स्वाध्याय
– प्रवीण नारायण चौधरी
कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण
लङ्काकाण्ड – आठम अध्याय
कुम्भकर्णक वध
।सोरठा।
शुनल वचन लङ्केश, कुम्भकर्ण समुचित कहल ॥१॥
मानल हृदय कलेश, क्रोधातुर चहलनि उठय ॥२॥
शिखइक नहि अछि ज्ञान, बजबाओल से काज करु ॥३॥
जाउ जौँ मन किछु आन, करु सुषुप्ति निद्रा-विकल ॥४॥
भावार्थः
कुम्भकर्णक कहल उचित वचन रावण सुनलक । ओकरा से बहुत खराब लगलैक । सुनितहि ओ तामश मे आबि गेल आ तुरन्त उठिकय चलि जाय लेल चाहलक । जाइत समय कहलक – “हमरा तोरा सँ ज्ञानोपदेश नहि लेबाक अछि । जाहि काज लेल बजेलियौक से काज कर । जँ मोन मे कोनो आरे बात छौक तँ जाकय सुइत रह । तूँ निन्द सँ परेशान बुझाइत छँ ॥१-४॥
।चौपाइ।
कुम्भकर्ण शुनि रावण-उक्ति । कालविवश काँ नीति न युक्ति ॥५॥
समुचित कहल कयल ओ कोप । पापक उपचय शर्म्मक लोप ॥६॥
महागोट पर्व्वत सन काय । चलला समर विषाद विहाय ॥७॥
रण-महि कयल तेहन से नाद । सातो जलधि रहित-मर्याद ॥८॥
अति भयकारक कपि-दल जान । कुम्भकर्ण थिक काल-समान ॥९॥
झपटि झपटि वानर केँ खाथि । गिरि सपक्ष सन सत्वर जाथि ॥१०॥
मुदगर लय कर तेहन घुमाव । कालदण्ड गुणि के लग आव ॥११॥
बहुतक चूर चरण ओ हाथ । बहुत जनक भेटय की माथ ॥१२॥
जाय विभीषण कयल प्रणाम । गदापाणि कहलनि निज नाम ॥१३॥
भाय दया करु भय गेल भेट । रावण रहल न कहल समेट ॥१४॥
बहुत कहल हम नीति बुझाय । अनुचित मानल बड़का भाय ॥१५॥
कि कहब सहल बहुत अपमान । रहितहुँ निकट न बचयित प्राण ॥१६॥
मारल लात हाथ तरुआरि । असमन्धिक जकँ धिक पढ़ गारि ॥१७॥
राम-शरण हम धयल विचारि । सचिव-चारि-युत कुशल निहारि ॥१८॥
अमृत त्यागि विष तिष के खाय । चुम्बन करय व्यालमुख जाय ॥१९॥
कुम्भकर्ण लघु भ्राता जानि । मिलि कहलनि की तोहर हानि ॥२०॥
महाभागवत थल भल पाय । कुल मे कमल भेलहुँ एक भाय ॥२१॥
नारद सौँ हमरा सभ ज्ञात । जाउ निकट सौँ सम्प्रति कात ॥२२॥
के थिक अपन बुझी नहि आन । सुरा हरल जतबो छल ज्ञान ॥२३॥
कहलनि कुम्भकर्ण जे भाय । कह सुग्रीव चरण लपटाय ॥२४॥
कनयित कनयित भेला विदाय । कयल निवेदन प्रभु-पद जाय ॥२५॥
कुम्भकर्ण किछु श्रम नहि लेथि । करपद सौँ कपि-दल पिसि देथि ॥२६॥
मुका एक मारल हनुमान । खसला कटला गाछ समान ॥२७॥
कुम्भकर्ण रण उठल सम्भारि । हनुमानक सङ्ग बजरल मारि ॥२८॥
हनुमानक पर मुका चलाय । मूर्छित कय देल अवनि शुताय ॥२९॥
नलनीलादि सहित कपिराज । पटकल छल सभ किछु नहि बाज ॥३०॥
मातल जेहन प्रबल मातङ्ग । कुम्भकर्ण से धयलनि रङ्ग ॥३१॥
भावार्थः
रावण केर ई बात सुनिकय कुम्भकर्ण सोचय लगलाह – “जेकरा माथ पर काल सवार भ’ जाइत छैक ओकरा नीति नहि भाबैत छैक । हम त उचित बात कहलियनि, मुदा ई कुपित भ’ गेलाह । पाप संचित भेला सँ सुखक नाश होइत छैक ।” एना सोचि मनक विषाद केँ बिसराकय पर्वतकाय कुम्भकर्ण लड़ाइ वास्ते चलि पड़ल । रणभूमि मे पहुँचिते ओ जे सिंहनाद कयलक ताहि सँ सातो समुद्र उफान मारय लागल । कपि सभक दल ताहि सँ बहुते डरा गेल । अरे, कुम्भकर्ण तँ काल केर समान अछि । ओ लपटि-झपटिकय वानर सब केँ खाइत अछि आ पाँखिवला पहाड़ जेकाँ झटपट उड़ि जाइत अछि । जखन ओ हाथ मे मुग्दर लय केँ ओकरा भाँजय