स्वाध्याय
– प्रवीण नारायण चौधरी
कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण
लङ्काकाण्ड – एगारहम अध्याय
राम आ रावण केर प्रचण्ड युद्ध तथा रावणक वध
।चौपाइ।
एहि चिन्ता मे भय गेल भोर । वानर भालु द्वार कर शोर ॥१॥
रे दशकण्ठ लण्ठ बहराह । राम-शरानल शलभ समाह ॥२॥
चारू द्वार नगर घर घेर । रावण काँ तृणवत नहि टेर ॥३॥
रावण शुनल कपिक किलकार । कहल प्रबल रथ कर तैयार ॥४॥
रथ मे चक्र एगारह पाँच । बहुत भयावह वदन पिशाच ॥५॥
खर अनेक रथ जोतल जोड़ । सैन्य प्रधान चलल नहि थोड़ ॥६॥
अस्त्र शस्त्र सभ तहिपर धयल । दशकन्धर रणयात्रा कयल ॥७॥
दुहु दल छल संघट्ट अमान । राति दिवस किछु हो नहि भान ॥८॥
नभ मे भय गेल धूलि-वितान । बड़ गोट शब्द वधिर भेल कान ॥९॥
रावण जेहन प्रलय-जीमूत । ओ नहि कपि-सामान्यक बूत ॥१०॥
कपिदल काँ रण मे ललकार । झपटि झपटि अन्तक जकँ मार ॥११॥
पड़ल ततय हनुमानक दृष्टि । रावण-हृदय हनल एक मुष्टि ॥१२॥
ठेघुना भर रथपर खसलाह । मूर्छित कय मारुति हँसलाह ॥१३॥
क्षण मूर्छा रावण सौँ दूर । कहलनि पवनतनय तोँ शूर ॥१४॥
धिक थिक हमरा कह हनुमान । एखनहु धरि अछि तोहरा प्राण ॥१५॥
करह प्रथम तोँ मुष्टि-प्रहार । हमरा हृदय जते बलसार ॥१६॥
हमहुँ तखन एक मूका हनब । दशकन्धर निज बल काँ जनब ॥१७॥
पवनक तनय कहल पण जेहन । कयल दशानन झट दय तेहन ॥१८॥
क्षण भरि अनमन सन हनुमान । रावण-मुष्टि सहत के आन ॥१९॥
पवन-तनय दृढ़ मुष्टि उठाय । चलला रावण चलल पड़ाय ॥२०॥
हनूमान अङ्गद नल नील । बड़ बड़ राक्षस मारण-शील ॥२१॥
अग्निवर्ण रावणक प्रधान । तनिक प्राण लेलनि हनुमान ॥२२॥
सर्प्परोम काँ अङ्गद मार । खड्गरोम काँ नल संहार ॥२३॥
वृश्चिकरोम लड़ल घड़ि चारि । तनिकहु समर नील लेल मारि ॥२४॥
सिंहनिनाद कयल कपि धीर । गेला जतय छला रघुवीर ॥२५॥
भावार्थः
एहि तरहें सोच-विचार करैत भोर भ’ गेल । बन्दर आ भालू दरबाजा पर शोर मचबय लागल – “अरे बदमाश रावण, जल्दी निकल आ रामक तीर केर आगि मे पतंग समान समा जो ।” बन्दर आ भालु सब नगरक चारू द्वार केँ घेर लेलक; आर रावण केँ तिनको समान नहि टेरैत अछि । रावण जखन बन्दर सभक किलकारी सुनलक त हुक्म देलक – “एकटा मजबूत रथ तैयार करे ।” ओहि रथ मे सोलह टा पहिया छल । ओकर आगाँ-पाछाँ बहुते रास डराओन चेहरा वला राक्षस सब छल । रथ सब मे कतेको जोड़ा गधा सब जोतल गेल । बहुते रास सेनापति चलि पड़ल । ओहि रथ सब पर अस्त्र-शस्त्र सब लादल छल । एहि प्रकारे रावण युद्धक लेल प्रयाण कयलक । दुनू दल आपस मे खूब टकराइत अछि । राति अछि या दिन किछुओ नहि बुझय मे अबैत छल । आकाश मे चारूदिश धूरे-धूरामय भ’ गेल । एतेक जोर सँ आवाज होइत छल जे सभक कान बहीर भ’ गेल छल । रावण मानू प्रलयकालक बादल छल । ओकरा मामूली बन्दर सब पछाड़ि नहि सकैत छलैक । ओ लड़ाइ मे बन्दर सब केँ फटकारय लागल आ पकड़ि-पकड़िकय यमराज जेकाँ मारय लागल । ओतय हनुमानजीक नजरि पड़लनि । ओ रावणक छाती पर एक मुक्का मारलनि । रावण ठेघुनक बले रथ सँ खसि पड़ल । ओकरा बेहोश कय केँ हनुमानजी हँसय लगलाह । क्षणहि भरि मे जखन रावणक बेहोशी दूर भेलैक, तखन हनुमानजी कहलखिन – “हे रावण, तूँ सचमुच शूर छँ । धिक्कार अछि हमरा जे एखन धरि तोहर प्राण नहि गेलौक । तोहर जतेक ताकत होउक, सबटा लगाकय हमर छाती पर मुक्का मार । फेर हमहुँ तोरा एक मुक्का मारबौक । हे रावण, तखन तोरा हमर ताकतक पता लागि जेतौक ।” हनुमान जहिना शर्त रखलनि, रावण झटपट तहिना कयलक । क्षण भरि लेल हनुमानजी अप्रकृतिस्थ रहलाह, फेर ठीक भ’ गेलाह । रावणक मुक्का आर के सहि सकितय ? तखन हनुमानजी मुक्का उठाकय दौड़लाह आ कि रावण भागि गेल । हनुमान, अंगद, नल आ नील बड़का-बड़का राक्षस सब केँ मारय लगलाह । अग्निवर्ण नामक जे रावणक सेनापति रहय ओकरा हनुमानजी निष्प्राण कय देलनि । सर्परोम केँ अंगद मारलनि आ खड्गरोम केर अन्त नल कय देलनि । तेकर बाद वृश्चिकरोम चारि घड़ी धरि लड़ैत रहल; ओकरो युद्ध मे नील मारि देलनि । तखन हनुमान सिंहनाद कय केँ ओतय गेलाह जेतय राम छलथि ॥