मिथिला लेल राजनीति के मुख्यमार्ग कि हेबाक चाही?
– प्रवीण नारायण चौधरीएहि विषय पर लिखू सब सामर्थ्यवान लेखक। हमर विनम्र आग्रह अछि जे आब मिथिला लेल राजनीतिक स्तर पर युद्ध लड़बाक बेर भ’ गेल अछि, एहि समय जँ हम सब चुप रहि जाइत छी, अपन अपन सोच आ विचार अनुसार मिथिला लेल आगू नहि बढैत छी, बस अपन मत देबाक अधिकार आबहु बिहारहि लेल करैत छी त बहुत देरी भऽ जायत। नेपाल मे सेहो मिथिला प्रति जे विद्वेषपूर्ण राजनीतिक भावना देखल प्रदेश २ केर विशुद्ध मिथिला क्षेत्रक नामकरण मधेश प्रदेश करय बेर मे, एहि सँ स्पष्ट अछि जे मैथिल पहिचान केँ जानि-बुझिकय दिल्ली-काठमांडूक राजनीतिक शिगूफा आ मधेशवादक हार भोगि रहल मधेशवादीक कुतर्क आ कुटिल मोहरा बनिकय मिथिला केँ मेटेबाक नीयत – एकर विरूद्ध सेहो राजनीतिक स्तर पर ठाढ होयब आवश्यक अछि।
मोट ध्यान ई रहय जे मिथिला सभ्यता बचय, मैथिल पहिचान समस्त मिथिलावासी केँ भेटय आ आत्मगौरव के बोध लेल!
हमर हिसाब सँ –
रोडमैप क्लियर छैक।
हरेक मुद्दा आइकाल्हि राजनीतिक तौर पर उठेले सँ जायज मानल जाइत छैक। जे मिथिला लेल नगण्य अछि। मिथिला लेल राजनीति अनिवार्य विषय बनि गेल अछि। विगत समय मे राज्य अथवा केन्द्र केर नीति सँ मिथिला लेल विशेष कि सब कयल गेल आ कि सब बाकी रहि गेल एहि सब पर तथ्यगत समीक्षाक बड पैघ जरूरत अछि।
हम सन्दर्भ राखय चाहब – डा. अलख निरंजन सिंह एवं डा. प्रभाकर सिंह केर ओहि शोधपत्र “Finding Mithila Between India’s Center And Periphery” (Ref Link: https://maithilijindabaad.com/?p=5673) – बहुत महत्वपूर्ण विन्दु सब पर लेखकद्वय चर्चा उठौने छथि। अंग्रेज वायसराय लॉर्ड वेवेल (१ अक्टूबर १९४३ सँ २१ फरवरी १९४७ तक वायसराय, ताहि सँ पहिने १९४१ सँ १९४३ जून महीना तक ओ भारत मे कमान्डर इन चीफ रहलाह) – जिनका रचनात्मक विकास संग युद्ध रणनीतिकारक रूप मे ब्रिटिश राज काफी सम्मान आ महत्वपूर्ण ओहदा दैत रहल छलन्हि, जे द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद आर्थिक रूप सँ टूटि चुकल ब्रिटिश राज लेल भारत मे खसकैत शासन केँ सम्हारबाक लेल विशेष नियुक्ति दैत भारत मे आनल गेल छलाह, जे अबैत देरी भारत मे विकास आ सुशासन केर उच्चपथ पर अनबाक लेल कइएक योजना बनेबाक लेल सेहो प्रसिद्ध छथि, जे मिथिला मे हिमालय सँ आबि रहल बेहिसाब जल संसाधन केर व्यवस्थापन लेल सेहो सुप्रसिद्ध डकुमेन्ट वैवेल प्लान मे स्पष्ट खाका देलनि, संगहि बजट सेहो व्यवस्थापित कय