लगैत अछि तखन ओहि मुग्दर केँ कालदण्ड मानिकय कियो नजदीक जेबाक हिम्मत तक नहि करैत अछि । ओ बहुते रास वानर भट (वीर) सब केँ हाथ-पैर चूर-चूर कय देलक । बहुतो केँ माथे लापता भ’ गेलैक । तखन विभीषण हाथ मे गदा लय केँ कुम्भकर्णक समीप गेलाह आर हुनका अपन नाम कहलनि आ बजलाह – “हे भाइ ! हमरा उपर दया करू । सौभाग्यवश भेंट भ’ गेल । रावण हमर सलाह मे नहि रहलाह । हम हुनका बहुते रास नीति-उपदेश बुझेलियनि । मुदा हमर जेठ भाइ रावण ओकरा खराब मानि लेलनि । कि कहू ! हम बहुत अपमान बर्दाश्त कयलहुँ । जँ हम हुनका लग रहितहुँ त हमर प्राणो नहि बचि पबैत । हाथ मे तलवार लय केँ हमरा लात मारलक आ एहेन खराब-खराब गारि देलक जेना कि हमर ओकर सम्बन्धिये नहि होइ । सोचि-विचारिक चारू सचिव सहित हम रामक शरण गहलहुँ; कियैक तँ एहि मे कल्याण देखाय देलक । अमृत केँ छोड़िकय तीत जहर के पियत ? साँपक मुँह केँ चूमय लेल के जायत ?” ई सुनिकय कुम्भकर्ण विभीषण केँ छोट भाइ बुझिकय हुनका सँ भेटलाह आ कहलाह जे, “एहि मे तोहर कोनो हानि नहि भेलौक अछि । तूँ महाभागवत (उत्कृष्ट विष्णु-भक्त) केर बीच नीक स्थान प्राप्त कयलें । कम सँ कम एक भाइ त कुल-कमल भेल । सबटा हाल हमरा नारदक मुँह सँ पता अछि । एखन हमरा सोझाँ सँ दूर चलि जो । हमरा जेहो किछु ज्ञान छल से मदिरा हरण कय लेलक । के अपन अछि आ के पराया, इहो समझ मे नहि आबि रहल अछि ।” कुम्भकर्ण जे कहलनि से विभीषण सुग्रीवक चरण मे लिपटिकय हुनका सुनौलनि । फेर कनैत-कनैत ओतय सँ विदाह भेलाह आ रामजीक पास जाकय हुनकहु सुनौलनि । कुम्भकर्ण केँ लड़ाइ मे कोनो श्रम नहि करय पड़ैत छलैक । ओ बिना श्रमहि केँ कपि सभक दल केँ अपन हाथ आ पैर सँ कुचलि दैत छल । हनुमानजी ओकरा एक मुक्का मारलनि आ ओ कटल गाछ जेकाँ जमीन पर खसल । कुम्भकर्ण रण मे फेर सम्हरिकय उठल, हनुमानजीक संग बड़का मारि बजैर गेल । ओ हनुमानजी पर सेहो मुका चलौलक आ हुनको अचेत कय केँ जमीन पर सुता देलक । नल, नील समेत जतेको बड़का-बड़का योद्धा कपि सब रहथि, सब पटका गेलथि, तेँ कियो किछु बाजियो तक नहि सकलाह । जेना मद सँ पागल हाथी हो, तहिना कुम्भकर्ण लड़ाइ मे रंग देखाबय लागल ॥५-३१॥
।सवैया छन्द।
कण्ठकूप मे कपिपति जाँतल, सभ प्रधान सङ्ग्राम खसाय ॥३२॥
कुम्भकर्ण घुरि लङ्का चलला, ककरो बुते नहि बनय उपाय ॥३३॥
गमहि गमहि अति साहसि कपिपति, हुनकर काटल नासा कान ॥३४॥
उड़ि नभ अपन कटक चल अयला, कुम्भकर्ण काँ भेल न ज्ञान ॥३५॥
भावार्थः
लड़ाइ मे सब सेनापति केँ पछाड़िकय कुम्भकर्ण कपिपति सुग्रीव केँ अपन अपन गला मे दबा लेलक । आर घुरिकय लंका दिश चलि देलक । प्रतिकार करबाक बूता (ताकत) केकरो मे नहि रहैक । तखन धीरे-धीरे खूब साहस कय केँ कपिपति सुग्रीव कुम्भकर्णक चाप सँ बहरेलाह । ओकर नाक आ कान काटि लेलनि आ आकाश मे उड़िकय अपन छावनी मे घुरि अयलाह; कुम्भकर्ण केँ पते नहि चललनि ॥३२-३५॥
।बरबा छन्द।
सूर्प्पनखा काँ समुचित, भेलथिनि भाय ॥३६॥
रूप भयङ्कर तिनकर, कहल न जाय ॥३७॥
भावार्थः
शूर्पणखा केँ जेहेन हेबाक चाही तेहेन भाइ भेट गेलैक । कुम्भकर्ण केर रूपक भयंकरता वर्णनातीत छल ॥३६-३७॥
।दोबय छन्द।
