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मिथिलाभाषा रामायण – अयोध्याकाण्ड तेसर अध्याय – राम केँ वनवासक आज्ञा

629 भ्यूज

कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण

अयोध्याकाण्ड – तेसर अध्याय

राम केँ वनवासक आज्ञा 

॥अध्याय ३॥

।चौपाइ।

।मिथिला संगीतानुसारेण श्रीमालव छन्द।

काज मन्त्रि केँ कहि नृप देल । अपनैँ अन्तष्पुर मे गेल ॥१॥
नृपति न देखल केकयि आँखि । की वृत्तान्त उठल नृप भाखि ॥२॥
अबइत हसइत नित जे आब । केकयि काँ छल सिद्ध स्वभाव ॥३॥
नृप चिन्तातुर चित्त नितान्त । पुछलनि दासीसौँ वृत्तान्त ॥४॥
स्वामिनि तोर कतय छथि आज । कोप-भवन मे जनु महराज ॥५॥
आह आह की कोप निदान । सापक चरण साप नृप जान ॥६॥
की भेल नृपतिक प्रबल प्रताप । कुबड़ि-कथा शुनि थरथर काँप ॥७॥
शञ्च शञ्च केकयि तट जाय । थर थर कर कर परसल काय ॥८॥
त्यागि पलंग कि धरणी शयन । जिबइत हम देखइत छी नयन ॥९॥
असमय त्यागि कलावति कोप । करु जनु हमर मनोरथ लोप ॥१०॥
चलु निज भवन कि भेलहुँ बताहि । बड़ उत्सव दिन दिअ निमाहि ॥११॥
मलिन वसन धारण धिक ज्ञान । अलङ्करण तन प्रत्याख्यान ॥१२॥
कहु निर्द्धन काँ बड़ धनि करिय । मानी धनी सकल धन हरिय ॥१३॥
नारी पुरुष अहित जे हयत । दण्डबद्ध जीवनसौँ जयत ॥१४॥
सुन्दरि सुमति कहू की आन । हेतु अहाँक त्यागि देब प्राण ॥१५॥
रामक शपथ कहैछी खाय । करब न अहाँ विषय अन्याय ॥१६॥
सत्य पराक्रम शोभाधाम । प्राणहुँ सौँ प्रियतम छथि राम ॥१७॥
कुबड़ी कल बल कहय इरोत । चोर सहथि की कतहु इजोत ॥१८॥
शुनि से नृपति देल अनठाय । बान्धल सिंह जकाँ पछताय ॥१९॥
दासी चित्त भेल निर्भीक । कुकरक भागेँ टूटल सींक ॥२०॥

भावार्थः

राजा दशरथ सबटा काजक भार मंत्री सब केँ सौंपिकय स्वयं रनिवास गेलाह । ओतय राजा केँ कैकयि नजरि नहि पड़लिह । कि बात अछि, राजाक मुंह सँ निकलल । ओ तँ राजाक अबिते रोज विहुँसैते आबि जाइत छलिह – ई हुनकर सहज स्वभाव छलन्हि । राजा मोन मे बहुत डरायल दासी सँ पुछलथि – “आइ तोहर मलकाइन कतय छथुन ?” दासी कहलखिन – “हे महाराज! शायद ओ कोपभवन मे छथि ।” राजा बजलाह – “ओह-ओह ! कोपक की कारण भेलनि ?” दासी जवाब देलिह – “हे महाराज, साँपक पैर साँपे टा जनैत अछि, हम कि जानू !” सुनितहि राजाक तेज उतरि गेलनि आ ओ कूबड़ीक बात सुनिकय थरथर काँपय लगलाह । धीरे सँ कैकेयि लग गेलाह आ काँपैत हाथ सँ रानीक देह सहलाबैत बजलाह – “अहाँ पलंग छोड़ि धरती पर लेटल छी आ हम जिबिते-जी आँखि सँ देखि रहल छी । हे कलावती, बिनु बेरक तामस छोड़ू । हमर मनोरथ मे विघ्न नहि करू । अपन भवन चलू । बताहि भ’ गेलहुँ की ? आइ बड पैघ उत्सवक दिन अछि । एकरा पूरा करय देल जाउ । आइ ई मैल वस्त्र ? केहेन मति भ’ गेल अछि अहाँक ? शरीर पर सँ गहना कियैक उतारि देलहुँ अछि ? कहू त हम अकिंचन केँ धनवान् बना दी, घमंडी धनी केर सारा संसार हरण कय ली ! स्त्री या पुरुष जे कियो अहाँक अहित करत से दंड पाबिकेँ अपन जान गमाओत । हे बुझनिहारि सुन्दरि ! हम आर की कहू ? अहाँक लेल हम अपन प्राण तक छोड़ि देब । हम रामक शपथ खाकय कहैत छी, अहाँक प्रति कखनहुँ अन्याय नहि करब । सत्य, पराक्रम आ शोभा सँ भूषित राम हमरा प्राणहुँ सँ बेसी प्रिय छथि ।” कूबड़ी धीरे सँ नजरि सँ बचिकय बाजल – “चोर कतहु इजोत बर्दाश्त कय सकैत अछि ।” राजा ई सुनियोकय अनसुना कय देलनि तथा ओ बन्धन मे पड़ल बाघ जेकाँ पछताबा करय लगलाह । दासीक मोन निडर भ’ गेलैक । कुकुरक भाग्य सँ सींक टूटि गेल ॥१-२०॥