१-२५॥
।चञ्चला छन्द।
भालु ओ प्रचण्ड कीश जाय जाय झट्ट झट्ट ॥२६॥
राक्षसेन्द्र वीर काँ पछाड़ि मार पट्ट पट्ट ॥२७॥
शैलखण्ड वृक्ष हाथ सौँ उखाड़ चट्ट चट्ट ॥२८॥
राक्षसेन्द्र-सैन्य-झुण्ड-झुण्ड फोड़ फट्ट फट्ट ॥२९॥
लागि अस्त्र मध्य अस्त्र आबि आबि चट्ट चट्ट ॥३०॥
रावणोग्र-वीर-पेट-कुम्भ फूट भट्ट भट्ट ॥३१॥
नाचि नाचि योगिनीक वृन्द भाष हट्ट हट्ट ॥३२॥
राक्षसावलीक मुण्ड जाय खाय कट्ट कट्ट ॥३३॥
रामचन्द्र-तीर-विद्ध-मौलि-पात छट्ट छट्ट ॥३४॥
योगिनीक वृन्द रक्त-ओघ घोँट घट्ट घट्ट ॥३५॥
खाय कि शृगाल मासु नोचि नोचि गट्ट गट्ट ॥३६॥
वस्ति-अस्थि-दन्त घोर जोर तोड़ मट्ट मट्ट ॥३७॥
जोर सौँ कबन्ध नाच वीरभूमि कोटि कोटि ॥३८॥
भैरवी भभाय हँस्स भूमिमध्य लोटि लोटि ॥३९॥
नाचथि प्रसन्न गीत गाबि गाबि छोटि छोटि ॥४०॥
हर्ष सौँ कपाल ताल देथि महा मोटि मोटि ॥४१॥
भावार्थः
प्रचण्ड भालु आ बन्दर तेजी सँ जाइछ आ रावण केर सैनिक सब केँ पटापट पछाड़ैत जाइछ । पहाड़क टुकड़ा आ गाछ सब चटपट हाथ सँ उखाड़ि लैछ आर ताहि सँ रावणक सैनिक सभक मुंड केँ फटाफट फोड़ि दैछ । आबि-आबिकय हथियार हथियार सँ चटाचट टकराइछ । रावणक पैघ-पैघ वीर सभक पेट रूपी घड़ा भटाभट फूटैछ । झुंडक झुंड योगिनिया सब नाचि-नाचिकय एक-दोसर सँ कहैछ – हँट-हँट, आर स्वयं मरल राक्षस सभक मुंड कटाकट चिबबैछ । रामक तीर सँ राक्षस सभक सिर खसैत जाइछ आ योगिनिया सब ओहि मे छूटल खूनक धारा केँ गटागट पिबैत जा रहल अछि । सियार मांस नोचि-नोचिकय हबड़-हबड़ खा रहल अछि । मूत्राशयक थैली आ हड्डी सब दाँत सँ खूब जोर लगाकय फटाफट तोड़ि रहल अछि । रणभूमि मे करोड़ों कबन्ध जोर-जोर सँ नाचि रहल अछि । भैरवि सब धरती पर लोटि-लोटिकय अट्टहास कय रहल अछि । छोट-छोट भैरवि सब प्रसन्न भ’ गाबि-गाबिकय नाचि रहल अछि आ मोट-मोट भैरवि सब हर्षपूर्वक खोपड़ी पीटि-पीटिकय ताल दय रहल अछि ॥२६-४१॥
।अनुष्टुप् छन्द।
।देश।
महाकालो विशालाक्षो मुदा गृह्णाति मुण्डालीम् ॥४२॥
हसन्ती युद्धभूमौ तम्पिवन्ती शोणितं काली ॥४३॥
वहन्मुण्डालिभारन्ते महोक्षो विह्वलत्येषः ॥४४॥
कथन्नाद्यापि सन्तृप्तो भव्यान्व्यग्रश्च ते शेषः ॥४५॥
भावार्थः
बड़का-बड़का आँखिवाली महाकाली युद्धभूमि मे रक्त पिबैत हर्षक संग मुंड सब हँसोथिकय एकत्रित करैत छथि । अरे, एतबा मुंड लादि देलहुँ जे अहाँक ई विशाल बसहा सेहो लड़खड़ा रहल अछि । तैयो अहाँ केँ सन्तोष कियैक नहि होइत अछि ? अहाँ शेषनाग सेहो व्यग्र छथि ॥४२-४५॥
।चौपाइ।
लाखहि लाख सबार-विहीन । घोड़ दौड़ पिठ कसले जीन ॥४६॥
मुइले चढ़ल पीठ असबार । कय चीत्कार भ्रमित दन्तार ॥४७॥
घोड़ा बहुतक डाँड़ टूट । लादल अस्त्र पड़ायल ऊँट ॥४८॥
शोणित-धार चललि बढ़िआय । गेलि दीर्घिका सिन्धु समाय ॥४९॥
भेलि तेहनि सूतहु नहि थाह । बहुत समुद्रक पहुँचल ग्राह ॥५०॥
तनिका भेटल भक्ष्य कबन्ध । खाय खाय सभ भेल निर्धन्ध ॥५१॥
समरभूमि कत योगिनि नाँच । खाथि मासु निधुरायल काँच ॥५२॥
