लेख विचार
प्रेषित: दिलीप झा ललित
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- पावनि तिहार मे महिलाक योगदान
पावैनक उजासक पाछाँ नारीक मौन श्रम
मिथिलाक पावैन-तिहारक उजास केवल दीप, अरिपन आ मंगलगीतमे नहि, बल्कि ओहि अनगिनत हाथक श्रममे निहित अछि, जे उत्सवक पहिने सँ तैयारीमे जुटि जाइत अछि। एहि श्रममे नारीक योगदान सर्वाधिक व्यापक होइत अछि। मुदा हुनकर बहुतो श्रम एहन अछि जे दिखाइ नहि पड़ैत, गिनल नहि जाइत आ प्रायः ‘घरक स्वाभाविक जिम्मेदारी’ मानि लेल जाइत अछि।
पावैनक एक दिनक उत्सवक पाछाँ नारीक कतेको दिनक तैयारी, चिन्ता, योजना, परिश्रम आ भावनात्मक समर्पण रहैत अछि। एहि अदृश्य श्रमकेँ बुझनाइ पावैनक वास्तविक सामाजिक अर्थकेँ बुझनाइ अछि।
जे श्रम देखाइत अछि, तेँ कम नहि, जे नहि देखाइत अछि, तेँ कमतर नहि। आँगन निपब, घर साफ करब, सामग्री जुटैब, पूरी-पकवान बनायब ई सभ नारीक प्रत्यक्ष श्रम अछि। मुदा एहि सँ पहिने एकटा आरो पैघ प्रक्रिया चलैत अछि। कोन दिन की सामग्री चाही? कतेक अन्न आ फल पर्याप्त होयत? ककरा कोन पकवान पसिन्न अछि? पूजामे कोनो सामग्री छुटि तँ नहि गेल?बच्चा आ बुजुर्गक आवश्यकता कोना पूरा होयत?
एहि सभक उत्तर नारी अपन मोनमे पहिने सँ समेटने रहैत छथि। उत्सवक योजना हुनकर मस्तिष्कमे बनैत अछि, श्रम हाथमे उतरैत अछि आ परिणाम पूरा परिवार उपभोग करैत अछि।
अदृश्य श्रमक एकटा महत्वपूर्ण पक्ष अछि मानसिक दायित्व। पावैनक तैयारीक बीचोबीच घरक सामान्य दिनचर्या रुकैत नहि अछि। भोजन, बच्चाक देखभाल, बुजुर्गक आवश्यकता, अतिथिक स्वागत आ अन्य घरेलू कार्य निरन्तर चलैत रहैत अछि।
अर्थात नारी पावैन लेल अलग सँ समय नहि निकालैत छथि। ओ प्रायः अपन सामान्य जिम्मेदारीक ऊपर उत्सवक अतिरिक्त भार जोड़ि लैत छथि।
पावैन परिवारक लेल आनन्दक अवसर अछि, मुदा नारी प्रायः एहि आनन्दक व्यवस्था करैत-करैत अपन थकानकेँ पाछाँ छोड़ि दैत छथि। परिवारक प्रत्येक सदस्य उत्सवक सुख अनुभव करय, घरमे कोनो कमी नहि रहय, वातावरणमे प्रसन्नता बनल रहय ई भावनात्मक जिम्मेदारी सेहो हुनके ऊपर रहैत अछि।
कतेको बेर हुनकर अपन थकान, इच्छा वा असुविधा उत्सवक आवश्यकताक पाछाँ दबि जाइत अछि। एहि त्यागकेँ सामान्य मानि लेब सेहो अदृश्य श्रमकेँ अदृश्ये राखब अछि।
संस्कृतिक श्रम जेना परम्पराकेँ स्मृतिसँ व्यवहार धरि आनब हूनके हिस्सा मे रहैत अछि। पावैनक विधि कोन क्रमसँ होयत, कोन गीत कहिया गाओल जायत, अरिपनमे कोन आकृति बनत, कोन पकवानक परम्परागत विधि की अछि ई सभ नारी अपन स्मृतिमे संजोने रहैत छथि।
माय बेटीकेँ केवल पकवान बनायब नहि सिखबैत छथि, ओ ओकरा संग जुड़ल कथा, लोकविश्वास आ संस्कार सेहो हस्तान्तरित करैत छथि। एहि प्रकारेँ नारीक अदृश्य श्रम लोकस्मृतिक संरक्षणक कार्य सेहो अछि।
पावैनक अवसरपर नारीकेँ केवल ‘व्रत करनिहार’ अथवा ‘घर सम्हारनिहार’ कहि सीमित करब हुनकर योगदानकेँ छोट करैत अछि। ओ एक संग योजनाकार, श्रमिक, परिचारिका, संस्कृतिकर्मी आ परिवारक भावनात्मक आधारक भूमिका निभबैत छथि।
तेँ पावैनक तैयारीमे हुनकर श्रमक बाँटब मात्र पर्याप्त नहि, ओहि श्रमक पहचान आ सम्मान सेहो आवश्यक अछि। परिवारक अन्य सदस्य सामग्री जुटैब, सफाइमे हाथ बँटैब, बच्चाक देखभाल करब वा पकवानक तैयारीमे सहभागी होथि तखन पावैनक उत्सव अधिक साझी आ मानवीय बनत।
मिथिलाक पावैन-तिहारमे नारीक योगदान दीपक लौ जकाँ अछि। प्रकाश सभकेँ देखाइत अछि, मुदा बाती आ तेलक मौन तपस्या प्रायः नहि।
अरिपनक सौन्दर्य, प्रसादक स्वाद, पूजाक पूर्णता आ घरक मंगल वातावरणक पाछाँ हुनकर जे समय, श्रम, चिन्ता, योजना आ स्नेह लागल अछि, से पावैनक अव्यक्त इतिहास अछि।
नारीक अदृश्य श्रमकेँ दृश्य बनायब कोनो उपकार नहि, ई हुनकर योगदानकेँ ओकर उचित मान्यता देब अछि। कारण पावैनक वास्तविक मंगल तखनहि पूर्ण होयत, जखन उत्सवक उजासक संग ओहि उजासकेँ सम्भव बनौनिहारक हाथ सेहो सम्मानित होयत।
