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मिथिलाभाषा रामायणः अरण्यकाण्ड दसम अध्याय – शबरी सँ भेंट आ ओकर मोक्ष प्राप्त करब

615 भ्यूज

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण

अरण्यकाण्ड – दसम अध्याय

शबरी सँ भेंट आ ओकर मोक्ष प्राप्त करब

।चौपाइ।

ओ वन छोड़ि वनान्तर प्राप्त । सीता-विरह-अग्नि मन व्याप्त ॥१॥
शबरी देखल प्रभुक स्वरूप । आइलि आनन्दमयि चुप चूप ॥२॥
मन एकाग्र सनक सन केश । दिनकर-कान्ति तपस्विनि-वेश ॥३॥
राम-चरण पर धयलनि माथ । कह जय जय सानुज रघुनाथ ॥४॥
पुलक शरीर नयन बह नोर । कह जय जय जय श्यामल गोर ॥५॥
निकटहि कुटि देखक थिक ओह । नाथ परशमणि हम छी लोह ॥६॥
हम कुवस्तु जन जन विख्यात । प्रभु रवि-चन्द्र-किरण-संघात ॥७॥
शबरी-भक्ति-विवश श्रीराम । हर्षित गेला तनिकर धाम ॥८॥
भल भल जल लय पयर धोआब । से जल लय लय माथ चढ़ाब ॥९॥
कन्द मूल फल भल भल आन । अतिशय प्रेम-मगन भगवान ॥१०॥
खाथि कहथि अमृतक अभिमान । हरल यहन रसना रस जान ॥११॥

भावार्थः

सीताक विरह केर आइग सँ सन्तप्त-हृदय राम ओहि वन केँ छोड़िकय दोसर वन मे अयलाह । ओतय शबरी प्रभु रामक स्वरूप देखि आ आनन्द-विभोर भ’ चुपेचुप हुनका लग दौड़ल अयलिह । ओ रामक पैर पर अपन माथ राखि देलिह आ बजलिह – “अनुज सहित रघुनाथ केर जय हो ।” हुनकर देह पर रोइयाँ ठाढ़ भ’ गेलनि । आँखि सँ नोर बहय लगलनि । ओ जयकार करय लगलिह – “श्याम आ गौरवर्ण वला राम आ लक्ष्मण केर जय हो ! ओ लगे मे हमर कुटिया अछि, कनी देखू । प्रभु, अहाँ पारस छी आ हम लोहा छी । हम तुच्छ छी, से सब गोटे जनैत अछि । अहाँ तँ सूर्य आ चन्द्र केर किरण-पुंज समान देदीप्यमान छी ।” शबरीक भक्ति सँ विवश भ’ राम हर्षक संग ओकर घर पर गेलाह । ओ पानि आनिकय खुब नीक सँ हुनकर चरण पखारलनि आ चरणक पानि लय अपन माथ पर छिटलनि । खुब बढियाँ-बढियाँ कन्द-मूल-फल लय अनलिह । भगवान राम बड प्रेम मे मग्न भ’ खाइत छथि आ कहैत छथि – “अरे, ई त अमृतहु केर घमंड केँ चूर करैत अछि, जीह केँ एहेन स्वाद लागि रहल अछि ।” ॥१-११॥

।गीत दोबय छन्द।

कि कहब करणी, हे प्रभु, हम शबरक घरणी ॥१२॥
चारू पन हम वनहि गमाओल, विषय-व्याध हम जनु हरिणी ॥१३॥
ई संसार-समुद्र तरब हम, पायोल प्रभुक चरण तरणी ॥१४॥
माया-मानुष भूप-शिरोमणि, श्याम गौर छवि की वरणी ॥१५॥
निर्ग्गुण ब्रह्म सगुण बनि अयलहुँ, मन आनन्द अमर धरणी ॥१६॥
योग-अनल जरि तत्पद पायोब, जतय न फेरि जनन मरणी ॥१७॥
जय जय रामचन्द्र जय लक्ष्मण, मायापन्नगि हम भरणी ॥१८॥

