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मोक्ष दुर्लभ नहि छैक जँ एतबी बात बुझि जाय तँ – भाग २

373 भ्यूज

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

ज्ञान कर्म संन्यास योग (कर्म, अकर्म आ विकर्म केर निरुपण) – भाग २

गीताक चारिम अध्याय केँ ‘ज्ञान कर्म संन्यास योग – कर्म, अकर्म आ विकर्म केर निरुपण’ शीर्षक मे विद्वान् लोकनि प्रस्तुत कयलनि अछि। विगत किछु समय सँ बेर-बेर एहि अध्यायक अध्ययन करैत एकरा अलग-अलग टुकड़ा मे प्रस्तुत करबाक निर्णय कयल अछि। एक्के पोस्ट मे पूरा अध्याय कठिन अछि। एकर पहिल भाग पहिने प्रकाशित कय चुकल छी। (देखू – मैथिली जिन्दाबाद परः मोक्ष दुर्लभ नहि छैक जँ एतबे बात बुझि जाय तँ – लिंकः https://maithilijindabaad.com/?p=21969) एहि प्रकाशित लेख मे एतेक बात आबि गेल छल जे चारि वर्णक सृष्टि मे मुक्तगामी बनि कर्म-बन्धन सँ मुक्त हेबाक इच्छा रखनिहार भगवानक दिव्य प्रकृति केँ बुझिकय कर्तव्य-कर्म कइयो कय मोक्षक प्राप्ति कयलक, तेँ हम सब ओहने मुक्तलोकक अनुसरण कय केँ अपन कर्तव्यक पालन करी। आब आउ, आगू ध्यान दी।

भगवान् श्रीकृष्ण आब कर्म-अकर्मक व्याख्या करैत कहैत छथि –

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्‌॥४-१६॥

कर्म कि थिक आ अकर्म कि थिक, एहि विषय मे बड़का-बड़का बुद्धिमान लोक सेहो मोहग्रस्त रहैत छथि, तेँ ओहि कर्म केँ हम अहाँ (अर्जुन) केँ नीक सँ बुझाकय कहब, जे बुझिकय अहाँ संसारक कर्म-बन्धन सँ मुक्त भ’ सकब।

लक्ष्य हमरा सब लेल एक्के टा अछि जे ‘कर्म-बन्धन-मुक्त कर्म-कर्तव्य करी’। आब ई कर्म बन्धन सँ मुक्त होइ लेल समझशक्ति बनेबाक कार्य श्रीकृष्ण अपन प्रियपात्र अर्जुन लेल करय जा रहला अछि। एतय सँ हम सब अपन मन-मस्तिष्क केँ पहिने सँ भरने बुद्धि-ज्ञान सँ कनिकाल लेल खाली कय ली। बुझबाक यत्न करीः

भगवान् हमरा सब केँ सावधान होइत एहि गूढ़ रहस्य केँ पकड़बाक लेल आर एक पाँति कहलनि अछि –

“कर्म केँ सेहो बुझबाक चाही आ अकर्म केँ सेहो बुझबाक चाही, संगहि विकर्म केँ सेहो बुझबाक चाही। कियैक तँ कर्मक सूक्ष्मता केँ बुझनाय अत्यन्त कठिन अछि। जे मनुष्य कर्म मे अकर्म (शरीर केँ कर्ता नहि बुझि आत्मा केँ कर्ता) देखैत अछि आर जे मनुष्य अकर्म मे कर्म (आत्मा केँ कर्ता नहि बुझि प्रकृति केँ कर्ता) देखैत अछि, ओ मनुष्य मे बुद्धिमान अछि आर ओ मनुष्य समस्त कर्म सब करितो सांसारिक कर्मफल सँ मुक्त रहैत अछि।”

सूत्र कनिये टा के देलनि भगवान्। कर्म मे अकर्म – अर्थात् हम जे कयलहुँ से हम नहि अपितु हमर आत्मा कयलक, आर फेर, अकर्म मे कर्म – यानि हमर आत्मा नहि, अपितु प्रकृति (परमात्माक रचल गुण-धर्म सँ स्वतःस्फूर्त) द्वारा कर्म भेल। एहि भाव केँ पकड़ब आ एहि पर अपन जिबैत चलि जायब – हमरा सब केँ मुक्तजीव बनबैत अछि। बस, एहि सूत्र पर सब केँ चलबाक अछि। मोक्ष – मनुष्यक मूल अभीष्ट ओकरा भेटि जायत।

