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कोढिया चाहे हऽ: बियाह लेल गर्हुआर कनियां चाही

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व्यंग्य प्रसंग

lazy fishermanएकटा एहेन कोढि लोक छल जे बंसी पाथि देने छलैक, आ अपने महारे पर छाहरिक गौर मे ओंघरा गेल छल। एकटा कोम्हरौ सऽ कोढियेक गौंआँ छौड़ा आबि ओकर बंसी मे माछ केँ खोंटी करैत देखि ओकरा उठेलकैक – हे रौ! ललित! उठ-उठ! देख माछ खाइ छौ तोहर बंसी मे।

ललित ओकरा जबाब देलकैक – रौ! तऽ कने तोंही देख न दे। वास्तव मे माछ खेबे टा नहि तरैला डूबेलकैक तऽ ओ छौंड़ा माछो ऊपर कय देलकैक। आ कहलकै, “ले सार! २ किलो के रौह ऊपर भेलौ।”

ओ कोढिया कहलकैक, “हे! कने छोड़ा कऽ ओहि खन्ता मे धऽ दही जाहि मे पहिने सऽ दू टा फरी मारिकय तोरे जेकाँ एकटा आरो आयल छल संगी से राखि देने अछि।”

आब ओहि छौंड़ा केँ रहल नहि गेलैक… माछ-ताछ छोड़ाकय ओना ओहो खन्ता मे राखि देलकैक… बोर लगाकय बंसियो पाथि देलकैक। आ कोढियाक निचैन भऽ के सूतल देखि कहलकैक… “हे रौ ललितबा! आब तों बियाह कय ले। धियापुता हेतौक तऽ माछ मारि-मारि खुएतौक।”

तऽ ओ कोढिया कहलकैक, “हे रौ मोहना! हम तऽ बाउ के कय बेर कहलियैक जे देखहक कतहु। मुदा कहाँ कोम्हरौ सऽ घटक एलौ?”

छौंड़ा कहलकैक जे हमहुँ सब ताकि दियौक कि कथा? तऽ ललितबा चट दिना जबाब देलकैक, “हँ रौ! देखहीन न कतहु। मुदा हे ओ गर्हुआर मौगी हेबाक चाही।”

“धियापुता चाही ताहि लेल बियाह करत, मुदा मौगी गर्हुआर चाही!” छौंड़ाक बुझय मे आबि गेलैक जे ई महान कोढिया थीक। एकरा सँ पैघ कोढिया दोसर कियो एहि संसार मे नहि भऽ सकैत अछि। ताबत काल एकटा आरो फरी निकालि ओकरा इज्जत सहित खन्ता मे राखि, बोर लगा ओकर बन्सी पाथि ओ छौंड़ा आगू बढि गेल। कोढिया आराम सऽ पड़ल रहल।

हरि: हर:!!

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