मिथिलाभाषा रामायण – अरण्यकाण्ड
कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण केर अरण्यकाण्ड आरम्भ
अथ अरण्यकाण्ड
।शिखरिणी छन्दः।
भ्रमन्तौ कान्तारे क्षयितदनुजौ त्यक्तनगरौ ॥१॥
किशोरौ सद्वीरौ जनकतनया-रक्षणपरौ ॥२॥
जटावन्तौ दान्तौ करकमल-चापाशुगधरौ ॥३॥
सदापायास्तान्नो दशरथतनूजौ नरवरौ ॥४॥
भावार्थः
दशरथ केर पुत्र किशोर, वीरवर, पराक्रमी, पुरुष-श्रेष्ठ राम आ लक्ष्मण हमरा लोकनिक पालन करथि जे राक्षस सब केँ मारिकय, नगर छोड़ि वन मे घूमि रहल छथि, जनकसुता जानकीक रक्षा मे तत्पर छथि, सिर मे जटा धारण कएने छथि आ कर-कमल मे तीर-धनुष लेने छथि ॥१-४॥
विराधक मुक्ति
।चौपाइ।
एकदिन रहि प्रभु पुन चललाह । अरिआतय मुनि सङ्ग चललाह ॥५॥
राम कहल अपनैँ घुरि जाउ। कृपायुक्त वन-बाट देखाउ ॥६॥
शुनि मुनि कहलनि होमहि बूझ । अपनैँ काँ प्रभु कतय न सूझ ॥७॥
हमर शिष्य लौकिक व्यवहार । बाट देखौता उचित विचार ॥८॥
चलला एक कोश प्रभु भूमि । अत्रिशिष्यसौँ कहलनि घूमि ॥९॥
देखि पड़ै अछि नदी अथाहि । निर्ज्जन भेट नाब कि ताहि ॥१०॥
शिष्य कहल प्रभु अछि भल नाब । देखब खेबि लबै छिय आब ॥११॥
तिनु जनकाँ लेल नाब चढ़ाय । क्षणमे देलनि पार लगाय ॥१२॥
अपने लोक कयल बड़ काज । गेल जाय मुनि अत्रि-समाज ॥१३॥
विपिन भयङ्कर सह सह साप । सिंह बाघ वन-जन्तु कलाप ॥१४॥
झिल्ली करय घोर झंकार । राक्षस विकट विकट संचार ॥१५॥
शुनु लक्ष्मण कहलनि रघुवीर । यतनहि चलिय सज्ज धनुतीर ॥१६॥
भावार्थः
एक दिन ओतय विश्राम कय भगवान् रामचन्द्र फेर आगू बढ़लाह । मुनि अत्रि अरियातय लेल किछु दूर धरि हुनका संग लागि चललाह । राम कहलनि – “अपने कृपया घुरि जाउ, खाली वनक रस्ता टा हमरा बता दियह ।” मुनि से सुनिकय कहलनि – “सब त अपने केँ विदिते अछि । हे प्रभु, अपने केँ भला कतय नहि सुझैत अछि (अर्थात् अपने सँ कोन जगह अन्जान अछि) । तैयो हमर ई शिष्य लोकनि दुनियाक रीति अनुसार अपनेक यथोचित मार्गदर्शन करताह ।” प्रभु रामचन्द्र एक कोस रस्ता चललाह, फेर पाछू घुरिकय अत्रि मुनिक शिष्य सब सँ कहलनि – “देखि रहल छी जे आगाँ अथाह नदी अछि । जगह निर्जन अछि । कि एहेन सुन्न स्थान पर नाव भेटि सकैत अछि ?” शिष्य सब कहलखिन – “हे प्रभु ! किनार पर नाव अछि । देखू, हम तुरन्त खेबिकय आनि लैत छी ।” शिष्य सब नाव आनिकय ओहिपर राम, लक्ष्मण आ सीता तीनू गोटे केँ चढ़ा लेलनि आ क्षणहि भरि मे ओहि पार पहुँचा देलनि । तखन राम शिष्य सब सँ कहलनि – “अहाँ सब बहुते परिश्रम कयलहुँ । आब अहाँ सब अत्रि मुनि लग जा सकैत छी ।” फेर राम लक्ष्मण सँ कहलनि – “वन बड डराओन अछि, जेम्हर-तेम्हर साँपे सब देखाय दय रहल अछि । सिंह, बाघ आदि जंगली जानवर सभक भरमार अछि । झिल्ली सब तेज आवाज कय रहल अछि । बड़-बड़ डराओन राक्षस सब घूमि रहल अछि । अतः हे लक्ष्मण ! तीर-धनुष लेने सावधानी सँ संगे-संग चलू ॥५-१६॥
