डर आ समाधान – मानव जीवनक विलक्षण दर्शन

डर 
 
मोन अछि? बच्चे सँ केना अपना सब केँ पहिने डर देखायल गेल आ फेर डर सँ बचबाक लेल बहादुरी सेहो सिखायल गेल? डर कय प्रकारक छल – भूत-प्रेतक डर, आँधी-बिहाड़िक डर, बिजली-पानि के डर…! लकड़सूंघा के डर, मघैया डोम के डर, गुन्डा-बदमाश के डर…! तहिना अन्जान बाट पर असगरे जेबाक डर, जंगल-झाड़ आदि मे जेबाक आ ताहि मे अनेकों तरहक जानवर व साँप-कीड़ाक डर….! डर कतेको प्रकारक छल।
 
ताहि दिन त बच्चा रही तखन ई डर सब रहय। आब जखन बुझनुक भेल छी तखनहुँ ओतेक रास डर कोनो न कोनो तरहें मस्तिष्क मे अछिये। लेकिन डर सँ भगबाक लेल सेहो कय टा उपाय खिस्सा पिहानीक माध्यम सँ कहल जाइत छल। जेना-जेना बढलहुँ, पढलहुँ-लिखलहुँ, तेना-तेना डरक कारण, डरक समीक्षा आ डर सँ ऊबरबाक उपाय सभक ज्ञान होइत गेल। बहुतो रास डर स्वतः अन्तर्ज्ञानक संग भगैत चलि गेल।
 
हमरा लेल सेहो डर भगेबाक एकटा साधारण उपाय छल – मंत्रक जप। पिता एक साधारण साधक छलाह। जहाँ कनिको चौंकैत देखथि कि पाँच-दस बेर माथा पर ‘सीताराम-सीताराम’ जपिकय हाथ फेरि दैथ आ हमर डर तुरन्त भागि जाइत छल। मतलब जे पिताक हाथक संग भगवानक नाम आ डर छू-मन्तर, पार! जा धरि माता-पिताक संग रहलहुँ डर भगेबाक सब सँ पैघ उपाय यैह रहल। दिनचर्या मे मन्दिर जायब, भगवती केँ पाठ सुनायब, जल-फूल चढायब, ई सब स्वस्फूर्त पारिवारिक आ परिवेशक संस्कार सँ भेट गेल छल। यैह संस्कार जखन अन्तर्ज्ञानक संग बढैत गेल, स्वाभाविक छैक जे डर केर नामोनिशान नहि रहल।
 
समाधानक उपाय जखनहि अहाँ केँ प्राप्त भऽ जाइत अछि, हर तरहक डर अहाँ सँ दूर भागि जाइत अछि। भले गरीबीक डर हो, बेरोजगारीक डर हो, बीमारीक डर हो, प्राकृतिक आपदाक डर हो, जंगली जानवर केर डर हो, दुष्चरित्र दुर्जनक डर हो, कुटिल आ खतरनाक मनुष्यक डर हो… डर एक समस्या थिक आ डर सँ लड़बाक सामर्थ्य हासिल करब समाधान थिक।
 
संस्कृत केर पाठ सेहो बहुत सहायक छल/अछि। हितोपदेश-सुभाषितानि केँ मोन पाड़ैत छी त आइयो जीवनक विभिन्न डर-विपत्ति आ दुरूह काल सँ संघर्ष करबाक – सामना करबाक सामर्थ्य स्वस्फूर्त उत्पन्न भऽ जाइत अछि। सब सँ पहिने त ओ प्रसिद्ध सुभाषितानिक श्लोक –
 
तावद् भयस्य भेतव्यं यावद्भयमनागतम् ।
आगतं तु भयं वीक्ष्य नरः कुर्याद् यथोचितम् ॥
 
डर सँ ता धरि मात्र डरेबाक चाही जा धरि सोझाँ नहि आयल अछि। जखन आबिये गेल त ओकर समुचित प्रतिकार करबाक चाही। एहि महान श्लोकक संग हितोपदेशक ओ कथा – बकरी आ बाघ केर एक-दोसरा सँ भेंट आ बकरी द्वारा बाघ केँ नहि टेरबाक चरित्र प्रस्तुति – कतेक सम्बल भेल छल ई कथा ताहि दिन बचपन मे जेकरा शब्द मे वर्णन करब कठिन अछि। यैह सच्चाई – यैह दर्शन (philosophy) आइ धरि ‘डर’ सँ सामना करबाक मूल मंत्र बनल अछि। हम मानव अपन जीवन मे डर केर थ्योरी आ डर केँ सामना करबाक कला सिखैत निरन्तर जिबैत छी। डर केर समाधान लेल आरो कतेको साधना आ मंत्र आदिक जनतब सेहो बाद मे भेटल, एहि पर फेर कहियो चर्चा करब। ॐ तत्सत्!!
 
हरिः हरः!!