आलेखः मैट्रिकक बाद अध्ययनक क्षेत्र
– पं. भवनाथ झा, पटना
माध्यमिक माने मैटरिकुलेशन एकटा एहन शिक्षा थिक जकरा सभ प्रकारक शिक्षाक आधार कहल जा सकैत अछि। जेना किसान खेत कें जोति-कोडि कें तैयार करैत छथि जाहिमे कोनो फसिल लगाओल जा सकए तँ खेतक ओहने अवस्था मैट्रिकुलेशन थिक। एकर बाद ई निर्णय लेब जे कोन बच्चा आँगा की पढय, ताहि पर विचार करब अभिभावक एकटा पैघ दायित्व भए जाइत छनि। अभिभावकक अपन ज्ञान-क्षेत्र सीमित होइत छनि, आ जँ ओ एसकरे अपन रुचिक अनुसार बच्चाक अध्ययनक क्षेत्र चुनैत छथि तँ ओहिमे बहुत हद धरि असफलताक सम्भावना सेहो रहैत छैक। एहि स्थितिमे अभिभावक अपन इच्छा बच्चा पर थोपबाक प्रयास करैत छथि जे भविष्यमे जा क घातक सिद्ध भए जाइत अछि।
तें एहि कार्यक लेल जँ कोनो संगठन आँगाँ आबि रहल अछि तँ ओकर ई डेग स्वागत योग्य अछि। हम एहि अर्थ मे एहि संस्थाक अभिनन्दन करैत छी।
संस्थाक स्तरसँ कार्य करबाक लेल हमरालोकनिकें सभसँ पहिन दू-तीन टा बात कें ध्यान राखए पड़त।
- उत्पादक आवश्यकता- जखनि कोनो बच्चा अध्ययन क्षेत्र कें चुनि ओहिमे क्षेत्र मे नीक ज्ञान पाबि कार्य करबाक योग्य भए जाइत छथि तखनि ओ समाज आ देशक लेल एकटा उत्पाद भए जाइछ। जेना एक वर्ष मे जँ 500 इंजीनियर कें देश भरि मे डिग्री देल गेल तँ ओ सभटा इंजीनियर देशक लेल ओहि सालक उत्पाद थिकाह।
उत्पादन दू प्रकारक होइत अछि-
- अपन आवश्यकताक पूर्तिक लेल- जेना कृषिक क्षेत्र मे लोग अपन घरक आवश्यकताक पूर्तिक लेल अन्न उपजबैत छथि तँ ओ घरक व्यक्तिक संख्याकें देखैत धान, गहूम, दलिहन, तेलहन मसाला आदिक फसिल लगबैत छथि तँ ओहि उत्पादमे ई ध्यान राखए पडैत छनि जे हमरा भरि सालमे चाउरक कतेक खर्च अछि ताही हिसाबसँ ओ धान उपजबैत छथि। आ धानक संग लेहन सेहो ओही अनुपात मे लगाए दैत छथि जे तेल खरिदए नै पडत।
- निर्यात करबाक लेल- मुदा एकर दोसर स्थिति छैक जे किसान ई अबधारि लैत छथि जे हमरा जे फाजिल होएत तकरा बेचि लेब आ जे वस्तु नै उपजाएब, से बाजारसँ कीनि लेब।
तें एहि दूनू स्थिति कें ध्यानमे राखि बच्चाक लेल अध्ययनक क्षेत्रक निर्धारण आवश्यक भए जाइत छैक। एहि विषय पर कार्य करबासँ पहिने संस्थाक लेल आवश्यक भए जाएत जे ओहि देश कें, ओहि समाज कें कोन क्षेत्रक उत्पाद के कतेक आवश्यकता छैक। जँ एहि तथ्य के ध्यानमे नै राखल गेल तँ ओहि देशमे एक क्षेत्रक लोकक अभाव होएत आ दोसर क्षेत्रक पढल-लिखल लोकमे बेरोजगारी बढत। शिक्षित बेरोजगारक संख्यामे वृद्धि होएत आ दोसर दिस आन क्षेत्रक शिक्षित व्यक्तिक अभावमे विकासक कार्य रुकत। ऊपर जे कृषिक उदाहरण हम देल अछि ताहिमे पहिल स्थिति अर्थात् अपन आवश्यकता मात्रक पूर्तिक लेल कृषिकार्यक स्थितिमे देश ओ समाजक आवश्यकताकें देखए पडत। सोझ शब्दमे ओहि देश कें भरिसालमे कतेक इंजीनियर चाही, कतेक चिकित्सक चाही आ कतेक अध्यापक चाही, एकर आकलन कएनाइ सभसँ आवश्यक। जँ ओ देश केवल अपन घरेलू उत्पादक उपयोग कए पबैत अछि तँ चिकित्सक आ इंजीनियरक अतिरिक्त देशक आवश्यकताक अनुसार सैनिक चाही, पुलिस बल चाही आ पुरोहित सेहो, किछुए संख्यामे सही, चाही। एहि सिद्धान्त कें अपनाए देशक घरेलू आवश्यकताक आकलन अध्ययनक क्षेत्र निर्धारणक लेल पहिल डेग थिक आ आवश्यकताक अनुरूप क्षेत्रक निर्धारण सभसँ उपयुक्त मार्ग थिक।