।दोहा।
आगाँ हम पाछाँ अहाँ, सीता माझहि ठाम ॥१७॥
ब्रह्म जीव माया जेहनि, चलु दण्डक वन नाम ॥१८॥
भावार्थः
आगाँ हम आ पाछाँ सँ अहाँ, सीता बीच (मध्य) मे रहती, ओहिना जेना ब्रह्म आर जीव केर बीच मे माया रहैत छथि ॥१७-१८॥
।चौपाइ।
सभ दिश लक्ष्मण तकितहि रहब । आबय दुष्ट शीघ्र से कहब ॥१९॥
कहइत योजन डेढ़ प्रमान । जाय देखल एक दिव्य स्थान ॥२०॥
शोभासीम अनूप तड़ाग । सुन्दर वारि अमृत सम लाग ॥२१॥
उत्पल कमल कुमुद कह्लार । जल-पक्षी कर विविध विहार ॥२२॥
जाय समीप पीबि किछु पानि । बैसला तरुतर छाया जानि ॥२३॥
अबइत देखल एक उतपात । वदन भयङ्कर भयकर गात ॥२४॥
गर्ज प्रचण्ड मेघ समतूल । कत मानुष गाँथल छल शूल ॥२५॥
महिष बाघ गज शूकर खाय । चटचट हाड़ समेत चिबाय ॥२६॥
शुनु लक्ष्मण कहलनि रघुवीर । धनु कोदण्ड हाथ करु तीर ॥२७॥
आबि गेल राक्षस बड़ गोट । दौड़ल अबइत अछि बड़ मोट ॥२८॥
जानकि जनु मन मानब त्रास । हिनकर एहिखन करब विनाश ॥२९॥
राम बाण धय अचल समान । ठाढ़ भेला ओकरे दिश ध्यान ॥३०॥
ओ प्रभु निकट विकट हँसलाह । जयबह कतय आब फसलाह ॥३१॥
मुनिसन वेष धनुष शर हाथ । अति निर्भय मन करह न लाथ ॥३२॥
स्त्री-सहाय छह युगल कुमार । हे सुन्दर के देल विचार ॥३३॥
अयला बन नहि बचतौ प्राण । हमरा मुह तेहि ग्रास प्रमाण ॥३४॥
कह कह बनमे छौ कि काज । ई दण्डक-वन दनुजक राज ॥३५॥
राम कहल शुन राक्षस घोर । कतय पड़यबह पकड़ल चोर ॥३६॥
हमर नाम कहइछ जन राम । पिता-वचन सौँ छोड़ल धाम ॥३७॥
लक्ष्मण भ्राता हमर कनिष्ठ । त्रिभुवन-विजयी वीर बलिष्ठ ॥३८॥
प्राण-वल्लभा सीता नाम । काज शुनह अयलहुँ एहिठाम ॥३९॥
तोर सन जन रण-शिक्षा देब । मुनिक मण्डली मे यश लेब ॥४०॥
राम – वचन शुनि हँसल से घोर । देखब राम केहन बल तोर ॥४१॥
शूल हाथ दौड़ल मुह बाय । देखितहिं सभकाँ जयबहु खाय ॥४२॥
जनयित नहि छह नाम विराध । मृग-मुनि-जनक वनक हम व्याध ॥४३॥
कत कत मुनिकाँ गेलहुँ खाय । बाँचल से जे गेल पड़ाय ॥४४॥
त्यागि अस्त्र दुनु बन्धु पड़ाह । सीताकाँ हमरा दय जाह ॥४५॥
जौँ जिबइक इच्छा संसार । सत्वर करह यहन व्यवहार ॥४६॥
बल लेब जानकि दौड़ल डाँटि । शरसौँ राम तनिक भुज काटि ॥४७॥
हँसइत मन नहि कोपक लेश । श्रीरघुनन्दन प्रबल नरेश ॥४८॥
मुह बओलैँ दौड़ल खल फेरि । पयर काटि लेलथिनि तहि बेरि ॥४९॥