लय त्रिशूल कर फिरल भयङ्कर कालमूर्त्ति जनु आबै ॥३८॥
नाशा-श्वास-पवन सौँ कपिगण योजन बहुत उड़ाबै ॥३९॥
एक जनक शक से नहि भेले, जे क्षण रण अटकाबै ॥४०॥
प्रबल वेग चल प्रवह जेहन बह, कत कपि नभ लटकाबै ॥४१॥
नहि सुबाहु खरदूषण नहि हम, नहि कबन्ध वनचारी ॥४२॥
नहि हम शम्भु-धनुष जे तोड़लह, तथा ताटका नारी ॥४३॥
सूर्प्पनखा मारीच नीच नहि, जड़ जलनिधि नहि जानह ॥४४॥
रे रे राम विश्वबलमर्दन, कालमूर्त्ति मन मानह ॥४५॥
भावार्थः
फेर कुम्भकर्ण हाथ मे त्रिशूल लय केँ घुमल । ओ ओहिना भयंकर लागि रहल छल मानू कोनो मूर्तिमान काल आबि रहल हो । ओ अपन नाकक साँस केर हवा सँ कतेको वानर केँ कतेको योजन धरि उड़ा दैत छल । केकरो मे एतेक ताकत नहि रहैक लड़ाइ मे एकहु क्षण लेल ओकरा अटका सकय । ओ प्रलयकालक तूफान जेकाँ प्रबल वेग सँ आगू बढ़ैत जाइत छल आ कतेको रास कपि सब केँ आकाश मे फेकिकय अटका दैत छल । ओ राम सँ कहलक – “हे राम, नहि त हम सुबाहु छी, नहिये खर-दूषण आ न जंगली कबन्ध । नहि हम शिवजीक ओ धनुष छी जेकरा अहाँ तोड़ि देलहुँ आ न हम नारी ताटका छी । नहि हम शूर्पणखा छी, न अधम मारीच छी आ न जड़ समुद्र छी । हे राम, हमरा अहाँ दुनिया भरिक ताकत केँ मसैल दय मे समर्थ प्रत्यक्ष काल बुझू, काल !” ॥३८-४५॥
।चौपाइ।
वानर विकल देखल रघुनाथ । क्रुद्ध धनुष शर लेलनि हाथ ॥४६॥
फेकलनि अस्त्र एक वायव्य । अस्त्रसहित काटल भुज सव्य ॥४७॥
खसल हाथतर कपि जे पड़ल । रहि गेल ठामहिँ नहि संचरल ॥४८॥
राक्षस लय कर शाल विशाल । रघुवर पर दौड़ल तत्काल ॥४९॥
इन्द्र-अस्त्र प्रभु मारल ताहि । शालसहित कटि गेल तनि बाँहि ॥५०॥
भुजयुग-रहित चलल खिसिआय । रावण काँ प्राणाधिक भाय ॥५१॥
अर्द्धचन्द्र दुइ सौँ बुझि बयर । काटि देल प्रभु तनिकर पयर ॥५२॥
छिन्नचरण महि खसला ढेर । ओँघड़ायित दौड़ से फेर ॥५३॥
बड़वामुह सन मुह बड़ बाय । विधु लग राहु ग्रसय जनु जाय ॥५४॥
शिलाखण्ड प्रभु शरपर लेथि । कुम्भकर्ण-मुह भरि भरि देथि ॥५५॥
तदपि न मरय करय सञ्चार । ओँघड़यितहुँ कपिदल संहार ॥५६॥
तखन ऐन्द्रधनु अशनि समान । राम धनुष पर कर सन्धान ॥५७॥
फेकल कयल तनिक संहार । वासव वृत्र समर व्यवहार ॥५८॥
कुम्भकर्ण शिर लङ्का द्वारि । तनिक पतन तन वारिधि वारि ॥५९॥
धर तल जलचर जे पड़ि गेल । तनिकर मरण अकालहिँ भेल ॥६०॥
देखल समर अमर-गण गगन । कयलनि सुमन-वृष्टि मन-मगन ॥६१॥
खग पन्नग मुनिगण गन्धर्व्व । अतिशय हृदय हर्ष भर सर्व्व ॥६२॥
नारद मुनि अयला तहिठाम । स्तुति कर धन्य धन्य प्रभु राम ॥६३॥
विजय-सदवसर बजबथि बीण । धरणीभार कयल प्रभु क्षीण ॥६४॥
कुम्भकर्ण सन मारल शूर । सज्जन मुनिक मनोरथ पूर ॥६५॥
के छथि जनिकाँ देल न कष्ट । सुखित आज छथि दिग्गज अष्ट ॥६६॥
अपनैँक तकलैँ हो संसार । मुनलय आँखि सृष्टि-संहार ॥६७॥
प्रकृति पुरुष साक्षी से काल । व्यक्ताव्यक्त त्रिगुणमय जाल ॥६८॥
सबहिक मूलभूत अहँ राम । बार बार तैँ करी प्रणाम ॥६९॥
स्मरण नाम कीर्त्तन गुण करथि । कथा-कथन से संसृति तरथि ॥७०॥
सभ-ज्ञाता काँ हम की कहब । सुर मिलि नभ सौँ देखयित रहब ॥७१॥
कृपा करू जाइत छी आज । सिद्धि कयल धरणी सुरकाज ॥७२॥
चलल मनोगति विधिक समाज । सुरमण्डलि सुख गगन विराज ॥७३॥