देलनि…. लेकिन १९४७ मे देश स्वतंत्र होइत देरी तत्कालीन दुइ राजनीतिक जनचेतनाक मामिला मे प्रखर समुदाय ‘बंगाली’ आ ‘पंजाबी’ केँ देशक विभाजनक फलस्वरूप उत्पन्न खलबली केँ शान्त करबाक लेल वैवेल केर देल बजट केँ ‘बिहार’ सँ छीनिकय ‘बंगाल’ केर दामोदर घाटी निगम (स्थापना ७ जुलाई १९४८) आ ‘पंजाब’ केर भाखड़ा नांगल परियोजना (स्थापित १९४४, आंशिक काज १९४६, लेकिन विश्वक दोसर सब सँ ऊँच बाँध केर रूप मे बाँध निर्माणक काजक आरम्भ १९४८ बिहारक वैवेल योजनाक पैसा शिफ्ट कय केँ भेल) मे दय देल गेल। आर, तत्कालीन बिहार जेकर दक्षिणी भाग मे विश्वक एक सँ बढिकय एक कीमती खदान छल तेकर लौलीपप देखाकय अन्ततः मिथिला क्षेत्र केँ योजनावद्ध ढंग सँ मजदूर आपूर्तिकर्ता क्षेत्रक रूप मे परिणति दय देल गेल। बाद मे बाबू श्रीकृष्ण सिंह केर विरोध आ रुसवाई केँ दूर करय लेल यैह वैवेल योजना ‘कोसी परियोजना’ केर रूप मे अवैज्ञानिक, अनियंत्रित आ औपचारिकता लेल फूल सुंघाई दय कय नक्की मानल गेल। एहि आर्थिक पिछड़ापन केँ दूर करबाक लेल आइ कइएक दशक धरि कोनो उपलब्धिमूलक काज नहि, उल्टा जेहो किछु उद्योग सब छल से क्रमिक रूप सँ बन्द होइत चलि गेल। चीनी, पेपर, थर्मल पावर, तेल प्रशोधक, पनबिजली निर्माण आ कृषि उत्पाद प्रशोधक मिल सब केँ बीमार होय मे समय नहि लागल, एहि क्षेत्रक लोक हुजुम मे पंजाब आ बंगाल केर शरण लेनाय शुरू कयलक पहिने, आब त पूरे हिन्दुस्तान मे एतुका मजदूर भेटि जाइत अछि। तऽ लेखक सिंहद्वय काफी संजीदगी सँ मिथिलाक्षेत्रक पिछड़ापन केँ आ एतुका पहिचानक वैशिष्ट्य आदि केँ सेहो आधार बनाकय भारत सरकारक नीति पर आधारित शोधपत्र प्रस्तुत कएने छथि, तेकर अध्ययन अनुसार हम कहि सकैत छी जे ‘मिथिला राज्य’ केर स्थापना नहि केवल जरूरी अछि बल्कि अपरिहार्य सेहो अछि। लेकिन ई काज बिना राजनीतिक व्यवस्थापन केर नहि होयत। एहि लेल जरूरी अछि जे हर स्तर पर चर्चा हुए।
आबो यदि एहि मुद्दा केँ राजनीतिक संघर्ष में नहि आनब त मिथिला के राजनीतिक मृत्यु भेल बुझल जायत। एहि वास्ते अन्य राजनीतिक दल जेकाँ मिथिला लेल सेहो हम सब हिम्मत करी।
राजनीतिक व्यवस्थापन लेल स्पष्ट रूप सँ कारपोरेट स्तर पर मैथिल लोक आगू आबथि, चुनाव लड़थि। चुनाव हमेशा जीतय लेल नहि अपितु लोकतंत्रक बेहतरीन पक्ष विपक्ष केर रूप मे सेहो मजबूती सँ दावी पेश करबाक लेल लड़ल जाइत छैक। मिथिला लेल राजनीति कयनिहार चुनाव नहि जीत त हरेबाक लेल सेहो लड़थि आ परम्परावादी दल केँ यथास्थितिवाद केँ धकियाबैत मिथिलावाद केर महत्व केँ आत्मसात करबाक लेल सेहो लड़थि।