अगनित गृद्ध चिल्ह ओ काक । कङ्क शृगालक बनि गेल ताक ॥५३॥
भासल घर पर वायस बास । मांसाशी खग पूरित आश ॥५४॥
लङ्का वनिता-गण जे कान । करुणा-गिरि-झरनाक समान ॥५५॥
भैरव मुण्डमाल लय आब । महाकाल गलमे पहिराब ॥५६॥
वृद्ध गृद्ध रण-महि मे भाष । आइ पुरल आमिष-अभिलाष ॥५७॥
आहि आहि हा हा धुनि कान । लङ्काधिप-पुर पड़ल मलान ॥५८॥
लङ्केश्वर से पढ़लनि पाठ । सगर नगर भेल राँड़क ठाठ ॥५९॥
राक्षस-वृन्द-वधूटी कान । आज कयल विधि घर शमशान ॥६०॥
मान्य विभीषण छथि कोन ठाम । जे राखल राक्षसकुल-नाम ॥६१॥
लय लय तीक्ष्ण हाथ तरुआरि । प्रिय-हीना केँ से देथु मारि ॥६२॥
धिक पति बिनु जीवन संसार । अपनो प्राण लगै अछि भार ॥६३॥
पति-रण-मरण देखल सभ आँखि । की सुख जीव देह मे राखि ॥६४॥
आनु हलाहल सब जनि खाउ । गर पाथर दय सिन्धु समाउ ॥६५॥
कतय कयल नहि राक्षस लूटि । हा स्वाधीन नगर गेल छूटि ॥६६॥
त्यागथि विकला गहना अङ्ग । विधि विपरीत मनोरथ भङ्ग ॥६७॥
मणिमाला व्याली समतूल । लगइछ आइ दैव प्रतिकूल ॥६८॥
केओ कह युवति चित्त कर थीर । सभ सङ्कट हर्ता रघुवीर ॥६९॥
तनिकाँ सौँ होयत नहि हानि । करुणामय तनिकाँ लिय मानि ॥७०॥
दाँतय ओठ काट दशभाल । विकट कोप विश लोचन लाल ॥७१॥
रामचन्द्र दिश रथ चढ़ि धाब । अशनि जेहन शर कोटि चलाब ॥७२॥
अविरल जलधर सम शर-धार । शरक निकर दशकन्धर मार ॥७३॥
राम-निकट जे वीर प्रधान । सभ जन आनन कयल मलान ॥७४॥
कनक-अलङ्कृत पावक जेहन । रघुवर वाण चलाओल तेहन ॥७५॥
भावार्थः
बिना सवार केर लाखों घोड़ा, जेकर पीठ पर जीन कसले अछि, दौड़ैत नजरि आबि रहल अछि । पीठ पर चढ़ल मृत सवारवला बहुते रास दन्तार हाथी चिघाड़िते एम्हर-आम्हर भटैक रहल छल । बहुते रास घोड़ाक डाँढ़ टूटि गेल अछि । अस्त्र सब सँ लदल ऊँट भागैत जा रहल अछि । रक्त धाराक बाढ़ि आबि गेल आ बड़का-बड़का तालाब सब उमड़िकय समुद्र मे जाकय खसय लागल । एतेक बाढ़ि आयल जे सूतो सँ गहराइ नापल नहि जा सकैछ । समुद्र सँ बहुते रास मगरमच्छ सब आबि गेल । ओहि मगर सब केँ खेबाक लेल कबन्ध (मुर्दाक सिररहित धड़) भेटि गेलैक आर ओ खा-पीकय निश्चिन्त भ’ गेल । लड़ाइक मैदान मे बहुत रास योगिनियाँ सब नाचैत अछि आ खून सँ लिपटल मांस खाइत अछि । अनगिनत गीध, चील्ह, कौआ, कंक आ सियार सब केँ नीक मौका हाथ लागि गेलैक । रक्तक धारा मे हेलैत मुर्दा सब पर कौआ बैसि जाइछ । मांस खायवला पक्षी सभक आसा पूरा भेलैक । लंका मे महिला सब जे कनैत छल से मानू करुणाक पहाड़ सँ झरना जेकाँ खसि रहल हो । भैरव मुंडमाल लय-लय अबैत छथि आ महाकाल केर गला मे पहिराबैत छथि । बूढ़बा गिध सब लड़ाइक मैदान मे बजैछ – मांस खेबाक अभिलाषा आइ पूरा भेल । चारू दिश आह-आह आ हाय-हाय केर आवाज सुनाय पड़य लागल । लंका नगरी सदमा सँ उदास भ’ गेल । रावण एहेन पाठ पढ़लक जे सारा नगर मे विधवा सभक जमघट भ’ गेल । राक्षस सब बहुते कनैत आ कहैत अछि – “हाय, आइ विधाता हमर घर केँ श्मशान बना देलनि । पूजनीय विभीषण कतय छथि, जे राक्षस-वंशक इज्जत बचौलनि ? ओ हाथ मे तेज तलवार लय-लय केँ विधवा सब केँ काटि देथि, कियैक तँ संसार मे पतिक बिना जिनाय बेकार अछि । स्वयं अपनहुँ प्राण भार बुझाइछ । सब गोटे अपन आँखि सँ अपन-अपन पति सब केँ युद्धभूमि मे मरैत देखलनि । आब शरीर मे प्राण राखिकय कोन सुख भेटत ? जहर खाउ आ सब बहिन मिलिकय पिबू या गला मे पाथर लटकाकय समुद्र मे डूबि मरू । राक्षस सब कतय लूटपाट नहि कयलक ? हाय, आब ई लंका नगरी स्वाधीन नहि रहल ।” एहि तरहें विलखिते अपन शरीर सँ गहना उतारैत छथि