जय अतिबल रघुवर भगवान । भूमि गगन धुनि पूरित कान ॥७४॥
जय जय शब्द करय कय बेर । वानर अरिगण काँ नहि टेर ॥७५॥
कुम्भकर्ण काँ मारल राम । पर्व्वत सन शिर अछि एहिठाम ॥७६॥
शुनि से रावण भूमि लोटाय । कहि भ्राता-गुण शोक समाय ॥७७॥
क्षण-क्षण मूर्छा क्षण चैतन्य । बरनथि विशद सहज सौजन्य ॥७८॥
भेलहुँ आज उत्साह-विहीन । मानल गेलहुँ काल-अधीन ॥७९॥
निहत पिती विह्वल लङ्केश । शुनि मेघनाद पहुँचि तहि देश ॥८०॥
परिहरु शोच पिता एहिठाम । हमरा आगाँ के थिक राम ॥८१॥
अतिबल जिबितहिँ छी घननाद । अपनैँ काँ नहि उचित विषाद ॥८२॥
स्वस्थ चित्त सौँ रहु महिपाल । हम श्रम करब हरब जञ्जाल ॥८३॥
अपनैँक शत्रु-समूह संहारि । तौँ जानब हमरा शक्रारि ॥८४॥
मेघनाद रण चलल सकोप । करब समर रघुवर-बल-लोप ॥८५॥
भोरहिँ वानर रोकल द्वारि । भेल परस्पर भारी मारि ॥८६॥
मेघनाद अतिमाया धयल । रथ चढ़ि गगन महा-रव कयल ॥८७॥
रङ्ग एकर नहि लगएछ नीक । विकल सकल दल कह की थीक ॥८८॥
होइछ अस्त्र जते संसार । नभ सौँ बरिशय नानाकार ॥८९॥
अविरल वारिद बरिसय नीर । तेहने बरष गगन सौँ तीर ॥९०॥
समर राम सङ्ग करय प्रताप । शर तन लाग ससरि हो साप ॥९१॥
वानर दल भय थर थर काँप । सगर समर भरि सापहिँ साप ॥९२॥
साप लपटि सभहिक तन जाय । रह अवकाश न केओ पड़ाय ॥९३॥
तखन प्रकट भेल पढ़यित गारि । परिकल छह कय दिन कय मारि ॥९४॥
एतगोट दर्प्प हमर पुर जार । अतिबल राक्षस काँ संहार ॥९५॥
जाम्बवान कहलनि रे दुष्ट । जयबह कतय समर-सन्तुष्ट ॥९६॥
मेघनाद शुनि कय मन क्रोध । रह रे वृद्ध वृद्ध-दुर्ब्बोध ॥९७॥
बुढ़ भनि छोड़ल साहस छोड़ । अपना बल काँ के कह थोड़ ॥९८॥
देखि प्रताप तदपि नहि ज्ञान । हम छी मेघनाद नहि आन ॥९९॥
शूल चलाओल वचनैँ झोँकि । जाम्बवान लेल हाथैँ लोकि ॥१००॥
मारल शूल हृदय मे हाँकि । मूर्छित खसला शकथि न ताकि ॥१०१॥
समर-भूमि पद धय घिसिआय । लङ्का फेकि देल खिसिआय ॥१०२॥
हर्ष विषाद नगर भरि भरल । रजनि जानि नहि जन सञ्चरल ॥१०३॥
भावार्थः
जखन राम देखलनि जे कपि सब घबरा गेल अछि, तखन क्रुद्ध भ’ स्वयं हाथ मे धनुष-बाण लेलनि । ओ एक गोट वायव्य अस्त्र चलौलनि आर ताहि सँ कुम्भकर्ण केर अस्त्र सहित बायाँ बाँहि कटि गेल । ओकर कटिकय खसल बाँहिक नीचाँ जे-जे कपि पड़ल से बिना हिलने-डुलने जतय छल ओतहि निष्प्राण भ’ गेल । कुम्भकर्ण बचल हाथ मे साल केर भारी गाछ लय केँ तुरन्त राम पर टूटि पड़ल । राम फेर इन्द्र-अस्त्र चलौलनि आ ताहि सँ साल केर गाछ सहित कुम्भकर्णक दाहिना हाथ कटि गेल । फेर रावणक प्राणहु सँ बेसी प्रिय भाइ दुनू बाँहि सँ रहित भ’ ताम सँ आगिबबूला भ’ आगू बढ़ल । रामचन्द्र देखलनि जे एखनहुँ ई वैर (शत्रुता) कय रहल अछि त दुइ गोट अर्धचन्द्राकार तीर सँ ओकर दुनू टाँग काटि देलनि । टाँग कटिते ओ लोथ भ’ कय पृथ्वी पर खसि पड़ल, लेकिन तैयो लेर्हाइत (लुढ़कैत) आगू बढ़ल । बड़वा-मुख (नरक केर उत्तरी द्वार) समान ओकर मुँह पसरल छलैक । लगैत रहैक जेना राहू चाँद केँ ग्रसबाक लेल जा रहल हो । राम बड़का-बड़का पाथर तीर पर लेथि आ ताहि सँ कुम्भकर्णक मुँह भरैत जाइत छलथि । तैयो ओ मरल नहि, बल्कि चलिते-फिरिते रहल आ लुढ़कैतो ओ कपि सब केँ कुचलैत फिरैत रहल । तखन