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मिथिलाभाषा रामायण – किष्किन्धाकाण्ड सातम अध्याय – अंगद केँ हनुमानजीक उपदेश

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स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

कवि चन्द्र विरचित मिथिला भाषा रामायण
किष्किन्धाकाण्ड – सातम अध्याय
घबरायल अंगद केँ हनुमानक उपदेश, सम्पाति सँ भेंट आ लंकाक पता लागब
।सोरठा।
चिन्ता-दुर्ब्बल देह, सीतान्वेषण मे भ्रमित ॥१॥
छूटल निज निज गेह, वन-तरु-शाखा-स्थित सकल ॥२॥
भावार्थः
सीताक खोज मे भटकैत-भटकैत सभक शरीर दुब्बर भ’ गेलनि । सभक अपन-अपन घर छुटि गेलनि, सब वन मे गाछक डार्हि सब रहैत-रहैत ऊबि गेलाह ॥१-२॥
।चौपाइ।
अङ्गद कहल अपन मन-ताप । मरि गेला बालिक सन बाप ॥३॥
पिती करै छथि निन्दित काज । माइक अनुचित कहइत लाज ॥४॥
हुनका नहि पुन मारथि राम । दूइ रीति अछि एकहि गाम ॥५॥
कामी मलिन चलथि की नीति । हमरा विषय कतय हो प्रीति ॥६॥
गह्वर घुमयित गत भेल मास । रामक रक्षित हम निस्त्रास ॥७॥
यहि जीवन सौँ मरणे नीक । अयश श्रवण नित बाप पितीक ॥८॥
कनयित तनिकाँ देल सन्तोष । एतहि रहु सभ जन निर्दोष ॥९॥
से शुनि कहल वीर हनुमान । एहन न करिय बालि-सुत ज्ञान ॥१०॥
अहँ कपीश केँ प्राण समान । अङ्गद जनु करु संशय आन ॥११॥
लक्ष्मण सौँ अहँ मे अतिप्रीति । राखथि रघुवर धर्म्म सुनीति ॥१२॥
मानुष मानल अहँ मन राम । देखल पराक्रम अपनहि ठाम ॥१३॥
नारायण मानुष अवतार । छल-बल हरता अवनी-भार ॥१४॥
सत्य कहैछी निश्चय मानि । सीता विष्णुक माया जानि ॥१५॥
लक्ष्मण थिकथि शेष-अवतार। नर-लीला कर लोकाचार ॥१६॥
हमरहु सबहि लेल अवतार । थिकहुँ देवता चरित उदार ॥१७॥
अङ्गद काँ कयलनि सन्तुष्ट । करु संहार दनुज जे दुष्ट ॥१८॥
क्रम क्रम जाय महोदधि-तीर । से देखि ककरो मन नहि थीर ॥१९॥
कतहु देखि पड़ नहि किछु लक्ष । कि करब विधि जलनिधिक समक्ष ॥२०॥
गुहा भ्रमित बीतल ई मास । अतिशय अछि सुग्रीवक त्रास ॥२१॥
देखितहुँ कतहु दशानन नयन । अवश करबितहुँ अवनी-शयन ॥२२॥
सीताकाँ देखितहुँ कहुँ आँखि । कहितहुँ थिति रघुपति संभाखि ॥२३॥
बिनु देखलें जायब घर घूरि । कपि-पति देता चरणहि चूरि ॥२४॥
ई कहि कहि कुश घास ओछाय । वानर सभ बैशल पछताय ॥२५॥
भावार्थः
अंगद अपन मोनक व्यथा सुनौलनि – “बालि-जेहेन हमर पिता मरि गेलाह । पित्ती सुग्रीव निन्दनीय कर्म कय रहल छथि । माताजी कुकर्म कय रहलि अछि से बजैतो लाज लगैत अछि । तैयो राम सुग्रीव केँ नहि मारैत छथि । ओ त एक्कहि गाम मे दुइ तरहक रेबाज करैत छथि । सुग्रीव कामी छथि, कुकर्मी छथि, ओ सन्मार्ग पर केना चलताह । हमरा उपर हुनका कहियो स्नेह भ’ नहि सकैत छन्हि । गुफा-गुफा भटकैत-भटकैत महीना बीति गेल । राम हमरा सभक रक्षा करैत छथि, तेँ निर्भीक छी । लेकिन एहि तरहें जिबय सँ त मरि गेनाय नीक अछि । रोज बाप आ पित्तीक निन्दा सुनैत छी ।” ॥३-८॥
