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मिथिलाभाषा रामायण – सुन्दरकाण्ड पहिल अध्याय – हनुमानजीक लंका पहुँचब

671 भ्यूज

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

कवि चन्द्र विरचित मिथिला भाषा रामायण

अथ सुन्दरकाण्ड

पहिल अध्याय

हनुमानजीक लंका पहुँचब; सुरसा, सिंहिका व लंकिनी सँ सामना

।द्रुतविलम्बित छन्दः।

धुतनगेऽम्बरगे परमोत्सवे, चकितभानुगणे जितमन्मथे ॥१॥
जनकजाधिविनाशिमनोगतौ, प्रणतिरस्तु हनूमति मारुतौ ॥२॥

भावार्थः

पहाड़हु केँ हिलाबयवला, आकाश मे उड़यवला, परम उत्साह सँ भरल, सूर्य-चन्द्रादि केँ चकित करयवला, कामदेव केँ जितयवला, जानकीजीक व्यथा हरयवला, मन-जेकाँ तेज चलयवला पवनसुत हनुमान केँ प्रणाम ॥१-२॥

।चौपाइ।

जयजय राम नवल-घनश्याम । सकललोक-लोचन अभिराम ॥३॥
मनमे तनिक ध्यान दृढ़ राखि । मारुतनन्दन उड़ला भाखि ॥४॥
शतयोजन वारिधि विस्तार । लाँघब हम मन हर्ष अपार ॥५॥
रघुनायक-कर जनु शर मुक्त । तथा हमहुँ जायब मुदयुक्त ॥६॥
देखथु कपिगण जाइत गगन । शोभित जेहन प्रवहमे भगण ॥७॥
वैदेही हम देखब आज । दोसर यहन आन की आज ॥८॥
रघुनन्दन काँ वार्ता कहब । सत्वर घुरब अनत नहि रहब ॥९॥
नामस्मरण अन्त एक बार । जनिकाँ भव-जलनिधि से पार ॥१०॥
प्रभुक मुद्रिका हमरा सङ्ग । होयत न हमर मनोरथ भङ्ग ॥११॥
जायब लङ्का दनुज-समाज । प्रभुप्रताप साधब सब काज ॥१२॥

भावार्थः

नव मेघ जेकाँ श्यामवर्ण तथा सभक आँखिक लोचन रामजीक जय हो, जय हो । मन मे हुनक दृढ़ ध्यान कय केँ पवनसुत हनुमान ई कहैत उड़ि चललाह – “ई समुद्र जे सौ योजनक विस्तार मे पसरल अछि तेकरा आइ हम लाँघब से मन मे अपार हर्ष भ’ रहल अछि । जेना रामजीक हाथ सँ छुटल बाण (तीर) चलैत अछि तहिना आइ हमहुँ आनन्दपूर्वक निकलि जायब । हमरा वानर सब आकाश मे जाइत ओहिना देखथि मानू जेना प्रवह पवन ग्रह-नक्षत्र सब मे चलैत देखाय पड़ैछ । आइ हम सीताजी केँ देखबनि, एहि सँ बढ़िकय आर दोसर कोन काज भ’ सकैत अछि ! रामजी केँ हुनकर समाचार सुनेबनि । जल्दिये वापस सेहो आबि जायब, अन्तऽ (बाहर) नहि रहब । अन्त मे एक बेर फेर वैह प्रभुजीक नाम स्मरण करैत छी जिनकर कृपा सँ समुद्र कि, भवसागरो केँ लोक पार कय जाइत अछि । प्रभुक मुद्रिया हमरहि लग मे अछि । हमर मनोरथ किन्नहुँ भंग नहि होयत । लंका मे राक्षस समाजक बीच मे जायब आ रामजीक प्रताप सँ सबटा काज पूरा करब ।” ॥३-१२॥

।सोरठा।

उड़ि चलला हनुमान, ध्यान राम-पद मे सतत ॥१३॥
प्रबल प्रलय पवमान, रौद्र-मूर्ति लङ्काभिमुख ॥१४॥

भावार्थः

एतेक कहिकय हनुमानजी रामजीक चरण मे निरन्तर ध्यान लगबैत प्रलयकालक प्रबल वायु जेकाँ लंका दिश उड़ि चललाह ॥१३-१४॥

