मिथिलाभाषा रामायण – अयोध्याकाण्ड तेसर अध्याय

कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण

अयोध्याकाण्ड – तेसर अध्याय

॥अध्याय ३॥

।चौपाइ।

।मिथिला संगीतानुसारेण श्रीमालव छन्द।

काज मन्त्रि केँ कहि नृप देल। अपनैँ अन्तष्पुर मे गेल॥
नृपति न देखल केकयि आँखि। की वृत्तान्त उठल नृप भाखि॥
अबइत हसइत नित जे आब। केकयि काँ छल सिद्ध स्वभाव॥
नृप चिन्तातुर चित्त नितान्त। पुछलनि दासीसौँ वृत्तान्त॥
स्वामिनि तोर कतय छथि आज। कोप-भवन मे जनु महराज॥
आह आह की कोप निदान। सापक चरण साप नृप जान॥
की भेल नृपतिक प्रबल प्रताप। कुबड़ि-कथा शुनि थरथर काँप॥
शञ्च शञ्च केकयि तट जाय। थर थर कर कर परसल काय॥
त्यागि पलंग कि धरणी शयन। जिबइत हम देखइत छी नयन॥
असमय त्यागि कलावति कोप। करु जनु हमर मनोरथ लोप॥
चलु निज भवन कि भेलहुँ बताहि। बड़ उत्सव दिन दिअ निमाहि॥
मलिन वसन धारण धिक ज्ञान। अलङ्करण तन प्रत्याख्यान॥
कहु निर्द्धन काँ बड़ धनि करिय। मानी धनी सकल धन हरिय॥
नारी पुरुष अहित जे हयत। दण्डबद्ध जीवनसौँ जयत॥
सुन्दरि सुमति कहू की आन। हेतु अहाँक त्यागि देब प्राण॥
रामक शपथ कहैछी खाय। करब न अहाँ विषय अन्याय॥
सत्य पराक्रम शोभाधाम। प्राणहुँ सौँ प्रियतम छथि राम॥
कुबड़ी कल बल कहय इरोत। चोर सहथि की कतहु इजोत॥
शुनि से नृपति देल अनठाय। बान्धल सिंह जकाँ पछताय॥
दासी चित्त भेल निर्भीक। कुकरक भागेँ टूटल सींक॥

।षट्पद छन्द।

राम शपथ नृप कयल कहल शुनि केकयि रानी।
शञ्च उघाड़ल आँखि सत्य बान्धल नृप ज्ञानी॥
देवासुर – सङ्गाम मध्य वर अहँ दुइ देलहुँ।
से अछि न्यासित हमर प्रयोजन बिनु नहि लेलहुँ॥
भरत होथु युवराज नृप राम जाथु दण्डक गहन।
मुनिक वेष चौदह बरष हमर याचना अछि एहन॥

।चौपाइ।

।मिथिलासंगीतानुसारेण सरसासावरीय छन्दः।

हमर कहल नहि होयत भूप। डूबि मरब धसि पोखरि कूप॥
गरल अशन कय त्यागब प्रान। सङ्कल्पित जौँ होयत आन॥
केकयि कठिन वचन शुनि कान। नृप खसला मूर्छित अज्ञान॥
अशनि पतन तरुगण गति जेहन। केकयि कथा श्रवणसौँ तेहन॥
मूर्छित दशरथ नृप काँ जानि। अन्तःपुर जनि उठली कानि॥
दशरथ मन मन करथि विचार। विषमय विषम विषय संसार॥
की दुःस्वप्न भ्रमाकुल चित्त। बूझि न पड़इछ एकर निमित्त॥
मन नृप कह निद्रा नहि गाढ़ि। बाघिनि सनि रानी तट ठाढ़ि॥
वचन न एहन शुनाबिय कान। चट पट दय उड़ि जायत प्रान॥
सुमति सुदति सति को मति आज। भोगब अहाँ अकण्टक राज॥
कौशल्या काँ नहि किछु काज। अहंइक राम अहँक समाज॥
भेल कुसङ्ग ज्ञान सभ नष्ट। हमरा शिर मरणाधिक कष्ट॥

।मत्तगजेन्द्र छन्द।

निर्द्दय चित्त हलाहल घोरि कहू हम को बरु आनि पिआऊ॥
श्याम भुजङ्गमसौँ अंग अंगमे केकयनन्दिनि आनि डसाऊ॥
कण्ठमे बाँधि शिला बड़ि गोटि समुद्रक मध्य मे जाय डुबाऊ॥
दुस्सह राम-वियोग-कथा हमरा जनु कामिनि कान शुनाऊ॥

।चामर छन्द।

केकयी अहाँक दोष रामचन्द्र कैल की
मन्थरा कुमन्त्रणा सुबुद्धि कान धैल की
जीवनावलम्ब सौँ अये वियोग भेल जौँ
लोकमे कलङ्क देह छोड़ि जीव गेल तौँ॥