रामजी जेना इन्द्रक धनुष पर बज्र छोड़ल जाइछ तहिना अपन धनुष पर तीर चढ़ौलनि आर चला देलनि । ओहि सँ कुम्भकर्णक संहार कय देलनि, जेना इन्द्र वृत्रक संहार कएने रहथि । कुम्भकर्णक मुण्ड लंकाक सिंहद्वार पर खसल आ ओकर शरीर समुद्रक पानि मे खसल । जे कोनो जल-जन्तु ओकर धड़क नीचाँ पड़ल से सब बेमौत मारल गेल । आकाश सँ देवता सब युद्ध देखि रहल छलथि । ओ सब रामक जीत सँ आनन्दमग्न भ’ फूल बरसाबय लगलाह । पक्षी, सर्प, मुनि आ गन्धर्व सभक हृदय भारी हर्ष सँ लबालब भरि गेलनि ॥४६-६२॥
नारद मुनि ओतय पहुँचि गेलाह । ओ स्तुति करय लगलाह –
“हे भगवान राम, अपने धन्य छी !” ओ ऐन मौका पर वीणा पर विजय-ध्वनि बजबय लगलाह आ कहला – “हे प्रभु, अपने धरतीक भार दूर कयलहुँ । अपने कुम्भकर्ण समान वीर राक्षस केँ मारलहुँ । आइ भला लोक तथा ऋषि-मुनि सभक अभिलाषा पूरा भेल । के एहेन अछि जेकरा ई राक्षस कष्ट नहि देलक ? आइ आठों दिग्गज सुखी छथि । अपनहिये देखैत छी त दुनिया बनि जाइत अछि आ जखन अहाँ आँखि बन्द कय लैत छी त प्रलय मचि जाइत अछि । अहीं प्रकृति, पुरुष आ काल – तीनू अहीं छी । अहीँ सांख्यक अनुसार व्यक्त आ अव्यक्त तथा त्रिगुणात्मक जगज्जाल छी । हे राम, अहाँ सभक मूल छी, तेँ अहाँ केँ बारम्बार प्रणाम करैत छी । जे अहाँक स्मरण करैत अछि, जे अहाँक नाम आ गुणक कीर्तन करैत अछि आर अहाँ चरित्रक कथा सुनैत अछि, ओ संसार-सागर सँ तैर जाइत अछि । अहाँ सर्वज्ञ छी, तेँ अहाँ सँ हम कि कहू ? हम देवता सभक संग रहिकय आकाश सँ देखैत रहब । कृपा करू, आब आइ हम जा रहल छी । अपने धरती केर तथा देवगणक कार्य पूरा कयलहुँ ।” ॥६३-७२॥
एतेक कहिकय नारद मुनि मनक समान गति सँ ब्रह्मा लग पहुँचि गेलाह जेतय आकाश मे देवता लोकनिक दल जुटल छल । “भगवान महाबली रामचन्द्र की जय !” ई ध्वनि धरती आ आकाश मे कान-कान मे भरि गेल । कपिक अनेकों दल जय-जयकार कय रहल छल । कपिगण शत्रु केँ टेरय नहि । (कियो आबिकय संवाद देलक -) “रामजी कुम्भकर्ण केँ मारि देलनि । ओकर पहाड़ जेहेन मुण्ड (लंकाक) द्वार पर पड़ल अछि ।” सुनितहि रावण धरती पर ओंघराय लागल । भाइ केर गुण सभक बखान कय-कय केँ ओ शोक मे लीन भ’ गेल । क्षण-क्षण मे बेहोश होइत आ फेर होश मे अबैछ । ओकर सहज भलमनसाहत केर विशद वर्णन करैत छल । ओ विलाप करय लागल – “आब हमर सबटा जोश हेरा गेल । आइ मानि गेलहुँ जे हम आब काल केर वश मे भ’ गेल छी ।” ॥७३-७९॥
युद्ध मे मेघनादक प्रवेश आ तांत्रिक साधना केनाय
काका कुम्भकर्ण केँ मृत आ पिता रावण केँ घबरायल जानि ओतय मेघनाद आयल आ पिता केँ ढाँढस दियए लागल – “हे पिता, एतय शोक जुनि करू । हमरा सोझाँ राम के होइत अछि ? हम निजबल सँ जीतब, तेँ अहाँ केँ दुःख केनाय उचित नहि । हे राजा ! अहाँ चैन सँ रहू । हम ताकत सँ एहि संकट केँ दूर करब । अहाँक सबटा दुश्मन केँ मृत्युक घाट उतारब, तखने अहाँ हमरा इन्द्रजित बुझब ।” एतेक कहिकय मेघनाद रोषक संग निकलि पड़ल आ बाजल – “हम युद्ध मे रामक सम्पूर्ण सेना केँ मटियामेट कय देब ।” भोर होइते कपि-सेना सब दरबाजा रोकि देलक । आपस मे भारी लड़ाइ मचि गेल । मेघनाद एकटा पैघ माया रचलक । ओ रथ पर सवार भ’ आकाश मे जाकय