मैथिली गीत-संगीत-मनोरंजन केर दुनिया मे कथित सम्भ्रान्त समाजक सेंशरशीप सिर्फ एक मिथ्याचार

किछु अहिना-ओहिना: मैथिलीक मंच आ अश्लीलताक परिभाषा तकैत प्रवीण
 
फोटो फाइल: साभार एमएसएन

आजुक युग मे ढोलक-झालि-मृदंग आदि पुरना जमानावला बाजा सब बड कम चलैत अछि। रसनचौकी सँ अंग्रेजी बाजा मिथिला समाज मे सेहो बड़ा सख सँ लोक बजबय लागल। आर जेना-जेना जेबी मे माल बढल गेल, साउन्ड सिस्टम आ बाजा सिस्टम सब सेहो चेन्ज होइत गेल अछि। आब त एना बुझाइ यऽ मानू जे पुरना बाजाक ध्वनि मानव श्रवण क्षमता केँ भीतरक संवेदना धरि पहुँचय तक केर काबिल नहि रहि गेल अछि। गर्भहि सँ बच्चाक संरचना मे ‘डीजे’ केर पछिमाहा बाजाक धक-धक धड़कन केँ हिलबय वला आवाजक स्पन्दन मात्र संगीतक बिया बाउग करैत अछि, मायक हृदयक धड़कन केर आवाज केँ बात छोड़ू, चारूकात आवोहवा मे जे धकधक्की बढौने अछि वैह टा संवेदना केँ स्पर्श कय पबैत बुझा रहल अछि। दोष मायक नहि, वातावरण मे साउन्ड पोल्यूशन केर कहि सकैत छी या फेर समाज मे प्रचलित वर्तमान मानवीय व्यवहार एहि लेल दोषी भऽ सकैत अछि। ओना एकरा जँ सरेआम जनसभा मे दोषी कहि देबय त लोक सब मार-मार दौड़त अहीं पर। हाले एकटा गीत-संगीतक मैथिली मंच पर एक प्रख्यात उद्घोषक किछु कलाकार केर धकधक्कीपूर्ण प्रस्तुति मे टांग अड़ेलखिन कि लोक सब दौड़ि गेल छलन्हि, “मार सार के, मार सार के… चिचियाइत!” हम डरा गेल रही। उद्घोषक आ हम संगे गेल रही। डर ई भेल जे हुनका बचबय लेल हम जायब तऽ एम्हर-ओम्हर सऽ १० ढेपा-चेपा अपनो नहि लागि जाय, हम डरपोक लोक… भोज मे आगू आ रण मे पाछू वला लोक… कतेक बुझबैत छियन्हि उद्घोषक भाइ केँ जे यौ जी बेसी सम्भ्रान्त बनबाक चक्कर मे नहि पड़ल करू… मुदा ओ खून होइ लेल तैयार छथि।

 
एकटा बात मोन पाड़य चाहब। विवाहक पार्टी आ कि इंजीनियरिंग कालेज मे छात्र लोकनिक स्वागत कार्यक्रम, पिकनिक कि न्यु ईयर… कोनो पार्टी मे ‘सपना चौधरी’ आइ-काल्हि सलवार-फ्राक मे तेना-तेना ‘देशी-नाच’ आदिक ठुमका लगबैत छथिन जे केहेन-केहेन पागल भऽ जाइत अछि। बुढबो सब धोती-तोती ठेहुन सँ ऊपर उठाकय देबय लगैत छैक ओकरे जेकाँ घुमघुमौआ डाँर्ह लचकौआ स्टाईल मे। एकटा उदाहरण राखि रहल छी:
 
आइ-काल्हि सपना चौधरीक नााच आ ई हरियाणवी गीत… तहलका मचौने अछि।
 
तेरी आग्या का यो काजल
मने करे से कोई घायल
तूँ सहज सहज मा धर ले
मेरा दिल धड़काबे पायल
हो मने पल पल पल पल याद तेरी तड़पाबे से हाय
तेरा रूप जिगर मे रंगके आग लगाबे से
तेरी आग्या….
 
सपने के मैं तेरा दीदार करता हूँ
जान से ज्यादा जाने मन तने प्यार करता हूँ
मेरी जिन्दगी में आके, मेरे दिल का चैन चुराया
तूँ संगमरमर की मूरत, तने देख के मन ललचाया
ओ मने पल पल पल पल याद तेरी तड़पाबे से
तेरा रूप जिगर मे रंगके आग लगाबे से
तेरी आग्या…..
 
दिल जिगेरी तेरी आग्या में खो जाऊँ
जुल्फें घटा कारी तेरी मैं इन में सो जाऊँ
हिरदैया देखे सपना कद बनेगा तेरा सजना
मने भूख प्यास न लागे तूँ बना ले कोई अपना
ओ मने पल पल पल पल….
तेरा रूप….
तेरी आग्या….
 