।षट्पद छन्द।

राम शपथ नृप कयल कहल शुनि केकयि रानी ॥२१॥
शञ्च उघाड़ल आँखि सत्य बान्धल नृप ज्ञानी ॥२२॥
देवासुर-सङ्ग्राम मध्य वर अहँ दुइ देलहुँ ॥२३॥
से अछि न्यासित हमर प्रयोजन बिनु नहि लेलहुँ ॥२४॥
भरत होथु युवराज नृप राम जाथु दण्डक गहन ॥२५॥
मुनिक वेष चौदह बरष हमर याचना अछि एहन ॥२६॥

भावार्थः

राजा रामक शपथ खेलनि, से जानिकय रानी कैकेयि धीरे-धीरे आँखि खोललिह आ बुझि गेलिह जे ज्ञानी राजा सत्यक बन्धन मे फँसि गेलाह । फेर ओ बजली – “हे राजा, अपने देवासुर संग्रामक समय हमरा जे दुइ गोट वरदान देने रही, से अहीँ लग थाती रखने छी । ताहि समय प्रयोजन नहि छल, तेँ हम नहि लेलहुँ । आइ हमर याचना यैह अछि जे भरत युवराज बनथि आ राम मुनीक वेष धारण कय चौदर बरस दंडकवन मे निवास करथि ॥२१-२६॥

।चौपाइ।

।मिथिलासंगीतानुसारेण सरसासावरीय छन्दः।

हमर कहल नहि होयत भूप । डूबि मरब धसि पोखरि कूप ॥२७॥
गरल अशन कय त्यागब प्रान । सङ्कल्पित जौँ होयत आन ॥२८॥
केकयि कठिन वचन शुनि कान । नृप खसला मूर्छित अज्ञान ॥२९॥
अशनि पतन तरुगण गति जेहन । केकयि कथा श्रवणसौँ तेहन ॥३०॥
मूर्छित दशरथ नृप काँ जानि । अन्तःपुर जनि उठली कानि ॥३१॥
दशरथ मन मन करथि विचार । विषमय विषम विषय संसार ॥३२॥
की दुःस्वप्न भ्रमाकुल चित्त । बूझि न पड़इछ एकर निमित्त ॥३३॥
मन नृप कह निद्रा नहि गाढ़ि । बाघिनि सनि रानी तट ठाढ़ि ॥३४॥
वचन न एहन शुनाबिय कान । चट पट दय उड़ि जायत प्रान ॥३५॥
सुमति सुदति सति को मति आज । भोगब अहाँ अकण्टक राज ॥३६॥
कौशल्या काँ नहि किछु काज । अहंइक राम अहँक समाज ॥३७॥
भेल कुसङ्ग ज्ञान सभ नष्ट । हमरा शिर मरणाधिक कष्ट ॥३८॥

भावार्थः

हे राजा, यदि ई हमर बात नहि होयत त हम इनार या पोखरि मे डुबि जायब । यदि हमर एहि इच्छाक बिपरीत बात होयत त हम जहर खाकय प्राण त्याग कय देब ।” कैकेयि केर एहेन कठोर वचन कान मे पड़िते राजा सुधि-बुधि हेराकय, मूर्च्छित भ’ कय खसि पड़लाह । कैकेयि केर बात सुनिकय राजाक ओहने हाल भेलनि जेना बज्र खसला पर गाछ सभक होइत छैक । राजा दशरथ मूर्च्छित भ’ गेलाह, ई सुनिते रनिवासक स्त्री सब कानय लगलिह । दशरथ मोन मे सोचैत छथि, “सांसारिक विषय अन्त मे खराबे परिणाम दयवला कष्टदायी होइत अछि । कहीं हमर मोन खराब स्वप्न मे तँ नहि भ्रमण कय रहल अछि । एकर कोनो रहस्य बुझय मे नहि अबैत अछि ।” फेर राजा मोन मे कहैत छथि जे गाढ़ नींद मे त नहि छी । (आँखि खोलिकय देखैत छथि) लगहि मे बाघिन जेकाँ रानी कैकेयि ठाढ़ छथि । ओ बजलाह – “प्रिये, एहेन वचन जुनि सुनाउ । ई सुनिकय तत्क्षण हमर प्राण उड़ि जायत । हे बुझनिहारि सुन्दरि, आइ अहाँक मति एहेन कियैक भ’ गेल अछि ? अहीं तँ ई निष्कंटक राज भोगब । कौशल्या केँ तँ कोनो मतलबो नहि छन्हि । राम सेहो अहींक छथि आर ई राजपाट सेहो अहींक छी । खराब संगति सँ अहाँक मति बिगड़ि गेल अछि । हमर माथ पर मरण सँ भारी संकट आबि गेल अछि ॥२७-३८॥