ससरल आबय करय प्रताप । मुह बओलैँ जनु अजगर साप ॥५०॥
अर्द्ध-चन्द्र-बाणैँ तनि माँथ । चटपट काटल श्रीरघुनाथ ॥५१॥
पृथिवी-तल ककरहु नहि टेर । से खल खसल रुधिर भेल ढेर ॥५२॥
प्रभु-महिमा किछु कहल न जाय । सीता प्रभु-तन गेलि लपटाय ॥५३॥
दिवि दुन्दुभि निर्भीति बजाव । अप्सरादि नाचथि कय भाव ॥५४॥
गाबथि किन्नर-गण गन्धर्व्व । धन्य धन्य प्रभुकाँ कह सर्व्व ॥५५॥
भावार्थः
हे लक्ष्मण ! चारू दिश नजरि राखब । जहिना कोनो दुष्ट राक्षस आबय, तुरत हमरा बता देब ।” ॥१९॥
एना कहिते जखन डेढ़ योजन लगभग आगू बढ़लाह तखन राम एक गोट मनोरम (सुन्दर) स्थान देखलनि । असीम शोभावला एक गोट अनुपम पोखरि छल । ओकर सुन्दर जल एहेन लगैत छल मानू अमृत हो । ओहि पोखरि मे लाल कमल, श्वेत कमल, कुमुद, कल्हार आदि फूल लागल छल आ जलचर पक्षी सब केलि कय रहल छल । तीनू गोटे ओहि पोखरि लग गेलाह, किछु पानि पिलनि आ गाछक नीचाँ छाहरि देखिकय बैसि रहलाह । एतबे मे एकटा आफद (उत्पात) केर बात देखलनि । ओकर चेहरा विकराल आ शरीर भयंकर भयभीत करयवला छलैक । ओ मेघ जेकाँ प्रचण्ड गर्जन करैत रहय । कतेको मनुष्य केँ अपन बरछी मे गँथने छल । महींस, बाघ, हाथी आ सुग्गर मारि-मारिकय खाइत छल आ हड्डी-सहित कड़कड़ा कय चिबा जाइत छल । रामचन्द्र ई देखलनि आ लक्ष्मण सँ कहलनि – “हे लक्ष्मण ! सुनू ! आब तीर-धनुष हाथ मे लियह । बहुते भारी राक्षस आबि गेल अछि । ओ विशालकाय राक्षस एम्हरे दौड़ल आबि रहल अछि । हे जानकी ! अहाँ मन मे डर जुनि करब । हम एकरा तुरन्त नाश कय देब ।” एतेक कहिकय राम पर्वतक समान अटल भ’ कय तीर हाथ मे लेलनि आ ओकरे दिश नजरि गड़ाकय ठाढ़ भ’ गेलथि । ओ राक्षस प्रभु राम लग आयल आ अट्टहास करैत बाजल – “आब तूँ कतय जेबह ? एकदम खराब ढंग सँ फँसि गेल छह । तोहर बाना त मुनि-जेहेन लगैत अछि, तैयो तोहर हाथ मे तीर आ धनुष लेने देखाइत छह । तोहर मोन मे कनिकबो डर नहि छह की ? हमरा संगे छल नहि करिहह । तूँ मात्र दू आदमी छह, सेहो काँच उमेरक आ संग मे महिला सेहो छथुन । अरे सुन्दर ! के तोरा विचार देलकह जे तूँ जंगल मे आबि गेलह ? आब त तोहर प्राणो नहि बचतह । हमर विशाल मुँहक लेल त तूँ एक कौर बराबर छह । कहह, कहह तऽ, एहि वन मे अयबाक तोरा कोन जरूरत पड़लह ? जनैत छह, ई दंडक-वन छी । एतय राक्षस सभक राज अछि ।” ॥२०-३५॥
राम उत्तर देलखिन्ह – “अरे घोर राक्षस ! सुनह, तूँ भागिकय कतय जयबह ? हम चोर केँ पकड़ि लेलहुँ । हमर नाम राम अछि । हम पिताक आज्ञा सँ नगर छोड़ि एतय आयल छी । ई हमर छोट भाइ लक्ष्मण छथि । ई एहेन वीर-बलिष्ठ छथि जे तीनू लोक केँ जीति सकैत छथि । ई हमर प्राण-प्यारी थिकीह, जिनकर नाम सीता छन्हि । आब ई सुनह जे हम कोन काजे एतय आयल छी । हम तोरा-जेहेन (उद्दण्ड) लोक सब केँ लड़ाइ केर सीख देबय आ (नाश कयकेँ) मुनि लोकनिक समाज मे यश पाबय आयल छी ।” ॥३६-४१॥