गरजय लागल । कपि सब देखलक, रंग नीक नहि लगैत अछि । दलक सबटा कपि एक-दोसर सँ पूछय लागल – “अरे, ई कि भ’ रहल छैक ? संसार मे जतेको प्रकारक अस्त्र होइत अछि से सबटा भाँति-भाँतिक आकृति मे आकाश सँ खसि रहल अछि । जेना मेघ सँ मूसलाधार पानि बरसैत अछि, तेनाही आकाश सँ तीरक वर्षा भ’ रहल अछि । ई त रामक संग लड़य सँ पहिनहिं अपन प्रताप देखा रहल अछि । तीर देह मे लगिते साँप जेकाँ ससरय लगैत अछि । कपिदल डर सँ थर्रा उठल । सौंसे रणभूमि मे साँपे-साँप पसैर गेल । ई साँप सभक शरीर मे लिपटि जाइछ । केकरो भागइयो के मौका नहि भेटैछ ।” तखन गारि पढ़ैत मेघनाद प्रकट भेल आ कहलक – “कतेको दिन सँ लड़ाइ लड़ैत-लड़ैत तोरा सब केँ आदति लागि गेल छौक । तोरा सब केँ एतेक घमंड भ’ गेल छौक जे हमर नगर लंका केँ जरा देलें आ महाबली राक्षस सभक संहार कयलें ।” जाम्बवान जवाब देलनि – “अरे बदमाश, लड़ाइ सँ खुश होयबला तूँ भागिकय कतय जेमें ?” ई सुनिकय मेघनाद तमसाकय कहलक – “अरे बूढ़ा, वृद्ध भेलापर ज्ञान नहि रहैत छैक । बूढ़ बुझिकय हम तोरा छोड़ि देलियौक । तूँ ढिठाइ नहि करिहें । अपन ताकत केँ के कम कहैत अछि ? हमर प्रताप त देखिये लेलें, तैयो तोहर आँखि नहि खुजलौक अछि । तूँ नहि जनैत छँ जे हम मेघनाद छी ?” एतेक बजैत झटके मे मेघनाद बरछी चलेलक । जाम्बवान ओहि बरछी केँ हवे (आकाशे) मे हाथ सँ पकड़ि लेलनि । आर वैह बरछी केँ मेघनादक छाती केँ निशाना बना चला देलनि । मेघनाद बेहोश भ’ कय खसि पड़ल । ओकर आँखि बन्द भ’ गेलैक । जाम्बान लड़ाइक मैदान मे ओकर पैर पकड़िकय घसिटिकय तामश सँ लंका मे फेंकि देलनि । भरि नगर मे एक दिश हर्ष आ दोसर दिश विषाद छा गेल । राति बुझिकय कियो कतहु निकलल तक नहि ॥८०-१०३॥
।रूपक दण्डक छन्द।
।सरमाक उक्ति।
नागपाश सौँ रण मे बाँधल – सीता तोहर भर्त्ता, उद्धर्त्ता ॥१०४॥
प्रायः एको व्यक्ति नहि छूटल – जे सङ्कट काँ हर्त्ता, अरि मार्त्ता ॥१०५॥
त्यागू मन सौँ पति-प्रत्याशा – पड़लहुँ शोकक गर्त्ता, रुचिकर्त्ता ॥१०६॥
सरमा कहल सत्य कहयित छी – हमहुँ भेलहुँ दुःखार्त्ता, शुनि वार्त्ता ॥१०७॥
भावार्थः
ओम्हर अशोक वाटिका मे राक्षसी सरमा सीताजी सँ कहलक – “हे सीता, तोहर उद्धार करयवला तोहर पति राम लड़ाइ मे नागपाश सँ बान्हल गेलथुन । शायद एकोटा लोक नहि बचल जे तोहर शत्रु केँ मारिकय तोहर रक्षा करथि । आब फेर सँ अपन पति केँ प्राप्त करबाक आशा मन सँ दूर कय ले । विधाताक इच्छा सँ तूँ शोकक गर्त (गढ्ढा) मे खसि पड़लें । हम सच कहैत छी, ई समाचार सुनिकय तोहर दुःख सँ हमहुँ दुःखी भ’ गेल छी ।” ॥१०४-१०७॥
।वसन्ततिलका छन्द।
।सीताक उक्ति।
हा राम लक्ष्मण कहू कत की करै छी ॥१०८॥
माया-भुजङ्गमक बन्धन सौँ मरै छी ॥१०९॥
हा स्पष्ट कष्ट हमरे सभ हेतु प्राप्त ॥११०॥
अम्भोजबन्धु-कुल-कीर्त्ति-शशी समाप्त ॥१११॥
भावार्थः
ई सुनिकय सीता विलाप करय लगलिह – “हा राम, हा लक्ष्मण, कहू, अहाँ सब कतय छी ? कि कय रहल छी ? कि अहाँ सब मायाक नागपाश मे बन्हाकय मरि रहल छी ? हाय, हमरे ई सबटा कष्ट झेलय पड़ल । कि सूर्यवंश केँ उजागर करयवला यशचन्द्र अस्त भ’ गेल ?” ॥१०८-१११॥
।नाराचिका छन्द।
।तिरहुति।