।मत्तगजेन्द्र छन्द।

निर्द्दय चित्त हलाहल घोरि कहू हम की बरु आनि पिआऊ ॥३९॥
श्याम भुजङ्गमसौँ अंग अंगमे केकयनन्दिनि आनि डसाऊ ॥४०॥
कण्ठमे बाँधि शिला बड़ि गोटि समुद्रक मध्य मे जाय डुबाऊ ॥४१॥
दुस्सह राम-वियोग-कथा हमरा जनु कामिनि कान शुनाऊ ॥४२॥

।चामर छन्द।

केकयी अहाँक दोष रामचन्द्र कैल की ॥४३॥
मन्थरा कुमन्त्रणा सुबुद्धि कान धैल की ॥४४॥
जीवनावलम्ब सौँ अये वियोग भेल जौँ ॥४५॥
लोकमे कलङ्क देह छोड़ि जीव गेल तौँ ॥४६॥

।चञ्चला छन्द।

चञ्चला समान गौरि रामकाँ रहै दिऔनि ॥४७॥
राज पाट कोष ओ समस्त सैन्य लै लिऔनि ॥४८॥
नीक ई कहैतछी पतिव्रता-विचार-सार ॥४९॥
स्पष्ट कष्ट नष्ट हैत छूट लोक मे अभार ॥५०॥

भावार्थः

हे निर्दय-हृदये! अहाँ केँ हम कि कहू ? चाहू त हलाहल लाउ आ घोरिकय हमरा पिआ दिय’; कैकेयि, चाहू त कारी नाग लाउ आ अंग-अंग मे ओकरा सँ डसबा दिय’; चाहू त हमर गला मे एकटा भारी पाथर लटकाकय हमरा बीच समुद्र मे जाकय डुबा दिय’; मुदा हे कामिनी, हमर कान मे रामक विरह जेहेन असह्य कथा जुनि सुनाउ । कैकेयि, बताउ त, राम अहाँक कि बिगाड़लनि ? अहाँ दुष्ट मतिवाली मन्थराक खराब सलाह पर कियैक कान देलहुँ ? यदि हमरा हमर प्राणक सहारा राम केर विरह भ’ जायत त दुनिया मे बदनामियो होयत आ हमर प्राणो चलि जायत । हे बिजली समान चमकैत गोर नारी, राम केँ रहय दियौन । भले राजपाट, खजाना आ सबटा सेना हुनकर हाथ सँ लय लिय’ । हे पतिव्रताक लायक विचारवाली प्रिये, हम अहाँ केँ ई भल (नीक) बात कहैत छी, एहि सँ सबटा विपत्ति दूर भ’ जायत तथा लोक मे कलंको नहि लागत ।” ॥३९-५०॥

।चौपाइ।

।मिथिलासंगीतानुसारेणेदं द्राविण्यासावरीयं छन्दः।

दशरथ-दशा कहल की जाय । केकयिक पअर धयल लपटाय ॥५१॥
कहु की रामचन्द्र सौँ भीति । कयल कसाइनि सनि की रीति ॥५२॥
कहलनि केकयि भेलहुँ बताह । शुनितहिँ वचन हृदय उठ दाह ॥५३॥
सत्य-प्रतिज्ञ सुयश बड़ गोट । भय जायब मर्य्यादा छोट ॥५४॥
रामक शपथ कयल कय बेरि । वर माँगल हम अवसर हेरि ॥५५॥

भावार्थः

दशरथक हाल कि कहल जाय ! ओ कैकेयि केर पैर सँ लिपटि गेलाह आ बजलाह – “बताउ त, अहाँ केँ राम सँ केहेन भय होइत अछि ? कियैक अहाँ कसाइ जेकाँ चाइल चललहुँ ?” कैकेयि कहलनि – “अहाँ बताह भ’ गेलहुँ की ? अहाँक बोल सुनिकय त हमर करेजा जरि गेल । लोक मे अहाँक बड़का नाम अछि जे अहाँ सत्य पर अडिग रहयवला लोक छी । एना कयला सँ अहाँक प्रतिष्ठा खसि पड़त । अहाँ वर देबाक समय कतेको बेर रामक शपथ खेने छी । हम त अवसर पाबिकय वर मँगलहुँ अछि ॥५१-५५॥

