मूल भाषा सँ कहियो नहि भटकू

सम्पादकीय

मूल भाषा सँ कहियो नहि भटकू

अपन मूल पहिचान सँ दूर होयब आजुक फैशन बनि गेल अछि। स्वयं अपन भाषाक प्रयोग करय मे लज्जाबोध अथवा हीनताबोध अपूर्ण ज्ञान आ जीवन मे भटकल लक्ष्य रखबाक एक तरहक बीमारीक लक्षण होइछ। परञ्च बेसी लोक एहि तरहक नकारात्मकताक शिकार परिवेश आ परिस्थितिक कारण भ’ गेल करैत अछि। केकरो ई लगैत छैक जे हमर अन्य भाषाभाषी मित्र हमर भाषा सुनि कि सोचत, केकरो ई लगैत छैक जे अपन भाषा प्रचलन मे नहि अछि त कियैक प्रयोग करी। मुदा एकर खराब असर अपनहि आत्मा सँ अपने दूर भेनाय होइत छैक। एकर दूरगामी असर ओकर भविष्यक पीढ़ी पर सेहो पड़ैत छैक। आगू दिन मे परिवारक लोक भाषा सँ भटकि कय संस्कार आ परम्परा सँ भटकब सुनिश्चित भ’ जाइत छैक। शुरू मे एहेन खराब परिणाम बारे थाहे नहि पबैत अछि, लेकिन समाज मे एहेन कतेको उदाहरण नजरि पड़त जे अपन भाषा बिसरबाक चलते केना परिवारक संस्कार खराब भ’ गेल करैत छैक। बाद मे सुधारो करब मुश्किल भ जाइत छैक। तेँ अपनहि मन-बुद्धि आ चेतना सँ जेना लोक स्वयं केर मूलशक्ति ‘आत्मा’ सँ बात करैत अछि, तेकरा सरेआम लोकव्यवहार मे अपनेनाय जरूरी छैक। एहि सँ ज्ञान आ संस्कारक परिपूर्णता अबिते टा छैक। परिवारक संस्कार मे सेहो नित्य प्रगति आ उन्नति होइत छैक।