।चौपाइ।

लङ्का जाइत छथि हनुमान । की बल की मति से के जान ॥१५॥
सुरसा काँ सुर सत्वर कहल । सर्प्प-जननि करु सुरहित टहल ॥१६॥
बहुत दिवस धरि मानब गून । जाउ शीघ्र घुरि आयब पून ॥१७॥
रोकब बाट कहब नहि मर्म्म । बूझब की करइत छथि कर्म्म ॥१८॥
कहल कयल से नभ पथ रोकि । चललहुँ कतय ततय देल टोकि ॥१९॥
हमरा आनन सत्वर आउ । विहित भक्ष्य अन्यत्र न जाउ ॥२०॥

भावार्थः

(देवता सब सोचलनि जे) हनुमान लंका जा रहल छथि । हुनकर केहेन बल छन्हि आ केहेन बुद्धि छन्हि से केकरा पता छैक । सुर लोकनि तुरन्त सुरसा सँ कहलनि – “हे साँपक माता, अहाँ देवता लोकनिक खातिर एकटा टहल करू । एहि लेल हम सब अहाँक बहुते दिन धरि गुण मानब । जल्दी जाउ आ फेर जल्दिये घुरि आउ । अहाँ हनुमानजीक रस्ता रोकब, लेकिन वास्तविक बात नहि कहबनि । ई देखब जे ओ कोन उपाय करैत छथि ।” सुरसा देवता लोकनिक आज्ञाक अनुसार चलि पड़लिह आ आकाश मे हनुमानजीक रास्ता रोकिकय कहली – “अहाँ कतय चलि देलहुँ ? आउ, जल्दी सँ हमर मुँह मे आउ । अहाँ हमरे विहित भक्ष्य (आहार) थिकहुँ । अन्यत्र जुनि जाउ ।” ॥१५-२०॥

।सवैया छन्द।

मारुत-सुत कहलनि शुनु माता, राम-काज कय आयब घुरि ॥२१॥
सीता-विषय कहब श्रीप्रभुकाँ, अहँक देब प्रत्याशा पूरि ॥२२॥
सुरसा देवि होइ अछि अरसा, कल जोड़ैछी छोड़ू बाट ॥२३॥
अभिनत मारुति कहल न मानल, नमस्कार कयल भेलहुँ आँट ॥२४॥
सुरसा कहल शून रे बाबू, नहि छोड़ब बिनु खयलैँ ॥२५॥
एखनहुँ धरि जीवन-प्रत्याशा, हमरा मुहमे अयलैँ ॥२६॥
बहुत दिनासौँ हम भूखलि छी, बिनु आहारैँ मरबे ॥२७॥
हाथ मुसरी बियरि मे दय, कड़े कड़े नहि करबे ॥२८॥

भावार्थः

हनुमानजी कहलनि – “हे माता, सुनू । हम रामजीक काज कय केँ घुरि जायब, रामजी सँ सीताजीक हाल कहबनि, तखन अहाँक इच्छा पूरा कय देब । हे सुरसादेवी, हमरा देरी भ’ रहल अछि । हाथ जोड़ैत छी, रस्ता छोड़ि दियह ।” प्रणाम करैत थाकि गेलाह, मुदा सुरसा विनीत हनुमानक कहब नहि सुनलनि । सुरसा कहलनि – “सुन रे बाबू, तोरा खेने बिना हम नहि छोड़ब । एखनहुँ धरि तूँ जिबय के आशा करैत छँ । आब तूँ हमर मुँह मे आबि गेलैँ । हम बहुत दिन सँ भुखले छी । आहाक बिना हम मरि जायब । हम हाथ मे पकड़ायल मूस केँ बिल मे दय देब आ ओकरा कड़ाक-कड़ाक कय केँ नहि खायब ?” ॥२१-२८॥