रामक बात सुनिकय ओ राक्षस जोर सँ हँसि पड़ल (आ बाजल) – “राम, आब हम लड़िकय देखब जे तोहर कतेक ताकत छह ।” एतेक कहिते ओ हाथ मे बरछी लेने मुँह बेने दौड़ल (आ बाजल) – “हम देखिते-देखिते तोरा सब केँ खा जैबह । जनैत नहि छह, हमर नाम विराध छी । मृगरूपी मुनि सभक जंगलक व्याघ्र छी । कतेको रास मुनि केँ हम चट कय गेल छी । वैह मुनि टा बचि सकलाह जे भागि गेलाह । हथियार छोड़िकय तुहूँ दुनू भाइ भागि जाह आ सीता हमरा लग छोड़ि जाह । यदि एहि संसार मे तोरा जीबाक इच्छा छह त एना काज करह ।” ॥४२-४६॥
एहि तरहें दहाड़िकय ओ बलजोरी सीता केँ पकड़बाक लेल दौड़ल । राम तीर सँ ओकर बाँहि काटि देलनि । ओ हँसि रहल छलाह । हुनकर मोन मे नामोमात्रक क्रोध नहि रहनि । राम बड़ा पराक्रमी राजा रहथि । फेर ओ बदमाश मुँह बाबिकय दौड़ल आ एहि बेर राम ओकर टाँग काटि देलनि । तखन ओ अजगर जेकाँ मूँह बेने ससरिकय आर पराक्रम करिते आगाँ बढ़ल । राम अर्द्धचन्द्राकार बाण सँ ओकर मूड़ी केँ काटि देलनि । जे धरती पर केकरो टेरैत नहि छल से बदमाश खसि पड़ल आ खून सँ लथपथ भ’ गेल । रामक महिमा कहल नहि जा सकैछ । सीता डराकय रामक शरीर सँ लिटपि गेलिह । अप्सरा सब भय सँ मुक्त भ’ आकाश मे नगाड़ा बजबय लगलिह आ हाव-भाव केर संग नाचय लगलिह । किन्नर आ गन्धर्व सब गीत गाबय लागल तथा सब कियो रामक जय-जयकार केर नारा लगबय लागल ॥४७-५५॥
।दोहा।
भेल विराधक देह सौँ, दिव्य पुरुष उत्पन्न ॥५६॥
दिव्य वसन भूषण कनक, रवि-रुचि गुण-सम्पन्न ॥५७॥
भावार्थः
तखन ओहि विराधक शरीर सँ एकटा दिव्य मनुष्य निकलल । ओकर वस्त्र आर स्वर्णभूषण अलौकिक छलैक आ ओ गुणवान् एवं सूरज-समान चमकि रहल छल ॥५६-५७॥
।चौपाइ।
बद्धाञ्जलि रामक लग ठाढ़ । नाथ छोड़ाओल सङ्कट गाढ़ ॥५८॥
बेरि बेरि से करथि प्रणाम । कहि सानुज सीतापति राम ॥५९॥
हम विद्याधर विमल-प्रकाश । देखल-नयन भरि पूरल आश ॥६०॥
दुर्व्वासा मुनि देल छल शाप । क्रोध-विवश थापल छल पाप ॥६१॥
अपनैँ क चरण मध्य स्मृति रहय । रसना रामनाम नित कहय ॥६२॥
प्रभु-गुण-कीर्त्तन शुन नित कान । कर सेवा कर कर्म्म न आन ॥६३॥
प्रभु-पद-पङ्कज पर पड़ माँथ । करुणागार देव रघुनाथ ॥६४॥
देव-लोक माया नहि व्याप । से प्रभु अपनेक मुख्य प्रताप ॥६५॥
रघुनन्दन कह सुखसौँ जाउ । अँह माया मे जनु लपटाउ ॥६६॥