मैथिली मे सेहो एकर कय टा नकल बनि गेल एखन धरि। कतेको ठाम लोक प्रस्तुति सेहो दैत अछि। इनरुआ मे अपन सन्नू भाइ केँ खुलेआम एहेन गीत सब प्रस्तुत करैत देखने रही आ तखन आइ हुनकर लाखों फैन मैथिली-थारू-राजवंशी-उड़ाँव आदि अनेकों भाषाभाषी बनि सकल अछि से प्रत्यक्ष देखने रही। अपना मोन हमर अपरतिबे सनक रहल। कारण दीदी-बहिन सभक सोझाँ ओ सब गीत ‘सैँयाँ नथिया टूटल हमर खटिया मे’ सुनिकय हमरा बड़ा मोन केनादैन कय रहल छल…. लेकिन पब्लिक लेल न ओ कार्यक्रम रहैक…. हम त अतिथि रही…. हम के होइत रही झूठे बाझयवला ओहि सब मे! चुप रहिकय मोने-मोन गुड़-चाउर फाँकैत रहि गेलहुँ।
 
एम्हर मैथिली मंच पर कोनो गायिका अपन स्वर आ अदायगी सँ कनेक नयन-मटक्का खेलाइत दर्शक सब केँ झूमा देलीह त ‘नीक लोक’ सब केँ समस्या भऽ जाइत छन्हि। किनको ई देखाय लगैत छन्हि जे ‘विद्यापति’ केर नाम पर आयोजित मंच सँ एहि तरहक गीत-गजल प्रस्तुत नहि हेबाक चाही। कियो कहता जे ई सब सम्भ्रान्त समाजक काज नहि थिक। आब ओ गलत कहला कि सही कहला हम ताहि द्वंद्व मे नहि फँसय चाहब, धरि हिनका लोकनि सँ ई जानय चाहब जे सम्भ्रान्त लोक बनिकय हमरा लोकनि निम्न काज मे कतय धरि सफल भऽ पेलहुँ?
 
१. कि घर मे ई गीत सब पर प्रतिबन्ध लगेने छियैक?
 
२. कि अपन नव पीढी केँ एहि सब तरहक नाच-गान सँ बन्धित राखि सकल छी?
 
३. घर-घर मे देखा रहल टेलिविजन धारावाहिक आ म्युजिक चैनल्स केर उत्पाद जाहि मे लव आ न्युडिटी स्पष्ट रूप सँ युग अनुसार देखायल आ बाँटल जा रहल अछि ताहि सब पर नियंत्रण कय सकल छी?
 
एहेन-एहेन अनेकों प्रश्न अछि जेकर जबाब अहाँ कहबो करब जे ‘हाँ’, एहि सब सँ बचल छी तऽ अहाँ केँ हम अपवाद टा मानब। युगक प्रभाव सँ – वातावरणीय प्रभाव सँ – आर रंगी-चंगी फिल्मी संसार आ टेलिविजन सँ सेहो बेसी सहज इन्टरनेट देवताक कृपा सँ हाथे-हाथे उपलब्ध मोबाईल सँ ई सब जे मुफ्त मे ‘युट्युबेश्वर’, ‘गुगलेश्वर’, आदि अनेकों ‘नेट पर उपलब्ध मुफ्त साइटेश्वर’ सब सँ सहजे उपलब्ध ई ‘सांसारिक पदार्थ’ केर भोग के नहि कय रहल अछि।
 
तेहेन स्थिति मे फेसबुक पर हमरा लोकनि ‘अश्लीलता विरुद्ध मुहिम’ चलाकय वास्तव मे अपन पीठ त ठोकि सकैत छी, देखा सकैत छी जे फल्लाँ बाबू बड़ा सज्जन-सम्भ्रान्त…. हुनका ई सब अफीमी नशा सँ घृणा छन्हि, धरि यथार्थता एहि बनावटी ढकोसला सँ बेसीकाल नहि नुका सकैत अछि।
 
तैँ, मैथिली मे सेहो जे आधुनिकताक आगमन वा मिश्रण भऽ रहल अछि तेकरा पर आक्रमण कय कोनो एक कलाकार केर चरित्रहत्या करब कतहु सँ उचित नहि अछि। बल्कि नंगटे नाचय मे कतेक छोट कपड़ा तक मैथिली केँ पहिरबाक चाही से तय कय सकैत छी। पोंगापन्थी छाँटिकय मैथिली केँ पान्डित्य मे पहिने सेहो बहुत नुकसान कय देल गेलैक, तखन न किछु लोक केँ मौका भेटि जाइत छैक जे ई बड़का लोकक भाषा थिकैक…. बड़का लोक बनू, कियो नहि रोकैत अछि, मुदा एहि आमजनक भाषा मैथिली केँ सेहो सब तरहक श्रृंगार जरूर करय दियौक, हम एतबे आह्वान करब।
 
हरि: हर:!!