आ कहैत छथि, “जखन विधाते प्रतिकूल भ’ जाइत छथि तखन सबटा मनोरथ हेरा जाइत अछि । मणिक माला लगैत अछि जे नागिन हो । लगैत अछि आइ हमरा लोकनिक भाग्य पलटा खा गेल ।” कियो कहैछ – “हे युवती, चित्त केँ स्थिर करू । राम सब संकट केँ हरण करयवला छथि । हुनकर हाथ सँ खराब नहि होयत । मानि लेल जाउ, ओ बड दयालु छथि ।” रावण दाँत सँ अपन ठोर अपने कटैत अछि । भीषण क्रोध सँ ओकर बीसो आँखि लाल भ’ गेल छैक । ओ रथ पर सवार भ’ राम दिश दौड़ल, आर वज्रक समान करोड़ों तीर हुनका उपर चलबय लागल । ई देखि राम लग जतेक वीर सेनापति रहथि तिनका सभक चेहरा उतरि गेलनि (उदास भ’ गेलनि) । तखन राम सोना सँ अलंकृत आगिक समान बाण चलौलनि ॥४६-७५॥
।सोरठा।
देखि समर अमरेश, मातलि सारथि काँ कहल ॥७६॥
रथपर अछि लङ्केश, रघुनन्दन रथ-रहित छथि ॥७७॥
रथ लङ्का लय जाउ, अस्त्र सकल तेहिपर धरू ॥७८॥
हमर सन्देश शुनाउ, रथ चढ़ि मारू शत्रु केँ ॥७९॥
रथ पहुँचल तेहिठाम, हाथ जोड़ि मातलि कहल ॥८०॥
चढ़ल जाय प्रभु राम, अमरेश्वर-साहित्य रथ ॥८१॥
अस्त्र शस्त्र सभ धयल, कवच अभेद्य अखेद्य विधि ॥८२॥
प्रभु शुनि सम्मति कयल, नमस्कार कय रथ चढ़ल ॥८३॥
भावार्थः
इन्द्र ई लड़ाइ देखलनि आ अपन सारथि मातलि सँ कहलनि – “देखू, रावण रथ पर सवार अछि मुदा राम बिना रथ केर छथि । एहि रथ केँ लंका लय जाउ । एहि पर सारा अस्त्र राखि देल जाउ । राम केँ हमर समाद जाकय कहू जे ओ एहि रथ पर सवार भ’ शत्रु केँ मारथि ।” रथ राम लग पहुँचि गेल । हाथ जोड़िकय मातलि कहलनि, “हे राम, एहि रथ पर चढ़ू । देवता लोकनिक राजा इन्द्र सहायताक लेल ई रथ देलनि अछि । एहि मे सब तरहक अस्त्र सब राखल अछि, आर एहेन कवच अछि जेकरा कोनो अस्त्र बेधि नहि सकैछ ।” राम ई सुनिकय ओहि रथ केँ स्वीकार कयलनि आ इन्द्रक प्रति सिर झुकाकय रथ पर सवार भ’ गेलाह ॥७६-८३॥
।चौपाइ।
।जयकरी छन्द।
महायुद्ध बरणय के पार । शेष सहस्र-मुख कहइत हार ॥८४॥
रावण अग्नि-अस्त्र लय फेक । अग्नि-अस्त्र सौँ प्रभु सभ टेक ॥८५॥
देव-अस्त्र दशभाल चलाब । दैव-अस्त्र-बल राम फिराव ॥८६॥
पन्नग-अस्त्र चलाओल फेर । सापहि साप समर भेल ढेर ॥८७॥
दिश ओ विदिश विकल दल कयल । गरुड़-अस्त्र रघुनन्दन धयल ॥८८॥
पन्नगास्त्र जौँ जौँ फुफुआथि । गरुड़ अस्त्र गट गट गिड़ि जाथि ॥८९॥
रावण माया करथि अपार । श्री रघुनन्दन कर संहार ॥९०॥
देखि इन्द्रक रथ सारथि निकट । रावण क्रुद्ध भेल मन विकट ॥९१॥
इन्द्रादिक कृत सभ उत्पात । बड़ प्रपञ्च अपनैँ रह कात ॥९२॥
इन्द्रक घोड़ा काँ शर मार । मातलि सारति शत्रु विचार ॥९३॥
पड़य न सारति घोड़ा दृष्टि । कयल दशानन सायक-वृष्टि ॥९४॥
सुरगण नभ कर हा हा-कार । बिगड़ल देखि समर-व्यवहार ॥९५॥
सहित विभीषण वानर वीर । विकल मर्म्म मे वेधित तीर ॥९६॥
घोर युद्ध कर रावण एक । विश भुज धनुष धयल शर फेक ॥९७॥
रामचन्द्र मन बाढ़ल कोप । करय चाह दस-वदनक लोप ॥९८॥
ऐन्द्र धनुष सायक लय हाथ । कालानल सन श्री रघुनाथ ॥९९॥
सुरगण सिद्ध तथा गन्धर्व्व । देखथि युद्ध गगन सौँ सर्व्व ॥१००॥
भावार्थः