।नारीच छन्द।

कहू कहू नृपेन्द्र की वरप्रदान देल जे ॥५६॥
वृथा कथा करैतछी कि आइ माँगि लेल से ॥५७॥
कनैतछी बजैतछी जनैतछी न की अहाँ ॥५८॥
बिना विचार काज मे प्रयत्न कैल की कहाँ ॥५९॥

भावार्थः

कहू, कहू महाराज ! अहाँ जे वर देलहुँ से जे आइ हम माँगि लेलहुँ त अहाँ बेकारक बात कियैक करैत छी ? अहाँ कनैत-खिझैत त छी, लेकिन ई नहि जनैत छी जे अहाँ हमरा सँ राय-विचार कएने बिना कि-कि करय लगलहुँ ?” ॥५६-५९॥

।चौपाइ।

।मिथिला संगीतानुसारेणेदं शुद्धमलारीयं छन्दः।

धरणी शयन चयन नहि चित्त । दुर्ग्गति कामिनि प्रीति निमित्त ॥६०॥
संज्ञाशून्य मृतक समतूल । केकयि कहथि वचन प्रतिकूल ॥६१॥
विगत रात्रि जनु बरष समान । दशरथ आधि जान के आन ॥६२॥
बाहर उत्सव हर्षित लोक । अन्तःपुर पसरल बड़ शोक ॥६३॥
अरुणोदय भेल नृपति जगाब । बन्दी गायन गुणगण गाब ॥६४॥
केकयि शासन शुनि भयभीत । विरुद पढ़ी जनु गाबी गीत ॥६५॥
सम्प्रति स्वस्थ चित्त नहि भूप । की आयल छी घसकू चूप ॥६६॥
तिलक निमित्त वस्तु सभ धयल । मन्त्रि सुमन्त्र वृत्त सभ कयल ॥६७॥
ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्यक जाति । निद्रा तनिकाँ आँखि न राति ॥६८॥
ऋषिकन्या-गण पाँतिक पाँति । बाल वृद्ध तिय भाँतिक भाँति ॥६९॥
पीताम्बर सुन्दर श्रीराम । कखन देखब छवि शोभाधाम ॥७०॥
कटक किरीटी सर्व्वाभरण । कोटि-मनोभव-शोभा-हरण ॥७१॥
नव घनश्यामल शोभागार । कौस्तुभ-शोभित परमोदार ॥७२॥
स्मितमुख गजवर-पीठ विराज । लोक कहत जय जय युवराज ॥७३॥
श्वेतछत्र धर लक्ष्मण सङ्ग । देखब कखन तखन जे रङ्ग ॥७४॥
उत्सुक चित्त सबल पुर लोक । द्वार दोसर धरि नहि छल रोक ॥७५॥
जागल छला राति महिपाल । उठलाह अछि नहि एतबहु काल ॥७६॥
अनुदित दिनकर उठथि सदाय । आइ शुतल छथि की अलसाय ॥७७॥
भेल अबेरि शयन छथि भूप । मन्त्रि विचार कयल चुपचूप ॥७८॥
चिन्तातुर नृपतिक घर जाय । शञ्चहि जय जय शब्द शुनाय ॥७९॥
नृप अचेष्ट नहि शुन किछु सोर । मुद्रित नयन युगल बह नोर ॥८०॥
धरणी शयन न नयन उघार । केकयि नयन कोप विस्तार ॥८१॥
करुण-रसादित दशरथ भूप । केकयि बनली रौद्र स्वरूप ॥८२॥
मन्त्री मन व्याकुल अथऊत । विधि गति टारि न ककरो बूत ॥८३॥
केकयि केँ कहलनि कर जोड़ि । कहु की थिक तामस केँ छोड़ि ॥८४॥
निन्द न सगर राति नृप-नयन । विकल नृपति कीदहुँ छथि शयन ॥८५॥
बुझि कत पड़इछ की थिक आधि । देखल शुनल नहि एहन समाधि ॥८६॥
राम राम रटइत भेल भोर । बहल बहल चल नयन क नोर ॥८७॥
वारिज-नयन रामकाँ लाउ । सत्वर रामक वदन देखाउ ॥८८॥
स्वामिनि लायब राम बजाय । नृप-आज्ञासौँ से थिक न्याय ॥८९॥
देखब राम कहल नृप कानि । सत्वरतर तनिकाँ दिअ आनि ॥९०॥
शीघ्र सुमन्त्र कयल शुनि गम । जाय अवारित रामक भवन ॥९१॥
सरसीरुह-लोचन शुनु राम । चलु चलु सम्प्रति भूपति-धाम ॥९२॥
शीघ्र बजाओल अछि किछु काज । गड़बड़ सन मन लगइछ आज ॥९३॥
लक्ष्मण-सहित राम रथ हाँकि । नृप लग पहुँचल सभदिश ताकि ॥९४॥
कयल पिताक चरण परणाम । नृप जानल आएल छथि राम ॥९५॥
हुनकाँ हृदय लगाबक बेरि । सम्भ्रम उठला खसला फेरि ॥९६॥
रामचन्द्र बजला हा हाय । लेल पिता काँ अङ्ग लगाय ॥९७॥
राज-दार उच्चस्वर कान । नृपकाँ की भय गेल अग्यान ॥९८॥
राजतिलक-संभृति भेल व्यर्थ । अन्तःपुर किछु भेल अनर्थ ॥९९॥
राम पुछल नृप-आधि-निदान । केकयि कहलनि हमरा ज्ञान ॥१००॥

