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हिन्दीक महत्व आ मैथिलीक कमजोरी

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आदरणीय श्रेष्ठजन दिलीप भाइसाहब !

अपनेक चिन्तनयुक्त पोस्ट जाहि मे मैथिली लेल चिन्ता छल आ हिन्दी प्रयोगक आधिक्यक प्रतिकार, हमर ध्यानाकर्षण कयलक । किछु लिखबाक इच्छा जागि गेल जे निम्न अछि ।

संसार मे सभक अपन गति छैक । सब अपना हिसाब सँ एकटा मार्ग सुनिश्चित करैत अछि आ तदनुसार जीवन मे अग्रसर भेल करैत अछि ।

हिन्दी प्रेम हिन्दुस्तान मे स्वाभाविके बहुतो लोक मे देखब । आ तखन मैथिल जातिक लोक अपन कतेको रास महात्वाकांक्षी सपना केँ पूरा करय लेल ‘हिन्दी’क सहारा लैत अछि, एकर कतेको रास उदाहरण छैक ।

हिन्दी केँ पुष्ट बनबय मे मिथिलाक अद्भुत योगदान भेलैक । राष्ट्रकवि दिनकर, यात्री (नागार्जुन), राजकमल चौधरी, आरसी प्रसाद सिंह, रामवृक्ष बेनीपुरी, आदि अनेकों महान लोक हिन्दी सेवा कय केँ विश्वप्रसिद्ध बनलाह ।

भारतक भाषानीति मे ऐक्यबद्धता लेल ‘हिन्दी’ केँ नीतिगत बुनियाद बनायल गेलैक । पछातिकाल मुगल व अंग्रेज आदिक औपनिवेशिक शासन सँ मुक्ति लेल जे स्वाधीनता संग्राम भेलैक, ताहि मे सेहो हिन्दी भाषाक बहुल उपयोग भेलैक । जनसामान्य सेहो एहि मे सहज रहल । तेँ, हिन्दीक महत्व स्थापित भ’ गेलैक ।

वास्तविकता इहो छैक जे हिन्दीक लोकप्रियता मे हिन्दी सिनेमा बड पैघ भूमिका खेलेलक । तहिना संचार मे रेडियो, टेलिविजन, अखबार, पत्रिका आ आब इन्टरनेट व कम्प्यूटरीकृत अनेकों माध्यम – महत्वपूर्ण भूमिका खेला रहल अछि । मैथिलजन सहित कतेको मातृभाषाक लेल हिन्दी माध्यम सँ शिक्षा प्रदान करबाक राज्यक नीति अपने जनिते छी । आर समस्त सरकारी कामकाज (कार्यपालिका व न्यायपालिका सँ व्यवस्थापिका धरि) हिन्दीक प्रयोग सौंसे हिन्दीमय कएने अछि ।

हिन्दी आइ विश्वभाषाक श्रेणी मे पहुँचि गेल अछि । प्रयोगक आधार पर हिन्दी उल्लेख्य स्थान रखैत अछि ।

एहि तरहें हिन्दीक कारण कतेको प्राचीन भाषा दम तोड़ि रहल अछि, दम तोड़बे टा करत । कतेको रास मातृभाषा लेल हिन्दी डायन बनि गेल किंवा बना देल गेल अछि । ई दोषपूर्ण अछि । भाषा नीति मे वर्तमान सरकार परिवर्तन अनबाक चेष्टा कय रहल अछि, मातृभाषाक संरक्षण पर चिन्ता जतेलक, शिक्षा पद्धति मे त्रिभाषा शिक्षा नीति नव शिक्षा नीति मे अपनौलक ।

मुदा, मिथिलाक्षेत्रक महात्वाकांक्षी नेता आ नियन्ता सभक लेल हिन्दी ‘फिल्मी माल’ बनिकय मैथिली केँ नाश कइये केँ मानत । कतेक नेता केँ हिन्दिये मे ‘ठाढ़’ होइन छन्हि मनोग्रन्थि तखन निकलैत छन्हि कंठ सँ वाणी । अपने मिथिलावादी व मैथिली हितपोषक सभक चिन्ता तेँ वाजिबे अछि, मुदा ‘भौकाल’ केर आगू अपने सब टिकि सकब से सम्भव नहि अछि ।

अपने जानकी पुस्तक भंडार मे कवि सम्मेलन करब, आ टका बले हिन्दी फाइव स्टार मे आयोजन करत । अपने १० गोटे रहबय, हिन्दी १००० गोटे रहत । सकबय ? नहि न ! तखन चुपचाप मातृभाषाक सेवा करैत रहू । बाजब त हिन्दी ‘गाँथि’ देत ।

हरिः हरः!!

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