– – – – गजल – – – – –
माँ आइ दिनभरि, तोरे याद केलियौ॥
बुझि पड़ल जिनगी कते संघर्षशील छै
तोहर आँचर सँ, जखने दूर गेलियौ॥
कपड़ा खिचैत काल, भन्सा करैत काल
नै पूछ आर कि काजमे ठेस खेलियौ॥
सच्चे तुँ तऽ भगवानो सँ ओइ पार छेँ,
ई जगमे तोरा सनक लोक नै पेलियौ॥
हे अपन गन्तव्य धरि पहुँचियेक’ रहब,
आशीष दिहँ, सप्पत हम खा’ लेलियौ॥
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© विद्यानन्द वेदर्दी
राजविराज,सप्तरी
हाल:विराटनगर,मोरङ्ग
अध्यन: Isc. 1st Year(शिक्षादीप कलेज,विराटनगर)
2072/06/18 (जितिया पर्वक उपलक्षयमे)


2 Comments
मोन विहवल भ’ गेल ‘बेदर्दी’ जी के ई गजल पढि । सत्ते हुनक मोनक भाव चित्रण भेल अछि एहि रचनामे । विद्यानन्द जी कि करबै ? जिनगीक दोसर नामे त संघर्ष छी । अहाँ अपन जीवनमे पूर्ण सफल होइ सएह शुभकामना ।
Bahut vilakshan aur bhavnapoorn kriti.
Tora chhaahari me khelait kal kahio nahi kahaliyau
Bahuto paristhiti me tohar shaktik roop dekhaliyau
Hamra khatir tu dhata- vdhata San tatpar
Muda hamra shaktik ajasra srot tu hi chhalen se nahi kahahaliyau