।चौपाइ।
मारुति कहल देवि मुह बाउ । खाय शकी तौँ हमरा खाउ ॥२९॥
योजन भरि विस्तर कर काय । सुरसा मुह दश कोश बनाय ॥३०॥
तकर द्विगुण हनुमानो कयल । बिश योजन मुख सुरसा धयल ॥३१॥
योजन तीस वदन हनुमान । योजन हुनक पचाश प्रमान ॥३२॥
अति लघु बनि मुह बाहर जाय । नमस्कार हँसि कहल शुनाय ॥३३॥
बहरयलहुँ देवि आनन पैसि । हम जाइत छी रहब न बैसि ॥३४॥
भावार्थः
हनुमानजी कहलनि – “अच्छा तखन हे देवी, अहाँ मुँह बाउ । यदि खा सकैत छी त हमरा खाउ ।” एतेक कहिकय ओ अपन शरीरक आकार बढ़ाकय एक योजनक बना लेलनि । सुरसा अपन मुँह दस कोसक बराबर बढ़ा लेलनि । फेर हनुमान अपन शरीर केँ ओकर दोब्बर कय लेलनि । सुरसा अपन मुँह बीस योजनक कय लेलनि । हनुमानजीक शरीर तीस योजनक भ’ गेल त सुरसाक मुँह पचास योजनक । तखन हनुमानजी बहुते छोट रूप धारण कय हुनकर मुँह मे पैसिकय फेर बाहर भ’ कय हँसिकय प्रणाम कय केँ कहलनि – “हे देवी, हम अहाँक आज्ञा अनुसार मुँह मे चलि गेलहुँ आ बाहरो आबि गेलहुँ । आब हम चललहुँ । एतय रुकबाक नहि अछि ।” ॥२९-३४॥
।दोहा।
सुरसा सन्तुष्टा कहल, सत्वर लङ्का जाय ॥३५॥
राम-कार्य्य साधन करू, हम छी सर्पक माय ॥३६॥
देव पठावल बुझल बल, सीता देखू जाय ॥३७॥
कुशल फिरब सीता-कुशल, रघुवर देव शुनाय ॥३८॥
तखन चलल हनुमान पुन, गरुड़-गमन आकाश ॥३९॥
जलधि तहाँ मैनाक सौँ, कयलनि वचन प्रकाश ॥४०॥
भावार्थः
सुरसा प्रसन्न भ’ कय कहलखिन – “जल्दी लंका जाकय रामजीक काज पूरा करू । हम साँपक माता छी । देवता सब हमरा पठौलनि अछि अहाँक परीक्षा करबाक लेल, हमरा अहाँक बल-बुद्धि पता लागि गेल । आब जाकय सीता केँ देखू । अहाँ कुशलपूर्वक घुरि आयब आ सीताक कुशल-समाचार रामजी केँ सुनायब ।” तखन हनुमानजी पुनः गरुड़ जेकाँ आकाश मे उड़ैत चललाह । ई देखि समुद्र मैनाक पर्वत सँ कहलनि ‍- ॥३५-४०॥
।चौपाइ।
कयल सगर-कुल बड़ उपकार । तनिक बढ़ायोल भेलहुँ अपार ॥४१॥
तनिकहि वंश राम अवतार । हुनक दूत जाइत छथि पार ॥४२॥
जलनिधि कहल जहन हित वाक । जलसौँ उच्च भेला मैनाक ॥४३॥
काञ्चन-मणि-मय शृङ्ग अनूप । ततय पुरुष एक दिव्य स्वरूप ॥४४॥
हे कपि हमर नाम मैनाक । जलधि भितर डर मन मघवाक ॥४५॥
मारुत-नन्दन करु विशराम । खाउ अमृत सन फल यहि ठाम ॥४६॥
पथ विशराम न भोजन आज । अछि कर्त्तव्य राम-प्रिय काज ॥४७॥
शिखरक परश हाथ सौँ कयल । गगन-मार्ग पक्षी जकँ धयल ॥४८॥
भावार्थः
“राजा सगर केर वंशज हमर बहुत पैघ उपकार कएने छथि । हुनकहि बढ़ेला सँ हम एतेक पैघ भेल छी । हुनकहि वंश मे रामजीक अवतार भेलनि अछि । हुनकर दूत हनुमान पार जा रहला अछि, हुनकर सहायता करबाक चाही ।” समुद्र जेहेन हितकर वचन कहलनि, ताहि अनुसार मैनाक पर्वत समुद्रक जल-स्तर सँ उपर उठि गेलथि । हुनकर शीर्ष (शिखर) स्वर्ण आ रत्न सब सँ अनुपम शोभा पाबि रहल छल । ताहि शृङ्ग (शिखर) पर एकटा दिव्य-स्वरूपवला पुरुष प्रकट भेलाह आ कहलनि – “हे महावीर, हमर नाम मैनाक छी । हम इन्द्रक डर सँ समुद्रक भीतर नुकायल रहैत छी । हे पवनसुत, एतय विश्राम करू, एतुका फल अमृत-समान होइत अछि, से खाउ ।” हनुमानजी कहलनि – “आइ हमरा रस्ता मे विश्राम नहि करबाक अछि आ न भोजने करबाक अछि । हमरा रामजीक वांछित काज करबाक अछि ।” एतेक कहिकय हनुमानजी हाथ सँ ओहि शृंंङ्ग केँ स्पर्श कय देलनि आ पक्षीक भाँति आकाश-मार्ग केँ पकड़ि लेलनि ॥४१-४८॥