।चञ्चला छन्द।

चञ्चला समान गौरि रामकाँ रहै दिऔनि।
राज पाट कोष ओ समस्त सैन्य लै लोऔनि॥
नीक ई कहैतछी पतिव्रता – विचार – सार।
स्पष्ट कष्ट नष्ट हैत छूट लोक मे अभार॥

।चौपाइ।

।मिथिलासंगीतानुसारेणेदं द्राविण्यासावरीयं छन्दः।

दशरथ – दशा कहल की जाय। केकयिक पअर धयल लपटाय॥
कहु की रामचन्द्र सै भीति। कयल कसाइनि सनि की रीति॥
कहलनि केकयि भेलहुँ बताह। शुनतहिँ वचन हृदय उठ दाह॥
सत्य – प्रतिज्ञ सुयश बड़ गोट। भय जायब मर्य्यादा छोट॥
रामक शपथ कयल कय बेरि। वर माँगल हम अवसर हेरि॥

।नारीच छन्द।

कहू कहू नृपेन्द्र की वरप्रदान देल जे
वृथा कथा करैतछी कि आइ माँगि लेल से।
कनैतछी बजैतछी जनैतछी न की अहाँ
बिना विचार काज मे प्रयत्न कैल की कहाँ॥

।चौपाइ।

।मिथिला संगीतानुसारेणेदं शुद्धमलारीयं छन्दः।

धरणी शयन चयन नहि चित्त। दुर्ग्गति कामिनि प्रीति निमित्त॥
संज्ञाशून्य मृतक समतूल। केकयि कहथि वचन प्रतिकूल॥
विगत रात्रि जनु बरष समान। दशरथ आधि जान के आन॥
बाहर उत्सव हर्षित लोक। अन्तःपुर पसरल बड़ शोक॥
अरुणोदय भेल नृपति जगाब। बन्दी गायन गुणगण गाब॥
केकयि शासन शुनि भयभीत। विरुद पढी जनु गाबी गीत॥
सम्प्रति स्वस्थ चित्त नहि भूप। की आयल छी घसकू चूप॥
तिलक निमित्त वस्तु सभ धयल। मन्त्रि सुमन्त्र वृत्त सभ कयल॥
ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्यक जाति। निद्रा तनिकाँ आँखि न राति॥
ऋषिकन्या-गण पाँतिक पाँति। बाल वृद्ध तिय भाँतिक भाँति॥
पीताम्बर सुन्दर श्रीराम। कखन देखब छवि शोभाधाम॥
कटक किरीटी सर्व्वाभरण। कोटि – मनोभव – शोभा – हरण॥
नव घनश्यामल शोभागार। कौस्तुभ-शोभित परमोदार॥
स्मितमुख गजवर-पीठ विराज। लोक कहत जय जय युवराज॥
श्वेतछत्र धर लक्ष्मण सङ्ग। देखब कखन तखन जे रङ्ग॥
उत्सुक चित्त सबल पुर लोक। द्वार दोसर धरि नहि छल रोक॥
जागल छला राति महिपाल। उठलाह अछि नहि एतबहु काल॥
अनुदित दिनकर उठथि सदाय। आइ शुतल छथि की अलसाय॥
भेल अबेरि शयन छथि भूप। मन्त्रि विचार कयल चुपचूप॥
चिन्तातुर नृपतिक घर जाय। शञ्चहि जय जय शब्द शुनाय॥
नृप अचेष्ट नहि शुन किछु सोर। मुद्रित नयन युगल बह नोर॥
धरणी शयन न नयन उघार। केकयि नयन कोप विस्तार॥
करुण – रसादित दशरथ भूप। केकयि बनली रौद्र स्वरूप॥
मन्त्री मन व्याकुल अथऊत। विधि गति टारि न ककरो बूत॥
केकयि केँ कहलनि कर जोड़ि। कहु की थिक तामस केँ छोड़ि॥
निन्द न सगर राति नृप – नयन। विकल नृपति कीदहुँ छथि शयन॥
बुझि कत पड़इछ की थिक आधि। देखल शुनल नहि एहन समाधि॥
राम राम रटइत भेल भोर। बहल बहल चल नयन क नोर॥
वारिज – नयन रामकाँ लाउ। सत्वर रामक वदन देखाउ॥
स्वामिनि लायब राम बजाय। नृप – आज्ञासौँ से थिक न्याय॥
देखब राम कहल नृप कानि। सत्वरतर तनिकाँ दिअ आनि॥
शीघ्र सुमन्त्र कयल शुनि गम। जाय अवारित रामक भवन॥
सरसीरुह – लोचन शुनु राम। चलु चलु सम्प्रति भूपति-धाम॥
शीघ्र बजाओल अछि किछु काज। गड़बड़ सन मन लगइछ आज॥
लक्ष्मण – सहित राम रथ हाँकि। नृप लग पहुँचल सभदिश ताकि॥
कयल पिताक चरण परणाम। नृप जानल आएल छथि राम॥
हुनकाँ हृदय लगाबक बेरि। सम्भ्रम उठला खसला फेरि॥
रामचन्द्र बजला हा हाय। लेल पिता काँ अङ्ग लगाय॥
राज-दार उच्चस्वर कान। नृपकाँ की भय गेल अग्यान॥
राजतिलक – संभृति भेल व्यर्थ। अन्तःपुर किछु भेल अनर्थ॥
राम पुछल नृप – आधि – निदान। केकयि कहलनि हमरा ज्ञान॥