भावार्थः

स्त्रीक प्रेम मे पड़िकय हुनकर एहेन दुर्दशा भेलनि अछि, होश हेरा गेलनि, मुर्दा जेकाँ पड़ल छथि । तैयो कैकेयि कटु वचन सब बजने जा रहल छथि । एक बरख जेकाँ ओ एकटा राति बितल । दशरथ केर व्यथाक ओर (जड़ि) के बुझि सकैत अछि ? बाहर मे लोक उत्सव सँ हर्षित छथि, मुदा अन्तःपुर मे भारी शोक पसरल अछि । भोरक लालिमा पसरि गेल । बन्दीगण जगेबाक लेल राजाक गुणगान करय लगलाह । मुदा कैकेयि केर आज्ञा भेलनि – “विरुदावली पढ़नाय आ गेनाय बन्द करू । महाराजक तबियत ठीक नहि छन्हि । अहाँ सब बेकारे अयलहुँ । एतय सँ चुपचाप निकलि जाउ ।” आज्ञा सुनिते सब गोटे डरा गेलाह । तिलक वास्ते सब चीज राखल छल, मंत्री सुमंत्र सब किछु जुटेने रहथि । ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य व आरो-आरो लोक केँ राति भरि उत्सुकतावश नींद नहि भेल रहनि । झुंडक झुंड ऋषिकन्या लोकनि, बच्चा सँ बुढ़ धरि, तरह-तरह केर स्त्री लोकनि जुटि गेल छलिह । आइ दोसर फाटक धरि अयबा लेल किनको कोनो रोक नहि रहनि । नगर भरिक सब लोकक मोन मे ई उत्सुकता रहनि जे पिताम्बर पहिरने, कटक-किरीट आदि गहना सब सँ भूषित, करोड़ों कामदेवक शोभा केँ दबेनिहार, नव मेघ सन श्यामवर्णक, कौस्तुभ मणि लगेने, श्वेतक्षत्र लेने, लक्ष्मण सहित हाथीक पीठ पर सवार, प्रजाक मुंह सँ “युवराज केर जय हो” केर ध्वनि सुनैत शुभग मूर्ति श्री रामचन्द्र केँ कखन देखब । लोक सब कहैत छल – “लगैत अछि जे राजा दशरथ राति मे जागल छलाह, तेँ एखन धरि नहि जगला अछि । ओ त हमेशा सूर्योदय सँ पहिने जागि जाइत छलाह । कि कारण अछि जे आइ आलस्य सँ सुतल छथि ।” मंत्री सब मनहि-मन सोचलनि, अबेर भ’ रहल अछि, एखन धरि राजा सुतले छथि, एना कियैक ? मंत्री चिन्ताक संग राजाक घर पहुँचलाह, आ धीरे सँ जय-जयकार सुनौलनि । राजा बेहोश पड़ल छलाह । कुनू आवाज हुनका नहि सुनाय देलकनि । दुनू आँखि बन्द रहनि आर ताहि सँ नोर दहोबहो बहल जा रहल छलन्हि । धरती पर सुतल छलथि आ आँखि नहि खोलि रहल छलथि । कैकेयि केर आँखि मे क्रोध भरल छलन्हि । एम्हर राजा दशरथ करुण रस मे डूबल छथि आर ओम्हर कैकेयि साक्षात् रौद्ररस बनल छलथि । मंत्री लोकनिक मोन भाँति-भाँति केर आशंका सँ व्याकुल भ’ गेलन्हि । विधाताक विधान केँ टारनाय केकरहु बूत्ते सम्भव नहि अछि । मंत्री सब हाथ जोड़िकय कैकेयि सँ कहलनि, “हे देवी, कोप दूर कय केँ कहू जे कि बात छैक ?” रानी कैकेयि बजलिह – “राजा केँ राति भरि नींद नहि अयलनि अछि । नहि जानि कियैक ई विकल भ’ कय पड़ल छथि । बुझय मे नहि आबि रहल अछि जे हुनकर मोन मे कोन व्यथा प्रवेश कय गेलनि अछि । एहेन विकलता त हम न कतहु देखलहुँ आ न सुनलहुँ । राम-राम रटैत-रटैत भोर कय देलथि आर आँखि सँ नोर बहबैत रहलथि । आब कमलनयन रामजी केँ बजा आनू आ जल्दी राजा केँ हुनक चेहरा देखाउ ।” मंत्री कहलनि – “हे महारानी, रामजी केँ बजा त अनबनि, मुदा उचित होइतय जे राजा सँ ई आज्ञा ल’ लेल जइतय ।” राजा कनैत बजलाह – “हाँ, हम रामक मुंह देखब, हुनका जल्द सँ जल्द बजा आनू ।” सुनितहि मंत्री शीघ्र चलि पड़लाह आर बेरोकटोक रामजीक भवन मे पहुँचलाह आ कहला – “हे कमलनयन राम! एखन तुरन्त राजा लग चलू । राजा अपने केँ कोनो काज सँ तुरन्त बजौलनि अछि । आइ हुनकर मोन किछु गड़बड़ सन लागि रहल अछि ।” सुनितहि लक्ष्मण सहित राम रथ पर सवार आ सावधान भ’कय राजा लग पहुँचि गेलाह । ओ पिताक चरण मे प्रणाम कयलनि । राजा केँ पता चललनि जे राम आयल छथि । हुनका छाती सँ लगेबाक लेल हड़बड़ाकय उठलाह, मुदा उठितहि फेर खसि पड़लाह । रामचन्द्र ‘ओह, ओह’ करैत पिता केँ गला लगा लेलाह । रानी सब जोर-जोर सँ कानय लगलिह, “ओह, नहि जानि, राजा केँ कि भ’ गेलनि । राजतिलकक सबटा तैयारी बेकार गेल । लगैत अछि रनिवास मे किछु अनर्थ भ’ गेल अछि ।” राम पुछलाह – “राजाक एहि विकलताक कि कारण अछि ?” कैकेयि बजलिह, “हमरा पता अछि । हे कामदेवो सँ बेसी सुन्दर राम! लगैत अछि, राजा शोके सँ प्राण त्यागि देताह ।” ॥६०-१००॥