एहि स्थिति मे कर्मकाण्ड, प्रवचन, ज्योतिष एहि तीनू विषयक भविष्य पर हम किछु कहए चाहब। समाजमे आइयो अपन पारम्परिक कर्मकाण्डक प्रति रुचि छैक। जन्मसँ मृत्यु पर्यन्त कर्मकाण्ड सम्पन्न करओनिहार व्यक्तिक आवश्यकता पडैत छैक। एहि क्षेत्र मे वर्तमान परिदृश्य बड खराब भए रहल अछि। आइ एहन लोक कर्मकाण्डक क्षेत्र मे उतरि रहल छथि जिनका आन कोनो रोजगार नै भेटलनि तँ कर्मकाण्डम उतरि गेलाह। हिनका लग योग्यताक नाम पर केवल जाति बचल रहैत छनि। जखनि कि कर्मकाण्ड करएबाक लेल संस्कृत भाषाक ज्ञान, पद्धतिक ज्ञानक संगहिं वेद, पुराण आ मीमांसा शास्त्रक ज्ञान सेहो अपेक्षित अछि। तें आइ मिथिलो क्षेत्रमे पैघ-पैघ यज्ञ करएबाक लेल वाराणसी आदि स्थानसँ पुरोहित मँगएबाक आवश्यकता भए रहल छैक। एहि स्थिति मे मैट्रिक कएलाक बाद जिनका लग कर्मकाण्डक पारिवारिक पृष्ठभूमि छनि ओ विशेष अध्ययन कए ई क्षेत्र अपनाए सकैत छथि, जाहिमे नोकरीक अपेक्षा नहिं रहतनि। मुदा वर्तमान परिदृश्यक लेल कर्मकाण्डक संग ज्योतिषक ज्ञान सेहो आवश्यक, तखनि विशेष लाभकर सिद्ध होएत। एतए इहो उल्लेखनीय अछि जे वर्तमान मे पटनामे एक राति एक विवाह सम्पन्न करएबाक लेल पाँच हजार सँ एगारह हजार धरि दक्षिणा भेटैत छैक। एकटा तीन दिनुक यज्ञ मे सहायक कें कमसँ कम 6 हजार रुपयाक आमदनी होइत छनि। एहि दृष्टि सँ कर्मकाण्डकें सेहो एक विषयक रूपमे अपनाए ओकर गहन अध्ययन कएल जा सकैत अछि।
एहि क्रममे प्रवचन सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अछि। जनिक स्वर कोमल छनि, किछु गायनमे सेहो रुचि छनि ओ पुराण, वाल्मीकीय रामायण, भागवत एहि सभ पर कथा कहबाक लेल अपनाकें तैयार कए सकैत छथि। हुनका लेल संगीतक किछु ज्ञान आवश्यक होएतनि, संगहिं संस्कृतक अध्ययन आवश्यक छनि, तखनि ओ बीच बीचमे मूल श्लोक कें गाबि चमत्कार उत्पन्न कए सकैत छथि। एक समय छल जहिया संस्कृतक श्लोक कें गएबाक परम्परा समाप्त भए रहल छलैक, मुदा आइ फेरसँ प्रवचन ओहि दिस बढि रहल अछि। स्तरीय श्रोताकें आकृष्ट करबाक लेल संस्कृतक श्लोक गएबाक प्रवृत्ति फेर जोर पकडि रहल अछि। वृन्दावन, काशी, आदि शहरमे अनेक कथा कहनिहार छथि जे सभ दिन संध्यामे अपनहिं घर पर आसन लगबैत छथि आ हुनका लेल भारतीय लाख रुपया मासिक कमाएब कोनो भारी बात नै।
ज्योतिष शास्त्र तँ बुझू जे स्वरोजगारक क्षेत्रमे कामधेनु भए गेल अछि। आइ कुण्डली बनएबाक लेल कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर छैक, पाँच मिनटमे कुण्डली बनाए, अथवा हस्तरेखा देखि फलादेश कएल जा सकैत अछि। अपन ज्योतिष कार्यालय खोलि स्वरोजगारक नीक अवसर भेटैत छैक। आइ जीवनक व्यस्तता मे आ भौतिकवादक बाढिमे सभ अपन भविष्य बुझबाक लेल उताहुल रहैत अछि।