फेर एतबा भारी लड़ाइ होबय लागल जेकर वर्णन कियो नहि कय सकैछ, शेषनाग अपन हजार मुँहों सँ वर्णन करैत थाकि जेताह । रावण अग्न्यस्त्र चलबैछ तँ राम अग्न्यस्त्र सँ काटि दैत छथि । जखन ओ देवास्त्र चलबैछ तँ राम देवास्त्र सँ ओकरा लौटा दैत छथि । फेर रावण सर्पास्त्र छोड़लक । पूरे रणभूमि मे साँपे-साँप छा गेल । सब दिशा मे रामक सैनिक ई देखि घबरा गेलाह । तखन राम गरुड़ास्त्र छोड़लनि । जेना-जेना सर्पास्त्र फू-फू करैत बढ़य तेना-तेना गरुड़ास्त्र ओकरा सब केँ टपाटप खाइत जाइक । रावण भाँति-भाँतिक माया रचैत अछि आ राम ताहि सब केँ काटैत जाइत छथि । इन्द्रक रथ आ सारथि केँ राम लग देखिकय रावणक मोन मे भारी क्रोध उठलैक । ओ कहलक – “ई सारा उत्पात इन्द्र आदि देवता सब रचलनि अछि, मुदा वंचना एहेन अछि जे ओ सब स्वयं अलगे रहैत छथि ।” एतेक कहिकय रावण इन्द्रक घोड़ा केँ तथा सारथि मातलि केँ शत्रु बुझिकय तीर चलौलक । फेर न ओ घोड़ा देखाय पड़ल आ न ओ सारथि । रावण तीर सभक बौछार करय लागल । आकाश मे देवता सब लड़ाइक बिगड़ल हालत देखि हाहाकार करय लगलाह । विभीषण-सहित वीर बन्दर सभक मर्मस्थल मे तीर भोंका गेल छलन्हि, ताहि सँ ओ सब विकल भ’ गेल रहथि । रावण अकेले भीषण युद्ध कय रहल छल । बीसो हाथ मे धनुष लय दनादन तीर चलबैत जा रहल छल । रामचन्द्रक मन मे क्रोध बढ़ि गेलनि आर ओ राक्षस केँ खत्म करबाक कोशिश करय लगलाह । राम इन्द्र-धनुष पर प्रलयकालक आगिक समान तीर चलौलनि । देव, सिद्ध आ गन्धर्व सब आकाश सँ युद्ध देखि रहल छलथि ॥८४-१००॥
।मिथिला सङ्गीतानुसारेण भैरव छन्दः।
।ध्रुपद।
रामचन्द्र-हाथ सौँ सायक छुट सन्न सन्न ॥१०१॥
राक्षसेन्द्र-देह सौँ शोणित बह फन्न फन्न ॥१०२॥
देवी नाच मगन नूपुर बाज झन्न झन्न ॥१०३॥
देवताक वृन्द कहै रामचन्द्र धन्य धन्य ॥१०४॥
वार वार मेदिनी समस्त ऊठ काँपि काँपि ॥१०५॥
अन्धकार चन्द्र सूर्य्य चक्र लेथि झाँपि झाँपि ॥१०६॥
तारका-निपात उतपात बाढ़ अर्व्व खर्व्व ॥१०७॥
राहु-उपराग दृष्ट चन्द्र सूर्य्य विना पर्व्व ॥१०८॥
गृद्ध वृद्ध आबि दशभाल-भाल-वृन्द नोच ॥१०९॥
आज छूटि गल की जटायु धर्म्मशील शोच ॥११०॥
मौलि दशमौलि मही आबि खस्स धम्म धम्म ॥१११॥
योगिनीक यूथ लूट ताल-फल हम्म हम्म ॥११२॥
रावण न मरय सकल माथ काटलहुँ ॥११३॥
सङ्ग्राम-अवनि मुण्ड-झुण्ड कोटि पाटलहुँ ॥११४॥
चिन्तित बहुत चित्त भेल रघुनाथ काँ ॥११५॥
वृद्धि भेल देखि देखि रावणक माँथ काँ ॥११६॥
महाकाल सहित समर शोभ कालिका ॥११७॥
बहुत प्रसन्नतरा देवि मुण्ड-मालिका ॥११८॥
हाथ जोड़ि चण्डिकाक कयल देव वन्दना ॥११९॥
जय जय जगदीश्वरी महेशि दक्ष-नन्दना ॥१२०॥
सृष्टि उतपत्ति प्रतिपाल लय कारिणी ॥१२१॥
अम्बिका थिकहुँ अहाँ सर्व्वलोक-तारिणी ॥१२२॥
तारिणी हमर चित्त चिन्ताजाल आज अछि ॥१२३॥
मर दशभाल से उपाय मुख्य काज अछि ॥१२४॥
अट्टहास हसलि तखन मुण्डमालिका ॥१२५॥
विजय पायब रघुनाथ कहै कालिका ॥१२६॥
कयल कृतार्थ अहाँ मर्त्य-अवतार सौँ ॥१२७॥
योगिनी प्रसन्ना-मुखी भेलि रक्तधार सौँ ॥१२८॥
हमर क्षुधाक शान्ति भेल नहि कतहू ॥१२९॥
भेलहुँ प्रसन्ना हम महाकाल बतहू ॥१३०॥
देखि लेब रावणक मृत्यु गोट नयन सौँ ॥१३१॥
तकन नाचति योगिनीक वृन्द चयन सौँ ॥१३२॥
रावण मरत कोना पूछू तनि भाय काँ ॥१३३॥
कहताह रावणक मरण-उपाय काँ ॥१३४॥
देव नै विलम्ब करू मारू दशमाथ काँ ॥१३५॥
कहु की अभीष्ट-देनिहार सर्व्व-नाथ काँ ॥१३६॥
भावार्थः
रामक हाथ सँ सन्न-सन्न करैत तीर छूटि रहल अछि । रावणक शरीर सँ फन्न-फन्न खून बहि रहल अछि । देवी चंडी नाचि रहल छथि आ हुनकर नूपुर झन्न-झन्न बाजिर रहल अछि । देवता सब रामजी केँ धन्य-धन्य कहि रहल छथि । बेर-बेर पृथ्वी काँपि-काँपि उठैत छथि । धूलकणक चक्र (झोंका) उठिकय चन्द्र-सूर्य केँ झाँपि-झाँपि दैछ । तारा सभक निपात (टूटिकय खसला) सँ अरब-खरब उत्पात बढ़ि रहल अछि । राहुक उपराग दृष्टिक कारण चन्द्र-सूर्य मे बिना अमावस या पूर्णिमाक ग्रहण लागि रहल अछि । वृद्ध गिधो