आब सूत्र बहुत जल्दी सब कियो नहि बुझैत छैक। बुझितो छैक त आचरण मे ओकर अनुकरण करब बहुत कठिन भेल करैत छैक। सिगरेट के पैकेट पर इन्ज्यूरियस टु हेल्थ के बाकायदा संवैधानिक सूचनाक बादो अरबों स्मोकर्स स्मोकिंग करिते छैक। तेँ कन्डिशनिंग करबाक लेल भगवान् आरो आगू कि कहलनि ताहि पर ध्यान दियौक –

महापुरुषक आचरणक अनुकरणक बात पहिनहुँ कहने छथि भगवान् आ एकर विज्ञान आर नीक सँ फरिछौलनि अछि। हम-अहाँ जीवन मे केहेन आचार-विचार राखिकय आगू बढ़ी तेकरा निरूपण करैत भगवान् महापुरुषक उदाहरण दैत बुझेलनि अछिः

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः ।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पंडितं बुधाः ॥४-१९॥
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः ॥४-२०॥
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्‌ ॥४-२१॥
यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वंद्वातीतो विमत्सरः ।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥४-२२॥
गतसङ्‍गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥४-२३॥

“जाहि मनुष्य केर निश्चय कयल सब काज बिना फलक इच्छा केँ पूरे लगन सँ सम्पन्न होइत अछि तथा जेकर सब कर्म ज्ञान-रूपी अग्नि मे भस्म भ’ गेल अछि, बुद्धिमान सब ताहि महापुरुष केँ पूर्ण-ज्ञानी कहैत छथि। जे मनुष्य अपन सब कर्म-फल केर आसक्ति केँ त्यागिकय सदिखन सन्तुष्ट आ स्वतन्त्र रहिकय कार्य सब मे पूर्ण व्यस्त भेल रहैत छथि से मनुष्य निश्चित रूप सँ किछुओ नहि करैत छथि। जे मनुष्य सब प्रकारक कर्म-फलक आसक्ति आर सब प्रकारक सम्पत्तिक स्वामित्व केँ त्याग कय देने छथि, एहेन शुद्ध मन आ स्थिर बुद्धिवला, मात्र शरीर-निर्वाह लेल कर्म करैत कहियो पाप-रूपी फल केँ प्राप्त नहि होइत छथि। जे मनुष्य स्वत: प्राप्त होयवला लाभ सँ संतुष्ट रहैत छथि, जे सब द्वन्द्व सँ मुक्त आर केकरहु सँ ईर्ष्या नहि करैत छथि, जे सफलता आ असफलता दुनू अबस्था मे स्थिर रहैत छथि से सब तरहक कर्म करितो कथमपि बन्धन मे नहि पड़ैत छथि। प्रकृति केर गुण सब सँ मुक्त भेल आ ब्रह्म-ज्ञान मे पूर्ण रूप सँ स्थित आ खुब बढियाँ सँ कर्मक आचरण करयवला मनुष्यक सबटा कर्म ज्ञानरूप ब्रह्म मे ब्रह्म मे पूर्ण रूप सँ विलीन भ’ जाइत अछि।”

एकर बाद पुनः भगवान् यज्ञ आ यज्ञफल कहिकय कर्म आ कर्मफल मे मुक्तिक बोध पर प्रकाश दैत फरिछेलनि अछि –

ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्रौ ब्रह्मणा हुतम्‌ ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥४-२४॥

“ब्रह्म-ज्ञान मे स्थित ओहि मुक्त पुरुषक समर्पण ब्रह्म होइत छथि, हवन केर सामग्री सेहो ब्रह्म होइत छथि, अग्नि सेहो ब्रह्म होइत छथि, तथा ब्रह्म-रूपी अग्नि मे ब्रह्म-रूपी कर्ता द्वारा जे सब हवन कयल जाइत अछि सेहो ब्रह्म होइत छथि, जिनकर कर्म ब्रह्म केँ स्पर्श कयकेँ ब्रह्म मे विलीन भ’ चुकल छन्हि एहेन महापुरु केँ प्राप्त होयबा योग्य फल सेहो ब्रह्म होइत छथि।”