।दोहा।
धयलक छाया-ग्राहिणी, कयलक गमनक रोध ॥४९॥
हनुमानक मनमे तखन, बाढ़ल अतिशय क्रोध ॥५०॥
घोरस्वरूपा सिंहिका, छाया धय धय खाय ॥५१॥
नभचरकाँ ओ राक्षसी, गगन-गमन जे जाय ॥५२॥
देखल तनिकाँ मरुतसुत, मारल झट दय लात ॥५३॥
पुन उड़ि केँ चललाह से, शान्ति भेल उतपात ॥५४॥
भावार्थः
फेर छाया-ग्राहिणी (छाँह पकड़िकय खायवाली एक राक्षसी) हनुमानजीक गमन (गति) मे अवरोध (बाधा) ठाढ़ कय देलक । ताहि पर हनुमानजीक मोन मे तामशक वेग (लहैर) उठि अयलनि । विकट आकृति वाली सिंहिका नामक ई राक्षसी आकाश-मार्ग सँ चलयवला जीव (नभचर) सब केँ गगन-गमय (आकाश सँ चलैत समय) छाया पकड़ि-पकड़िकय खा जाइत छल । पवनसुत हनुमानजी ओकरा देखलनि आ तुरत एक लात लगा देलनि । एहि तरहें ओकर उत्पात शान्त भ’ गेल आ हनुमानजी आकाश-मार्ग सँ आगू बढ़ि गेलाह ॥४९-५४॥
।हरिपद पादाकुल दोहा वा।
गिरि त्रिकूटपर लङ्कानगरी नाना तरु फल बेश ॥५५॥
नाना खग मृग गण सौँ शोभित पुष्पलतावृत देश ॥५६॥
दुर्ग्ग दुर्ग्ग मे रोकत टोकत चिन्तित-मन हनुमान ॥५७॥
करब प्रवेश राति कय तहि पुर दिवा युक्ति नहि आन ॥५८॥
भावार्थः
हनुमानजी देखलनि जे त्रिकूट पर्वत पर लंकापुरी अछि । ओतय नाना प्रकारक गाछ-वृक्ष सब फल सँ लदल अछि । नाना प्रकारक पशु-पक्षी ओकर शोभा बढ़ा रहल अछि । सारा प्रदेश फूल आ लता सँ आच्छादित अछि । हनुमानजी मोन मे सोचय लगलाह – “एतय त हरेक किला मे रोक-टोक होयत । तेँ राति मे प्रवेश करब । दिन मे पैसबाक कोनो युक्ति नहि अछि ।” ॥५५-५८॥
।चौपाइ।
राम-चरण-सरसिज कय ध्यान । सूक्ष्मरूप भेला हनुमान ॥५९॥
पुरी-प्रवेश कयल निशि जखन । बुझलक लङ्का नगरी तखन ॥६०॥
कहलक गमहि चलल छी चोर । हम करइत छी गञ्जन तोर ॥६१॥
बुझल न अछि दशकण्ठ-प्रताप । चललहुँ कतय अहाँ चुपचाप ॥६२॥
चुप रह कहलैँ पढ़लक गारि । चट दय लात चलौलक मारि ॥६३॥
वाम मुष्टि हरि हनल सुतारि । खसली अवनीमे ओ हारि ॥६४॥
शोणित बान्ति करय कय बेरि । करति कि यहन उपद्रव फेरि ॥६५॥
लङ्का देवी विकला कान । बरिया काँ नहि लागय बान ॥६६॥
पूर्व्व विरञ्चि कहल छल जैह । अनुभव होइछ भेल की सैह ॥६७॥
भावार्थः