सब आबिकय दशभाल रावणक भाल-वृन्द (माथा) नोचि रहल अछि । आइ धर्मात्मा जटायुक चिन्ता जे दूर भ’ गेलनि ! रावणक मस्तक कटि-कटिकय धरती पर धम्म धम्म करैत खसि रहल अछि । योगिनियाँ सभक झुंड ओहि माथ केँ ताड़क फर बुझि लूझबाक लेल हम्म-हम्म करैत लूट मचौने अछि । सबटा माथ कटि गेलापर आ रणभूमि मे कोटि-कोटि मुंड पसैर गेला बादो रावण मरल नहि । रावणक मस्तक केँ बढ़िते देखिकय रामक मन मे बहुते चिन्ता भेलन्हि । भगवान महाकाल केर संग भगवती कालिका मुंडक माला पहिरने शोभा पाबि रहल छथि आ बहुते प्रसन्न छथि । तखन राम हाथ जोड़िकय देवी चण्डिकाक स्तुति करय लगलाह – “हे जगदीश्वरी, हे शिव केर शक्ति, हे दक्षकन्या, अपनेक जय हो ! अपने एहि संसारक उत्पत्ति, पालन आ संहार करयवाली थिकहुँ । अपने सौंसे संसारक माता ‘अम्बिका’ छी, अहाँ सब लोकक उद्धार करयवाली छी । हे तारिणी, आइ हमर मोन चिन्ताक जाल मे फँसल अछि । रावण मरय, यैह आइ हमर प्रधान कामना अछि ।” ई स्तुति सुनिकय मुण्डमालाधारिणी चण्डिका ठठाकय हँसलिह । चण्डिका कहलनि – “हे राम ! अहाँ विजय पायब । अहाँ मानवक रूप मे अवतार लय केँ हम समस्त देवता लोकनि केँ कृतार्थ कयलहुँ । योगिनियाँ रक्तक धारा सँ तृप्त भ’ गेल । एहि सँ पहिने हमर भूख कहियो नहि मेटायल छल । आइ हम प्रसन्न भेलहुँ आर हमर मतवाला शिवजी सेहो प्रसन्न भेलाह । रावणक मृत्यु अपन आँखि सँ देख लेताह । एना भेला उपरान्त योगिनियाँक झुंड निश्चिन्त भ’ कय नाचत । रावण केना मरत ई रहस्य अहाँ ओकर भाइ विभीषण सँ पुछल जाउ । ओ रावणक मृत्युक उपाय बतेता । हे देव, आब विलम्ब नहि करू आ रावण केँ मारू । बेसी कि कहू ! अपने सभक अभीष्ट-दाता छी ।” ॥१०१-१३६॥
।दोहा।
निकटहि छला विभीषण, पुछलनि श्रीरघुनाथ ॥१३७॥
रावण-मरण-उपाय कहू, सम्प्रति हमरा हाथ ॥१३८॥
भावार्थः
बगले मे विभीषण रहथि, श्री रघुनाथजी हुनका सँ पुछलनि, “हमरा हाथ सँ रावण मरण केर उपाय कहू ।” ॥१३७-१३८॥
॥चौपाइ॥
शुनल विभीषण रघुवर-उक्ति । रावण-मरणक कहलनि युक्ति ॥१३९॥
ब्रह्म-दत्त-वर छथि दशभाल । निकट न आबय तनिकर काल ॥१४०॥
नाभि – प्रदेश कुण्डलाकार । सुधा – सरोवर प्राणाधार ॥१४१॥
अनल-अस्त्र सौँ शोषण जाय । रावण-मरणक सहज उपाय ॥१४२॥
अनल-अस्त्र रघुवर देल छोड़ि । रावण नाभिकुण्ड देल फोड़ि ॥१४३॥
दुइ भुज एक शेष कय माँथ । काटल भुज शिर श्रीरघुनाथ ॥१४४॥
घोर शक्ति दश-कण्ठ उठाय । मारल मरथु विभीषण भाय ॥१४५॥
शक्तिक शक्ति हरल प्रभु बात । कनकाञ्चित सिर शर सौँ काट ॥१४६॥
रावण अतिशय भेला मलान । एक शिर दुइ भुज तदपि न ज्ञान ॥१४७॥
रघुनायक पर सायक फेक । रघुनन्दन शर मार अनेक ॥१४८॥
तुमुल युद्ध सुर हर्ष विषाद । सकल समुद्र रहित-मर्याद ॥१४९॥
मातलि देलनि स्मरण । दशमुख माथ न काटल जाय ॥१५०॥
कयल जाय ब्रह्मास्त्र प्रयोग । दशकन्धर नहि जीतय योग ॥१५१॥
रावण-मरण-समय अछि आज । कहथि रहथि नित देव-समाज ॥१५२॥
हाकि मर्म्म मे हनिऔनि बाण । चट पट उड़ दशवदनक प्राण ॥१५३॥
इन्द्रक सारथि कहलनि जैह । रघुनन्दन शुनि कयलनि सैह ॥१५४॥
अयलनि हाथ दीप्त शर तेहन । कर फुफकार फणीश्वर जेहन ॥१५५॥
जनिक पार्श्व मे मारुत बनल । तनि फल मे रवि राजित अनल ॥१५६॥
देह गगनमय जनिकाँ सर्व्व । लोकपाल बस तनिका पर्व्व ॥१५७॥
गुरुता मन्दर मेरु समान । यहन अस्त्र लेलनि भगवान ॥१५८॥
सर्व्वलोक – भय – नाशन नाम । अभिमन्त्रित कयलनि श्रीराम ॥१५९॥
वेद-उक्त विधि सौँ लेल चाप । कयलनि रघुवर प्रबल प्रताप ॥१६०॥
भावार्थः