राजनीतिक धारा में मिथिला आबय। समसामयिक राजनीति मे जाहि तरहें जातिवादक वाहियात आधार आ धार्मिक उन्माद मे हिन्दू-मुसलमान आदिक आधार पर सत्तारोहण कयल जा रहल अछि, ताहि पर सेहो करारा कुठाराघात लेल मिथिलावाद केँ ठाढ़ हुअय पड़त। जातिवाद आ धार्मिक उन्माद सँ राजनीति के शुचिता समाप्त हेबाक विरूद्ध सेहो लोकक चेतना जागृत करथि। समाज केँ एहि परम्परावादी राजनीति के कारण विखण्डन के नुकसान सँ बाहर निकालबाक काज सेहो होयत। मिथिला सँ जहिना चारि महत्वपूर्ण दर्शन संसार केँ भेटल – न्याय, सांख्य, वैशेषिक आ मीमांसा (गौतम, कपिल, कणाद आ जैमिनी) जेकाँ राजनीतिक शुचिता आ सामाजिक न्याय लेल ‘जनक समाजवाद’ केर अनुसार सभक लेल रोजी, रोटी आर मकान केर आधारभूत नीति पर चलथि।
बाकी राजनीति आइ जेना गन्दगी उत्पन्न कयलक ताहि विरुद्ध बिगुल फुकिकय मिथिला के जनक समाजवाद आ यथार्थ सामाजिक न्याय केँ लागू करैत लोकपलायन के दंश सँ उबारथि। लोकपलायन दूर करबाक लेल बहुत रास ठोस अवधारणा पर काज करय पड़त। पूँजी निवेश के माहौल बनाबय पड़त। कोढियापन्थ सँ हंटिकय, टंगघिच्ची प्रवृत्ति केँ खण्डित कय केँ सत्य आ ईमादारिता संग पूँजी संरक्षण, संवर्धन आ प्रवर्धनक लेल बढ़य पड़त। राज्य केर अपन नीति एहेन हो जे संसारक अनेकों बहुराष्ट्रीय कम्पनी आ पूँजी निवेशक लेल ई क्षेत्र आकर्षण के केन्द्र बनय। लेबर सप्लाई लेल सेहो राज्य द्वारा स्वयं नियमन करय पड़त। प्रत्येक मजदूर लेल न्यूनतम आय, बीमा आ स्वास्थ्य सुरक्षाक संग ओकर सन्तान लेल शिक्षा आ दक्षता वास्ते प्रशिक्षण आदिक व्यवस्था करय पड़त। एखन जेना अनस्किल्ड लेबर विभिन्न राज्य मे जा कय अपन शोषण करबाबैत अछि, ताहि सब पर मिथिला राज्य सरकार केर दृष्टि, निबन्धन आ प्रबन्धन काज करत। मानव संसाधनक सदुपयोग लेल तुरन्त प्रभाव सँ नव नीति केर अवलम्बनक जरूरत अछि।
जनगणना में मैथिली आ संविधान में मिथिला राज्य,
समाज केँ जोड़ब, तोड़ब नहि,
एहि नारा संग आ मिथिला के संसाधन के सदुपयोग करैत केना यथार्थ विकास होयत ताहि लेल विजन बनायब मिथिलाक राजनीति केर मूल आधार थिक। एहि पर ‘मिथिला राज्य निर्माण सेना’ द्वारा काज कयल जा रहल अछि। कतेको लोक छिटपुट काज करैत छथि, अपन-अपन डफली अपन-अपन राज अलापैत छथि… रोकबाक युग त आइ नहिये टा छैक, तखन कार्यगत एकता अर्थात् समान उद्देश्य-लक्ष्य लेल समान आवाज, समान काज करबाक प्रयास करथि त जीत नजदीक भेटत। एक-दोसर केँ अपन कुबोल आ दुर्वाणी सँ आघात नहि पहुँचा शंखघोषक ध्वनि सँ संग देबाक नीति पर चलथि। अन्यथा जहिना पहिने कतेको दशक खराब भेल से आगुओ होयत। एहि सँ बचू।