एहि तरहें कनैत-बिलखैत अंगद केँ हनुमानजी सान्त्वना देलनि – “निःशंक भ’ सब गोटे एतहि रहू ।” फेर वीर हनुमान कहलनि – “हे बालिसुत अंगद ! अहाँ एहेन ज्ञान एकदम नहि करू । अहाँ कपीश (सुग्रीव) केँ प्राणक समान प्रिय छियनि । अहाँ कोन आन तरहक संशय (शंका) नहि करू । लक्ष्मणहु सँ बेसी प्रेम अहाँ पर श्री रामजी केँ छन्हि । रघुवर हमेशा धर्मक आ सुनीति केर रखनिहार थिकाह । अहाँ भ्रमवश राम केँ मनुष्य बुझि गेलहुँ अछि । जखन कि अहाँ अपन घरहि मे हुनकर पराक्रम देखि लेलहुँ अछि । भगवान् नारायण मनुष्य रूप मे अवतार लेलनि अछि । ओ माया द्वारा धरतीक भार दूर करताह (छल आ बल केँ हरताह) । हम सत्य कहि रहल छी, एकरा निश्चिते टा मानि लेब । सीता केँ विष्णुक माया रूप मे जानब । लक्ष्मण शेषनागक अवतार छथि जे एहि लोकाचार हेतु मनुष्यक लीला कय रहल छथि । हमरा लोकनि सेहो वास्तव मे अवतारे छी आ हम सब उदार चरित देवता थिकहुँ ।” ॥९-१७॥
एहि तरहें हनुमानजी अंगद केँ बोल-भरोस देलनि आ कहलनि जे दुष्ट दनुज सभक संहार करू । क्रम-क्रम (बेराबेरी) ओ सब गोटे महासागरक किनार धरि पहुँचि गेलाह । अगाध समुद्र केँ देखि किनको मन स्थिर (दृढ़) नहि रहलनि । “कतहु कोनो लक्ष्य नहि देखाय पड़ैछ । एहि समुद्रक सोझाँ कोन उपाय कयल जाय ? खोह सब मे घुमैत-घुमैत एक मास बीति गेल । सुग्रीवक अतिशय त्रास सब मे भरल अछि । “यदि कतहु रावण केँ आँखि सँ देखितहुँ त ओकरा मारिकय अवश्ये टा धरती पर सुता दितहुँ । यदि सीता केँ कतहु देखितहुँ तँ राम केँ खबरि कय दितहुँ । यदि बिना देखनहि लौटब त सुग्रीव लातक प्रहार सँ कचूमर निकालि देताह ।” – एना कहि-कहिकय वानर लोकनि कुश आ फूस केर आसन बिछाकय बैसिकय पछताय लगलाह ॥१८-२५॥
सम्पाति सँ भेंट आ लंकाक पता चलब
।सबैया छन्दः।
तखन महेन्द्राचलक गुहा सौँ शञ्च शञ्च बहरायल गृद्ध ॥२६॥
पर्व्वत सन से सभ वानर काँ कहलनि मांसप्रिय अतिवृद्ध ॥२७॥
दिन दिन एक एक काँ खायब से शुनि वानर सकल डराय ॥२८॥
कहल जटायु धन्य खग छल छथि पाओल मुक्ति गृद्ध-तन पाय ॥२९॥
शुनि सम्पाति जटायुक चर्च्चा कर्णामृत सन मन मन मानि ॥३०॥
कहल कहू निर्भय भय कपि-कुल करब न ककरो जीवन-हानि ॥३१॥
जाय समीप कहल अङ्गद सभ शुनु हम कहइतछी वृत्तान्त ॥३२॥
पृथिवी-भार-हरण कारण विभु अवतरला महि लक्ष्मीकान्त ॥३३॥
भावार्थः
ओकर बाद महेन्द्र गिरि सँ धीरे-धीरे एकटा गिध बहरायल । ओ पहाड़-सन विशाल आ बूढ़ छल । मांस ओकरा बड प्रिय रहैक । ओ कपि सब सँ कहलक – “रोज एक-एकटा वानर केँ हम खायब ।” ई सुनिकय वानर सब डरा गेलाह । कुपित वानर सब आपस मे बजलाह – “धन्य रहथि जटायु जे गिधक शरीर पाबियोकय मुक्ति पेलनि ।” ओ गिध, जेकर नाम सम्पाती रहैक, जटायुक चर्चा सुनलक । से ओकरा कान मे अमृत समान लगलैक । ओ कहलक – “हे कपिगण, अहाँ सब निर्भय भ’ अपन परिचय कहू । हम केकरो नहि मारब ।” तखन अंगद लग मे जाकय कहलखिन – “सुनल जाउ, हम सबटा हाल कहैत छी । पृथ्वीक भार केँ दूर करबाक लेल परमेश्वर विष्णु अवतार लेलनि अछि ॥२६-३३॥