रामक बात सुनिकय विभीषण हुनका रावणक मरबाक उपाय बता देलनि । ओ कहलनि – “रावण केँ ब्रह्मा सँ वरदान भेटल छन्हि जे कालपुरुषो हुनका लग नहि भटैक सकैत छथि । हुनकर नाभिक स्थान पर गोल आकारक एकटा अमृतकुंड अछि; वैह हुनकर प्राणक आधार थिक । अग्न्यस्त्र चलाकय ओहि अमृतकुंड केँ सोखि लेल जाउ । रावण मरथि, एकर यैह आसान रास्ता अछि ।” राम अग्न्यस्त्र चलौलनि आ रावणक अमृतकुंड केँ फोड़ि देलनि । फेर राम रावणक दुनू बाँहि आ एकटा सिर छोड़ि बाकी बाँहि ओ सिर केँ काटि देलनि । तखन भाइ विभीषण केँ जान सँ मारबाक लेल रावण एक गोट भीषण शक्ति (साँगी) उठाकय वार कयलक । राम ओहि साँगीक प्रभाव केँ नष्ट कय देलनि आ ओकर सोना सँ मढ़ल शीर्ष (नोंक) केँ तीर सँ काटि देलनि । रावण बहुत उदास भ’ गेल । एकटा सिर आ दुइ बाँहि मात्र शेष रहि गेलो पर ओकर आँखि नहि खुजलैक । ओ रामक उपर तीर चलबय लागल आ राम सेहो ओकरा तीर पर तीर मारय लगलाह । घमासान लड़ाइ होबय लागल । देवता कखनहुँ हर्षित होइत छलथि त कखनहुँ चिन्तित । सब समुद्र उतावला भ’ गेल । इन्द्रक सारथि मातलि याद दियौलनि जे, “रावणक एकटा सिर कटनाय बाकिये अछि । आब ब्रह्मास्त्र चलाउ । रावण केँ जितबाक ताकत नहि छैक । रावणक मरबाक समय आइये छैक, देवता सब एना बता रहल छलथि । मर्म ताकिकय तीर चलाउ । शीघ्रहि रावणक प्राण उड़ि जायत ।” इन्द्रक सारथि मातलि जेना कहलनि राम तहिना कयलनि । राम अपन हाथ मे एकटा तेज बाण लेलनि । ओ शेषनाग जेकाँ फूफकारैत छल । ओकर बगल मे गति देबाक लेल वायुदेव रहथि, ओकर फल मे सूर्य आ अग्निदेव समाहित रहथि । ओकर सारा शरीर आकाशमय छलैक । ओकर ग्रन्थि-ग्रन्थि मे इन्द्र आदि लोकपाल समाहित छलथि । ओहि मे मेरु पर्वतक बराबर भारीपन छलैक । राम एहेन बाण हाथ मे लेलनि । एहि अस्त्रक नाम सब लोकक डर केँ दूर करयवला छल । राम ओकरा अभिमन्त्रित कयलनि । फेर वेद मे बतायल गेल रीति सँ धनुष उठौलनि आ प्रबल प्रताप देखबय लगलाह ॥१३७-१६०॥
॥षट्पद छन्द॥
क्रुद्ध कहल रघुनाथ, दशानन खल काँ मारब ॥१६१॥
निर्भय कय सभ लोक, भार धरणीक उतारब ॥१६२॥
कयल धनुष सन्नद्ध बाण, अरि-मम्म-विघाती ॥१६३॥
वज्रकल्प उद्धष धधक, दशकन्धर-छाती ॥१६४॥
लागल जाय कृतान्त जर्क, हृदय बेधि प्राणान्त कय ॥१६५॥
धसि धरणीतल राम-शर, आबि बसल तूणीर भय ॥१६६॥
भावार्थः
राम क्रोधित भ’ कय बजलाह – “आइ हम दुष्ट रावण केँ मारि देब । सब लोकक डर दूर कय धरतीक भार उतारब ।” तखन राम शत्रुक मर्मस्थल पर चोट पहुँचाबयवला ओहि बाण केँ धनुष पर चढ़ौलनि । वज्रज समान ओ अमोघ बाण रावणक छाती मे लागल आर ओकरा दग्ध करय लागल । ओ बाण यमराज जेकाँ जाकय ओकर छाती केँ बेधि देलक आ ओकर प्राणान्त कय देलक । फेर धरती मे पैसल आ घुरिकय तरकस मे आबि गेल ॥१६१-१६६॥
॥कलहंस-छन्दोभेदे माली-छन्दः श्रीछन्दश्च॥
रावणक हाथ सौँ ससरि खस चाप ॥१६७॥
घूमिकेँ खसल भूमि भूमिभार पाप ॥१६८॥
भेलहुँ अनाथ नाथ बिना दशभाल ॥१६९॥
छलहुँ कि सिंह आब भेलहु शृगाल ॥१७०॥
करत के रावण सदृश प्रतिपाल ॥१७१॥
सूर्य्यवंश मध्य राम जनमल काल ॥१७२॥
विश गोट बाहु दश गोट छल भाल ॥१७३॥
तनिकहु आबिकैँ ग्रहण कयल काल ॥१७४॥
प्राण सौँ रहित भय गेला दशमाथ ॥१७५॥
नाचि नाचि कीश कहै जय जय रघुनाथ ॥१७६॥
भावार्थः