भावार्थः

शबरी कहलिह – “हम अपन करनी कि कहू ? हे प्रभु, हम त शबर जातिक स्त्री छी । जीवनक चारू अवस्था केँ हम जंगलहि मे बर्बाद कयलहुँ । हम हरिनक समान बहैत रहलहुँ आ विषय रूपी व्याध हमर शिकार करैत रहल । आब हम एहि संसार रूपी समुद्र केँ पार कय जायब, कियैक तँ अहाँक चरणरूपी जहाज भेटि गेल हँ । अहाँ मायाक माध्यम सँ मनुष्यक रूप धारण कय श्रेष्ठ राजा बनल छी । अहाँ दुनू गोटेक श्याम आ गौरवर्णक छटाक वर्णन कतय धरि करू । अहाँ निर्गुण ब्रह्म भ’ कय सगुण-साकार बनिकय अयलहुँ । हमर मन आनन्दित भ’ गेल । घर अमर भ’ गेल । आब हम योगक आइग मे जरिकय ओहि परम पद केँ प्राप्त करब, जेतय जाय केँ फेर जन्म आ मरण नहि होइत अछि । रामचन्द्र केर जय हो ! लक्ष्मण केर जय हो ! हम मायारूपी नागिन केर डसल छी । ॥१२-१८॥

।चौपाइ।

गुरु महर्षि छल छथि यहि ठाम । से सब गेला ब्रह्मक धाम ॥१९॥
चलयित तनिकाँ कयल प्रणाम । ओ कहलनि थिर रह यहि ठाम ॥२०॥
राक्षस लोक क मारण काम । अयोता रघुनन्दन यहिठाम ॥२१॥
सम्प्रति चित्रकूट गिरि वास । भक्तिमती तोर पूरत आस ॥२२॥
यावत आबथि विभु रघुवीर । तावत राखह अपन शरीर ॥२३॥
तनिकर दर्शन जे छन प्राप्त । जयबह तत्पद देह समाप्त ॥२४॥
जेहन कहल छल सुगुरु महान । तेहन कयल छल अपनैँक ध्यान ॥२५॥
पुरल मनोरथ देखल आँखि । हम कृत्यकृत्य वृथा की भाखि ॥२६॥
नहि दासीत्व विषय अधिकार । तदपि कयल प्रभु हमर उधार ॥२७॥
यावत योग-अनल हम जरब । प्रभु रहु निकट विकट तम तरब ॥२८॥

भावार्थः

गुरु, महर्षि लोकनि सब एतय रहैत छलथि । ओ सब ब्रह्मलोक चलि जाय गेलाह । जाइत समय हुनका हम प्रणाम कयलहुँ । ओ कहलनि – ‘तूँ एतहि टिकल रहिहें । राक्षस सभक संहार कयबाक लेल राम एतय अओता । एखन तूँ चित्रकूट पर्वत पर वास करे । हे भक्तिमती, तोहर मनोरथ पूरा हेतौक । जाबत धरि परमेश्वर राम एतय नहि आबथि, ताबत धरि तूँ अपन शरीर केँ कायम रखिहें । जाहि क्षण हुनकर दर्शन भ’ जेतौक, ताहि क्षण तोहर शरीर समाप्त भ’ जेतौक आर तूँ हुनकर पद (रामक सायुज्य) केँ प्राप्त करमें ।’ जेना महान् सद्गुरु कहने रहथि, हम ओहिना कयलहुँ अछि आ अहाँक ध्यान लगेने रहलहुँ । आइ अपन आँखि सँ अहाँ केँ देखलहुँ । हमर कामना पूर्ण भ’ गेल । हम कृतकृत्य भ’ गेलहुँ । बेसी कहिकय कि होयत ? हम एहेन जातिक छी जे अहाँक दासियो बनबाक अधिकार नहि अछि । तैयो अहाँ हमर उद्धार कयलहुँ । जाबत धरि हम योगक आइग मे जरैत छी, ताबत काल धरि अहाँ कृपा कय केँ हमर लगहि मे रहू । हम आइ विकट अन्हारक पार उतरब । ॥१९-२८॥

।सोरठा।

प्रभु पम्पासर जाउ, किष्किन्धा सुग्रीव छथि ॥२९॥
सीता-वार्ता पाउ, करु चरित्र माया-रचित ॥३०॥
प्रभुपद-कमल निहारि, महाभक्ति सम्प्राप्त से ॥३१॥
योग-अग्नि तन जारि, भक्तिमती कयलनि तथा ॥३२॥

हे प्रभु, अहाँ पम्पासर जाउ । ओतय किष्किन्धा मे सुग्रीव रहैत छथि । ओतय सीताक खोज कयल जाउ । ओतय मायावश मानव केर लीला कयल जाउ ।” एतेक कहिकय शबरी रामक चरण-कमल केर दर्शन कयलिह आ भक्तिक सागर मे निमग्न भ’ गेलिह । फेर योगक आइग मे शरीर केँ जराकय ओ भक्तशिरोमणि ओहिना कयलिह जेना कहल गेल रहनि ॥२९-३२॥

।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे आरण्यकाण्डे दशमोऽध्यायः।

।मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिलाभाषा रामायण में अरण्यकाण्डक दसम अध्याय समाप्त भेल।

हरिः हरः!!

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