रामजीक चरणकमल केँ ध्यान कय केँ आर सूक्ष्म रूप धारण कय केँ हनुमानजी राति भेला पर लंका मे प्रवेश कयलनि । प्रवेश करिते लंकिनी केँ बुझय मे आबि गेलैक । ओ कहलक – “अरे चोर, तूँ चुपेचाप चलल छेँ । एखनहिं तोहर दुर्दशा हम करैत छी । कि तोरा रावणक प्रताप पता नहि छौक ? तूँ चुपे-चुपे कतय चललें हँ ?” तखन हनुमानजी कहलनि – “चुप रहे ।” त ओ हुनका गारि दैत जवाब देलकनि । ताहि पर हनुमानजी समधानि कय एक मुक्का मारलनि आ ओ हारिकय धरती पर खसि पड़ल । बेर-बेर खूने रद्द करय लागल । फेर उठिकय किछु नहि कय सकल । लंकादेवी बिलखि-बिलखिकय कानय लागल – “अपना सँ बलगरक सोझाँ तीर सेहो बेकाजक भ’ जाइछ । पूर्व समय मे ब्रह्माजी जे कहने रहथि, लगैत अछि आइ ओ सत्य भ’ गेल ॥५९-६७॥
।षट्पद।
नारायण अवतार राम त्रेता मे हयता ॥६८॥
पिता-वचन सह-बन्धु जानकी सङ्गहि जयता ॥६९॥
माया-सीता ततय मूढ़ दशकन्धर हरता ॥७०॥
बालि मारि सुग्रीव सङ्ग प्रभु मैत्री करता ॥७१॥
अहँ काँ तनिकर दूत कपि, मारि मुका विकला करत ॥७२॥
कहलनि विधि शुनु लङ्किनी, तखन बुझब रावण मरत ॥७३॥
भावार्थः
‘त्रेतायुग मे भगवान् विष्णु रामक अवतार लेताह । पिताक आज्ञा सँ स्त्री एवं भाइ-सहित वन जयताह । ओतय नासमझ रावण माया-स्वरूपा सीताक हरण करत । राम बालि केँ मारिकय सुग्रीव सँ मित्रता करताह । हुनक दूत हनुमान मुक्ता लगाकय अहाँ केँ व्याकुल कय देता; ब्रह्मा कहने रहथि, हे लंकिनी, सुनू; तखन बुझब जे आब रावणक मृत्यु आबि गेल अछि ।’ ॥६८-७३॥
।चौपाइ।
वनिता-उपवन अरुण अशोक । महा भयङ्करि राक्षसि लोक ॥७४॥
जनक-नन्दिनी छथि तहि ठाम । शोभित वृक्ष शिंशपा नाम ॥७५॥
कि कहब शोभा देखब जाय । हमहूँ धन्या दर्शन पाय ॥७६॥
विजय बनल अछि यश अवदात । हमरा हानि कि सहि आघात ॥७७॥
देखब राम नवल-घनश्याम । अयोता शीघ्र रहब यहि ठाम ॥७८॥
शुनि हरि हँसल चलल उत्साह । घरहिक भेदिया लङ्का डाह ॥७९॥
जखन पवन-सुत रघुपति-चार । दुर्ग-महोदधि उतरल पार ॥८०॥
दशमुख वाम अङ्ग भुज नयन । फरकय लाग अभागक अयन ॥८१॥
भल मन्द सगुन सकल फल जान । कालक त्रास न दशमुख मान ॥८२॥
भावार्थः
लाल अशोकक एकटा महिला-उद्यान अछि । ओतय बड डराओन राक्षसी सब रहैत अछि । ओहि ठाम एकटा शीशमक गाछक नीचाँ मे जानकी छथि । हुनकर शोभा (सुन्दरता) कि कहू, जाकय देखब । हुनकर दर्शन पाबिकय हमहुँ धन्य भ’ गेलहुँ । अहाँक विजय होयत । निर्मल यश पसरत । हमरा अहाँक आघात सँ किछु नहि भेल । हम त आब नव बादल-समान श्यामल रामक दर्शन पायब । ओ शीघ्रहि अओता । हम एतय हुनकर बाट तकैत रहब ।” ॥७४-७८॥
लंकिनीक ई बात सुनि हनुमान उत्साहपूर्वक आगू बढ़लाह । कहावत अछि ‘घरक भेदिया लंका जरबैत अछि ।’ जखनहि रामक दूत पवनसुत हनुमानजी दुर्गम समुद्र केँ पार उतरलाह, तखनहि सँ रावणक बायाँ अंग, भुजा व आँखि सबटा फड़कय लागल, जे दुर्भाग्यक सूचक थिक । नीक-बेजा शकुन केर फल सब कियो जनैत अछि, लेकिन रावण त कालहु सँ नहि डराइत अछि ॥७९-८२॥
।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे सुन्दरकाण्डे प्रथमोऽध्यायः।
।मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे सुन्दरकाण्डक पहिल अध्याय समाप्त भेल।
हरिः हरः!!

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