हमर दर्शनैँ अँह काँ मुक्ति । दुर्ल्लभ तेहन हमर दृढ़ भक्ति ॥६७॥
शीघ्र जाउ आज्ञा शिर मानि । भक्ति भाव सम्पन्नैँ जानि ॥६८॥
भावार्थः
ओ हाथ जोड़िकय राम लग ठाढ़ भ’ गेल आ बाजल – “हे प्रभु, अपने भारी संकट सँ हमर उद्धार कयलहुँ ।” ओ बेर-बेर प्रणाम कयलक आ लक्ष्मण-सहित सीतापति राम सँ कहलक – “हम विमलप्रकाश नामक विद्याधर छी । अपनेक भरपूर दर्शन पाबिकय हमर आशा पुरा भेल अछि । हमरा दुर्वासा नामक ऋसि तामस मे आबिकय श्राप देने रहथि जाहि कारण हमरा सिर पर पाप सवार भ’ गेल छल । (आब हमर कामना अछि जे) हमर चित्त सदिखन अपनहिक चरण मे लागल रहय । हमर जिह्वा सदैव राम-नाम केर रट लगबैत रहय । हमर कान सदिखन अपनहिंक गुण सभक कीर्तन सुनैत रहय । हमर हाथ सदिखन अपनेक सेवा करैत रहय, आर कोनो कर्म नहि करय । हमर माथा सदैव अपनेक पयर पर झुकल रहय । हे भगवान् राम ! अपने करुणाक सागर छी । हे प्रभु, हम फेर स्वर्ग जाय आ ओतय माया मे नहि पड़ी, से अपनहिक महिमा सँ भ’ सकैत अछि ।” ॥५८-६५॥
राम कहलनि – “मजा सँ जाह आ माया मे नहि फँसह । हमर दर्शन सँ तोरा मुक्ति भेटि गेलह । हमरा मे तोहर जे दृढ़ भक्ति छह, ओ अन्यत्र दुर्लभ अछि । हमर आज्ञा मानिकय आ अपना केँ भक्तिभाव सँ भरल बुझिकय शीघ्र स्वर्ग जाह ।” ॥६६-६८॥
।दोहा।
रामचन्द्र-करसौँ मरण, छूटल मुनि-कृत शाप ॥६९॥
चरित मुक्ति-वर-प्रद कहथि, सकल भुवन यश व्याप ॥७०॥
भावार्थः
राम केर हाथ सँ मृत्यु भेलैक, एकर फलस्वरूप दुर्वासा मुनिक श्राप दूर भेलैक । जे लोक विराधक मुक्ति देबाक ई कथा कहत ओकर यश एहि संसार मे पसैर जेतैक ॥६९-७०॥
॥इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा-रामायणे अरण्यकाण्डे अष्टमोऽध्यायः॥
॥श्री चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे अरण्यकाण्डक पहिल अध्याय समाप्त भेल॥
हरिः हरः!!

1 Comment
Bahut sundar lagal eh Aranyak kand paidh k. Eh baat satt chhai je aabeg bas kukritua ko baisal srap bas rakshs bbhes m janma hoit chhai.
Bidyadhar jena kono ehan krit kela t hunka Durbasa muni srap do delkhin O raksh bho gel. Snyog bas o apan (Rakshs bla krit koro Prabhu lag aabi gel. Prabhu takhno samjelah. Nahi samjha t mrit prapta bho fer o apan asli roop man aabi Prabhu san apan kalyan baste gohair kelak.
Prbhu hunka aaswast kelah jah aab tun maja san jah aa maya m nai fansiyah .
रामचन्द्र – करसौँ मरण, छूटल मुनि-कृत शाप ॥६९॥
चरित मुक्ति-वर-प्रद कहथि, सकल भुवन यश व्याप ॥
1 Trackback or Pingback