रावणक हाथ सँ धनुष खिसकिकय खसि पड़ल । जीवित बचल राक्षस सब कहैत अछि – “रावण हमरा लोकनि प्रभु छलथि, हुनका बिना हम सब अनाथ भ’ गेलहुँ । पहिने हम सब सिंहक समान रही, मुदा आब त सियारक गति भ’ गेल । रावणक भाँति आब हमरा सभक पालन-पोषण के करत ? सूर्यवंश मे राम हमरा सभक लेल काल बनिकय जन्म लेलनि । जिनकर बीस टा बाँहि आ दस टा सिर छल ताहि रावण केँ पर्यन्त काल आबिकय खा गेल । रावणक प्राण चलि गेल ।” कपिगण सब नाचि-नाचिकय कहैत छथि – “जय हो ! रघुनाथजी की जय हो !!” ॥१६७-१७६॥
॥चौपाइ॥
रावण-मरण विदित सभठाम । मन अति हर्ष विजय सङ्ग्राम ॥१७७॥
पूरल आश देव-मन आज । रघुनन्दन कयलनि सभ काज ॥१७८॥
त्रिदश दुन्दुभी बाजय लाग । नाचि अप्सरा गाबि सुराग ॥१७९॥
रघुनन्दन पर फूलक वृष्टि । कय देल आज अपूर्व्वे सृष्टि ॥१८०॥
स्तुति कर मुनिजन सिद्ध समस्त । धन्य कयल रावण-बल-अस्त ॥१८१॥
रावण-देह जोति बहराय । रघुनन्दन मे गेल समाय ॥१८२॥
से देखइत सभ देव छलाह । धन्य दशानन सुर बजलाह ॥१८३॥
हमरा सभ काँ सात्विक कर्म्म । सपनहुँ नहि पर-तरुणी-नर्म्म ॥१८४॥
बहुत कर्म्म रावण-कृत छोट । तामस-रूप भूप बड़ गोट ॥१८५॥
विष्णु-द्रोह तापस काँ मार । हरि हरि आनय अनकर दार ॥१८६॥
दैवी गति किछु कहल न जाय । मुक्तिलाभ तनिकाँ की न्याय ॥१८७॥
नारद पहुँचलाह तहिठाम । कहलनि नाम बजाओल राम ॥१८८॥
बुझलनि अमरक हृदय-विषाद । नारद कहल बहुत आह्लाद ॥१८९॥
रावण-मरण शुनल प्रभु-हाथ । कोपहु कल्पवृक्ष रघुनाथ ॥१९०॥
भावार्थः
सब जगह खबरि पसैर गेलैक जे रावण मारल गेल । लड़ाइ मे विजय भेला सँ देवता लोकनिक मन मे हर्षक ठेकान नहि रहलनि । आइ देवता सभक मोनक कामना पूरा भेलनि । राम सब काज तमाम कय देखौलनि । देवता लोकनिक नगाड़ा सब बाजय लागल । नीक-नीक गीत गबैत अप्सरा सब नाचय लगलिह । रामक उपर फूल बरसय लागल । राम मानू आइ नया सृष्टि कय देलनि । सब मुनि आ सिद्ध लोक रामक स्तुति करय लगलाह – “हे राम, अपने धन्य छी जे रावणक ताकत केँ खत्म कयलहुँ ।” रावणक शरीर सँ ज्योति निकलल आ ओ रामक शरीर मे समा गेल । सब देवता लोकनि ई तमाशा देखि रहल छलथि । देवगण बजलाह – “धन्य अछि रावण ! हमरा लोकनि सदिखन सात्त्विक कार्य मे लागल रहलहुँ । सपनहुँ मे दोसर स्त्री सँ संग नहि कयलहुँ । रावण त बहुत-रास ओछ काज कयलक अछि । ओ बड़ा भारी तामसी प्रकृतिक राजा छल । ओ भगवान् विष्णु सँ द्रोह करैत छल । तपस्वी सब केँ मारैत छल । पराया स्त्री केँ हरिकय लय जाइत छल । भाग्यक गति कियो नहि जनैत अछि । एहेन रावण केँ मुक्ति भेटलैक । कतेक आश्चर्यक बात भेल !” ओतय नारद पहुँचलाह । ओ अपन नाम बतौलनि । राम हुनका अपना लग मे बजौलनि । हुनका देवता लोकनिक हृदयक विषाद पता चललनि । नारद कहलखिन्ह – “बहुत खुशी अछि ।” हुनका पता चललनि जे रावण रामक हाथ मारल गेल अछि । क्रोधहु मे अयला पर राम कल्प-वृक्षक समान छथि ॥१७७-१९०॥
॥रूपमाला छन्द॥
मारि रावण विश्व-कण्टक, धनुष बामा हाथ ॥१९१॥
तथा धयलय दक्ष कर शर, भ्रमण कर रघुनाथ ॥१९२॥
शोण-लोचन-कोण रिपु-शर-भिन्न श्याम शरीर ॥१९३॥
कोटि-सूर्य्य-प्रकाश रक्षा, करथु से रघुवीर ॥१९४॥
भावार्थः
दुनिया भरि केँ तकलीफ दयवला रावण केँ मारिकय बायाँ हाथ मे धनुष लेने आ दाहिना हाथ मे तीर लेने राम भ्रमण कय रहल छथि । हुनक आँखिक कोण लाल छन्हि, साँवला शरीर दुश्मनक तीर सँ क्षत छन्हि, ताहि सँ करोड़ों सूर्यक बराबर ज्योति निकलि रहल अछि । एहेन भगवान् रघुवीर रक्षा करथि ॥१९१-१९४॥
॥इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे लङ्काकाण्डे एकादशोऽध्यायः॥
॥मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे लंकाकाण्डक एगारहम अध्याय समाप्त भेल॥
हरिः हरः!!

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