।दोबय छन्द।

।राग-तरंगिणी-मतानुसारेण शुद्धकोडारीयं छन्दः।

शुनु शुनु राम काम-मद-मोचन, शोचहिँ भूपति मरता ॥१०१॥
काज-जहाज अधीन अहँक अछि, सङ्कट-जलनिधि तरता ॥१०२॥
अहाँ सुपुत्र वंशमे भेलहुँ, पिता-धर्म सभ राखब ॥१०३॥
अहँक पिताकाँ कहइत लज्जा, हम मिथ्या नहि भाखब ॥१०४॥
वर दुइ गोट धयल छल पूर्व्वक, नृप सुकृती सौँ माँगल ॥१०५॥
अपना नीकक सभकाँ इच्छा, अयश-पताका टाँगल ॥१०६॥
बापक जौँ सन्ताप हरब नहि, नरकक होएता भाजन ॥१०७॥
सत्य-प्रतिज्ञ कथा कत जाएत, अयशक बाजत बाजन ॥१०८॥
शुनु शुनु श्रवण-शूल सम वाणी, जननी जानि सहैछी ॥१०९॥
भाखिअ अमृत कथा न राम हम, शपथहिँ सत्य कहैछी ॥११०॥
पिता-काज जीवन काँ त्यागब, विष भक्षण कय मरबे ॥१११॥
सीता ओ कौशल्या त्यागब, राज पाट की करबे ॥११२॥
बिन कहलहुँ जे पिताकार्य्य कर, से थिक उत्तम बालक ॥११३॥
मध्यम कहलेँ करथि न कहलेहु, करथि अधम कुल-घालक ॥११४॥
पिता कहल नहि करब अन्यथा, सत्य प्रतिज्ञा कयलहुँ ॥११५॥
तनिकर आज्ञा-पालन-कारण, कहु कि वृत्त भय अयलहुँ ॥११६॥
करुणारहित कहल शुनि केकयि, धन्य धन्य हे राम ॥११७॥
जनक-अभीष्ट शिष्ट जन करइछ, त्रिभुवन तनिके नाम ॥११८॥
अहँ युवराज-काज राजा जे, मङ्गबाओल सम्भार ॥११९॥
भरत होथु युवराज ताहिसौँ, ई सिद्धान्त विचार ॥१२०॥
शुनु गुणधाम राम कहइत छी, दण्डक वन अहँ जाउ ॥१२१॥
चौदह वर्ष वनी भय रहुगय, कन्द मूल फल खाउ ॥१२२॥
स्मितमुख राम कहल केकयि सौँ, भरत होथु युवराजे ॥१२३॥
हम दण्डक-वन गमन करैछी, नृपव्रत-पालन काजे ॥१२४॥
बड़ गोट शोच पिता हमरासौँ, नहि बजइत छथि आजे ॥१२५॥
प्रजा पालना भरत करथु भल, भोगथु सभ समाजे ॥१२६॥

