मिथिला के जन-गण-मन में जानकी आज भी बेटी की तरह

विचार

– राजेश झा, राष्ट्रीय महासचिव, मिथिला राज्य निर्माण सेना, दरभंगा (शिक्षाविद्)

rajesh jhaज्ञान से और श्रद्धा से— पर इसमें भी विशेषतः भक्ति के सुलभ राजमार्ग से— जितनी हो सके उतनी समबुद्धि करके लोकसंग्रह के निमित्त स्वधर्मानुसार अपने-अपने कर्म निष्काम बुद्धि से करते रहना ही प्रत्येक आन्दोलनी का कर्तव्य है।

भक्ति किसकी?…. भक्ति वसुधा की…वसुधा कौन?… जो मातृभूमि है। मातृभूमि भक्ति से बढ़कर कोई अन्य सांसारिक कर्म नहीं है।

प्रत्येक आन्दोलनी को अर्जुन की तरह आलस्य को जीतने वाला बनना पड़ेगा। जानकी स्वयं गुडा केशी हैं। गुडाकेशी मतलब जिसने आलस्य को जीत लिया हो। अगर जानकी को पुनः विशिष्ट स्थिति दिलाना है तो निरंतर कार्य करना होगा। यह कार्य छोटा हो या बड़ा, अगर मिथिला के हित का पोषक है तो वह यज्ञ की आहुति है।

मिथिला राज्य निर्माण सेना अब मिथिला केंद्रित हो, इसकी जड़ें मिथिला के छोटे-बड़े सभी इलाकों तक अपनी पहुँच बनाए। हमें यह प्रयास करना है। जानकी जी सर्वग्राह्य हैं। संभवतः मिथिला ही वह क्षेत्र है जो जनकलली को आज भी अपनी बेटी का स्नेह देता है। जानकी के बिंब में देवत्व कम और अपनत्व बोध ज्यादा दिखता है। सीता मिथिला में सिया-धिया की तरह प्रत्येक मनुष्य के हृदय में विराजती हैं। हिन्दू-मुसलमान सबके अंतर्मन में सिया-धिया के लिए एक जैसी स्नेहलता विकसित है। उस स्नेहलता को और सिंचित करना है।

अंतर्मन की व्यथा को बाहर निकलना पड़ेगा। यही इस आंदोलन का प्रारब्ध है, यही इसकी मूल चेतना है। जय मिथिला जय जानकी।