।दोबय छन्द।

।राग-तरंगिणी-मतानुसारेण शुद्धकोडारीयं छन्दः।

शुनु शुनु राम काम-मद-मोचन, शोचहिँ भूपति मरता।
काज-जहाज अधीन अहँक अछि, सङ्कट-जलनिधि तरता॥
अहाँ सुपुत्र वंशमे भेलहुँ, पिता-धर्म सभ राखब।
अहँक पिताकाँ कहइत लज्जा, हम मिथ्या नहि भाखब॥
वर दुइ गोट धयल छल पूर्व्वक, नृप सुकृती सौँ माँगल।
अपना नीकक सभकाँ इच्छा, अयश-पताका टाँगल॥
बापक जौँ सन्ताप हरब नहि, नरकक होएता भाजन।
सत्य-प्रतिज्ञ कथा कत जाएत, अयशक बाजत बाजन॥
शुनु शुनु श्रवण – शूल सम वाणी, जननी जानि सहैछी।
भाखिअ अनृत कथा न राम हम, शपथहिँ सत्य कहैछी॥
पिता-काज जीवन काँ त्यागब, विष भक्षण कय मरबे।
सीता ओ कौशल्या त्यागब, राज पाट की करबे॥
बिन कहलहुँ जे पिताकार्य्य कर, से थिक उत्तम बालक।
मध्यम कहलेँ करथि न कहलेहु, करथि अधम कुल-घालक॥
पिता कहल नहि करब अन्यथा, सत्य प्रतिज्ञा कयलहुँ।
तनिकर आज्ञा-पालन-कारण, कहु कि वृत्त भय अयलहुँ॥
करुणारहित कहल शुनि केकयि, धन्य धन्य हे राम।
जनक-अभीष्ट शिष्ट जन करइछ, त्रिभुवन तनिके नाम॥
अहँ युवराज – काज राजा जे, मङ्गबाओल सम्भार।
भरत होथु युवराज ताहिसौँ, ई सिद्धान्त विचार॥
शुनु गुणधाम राम कहइत छी, दण्डक वन अहँ जाउ।
चौदह वर्ष वनी भय रहुगय, कन्द मूल फल खाउ॥
स्मितमुख राम कहल केकयि सौँ, भरत होथु युवराजे।
हम दण्डक-वन गमन करैछी, नृपव्रत-पालन काजे॥
बड़ गोट शोच पिता हमरासौँ, नहि बजइत छथि आजे।
प्रजा पालना भरत करथु भल, भोगथु सभ समाजे॥

।चौपाइ।

।मिथिला-सङ्गीतानुसारेण शंकूकनाटीयं छन्दः।

देखलनि नृपति राम छथि ठाढ़। कयल विलाप दुःख बड़ गाढ़॥
उतपथ-वर्त्ति भ्रान्त मन जानु। हम स्त्रीजितक वचन नहि मानु॥
बलसौँ भोगिअ समुचित राज। अनुचित कहत न एक समाज॥
एहिसौँ हमरहुँ होयत न पाप। हरु रघुनन्दन मन सन्ताप॥

।रूपमाला छन्द।

।मिथिला-सङ्गीतानुसारेण केदारमालवीयं छन्दः।

जगन्नाथ अनाथ हमछी प्राण-वल्लभ राम।
विपिन जायब त्यागि हमरा शून्य पापिनि-धाम॥
कयल स्त्री-विश्वास जे हम तकर फल परिणाम।
हमर मन-अभिलाष सभटा रहल ठामहि ठाम॥
नृपति ई कहि रामकाँ निज हृदय लेल लगाय।
उच्चस्वरसौँ करथि क्रन्दन दशा कहल कि जाय॥
राम निज कर-कमल जलसौँ नयन देल धोआय।
कयल जाय न पिता चिन्ता आब की पछताय॥
हमहु पुनि घर घूरि आयब भरत छथि युवराज।
राजसौँ वन कोटि गुण सुख लाभ मुनिक समाज॥
कहब चिन्ता जननि करु जनु करब चरण प्रणाम।
किछु विलम्ब न तखन जायब जनकतनया-धाम॥
केकयी काँ आधि छूटल एतय आयब फेरि।
पिता-चरण-सरोज पर शिर धरब हम कय बेरि॥
कय प्रदक्षिण तखन गेला जननि दर्शन राम।
होम पूजा ध्यान बहुविध दान हो तहि ठाम॥

।दोहा।

रामचन्द्र आगमन किछु कौशल्या नहि जान।
विभु विष्णुक कयले छली राम-हेतु से ध्यान॥

।अध्याय ३ समाप्त।

हरिः हरः!!