वैदेही आबथु एहिठाम ॥११२॥
उतरि सबारीपर सौँ लेथु । निज-पद-दर्शन जनकाँ देथु ॥११३॥
रघुनन्दन आज्ञा देल जेहन । जनकनन्दिनी कयलनि तेहन ॥११४॥
राम असह्य कथा किछु कहल । सर्व्वसहा-तनया सभ सहल ॥११५॥
सीता काँ मन मे भेल आनि । लक्ष्मण काँ कहलनि शुनि कानि ॥११६॥
करु करु देवर ज्वलित हुताश । करब सकल मन संशय-नाश ॥११७॥
प्रभु अनुमति बुझि जोड़ल अनल । देखइत लोक शोक सौँ कनल ॥११८॥
राम निकट भय भेला ठाढ़ । धह धह धाह आगि मे बाढ़ ॥११९॥
पतिक प्रदक्षिण कय कय बेरि । बेरि बेरि चरणाम्बुज हेरि ॥१२०॥
वैदेही सभ शक्तिक शक्ति । रामचरण मे अविरल भक्ति ॥१२१॥
विकल लोक ओ राक्षसदार । कि होयत कि होयत वचन उचार ॥१२२॥
सकल देवता भूसुर-चरण । कयल प्रणाम कष्ट सभ हरण ॥१२३॥
सीता निर्भीता निज चित्त । साहस कर आमर्ष निमित्त ॥१२४॥
करयुग जोड़ल अनल समीप । विधु-दिनकर-कुल-कीर्त्ति-प्रदीप ॥१२५॥
जौँ रघुवर मे सत्य सनेह । तौँ रह अनल बनल ई देह ॥१२६॥
जौँ पति तेजि मन अनत न जाय । तौँ रह अनल बनल ई काय ॥१२७॥
जाग्रत स्वप्नदशा मे आन । पुरुषक भेल न मन मे ध्यान ॥१२८॥
सत्य स्वकीया जौँ हम नारि । पति-पद-व्रत मन गर्व्व विचारि ॥१२९॥
ज्वलित अनल मे पड़बे जाय । व्रत अन्यथा देह जरि जाय ॥१३०॥
साक्षी पावक रक्षा करब । संशय सकल-लोक-गत हरब ॥१३१॥
कयल प्रदक्षिण अग्नि-प्रवेश । जय-जय शब्द भेल नभ बेश ॥१३२॥
सीता अनल-राशि मे ठाढ़ि । सीता-कान्ति कोटिगुण बाढ़ि ॥१३३॥
सकल सिद्ध कह बारंबार । एहन विशुद्ध आन के दार ॥१३४॥
लक्ष्मी सीता करु जनु त्याग । सकल लोक काँ अनुचित लाग ॥१३५॥
अनल कहल बनि दिव्य स्वरूप । शुनु जगदीश्वर माया-भूप ॥१३६॥
छल छथि सीता सोपलि जतय । प्रकट भेलि छथि देखू ततय ॥१३७॥