।चौपाइ।

सीता-सह सानुज रघुनाथ । अयला वन पितृ-आज्ञा लाथ ॥३४॥
रावण छलसौँ सीता-हरण । कयलक ध्रुव तनिकर लग मरण ॥३५॥
शुनितहिँ वैदेहीक विलाप । कयल जटायु गतायु प्रताप ॥३६॥
युद्ध विरुद्ध कयल से घोर । कहि कहि दुष्ट दशानन चोर ॥३७॥
रावण तनिकाँ मारल बाण । मूर्छित खसला तन धर प्राण ॥३८॥
मोक्ष जटायुक अन्त चरित्र । रामचन्द्र काँ कपिपति मित्र ॥३९॥
बालि-निधन सुग्रीवक राज । अयलहुँ सभहुँ तनिक हित काज ॥४०॥
सीता तकइत तकइत आज । अयलहुँ एहि गह्वरक समाज ॥४१॥
बहुत विलम्ब बितल एक मास । सुग्रीवक हो अतिशय त्रास ॥४२॥
लवणोदधिक आबिकेँ तीर । जायत प्राण कि रहत शरीर ॥४३॥
वृद्ध गृद्ध अँह काँ दुर सूझ । हमरा सबहिक आधि के बूझ ॥४४॥
जनक-नन्दिनी छथि जे गाम । कहू दयामय मन दय ठाम ॥४५॥
अङ्गद-वचन शुनल से गृद्ध । कहलनि भ्राता छल छथि वृद्ध ॥४६॥
कति सहस्र बीतल अछि वर्ष । वार्त्ता शुनि मन बाढ़ल हर्ष ॥४७॥
कहब जतय छथि वचन सहाय । जलक समीप दिअओ पहुचाय ॥४८॥
पहुचाओल समुद्रक कात । देल तिलाञ्जलि कहि सहजात ॥४९॥
पुनि पहुचाओल पहिलहि ठाम । कहल तखन किछु समय विराम ॥५०॥
गिरि त्रिकूट पर लङ्का नाम । पुरी अशङ्क दशानन-धाम ॥५१॥
छथि वैदेही विपिन अशोक । कोटवार अछि राक्षसि लोक ॥५२॥
योजन शत कत जलचर पानि । से समुद्र जे जयता फानि ॥५३॥
से सीता काँ देखथि जाय । सत्य कथा हम देल जनाय ॥५४॥
रावण-वध करबा हम दक्ष । कि करब सम्प्रति नहि गति पक्ष ॥५५॥
गृद्ध लोककाँ सूझय दूर । करु उपाय उत्तम जे फूर ॥५६॥