पतिगति शुनिय जिवन थोर, फरकय बाम नयन मोर ॥११२॥
मुनिजन देखल कहल जत, नहि वैधव्य लिखल तत ॥११३॥
समर-अजय रघुनन्दन, करता अरि-बल-खण्डन ॥११४॥
यदपि वचन शुनि दुस्सह, मन नहि अपन तेहन कह ॥११५॥
भावार्थः
पतिक हाल सुनिकय त लगैत अछि जे हुनकर जीवन आब समाप्त होयबला अछि । मुदा हमर बायाँ आँखि फड़ैक रहल अछि, जे शुभसूचक अछि । जतेको ऋषि-मुनि हमरा देखलनि अछि, सभक कहब छन्हि जे हमरा वैधव्य नहि लिखल अछि । राम युद्ध मे कहियो हारयवला नहि छथि । ओ शत्रुक सेना केँ संहार करबे टा करता । यद्यपि असह्य दुखदायी समाचार सुनि रहल छी, तथापि अपन मन मे ओहेन आशंका नहि होइत अछि ॥११२-११५॥
।जयकरी छन्द।
गरुड़ावाहन कयलनि राम । चलल विहगपति नभ बलधाम ॥११६॥
उड़यित उड़ि गेल बहुत पहाड़ । गलित होय पन्नग-कुल-हाड़ ॥११७॥
अयला ततय जतय रघुराज । तनि भय सौँ भेल निर्भय काज ॥११८॥
खगपति खयलनि माया-व्याल । गरुड़क पूर भेल नहि गाल ॥११९॥
पक्ष-पवन-खन प्रलय घटाक । अति दुर्ग्गति लङ्काक अटाक ॥१२०॥
सभ जन सुखित दुखित नहि एक । कयल विहगपति अमृतक सेक ॥१२१॥
गिरिवर तरु कपि-दल लय जाय । मारथि राक्षस-भट खिसिआय ॥१२२॥
सकल पड़ायल राक्षस वीर । समर एक नहि रहले थीर ॥१२३॥
नहि मुइला ओ वरक प्रसाद । मेघनाद मन बहुत विषाद ॥१२४॥
रावण-मुख देखि लज्जा आब । मन मन जाम्बवान गुन गाब ॥१२५॥
त्रिकुटाचल-अन्तर-गिरि जाय । मेघनाद अभिचारि नुकाय ॥१२६॥
अरुण वसन गल माला लाल । चन्दन सुमन विधान विशाल ॥१२७॥
अर्द्धचन्द्र कुण्डक निर्म्माण । आमिष शोणित तत लय आन ॥१२८॥
काठ बहेड़क कयल से ढेर । होम करय लगलाह सबेर ॥१२९॥
होमक धूम गगन घन-रूप । अनुष्ठान कर चूपहि चूप ॥१३०॥
बुझल विभीषण से सभ कर्म्म । रघुनन्दन सौँ कहलनि मर्म्म ॥१३१॥
प्रभु कहयित छी हम कल जोड़ि । आन लड़ाइ आइ दिय छोड़ि ॥१३२॥
होमारम्भ कयल घननाद । जकर धूम अम्बर आछाद ॥१३३॥
जौँ सम्पन्न होयत मुख-काज । अजय होयत सुरपति-जित आज ॥१३४॥
लक्ष्मण चलथु सैन्य सभ सङ्ग । करथु प्रथम तनिकर मख-भङ्ग ॥१३५॥
मारथु तनिका लड़ि सङ्ग्राम । आज्ञा देल जाय प्रभु राम ॥१३६॥
राम कहल भल हमहीँ जयब । सुरपति-अरि रण-सन्मुख हयब ॥१३७॥
अनल-अस्त्र तनिकाँ हम मारि । वन-दव सम तनिकाँ देब जारि ॥१३८॥
भावार्थः
राम साँपक उपद्रव देखिकय गरुड़क आह्वान कयलनि । बलवान गरुड़ आकाश मे उड़ि अयलाह । हुनकर उड़ला सँ उठल हवाक झोंका सँ कतेको पहाड़ उड़ि गेल । साँपक हड्डी गलय लागल । गरुड़ ओतय पहुँचलाह जेतय राम छलथि । हुनकर डर सँ सब काज भ’ गेल आ कपिदल निर्भय भ’ गेल । गरुड़ ओहि मायारूपी साँप केँ खा गेलाह, तैयो हुनकर गला नहि भरलनि । हुनकर पाँखिक हवा सँ जे आवाज भेल ओ प्रलयकालक मेघक गर्जना समान छल । लंकाक महल सभक हालत खराब भ’ गेलैक । कपिदल मे सब कियो सुखी भ’ गेल, केकरो कोनो समस्या (शिकायत) नहि रहि गेलैक । मानू गरुड़ अमृतक वर्षा कय देलनि । कपिगण पहाड़ आ गाछ सब उठा-उठाकय लय गेलाह आ तामश सँ भरिकय ओहि सँ राक्षस योद्धा सब केँ मारय लागल । राक्षसदलक सबटा वीर सैनिक भागि गेल । मैदान मे एकहु टा अड़ल नहि रहल । वर केर प्रभाव सँ ओ मेघनाद मरल त नहि, ओकर मोन लेकिन एकदम घबरा गेलैक । रावण केँ अपन चेहरा देखबय मे