भावार्थः

आब कर्तव्यरूपी जहाज अहींक हाथ मे अछि जाहि सँ राजा ई शोकरूप समुद्र केँ टपि सकैत छथि । अहाँ एहि वंश मे सपूत भ’ कय जन्म लेलहुँ । अहाँ पिताक धर्मक रक्षा करब । अहाँक पिता केँ ओ कर्तव्य कहय मे लाज भ’ रहल छन्हि । हम झूठ नहि कहब । पूर्व मे हमरा लेल दुइ टा वरदान थाती (सुरक्षित) छल । हम पुण्यवान् राजा सँ ओ दुनू वर मंगलहुँ । अपन भलाइ केर इच्छा तँ सब केँ होइत छैक । मुदा अपयश केर पताखा टंगा गेल । यदि अहाँ पिताक सन्ताप (दुःख) केँ दूर नहि करब तँ ओ नरक केर भागी बनताह । हुनक सत्यप्रतिज्ञताक प्रतिष्ठा मेटा जेतनि आर अपयशक डंका पिटा लगतनि ।” ॥१०१-१०७॥

राम कहलखिन – “सुनू, अपनेक बात जे कान मे बरछी जेकाँ भोंकायवला अछि, अपने माता थिकहुँ से बुझैत हम सहन (बर्दाश्त) कय रहल छी । हम राम छी, झूठ नहि बजैत छी । शपथ संग सच बात कहैत छी । पिताक वास्ते हम प्राण दय सकैत छी; जहरो खाकय मरि सकैत छी; राजपाठ केँ के पूछय, सीता आ कौशल्या (माता) केँ सेहो छोड़ि सकैत छी । जे बिना कहनहियो पिताक काज करैत अछि से उत्तम बालक अछि, जे कहला उपरान्त करैत अछि से मध्यम अछि, आर, जे कहलो उपरान्त नहि करैत अछि ओ कुल-घालक अछि । हम पिताक वचन केँ अन्यथा नहि करब । हम सत्य प्रतिज्ञा करैत छी । पिताक आज्ञाक पालन करबाक लेल कहू कि करबाक अछि ? हम तैयार भ’ कय आयल छी ।” ॥१०८-११५॥

ई सुनिकय कठोर हृदय कैकेयि कहली – “हे राम, अहाँ धन्य छी । जे भला आदमी पिताक इच्छा पूरा करैत अछि, तीनू लोक मे ओकरे नाम होइत छैक । अहाँ केँ युवराज बनेबाक लेल जे सब सामग्री राजा मंगौने छथि, ताहि सँ भरत केर राज्याभिषेक कयल जाय, यैह बात तय भेल अछि । हे गुणधाम राम, आरो सुनू । अहाँ दण्डक वन केँ जाउ, ओतय १४ वर्ष धरि वनवासी बनिकय रहू, आर कन्द-मूल-फल खाउ ।” ॥११६-१२१॥

विहुँसैत राम कैकेयि सँ कहलनि – “भरत युवराज होइथ ! हम दण्डक वन जाइत छी, जाहि सँ राजाक वचन केर पालन हो । हमरा एहि बातक बहुत दुःख अछि जे पिता आइ हमरा सँ बाजि नहि रहल छथि । हमर शुभकामना अछि जे भरत नीक जेकाँ प्रजाक पालन करथि आर सम्राज्यक भोग करथि ।” ॥१२२-१२५॥

।चौपाइ।

।मिथिला-सङ्गीतानुसारेण शंकूकनाटीयं छन्दः।

देखलनि नृपति राम छथि ठाढ़ । कयल विलाप दुःख बड़ गाढ़ ॥१२७॥
उतपथ-वर्त्ति भ्रान्त मन जानु । हम स्त्रीजितक वचन नहि मानु ॥१२८॥
बलसौँ भोगिअ समुचित राज । अनुचित कहत न एक समाज ॥१२९॥
एहिसौँ हमरहुँ होयत न पाप । हरु रघुनन्दन मन सन्ताप ॥१३०॥