गीता केँ गूढ़, अत्यन्त गूढ़ कहल गेल अछि। ज्ञानक गूढ़तम् रूप कहल गेल अछि। लेकिन शनैः-शनैः अभ्यास करैत रहला पर आ गुरुक सान्निध्य पाबि सब बात केँ नीक सँ मनन कयला पर गूढ़ो बात सहज भ’ गेल करैत अछि। एखन जे २४मा श्लोक अभरल, तेकर व्याख्या सहज नहि छैक। लेकिन सदिखन ब्रह्म एकं सत्यं अन्यं समस्त मिथ्याक भाव ग्रहण कय अहं ब्रह्मास्मिक भाव प्राप्त कय सम्पूर्ण लोक, सम्पूर्ण प्रकृति, सम्पूर्ण कर्म आ सम्पूर्ण कर्त्ता आदि केँ ब्रह्ममय देखला सँ ‘समत्व’ केर भाव विकसित होइछ, सब मे एकरूपता देखाइछ, सफलता-असफलता आदिक द्वंद्व खत्म भ’ जाइछ। तेँ मात्र एहि श्लोक टा केँ मनन कय लेला सँ मोक्षरूपी सिद्धि बहुत दूर नहि रहि पबैछ। बुझू!

एकर अतिरिक्तो कतेको मनुष्य कतेको प्रकारक यज्ञ करिते रहैत अछि। मुदा ओहो यज्ञ सब आखिरकार कोन गन्तव्यक यात्रा करैछ, केकरा प्राप्त होइछ – ताहि पर भगवान् आगू चर्चा करैत कहलनिः

“किछु लोक अनेकों प्रकारक यज्ञ द्वारा अनेकों देवता सब केँ रीतिपूर्वक पूजा करैत छथि। एहि प्रकारे किछु लोक परमात्मारूपी अग्नि मे ध्यानरूपी यज्ञ द्वारा यज्ञक अनुष्ठान करैत छथि। किछु लोक सब ज्ञान-इन्द्रिय केर विषय सब केँ संयमरूपी अग्नि मे हवन करैत छथि आर किछु लोक इन्द्रिय सभक विषय सब केँ इन्द्रियरूपी अग्नि मे हवन करैत छथि। किछु लोक समस्त इन्द्रिय सब केँ वश मे कय केँ प्राण-वायुक कार्य केँ मोनक संयम द्वारा आत्मा केँ जनबाक इच्छा सँ आत्म-योग रूपी अग्नि मे हवन करैत छथि। किछु लोक धन-सम्पत्तिक दान द्वारा, किछु लोक तपस्या द्वारा आर किछु लोक अष्टांग योग केर अभ्यास द्वारा यज्ञ करैत छथि, किछु आरो लोक वेद-शास्त्र सभक अध्यन कय केँ ज्ञान मे निपुण भ’ कय आ आरो किछु लोक कठिन व्रत सब धारण कय केँ यज्ञ करैत छथि। बहुतो लोक अपान-वायु मे प्राण-वायु केर, तहिना प्राण-वायु मे अपान-वायु केँ हवन करैत छथि तथा आर किछु लोक प्राण-वायु आर अपान-वायुक गति केँ रोकिकय समाधि मे प्रवृत्त होइत छथि। किछु लोक भोजन केँ कम कयकेँ प्राण-वायु केँ प्राण-वायुए मे हवन कयल करैत छथि, ई सब यज्ञ करयवला यज्ञ सभक अर्थ जनबाक चलते सब पाप-कर्म सब सँ मुक्त भ’ गेल करैत छथि। यज्ञ सभक फलरूपी अमृत के सुवाइद ई सब योगी सनातन परब्रह्म परमात्मा केँ प्राप्त भ’ जाइत छथि, आर यज्ञ नहि करनिहार मनुष्य तँ एहि जीवन मे सेहो सुखपूर्वक नहि रहि सकैत अछि त फेर ऐगला जनम मे केना सुख केँ प्राप्त कय सकत? एहि तरहें आरो कतेको तरहक यज्ञ सभक सम्बन्ध मे वेदवाणी द्वारा सविस्तार व्याख्या कयल गेल अछि, एहि तरहें ओहि सब यज्ञ केँ कर्म सँ उत्पन्न होयबला बुझिकय अहाँ कर्मबन्धन सँ हमेशा-हमेशाक लेल मुक्त भ’ जायब।

क्रमशः…. भाग ३
(ज्ञान योगक निरूपण आ मोक्षक उपाय)

हरिः हरः!!

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