दुर्गा पूजा आ भगवतीक विदाह होयबाक उदासी

माँ केर विदाह होबक समय, सगर मिथिला उदास भऽ जाइत अछि

दुर्गा पूजाक प्रतीक्षा लोक सालो भरि करैत अछि

 
साल भरिक प्रतीक्षा उपरान्त अबैत अछि महापर्व दुर्गा पूजाक समय आर अपना-अपना तरहें प्रचलित विधान केर अनुकरण करैत जगह-जगह होइत अछि आदिशक्ति जगदम्बाक पूजा-पाठ। समूचा भारतवर्षीय विभिन्न राष्ट्र केर संग-संग आब विदेशहु केर धरती पर होबय लागल अछि ‘दुर्गा पूजा’ जाहि मे सामान्यतया १० दिनक क्रमिक पूजा-पाठक विधान अछि। प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी… सँ लैत नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा प्रकृतिताः केर प्रसिद्ध श्लोक मुताबिक भगवतीक ९ रूपक विशेष स्मरण-चिन्तन करैत शक्तिदात्री माता भवानी केँ प्रसन्न करबाक लेल आस्थावान समस्त लोक बेहाल रहैत छथि। जेना कोनो पुरान आ मैल वस्त्र फेरि लोक नव वा साफ वस्त्र धारण करैत अछि, दुर्गा पूजाक क्रम एहि शरीररूपी परिधान केँ पुरान आ मैल सँ नव आ साफ-सुथड़ा-स्वच्छ बनेबाक एकटा समग्र उपक्रम कही तऽ अतिश्योक्ति नहि होयत। बीमार, अस्वस्थ, कमजोर, रुग्ण, उदास, शिथिल, आलस्य सँ भरल – ई सब केकरा इच्छा छैक जे एहेन स्थिति मे रही। तैँ दुर्गा पूजा नव ऊर्जा आ शक्ति केर संचरण लेल एकटा मूल विन्दुक रूप मे सदिखन प्रतीक्षित रहैत अछि। 
 

मिथिला मे घर-घर शक्तिपीठ विराजमान

 
मिथिलाक लोकपरम्परा मे कुलदेवी काली आदिशक्ति जगदम्बाक अति विशिष्ट रूप मे अधिकांश परिवार मे प्रचलित छथि, तहिना एहि ठाम कोनो पूजा-पाठ मे पंचदेव उपासना अनिवार्य होइत अछि, अरिपन मे पर्यन्त श्रीयंत्रस्वरूपा आदिशक्तिक प्रतीक चिह्न ओ अष्टदल सहित नवग्रह आदि विभिन्न आध्यात्मिक सगुण स्वरूप पीठार-सिन्दुर केर युग्म रेखांकन-विन्दुरूपी ठोपक संग होइत अछि, घरे-घरे भगवतीक अनेकों रूप काली, बिसहरा, ज्वालामुखी, आदि देवी पिन्डरूप मे अवस्थित मानू एक-एक शक्तिपीठ होइथ ताहि तरहक आम अवस्था अछि। अतः एहि मिथिला नाम्ना अतिविशिष्ट वसुन्धरा मे देवी दुर्गा जे समस्त शक्तिक मूल आ समग्र स्वरूप थिकीह – हुनकर पूजा-पाठक अत्यन्त गहींर आस्था आ पूजापाठ परम्परा अछि। नहि केवल दुर्गा पूजाक समय बल्कि नित्य-प्रतिदिन कुलदेवी-कुलदेवताक पूजा-परम्पराक विलक्षण परम्परा एतय भेटैत अछि। जँ घर मे कोनो विशेष उत्सव होयबाक अछि तखन तऽ विशेष रूप सँ चनबा, अँचरी, आर्तक पात, मौर आदि लगबैत भगवती केँ प्रसन्न कयलाक बादे आन कोनो काज आगू बढत। षोडश मातृका पूजा, महागौरी, महालक्ष्मी, महासरस्वती ओ महाकालीक पूजा, पितर आ देवताक पूजा, ब्राह्मण बाबूक पूजा – एहि लोक सँ ओहि लोक धरिक समस्त आदिपुरुष, अनादिपुरुष लोकनिक पूजा विधान सँ मिथिला आध्यात्मिक साधनाक मुख्य केन्द्र आ पूर्ण वैदित सभ्यताक अनुगामी सिद्ध होइत अछि। संभवतः यैह कारण जगज्जननी जगदम्बा सीताक रूप सँ एहि माटि सँ अवतार लैत छथि। एहि धराधाम केर माटि-पानि-हवा सब किछु परम पवित्र सिद्ध भेल अछि।
 