ओकरा लाज लगलैक । मनहि-मन ओ जाम्बवानक बड़ाइ करय लागल । तान्त्रिकप्रवर मेघनाद त्रिकूट पर्वत केर भीतर पहाड़ी मे जा नुकायल । लाल वस्त्र पहिरि लेलक । गला मे लाल माला धय लेलक । सविस्तार विधान अनुसार चन्दन आ फूल जुटौलक । अर्धचन्द्रक आकार केर कुण्डल बनबौलक । रक्त आर मांस ओतय आनि लेलक । बहेड़ाक सुखायल लकड़ी जमा कयलक । सबेरे हवन शुरू कय देलक । हवन केर धुआँ मेघ-जेकाँ आसमान मे छा गेल । ओ चुपके सँ तान्त्रिक अनुष्ठान करय लागल । ई सबटा योजना विभीषण केँ पता लागि गेलनि । ई रहस्यक बात ओ राम केँ बता देलनि । ओ कहलनि – “हे प्रभु राम, हम हाथ जोड़िकय कहैत छी । आइ दोसर लड़ाइ छोड़ि देल जाउ । मेघनाद हवन शुरू कयलक अछि जेकर धुआँ आसमान मे छायल देखाइछ । ओ यज्ञ यदि पूरा भ’ जायत त इन्द्रजित मेघनाद आइ अमर भ’ जायत । सम्पूर्ण सेनाक संग लयकय लक्ष्मण चलथि आर सब सँ पहिने ओकर यज्ञ केँ भंग करथि । ओतहि लड़ाइ शुरू कय केँ ओकर वध करथि । हे प्रभु राम, अपने एहि लेल आज्ञा दियौन ।” राम कहलनि – “बढियाँ बात छैक । हम अपने जायब आ मेघनाद सँ युद्ध मे सामना करब । ओकरा उपर अग्न्यास्त्र चलायब आर वन मे आगि जेकाँ ओकरा जरा देब ।” ॥११६-१३८॥
।सोरठा।
कहल हाथ दुहु जोड़ि, शुनल विभीषण प्रभु-वचन ॥१३९॥
श्री लक्ष्मण काँ छोड़ि, मरत न रावण-सुत समर ॥१४०॥
बारह वर्ष विहीन, निद्राहार-विहार सौँ ॥१४१॥
कयल विरञ्चि अधीन, जे तनि कर मर इन्द्रजित ॥१४२॥
निद्रादिक परित्याग, अबधि अयोध्यागमन सौँ ॥१४३॥
लक्ष्मण-विषय विराग, रघुनन्दन-सेवा-निरत ॥१४४॥
मरता लक्ष्मण-हाथ, मेघनाद लङ्केश-सुत ॥१४५॥
शुनु शुनु प्रभु रघुनाथ, अपनैँक आज्ञा पाबि कैँ ॥१४६॥
भावार्थः
रामजीक बात सुनिकय विभीषण दुनू हाथ जोड़िकय कहलनि – “रावणक बेटा मेघनाद लक्ष्मणक सिवाय आर केकरो हाथे नहि मरि सकैत अछि । जे व्यक्ति बारह वर्ष धरि निद्रा, आहार आ विहार बिना रहिकय ब्रह्मा केँ वश मे करत, ओकरहि हाथ सँ इन्द्रजित मेघनादक मरण होयत । लक्ष्मण जहिया सँ अयोध्या सँ चललाह, तहिये सँ रामचन्द्रक सेवा मे लागल निद्रा आदिक परित्याग कएने छथि तथा विषय-भोग सँ विरत छथि । तेँ रावणक बेटा मेघनाद लक्ष्मणहि केर हाथ सँ मरत । हे प्रभु राम ! सुनू ! अहाँ हुनका आज्ञा दियौन ॥१३९-१४६॥
।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे लङ्काकाण्डे अष्टमोऽध्यायः।
।मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे लंकाकाण्डक आठम अध्याय समाप्त भेल।
हरिः हरः!!

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Paidh badd neek lagal. Bidhi k je likhal weh ta hoit chhai. Laxman k hatehe meghnadh k maut chhain t okra aan kena mair sakait chhaith.
रावणक बेटा मेघनाद लक्ष्मणक सिवाय आर केकरो हाथे नहि मरि सकैत अछि । जे व्यक्ति बारह वर्ष धरि निद्रा, आहार आ विहार बिना रहिकय ब्रह्मा केँ वश मे करत, ओकरहि हाथ सँ इन्द्रजित मेघनादक मरण होयत । लक्ष्मण जहिया सँ अयोध्या सँ चललाह, तहिये सँ रामचन्द्रक सेवा मे लागल निद्रा आदिक परित्याग कएने छथि तथा विषय-भोग सँ विरत छथि ।
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