भावार्थः

पिताक आज्ञाक बहाने सीता आ लक्ष्मण संग राम वन मे अयलाह । रावण छलपूर्वक सीताक हरण कय लेलक । ओकर मृत्यु आब नजदीक आबि गेल छैक । सीताक विलाप सुनितहि वृद्ध जटायु बड पैघ पराक्रम कयलनि । दुष्ट रावण केँ चोर कहि-कहिकय ओकरा संग घोर युद्ध कयलनि । रावण हुनका एक बाण मारलक । ओ मूर्च्छित भ’ खसि पड़लाह आ प्राण त्यागि देलनि । जटायु केँ जीवनक अन्त मे मोक्ष भेट गेलनि । तेकर बाद रामजीक सुग्रीव संग मित्रता भेलनि । बालि मारल गेलाह । सुग्रीव केँ राज्य भेटलनि । हम सब वैह रामक मदति लेल निकलल छी । सीता केँ तकैत-तकैत हम सब एहि खोह धरि पहुँचल छी । बहुत समय लागि गेल । एक मास बीति गेल । आब सुग्रीवक बहुते डर लगैत अछि । आब लवण-सागरक किनार पर आबि हम सब असमंजस मे पड़ि गेल छी, के कहय, जान बचत कि चलि जायत । हे वृद्ध गिध! अहाँ केँ त बहुत दूर धरि सूझैत अछि । हमरा लोकनिक चिन्ता आर के बुझत । हे दयामय, कृपा कय ई कहू जे जनकपुत्री सीता कतय छथि ?” ॥३४-४५॥

अंगदक बात सुनिकय ओ गिध बजलाह – “बूढ़ जटायु हमर भाइ रहथि । कतेको हजार वर्षक बाद आइ हुनकर समाचार सुनिकय बहुत प्रसन्नता भेल । हम केवल वचन सँ सहायता करब, ई कहि देब जे सीता कतय छथि । हमरा समुद्रक किनार धरि पहुँचा त दिय’ ।” फेर ओ समुद्रक किनार पर आनल गेलाह । ओ सहोदर भाइ कहिकय जटायु केँ तिलाँजलि देलनि । फेर ओ पूर्व स्थान पर गेलाह, तखन किछु समय रुकिकय ओ कहलनि । त्रिकूट पर्वत पर लंका नामक एकटा नगर अछि । ओतय रावण निरापद रूप सँ रहैत अछि । ओतय सीता अशोक वाटिका मे राखल गेलि अछि । राक्षसी सब हुनकर रखबारि करैत अछि । जे सौ योजन मे पसरल भाँति-भाँतिक जलचर व जलराशिवला समुद्र केँ नाँघिकय ओहि पार पहुँचि सकैछ वैह व्यक्ति जाकय सीता केँ देखि सकैछ । सत्य बात हम बता देलहुँ । हम त रावण केँ मारय मे समर्थ छी, मुदा कि करू, आब हमर पाँखिये बेकार भ’ गेल अछि । गिध पक्षी केँ दूर धरि सूझैत छैक । आब एहेन उपाय करू जे सब सँ उत्तम बुझय मे आबय ॥४६-५६॥

।सवैया छन्द।

शतयोजन जलनिधि सुख फानथि, लङ्कापुरी अशङ्कित जाय ॥५७॥
वैदेहीक कुशल सभ जानथि, समाचार सन्तोष शुनाय ॥५८॥
फानथि पुन निर्भयसौँ जलनिधि, छथि के यहि मे करू विचार ॥५९॥
होयत कार्य्य-सिद्धि निश्चय अछि, श्री नारायण-कृपा अपार ॥६०॥

भावार्थः

एहि सब मे सँ के एहेन वीर छथि जे सौ योजन धरि पसरल समुद्र केँ नाँघि सकैत छथि, निःशंक भ’ कय लंकापुरी मे प्रवेश कय सकैत छथि, फेर सीताक कुशल-समाचार जानिकय आ हुनका बोल-भरोस दय कय फेर ओ समुद्र केँ निर्भय भ’ पार कय सकैत छथि ? काज अवश्य बनत, कियैक तँ नारायणक बड पैघ कृपा अछि ।” ॥५७-६०॥

।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला‍-भाषा रामायणे किष्किन्धाकाण्डे सप्तमोऽध्यायः।

।मैथिल चन्द्रकवि विरचित मिथिलाभाषा रामायण मे किष्किन्धाकाण्डक सातम अध्याय पूरा भेल।

हरिः हरः!!

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