भावार्थः

हुनका एतय आनि लेल जाउ । सीता स्नान कय केँ रंग-विरंगक सुन्दर वस्त्र पहिरथि । अंग मे सब गहना लगबथि । फेर हमर प्राणेश्वरी सीता केँ डोली चढ़ाकय हमरा लग लेने अबियौन ।” आज्ञा पाबिकय हनुमानजीक संग विभीषणजी सीताजी लग गेलथि । हुनका स्नान कराओल गेलनि । पैघ-पैघ वृद्धा केँ मंगबाकय हुनका सुगन्धित तेल आदि लगबायल गेलनि । नव खजाना मे जे सब सँ सुन्दर आ स्वच्छ वस्त्र छल सीताजी से पहिरलनि । ओ महिला सब हुनका सबटा गहना पहिरौलखिन । ओ गहना अमूल्य छल, अरबों-खरबों मे पर्यन्त ओकर मूल्य आँकल नहि सकैत अछि । सीता डोली पर सवार भेलिह । कहार सब डोली केँ उठौलक । ओ परिजन सभक संग राजपथ पर चलि देलनि । संग मे पैदल अंगरक्षक सैनिक सब चलि रहल छल; ओ सब कखनहुँ पाछू नहि होइछ । ओ सब ‘हँटू-हँटू’ केर आवाज करैत आगाँ-आगाँ चलि रहल छल । बन्दर सभक दल सीता केँ देखय लेल दौड़ि पड़ल । ओकरा सब केँ खड्गधारी अंगरक्षक धक्का दय-दय केँ हंटबैत छल । तैयो ओ सब निर्लज्ज जेकाँ धक्का खाइत रहल । जे बन्दर रास्ता सँ तुरत नहि हंटैत छल ओकरा सब केँ अंगरक्षक लोकनिक बेंतक मारि पड़ैत छलैक । तखन कपिगण सब चिकरय लागल जे राक्षस सब बन्दर केँ पीटि रहल अछि । ओ सब बन्दर रामजी लग गेल । चोट लागल छलैक, एहि सँ ओकरा सभक मोन दुःखी छलैक । तखन राम देखलनि जे एकटा डोली आबि रहल अछि आर तेकर पाछाँ बहुते-रास लोक सब सेहो लागल अछि । ई देखि रामजी विभीषण सँ कहलनि – “जानकीजी केँ एतय आनू । ओ अपन डोली सँ उतैर जाइथ आर अपन सेवक लोकनि केँ अपन चरणक दर्शन देथि ।” रामजी जहिना आज्ञा देलनि, सीताजी तहिना कयलिह । राम तखन किछु कड़बा बात कहलनि । सर्वसहा (सब किछु सहयवाली, धरती) केर पुत्री सीताजी सब किछु वरदाश्त कय लेलिह । तैयो सीताजीक मोन मे कनेक आइन लगलनि । ओ कनैत अपन दिअर लक्ष्मणजी सँ कहलनि – “हे दिअर जी, अहाँ आगि जराउ । हम सभक मोनक सन्देह केँ दूर करब ।” रामक अनुमति पाबिकय लक्ष्मणजी आगि जरौलनि । ई सब देखिते सब लोक शोक सँ कानय लागल । रामजी ओहि आगि लग ठाढ़ भ’ गेलथि । आगि मे धह-धह ज्वाला बढ़ैत जा रहल छल । सीताजी, जे देवी शक्तियोक शक्ति छलिह आर जिनका रामक चरण मे अटल भक्ति छन्हि, बेर-बेर पतिक प्रदक्षिणा कयलनि आ बेर-बेर हुनकर चरण-कमल केर दर्शन कयलनि । सब लोक आ राक्षस-पत्नी सब स्थिति देखिकय खिन्न भ’ गेल छल आ कहैत छल जे नहि जाइन आब कि होयत । तखन सीताजी सब देवता आ ब्राह्मण लोकनि केँ प्रणाम कयलनि जे कि सब कष्ट केँ दूर करयवला छथि । सीताक मन मे कोनो त्रास नहि रहनि । ओ जान पर साहस कय रहल छलथि । चन्द्रवंश आ सूर्यवंश दुनू केँ उजागर करयवाली सीता हाथ जोड़िकय आगि लग गेलिह आ बजलिह – ‘यदि हमरा राम सँ सत्य प्रेम अछि त हमर ई शरीर आगि मे जहिनाक-तहिना बनल रहय । यदि हमर मन पति केँ छोड़िकय आर कतहु नहि जाइत अछि त हमर ई शरीर आगि मे जहिनाक-तहिना बनल रहय । यदि जागैत या सुतैत कहियो हमर मन मे पराया पुरुषक ध्यान नहि आयल; यदि हम सच्चा स्वकीया नारी छी आर पतिव्रता हेबाक हमरा अभिमान अछि तँ हम धधकैत आगि मे प्रवेश करब । यदि हमर व्रत गड़बड़ हो तँ हमर ई शरीर जैर जाय । हे अग्नि, अहाँ साक्षी छी; हमर रक्षा करब । सब लोकक मोनक सन्देह केँ दूर कय देब ।” एतेक कहिकय सीताजी आगिक प्रदक्षिणा कयलनि आर ओहि मे प्रविष्ट भ’ गेलिह । आकाश मे जोर-जोर सँ जयध्वनि होबय लागल । सीता धधकैत आगि मे ठाढ़ भ’ गेलिह । हुनकर कान्ति करोड़ों गुना बढ़ि गेलनि । सब सिद्ध लोकनि बेर-बेर कहय लगलाह – “आर कोन नारी एतेक विशुद्ध छथि । सीता तँ साक्षात् लक्ष्मी थिकीह । हिनक त्याग जुनि करू ।” रामक एहेन व्यवहार सब केँ खराब लगलनि । अग्नि भगवान् दिव्य रूप मे प्रकट भेलथि आ कहलथि – “हे लीलावश राजा बनल जगदीश्वर राम ! अपने जे वास्तविक सीता केँ जेतय सौँपि रखने छलहुँ, देखल जाउ, वैह आगि सँ ओ एतय प्रकट भ’ गेल छथि ।” ॥९९-१३७॥

।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे लङ्काकाण्डे द्वादशोऽध्यायः।

॥मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे लंकाकाण्डक बारहम अध्याय समाप्त भेल॥

हरिः हरः!!

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