पर्यटन, उद्योग, व्यवसाय, स्वरोजगार, कृषि, शिक्षा, संस्कृति, कला, फ़िल्म, जल परिवहन आ जल आधारित संरचनात्मक विकास, पनबिजली उत्पादन आ जल भंडारण जेहेन कतिपय क्षेत्र में सम्भावना अछि, से मिथिला के लोक केँ बुझबियनि आ ठोस अवधारणा पर काज करी। हरेक क्षेत्र लेल योजना निर्माण करी, से ओहि ठामक भौगोलिक बनावट आ संभावना केर प्राथमिकता मुताबिक बनबी आ ताहि लेल क्षेत्रक लोक संग संगठन निर्माण करैत आगू बढी। केकरो ऊपर भाषा आदिक नाम पर कोनो दबाव नहि, बल्कि अपन पहचान केँ मजबूती करय लेल, अपन सन्तति आ ऐगला पीढीक वास्ते, राष्ट्रक वास्ते, सम्पूर्ण मानवताक वास्ते एकजुटता करैत बढय जाइ।
सब सँ अधिक मिथिला के लोक जे आइ आन क्षेत्र में जाय लेल बाध्य अछि ओहि जनसँसाधन केर अपन क्षेत्र के विकास लेल, संगहि बाहरी आयार्जन (रेमिटेंस इनकम) लेल राज्य प्रायोजित आ योजनाबद्ध ढंग सँ काज होयब जरूरी अछि।
मिथिला में हरियर, पियर, उज्जर आ लाल क्रान्ति के जरूरत अछि। हरियर माने कृषि उपज के समुचित उत्पादन, रखरखाव आ बिक्री वितरण; पियर सँ फल उत्पादन आ बिक्री वितरण, उज्जर सँ दूध आ अन्य दुग्ध उत्पादन आ लाल सँ पशुपालन व मीट प्रोडक्ट्स उत्पादन आ निर्यात में गज्जब रोजगार आ राजस्व भेटत। से सब मिथिला आधारित राष्ट्रीय सकल उत्पाद में पर्यन्त में वृद्धि करयवला काज हो।
वर्क फ्रॉम होम के जमाना में आईटी पार्क मिथिला मे बनय। महानगर आ शहरक आधुनिकतम सुविधा सहित के बहुमंजिला इमारत निर्माण हो। एहि सँ सामुदायिक बाजारक निर्माण होयत आ कनेक्टिविटी के हर क्षेत्र में क्रान्ति आबि सकैत अछि। रोजगार के कमी नहि अछि एतय।
चीन, नेपाल, भूटान आ बांग्लादेश जेहेन संवेदनशील सीमाक्षेत्र के राज्य केँ विशेष कॉमन पोर्टल (पोर्ट) बनायल जा सकैत अछि। अंतर्राष्ट्रीय निवेश के अपार सम्भावना के क्षेत्र बनत मिथिला। जल परिवहन मार्ग विकसित करबाक आ फेरी (पनियां जहाज) चलेबाक जरूरत अछि एतय। कोलकाता-वाराणसी गंगा रूट मिथिला सँ होइत गुजैर रहल अछि, कोसी, बागमती, कमला-बलान, गंडकी, आदि विभिन्न मुख्य नदी आ एकर कतेको उपधारा सभ केँ नदी जोड़बाक महात्वाकांक्षी परियोजना दिश उन्मुख हुए पड़त। नेपाल, भुटान जेहेन भूपरिवेष्ठित देश केँ सेहो जलमार्ग उपलब्ध होयत।
हरि हर!!