एहि विषय सभसँ एक दिस अपन प्राचीन परम्पुराक संरक्षण होएत आ स्वरोजगारक संभावना बढत। एहि विषयसभसँ स्वरोजगार बढला पर बादमे एकर अध्येताक संख्या सेहो बढत। तेँ आन अनेक विषयक संग एहू सभकें परिस्थितिक अनुसार अपनाओल जेबाक चाही।
मुदा सभसँ महत्तवपूर्ण विषय अछि जे एहि सभ विषयकें जातिवाद सँ ऊपर उठाबए पडतैक। माने ई सभ विषय केवल ब्राह्मणेक धिया-पुता लेल नै, सभक लेल खोलि देल जाए।
एहि सभ विषयक लेल अल्पकालिक प्रशिक्षण सेहो आरम्भ मे देल जा सकैत अछि। कर्मकाण्डक लेल एकर प्रारूप एतए एना अछि-
- प्रशिक्षुकें पहिल खेप तीन दिनक लेल बजाओल जाए। एहि खेप सभ इच्छुक व्यक्तिकँ अवसर देल जाए।
- एहि कार्यशाला मे हुनका पाठ्य-सामग्री देल जएतनि आ ओकर आवश्यकता, ओकरा कण्ठस्थ करबाक लेल मार्ग बुझाओल जेतनि।
- एहि कार्यशालाक बाद प्रशिक्षुलोकनि अपन घर पर देल गेल पाठ्य-सामग्रीकें एक मासमे कण्ठस्थ करताह।
- पुनः एक मासक बाद हुनका लोकनिकें बजाओल जाए आ आवासीय सुविधा दैत 15 दिनुका कार्यशाला चलाओल जाए। एहि सत्रमे ओएह भाग लए सकताह जे पूर्व सत्रमे देल गेल पाठ्यसामग्री कमसँ कम 60 प्रतिशत कण्ठस्त कए नेने रहताह। हुनक परीक्षा लेलाक बाद दोसर सत्र मे प्रवेश भेटतनि। एहू सत्रमे आवासीय सुविधा अनिवार्य।
- एहि प्रकारें दोसर सत्रमे हुनकालोकनिकें सैद्धान्तिक आ प्रायोगिक प्रशिक्षण देल जा सकैत अछि।
नोटः आलेख प्रस्तोता पंडित भवनाथ झा पटना स्थित राजकीय धार्मिक निकाय महावीर मन्दिर केर प्रकाशन एवं शोध अधिकारी केर रूप मे हाल कार्यरत छथि, संगहि गहींर अध्ययन सँ सदैव उचित मार्गदर्शक केर रूप मे मैथिली-मिथिला अभियान हेतु सेहो अपन विशेष योगदान सब दैत रहैत छथि।

1 Comment
Very beautifully laid out and thoughtfully explored. Pandit Bhavnath Jhaji is at the right spot to express his ideas in such a practical fashion. Pravin Babu has been very keen to bring some comparative details from the Western Hemisphere, especially USA. I was committed to do that using a small but practical approach encouraging readers to participate in investigative discussions. I find question-answer modality a very useful approach. Sadly, my input could not be made available in a timely fashion due to a personal emergency at home. My wife is now a lot better and this week I will be sending my piece. With Bhavnathji’s formatted input, I will need to modify my writing to fit the bill. With that done , I will feel a bit less guilty.
Again, thanks for publishing Pt. Jha’s piece to set the standards.
Dr. Manikant Thakur, California.