पूजाक आखिरी विधान – जयन्ती चढेनाय आ भगवतीक प्रतिमाक विसर्जन

 
९ दिन धरि विधानपूर्वक माताक विभिन्न स्वरूपक विशेष आराधना आ हविष्य चढेबाक सब विध-व्यवहार पूरा कयलाक बाद १० दिन अथवा दशमी तिथि केँ विधिपूर्वक विसर्जन कय कलशस्थापनाक संग पारल गेल जयन्ती – जौ केर नव अंकुरित कोमल – पियर – हरियर गाछ काटिकय “ॐ जयन्ती मंगलाकाली भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते” मंत्रक जप करैत भगवती केँ जयन्ती सौंपल जाइत अछि। जगज्जननी जगदम्बा संग कार्तिकेय, गणेश, महालक्ष्मी, महासरस्वती, महाकाली, रमण भगवान्, अर्धनारीश्वर, हाथी देव, आदि केँ सेहो जयन्ती समर्पित कयल जाइत अछि। एकरा ‘जतरा’ सेहो कहल जाइछ। उड़ैत नीलकंठ केर दर्शन केँ बड़-बुजुर्ग शुभकारी मानलनि अछि। तहिना, आजुक दिवस सपरिवार जयन्ती अर्पण कयलाक बाद अपना सँ जेठ केँ प्रणाम कय आशीर्वाद लेबाक चलन अछि। दुर्गा पूजा हो आर मिठाई नहि बाँटल जाय ई त संभवे नहि छैक, ताहि पर सँ जतराक भोज – स्वजन-परिजन संग खास परिकार सहितक सुस्वादु भोजनक सेहो बड पैघ आनन्द अबैत अछि।
 
मुदा प्रतिमा विसर्जनक समय अबैत धरि एकटा अलगे तरहक उदासीक माहौल बनि जाइत अछि। पूरे एक साल केर प्रतीक्षा उपरान्त आयल ई महापर्व केर समापनक बेर – मोन केकरो नहि मानि रहल छैक जे आइ भगवती केँ विदाई करी परञ्च ठीक जेना बेटीक बिदागरी करेनाय अनिवार्य छैक किछु तहिना क्रन्दनक संग आब भगवतीक विदाई विधान मुताबिक करबाक रहैत छैक जे माहौल केँ पूरा उदास बना दैत छैक। एहि अवसर कतेको तरहक समदाउनि गायल जाइछ।
 
हिलि लियौ मिलि लियौ –
आब मिलि लियौ यौ भैया सब
आब मिलि लियौ हे सखी सब
आब धयलहुँ पंथ केर बाट
 
मिलैते जुलैते हो बाबा
आब दुइये पहर भेल
से आब दुइये पहर भेल
आब जुड़बा बन्हैते भय गेल साँझ
 
दाय हे माय सब
आब पर हे पड़ोसिन
से आब पर हे पड़ोसिन
आब बाबा केँ कहबनि बुझाय
 
के आब नहि एबैइ हो बाबा
अहुँ के नगरिया
से अहुँ के नगरिया
आब पियबा बसय छथि बड़ी दूर
 
आर, यैह उदासी, समदाउनि, निर्गुण आदिक गायनक संग मन्दिर सँ विसर्जन घाट धरिक यात्रा करैत उदास मोने लोक भगवती केँ विदाह करैत छथि। सभक अन्तिम प्रार्थना मे पुनः ऐगला वर्षक पूजा एकदम हर्षोल्लासक संग सपरिवार देखि सकी – सभक सब मनोकामना जे भगवती स्वयं जनैत छथि, ओ पूर करिहथि – करीब-करीब हर हाथ जोड़ल लोक एतबे प्रार्थना करैत भगवतीक प्रतिमा केँ विसर्जन करैत छथि। एहि तरहें पूरे दस दिनक ई महापर्व संपन्न होइत अछि।
 
हरिः हरः!!