भावार्थः

राजा दशरथ देखलनि जे राम सोझाँ मे ठाढ़ छथि । ओ अत्यन्त गाढ़ व्यथा सँ बिलखय लगलाह । “हे राम, अहाँ हमरा खराब रस्ता पर चलयवला भटकल लोक बुझू । हम स्त्रीजित भ’ गेल छी अर्थात् स्त्रीक वश मे कय लेल गेल छी । ताहि लेल एहेन आदमीक बात अहाँ नहि मानू । अहाँ बलपूर्वक एहि राज केँ भोग करू । एकरा कियो अनुचित नहि कहत । एहि सँ हमरो पाप नहि लागत । हे रघुनन्दन, एना कयकेँ अहाँ हमर सन्ताप दूर करू ।” ॥१२७-१३०॥

।रूपमाला छन्द।

।मिथिला-सङ्गीतानुसारेण केदारमालवीयं छन्दः।

जगन्नाथ अनाथ हमछी प्राण-वल्लभ राम ॥१३१॥
विपिन जायब त्यागि हमरा शून्य पापिनि-धाम ॥१३२॥
कयल स्त्री-विश्वास जे हम तकर फल परिणाम ॥१३३॥
हमर मन-अभिलाष सभटा रहल ठामहि ठाम ॥१३४॥
नृपति ई कहि रामकाँ निज हृदय लेल लगाय ॥१३५॥
उच्चस्वरसौँ करथि क्रन्दन दशा कहल कि जाय ॥१३६॥
राम निज कर-कमल जलसौँ नयन देल धोआय ॥१३७॥
कयल जाय न पिता चिन्ता आब की पछताय ॥१३८॥
हमहु पुनि घर घूरि आयब भरत छथि युवराज ॥१३९॥
राजसौँ वन कोटि गुण सुख लाभ मुनिक समाज ॥१४०॥
कहब चिन्ता जननि करु जनु करब चरण प्रणाम ॥१४१॥
किछु विलम्ब न तखन जायब जनकतनया-धाम ॥१४२॥
केकयी काँ आधि छूटन एतय आयब फेरि ॥१४३॥
पिता-चरण-सरोज पर शिर धरब हम कय बेरि ॥१४४॥
कय प्रदक्षिण तखन गेला जननि दर्शन राम ॥१४५॥
होम पूजा ध्यान बहुविध दान हो तहि ठाम ॥१४६॥

भावार्थः

“हा ईश्वर ! आइ हम अनाथ भ’ गेलहुँ ! हमर प्राणप्रिय राम हमरा एहि पापिन केर सून्न घर मे छोड़िकय वन चलि जेताह । हम जे स्त्रीक विश्वास कयलहुँ ओकरे ई फल भेटल अछि । हमर मोनक सबटा मनोरथ (अरमान) जहाँ के तहाँ रहि गेल ।” राजा एतेक कहिकय राम केँ छाती सँ लगा लेलनि । ओ हिचुँकि-हिचुँकिकय कानय लगलाह । हुनकर दशाक वर्णन नहि भ’ सकैत अछि । राम अपन हाथ मे पानि लय केँ राजाक आँखि केँ धो देलनि आ बजलाह – “हे पिता, चिन्ता जुनि करू । आब पछतेला सँ कि होयत । हमहुँ घुरिकय एब्बे करब । ताबत धरि युवराज भरत तँ छथिये । वन मे राज-सुख सँ सेहो कतेको गुना अधिक सुख छैक, जाहिठाम ऋषि-मुनिक समाज भेटैत छथि । वन सँ घुरलापर हम माताक चरण मे प्रणाम करब आ कहब जे हे माता, आब चिन्ता जुनि करू । कोनो समय नहि लागत । ओकर बाद जानकी लग जायब । कैकेयि केर मोनक व्यथा ताबत धरि दूर भ’ गेल रहतनि । फेर हम एतय घुरि आयब । पिताक चरण-कमल पर बेर-बेर माथ राखब ।” एतेक कहिकय राम राजाक प्रदक्षिण कयकेँ माता कौशल्याक दर्शन लेल चलि पड़लाह । जाहिठाम भाँति-भाँतिक हवन, पूजन, ध्यान आ दान कयल जा रहल छल ॥१३१-१४६॥

।दोहा।

रामचन्द्र आगमन किछु कौशल्या नहि जान ।
विभु विष्णुक कयले छली राम-हेतु से ध्यान ॥१४७॥

भावार्थः

कौशल्या केँ पतो नहि चललनि जे राम अयलाह अछि, कारण ओ रामक कल्याणक लेल परमेश्वर विष्णुक ध्यान मे मग्न छलिह ॥१४७॥

॥इति श्री मैथिल चन्द्रकवि-विरचिते मिथिलाभाषा रामायणे अयोध्याकाण्डे तृतीयोऽध्यायः॥

॥ मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला भाषा रामायण मे अयोध्याकाण्डक तेसर अध्याय समाप्त ॥  

हरिः हरः!!

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